काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 339, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद ३२५
विलफोर्ड (Major Wilford) लुइस् ज्याकोलिओट् (Louis Jacolliot) आदि¹ विद्वानों ने भी प्रतिपादन किया है कि मिश्र में सभ्यता, कला तथा स्मृति आदि का ज्ञान भारत से ही गया था।
‘पाश्चात्य विद्वान् आधे मन से स्वीकार करते हैं कि भारतीय भेषज्य विद्या का प्रभाव ग्रीस देश की चिकित्सा पर पड़ा है। मिश्र, पर्शिया तथा अरब द्वारा भारतीय चिकित्सा विज्ञान ग्रीस में पहुंचा है तथा इन देश वालों ने भी इसे भारत से प्राप्त किया है’ इसप्रकार अपना मत प्रकट करते हुए जे. जे.² मोदी ने वाइज् नामक विद्वान् का मत दिया है कि ‘सब देशों की चिकित्सा पद्धतियों का मूल एक ही है। पाथागोरस अथवा हिपोक्रिटस के पूर्वजों ने ग्रीसदेश में जिस चिकित्सा विज्ञान का सर्वप्रथम ग्रहण किया था वह मिश्र देश के विद्वानों की सहायता से ही प्राप्त किया था तथा मिश्र वालों ने भी इसे रहस्यपूर्ण पूर्व देश से प्राप्त किया था’। इस विषय में मोनियर विलियम्स³ (M. Monier Weillams) नामक विद्वान् का भी कहना है कि प्राचीन यूरोप के राष्ट्रों की उन्नति से पूर्व ही भारत ने ज्योतिष, गणित, विज्ञान तथा भेषज्य आदि विद्याओं में उन्नति कर ली थी। सभ्यता तथा ज्ञान के तत्त्व का प्रारम्भ पूर्वदेश में हुआ था तथा वहीं से ही वह पश्चिम दिशा में फैला था। इसके विपरीत वह पश्चिम से पूर्वदेशों में नहीं फैला है।
१. सर विलियम जोन्स ने रायल एशियाटिक सोसाइटी की रिपोर्ट में यह विश्वास व्यक्त किया है कि मिश्र बहुत प्राचीन काल में भारतीय आर्यों का उपनिवेश था। मेज़र विल्फोर्ड सरीखे लेखकों का मत था कि पुराणों का ‘मिश्रस्थान’ मिश्र से भिन्न नहीं था। दूसरी ओर इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिला है कि मिश्रवासियों ने भारत का प्रवास किया हो। इस प्रकार के प्रमाणों से कई यूरोपीय लेखकों ने जिनमें लुइस् जेकोलियट् प्रधान है—यह स्थापना की है कि मिश्र ने यूनान को सभ्यता का पाठ पढ़ाया और यूनानियों से रोम को सभ्यता का दान मिला। मिश्रने अपनी कला, संस्कृति और विज्ञान भारत से प्राप्त किया। मिश्र की चिकित्सा प्रणाली में ऐसा कोई तत्त्व नहीं है जो आयुर्वेद में न हो लेकिन इसके विपरीत आयुर्वेद में जो कुछ है उसका बहुत बड़ा अंश मिश्र की चिकित्सा प्रणाली में नहीं है।
(Short History of Aryan Medical Science P. 194-195)
२. ऐसा प्रतीत होता है कि यूनानी ओषधियों पर भारतीय ओषधियों के प्रभाव को आधे दिल से स्वीकार किया गया है तथा यह स्वीकार करते हुए वह मिश्र, इरान तथा अरब के माध्यम से यूनानी चिकित्सा पर भारत के अप्रत्यक्ष (Indirect) प्रभाव को भूल गया प्रतीत होता है। अब यह सिद्ध हो चुका है कि यूनानी चिकित्सा विज्ञान अपने ज्ञान के लिये बहुत अंश तक इन देशों की ऋणी हैं.......और इस प्रकार वह चिकित्सा संबन्धी ज्ञान के लिये भारत की ऋणी है। हिपोक्रिटस तथा पाथागोरस ने यूनानी चिकित्सा पर भारत के अप्रत्यक्ष प्रभाव का वर्णन किया है.......। डॉ. वाइज ने अपनी पुस्तक ‘Hindu System of Medicine’ में लिखा है कि इन सम्पूर्ण चिकित्सा पद्धतियों का कोई एक सामान्य स्त्रोत है......यूनानी तत्त्ववेत्ताओं (दार्शनिकों) को मिश्र के महात्माओं से सहायता प्राप्त हुई थी तथा इन मिश्र के महात्माओं ने अपना बहुत कुछ ज्ञान पूर्व के किसी रहस्यपूर्ण देश से प्राप्त किया था।
(Fourth Indian Oriental Conference Vol. II P. 426)
३. (a) यूरोप के बहुत से अतिप्राचीन राष्ट्रों द्वारा विविध विज्ञानों के परिचय और प्रयोग को जानने से पर्याप्त पहले ही हिन्दू लोगों ने ज्योतिष शास्त्र, बीजगणित, अंकगणित, वनस्पतिशास्त्र और चिकित्सा शास्त्र में विशेष उन्नति करली थी। व्याकरण में तो उनकी उच्चता का संकेत करने की आवश्यकता ही नहीं है।
(M. Monier Williams)
(संस्कृत इंगलिश डिक्शनरी पृ. सं. २१)
(b) सभ्यता और ज्ञान के तत्त्वों का उद्गम सदा प्राची से ही हुआ है। उनका प्रसार भी प्राची से प्रतीची की ओर हुआ है, न कि पश्चिम से पूर्व की ओर।
(संस्कृत इंगलिश डिक्शनरी पृ. सं. २३.)