काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 340, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३२६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् |
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प्राचीन समय में सिन्धु नदी के पार के देशों को भी सम्मिलित करके तात्कालिक केन्द्र तक्षशिला१ तथा शरावती आदि के आसपास के देशों से पूर्व में आसाम तथा उत्तर में चोल आदि देशों तक एकात्म्य रूप से अत्यन्त प्राचीन काल से प्रतिष्ठित भारत के पश्चिम में स्थित मिश्र आदि पड़ोसी देशों से परम्पर यातायात, सम्पर्क तथा परिचय आदि के न होने में कौनसी बड़ी भारी दूरी बाधक थी ?
वैदिक काल में भुज्यु आदि के अन्य द्वीपों में जाने, पिता द्वारा देश से निकाल दिये गये अनुद्रुह्यु तथा तुर्वसु के अन्य द्वीपों में जाकर नये वंश का प्रवर्तन तथा पाण्डवों द्वारा दूर-दूर देशों में भी विजय आदियों के वृत्तान्त के मिलने से भारतीयों का अन्य देशों में आवागमन प्रतीत होता है। ऋग्वेद आदियों में भी सामुद्रिक नावों का उल्लेख तथा प्राचीन ग्रन्थों में सामुद्रिक व्यापारियों की शुल्कव्यवस्था का उल्लेख मिलता है। वेद में अन्य देशों में जाने वाले एक पृथक् श्रेणी के रूप में विद्यमान व्यापारियों का 'पणि' नाम से निर्देश मिलता है। ए. सी. दास२ का कहना है कि इन्हीं व्यापारियों ने ही पश्चिम एशिया, ग्रीस, मिश्र तथा सेमेटिक प्रदेशों में भारतीय प्रभाव डाला है। महाजनक तथा शङ्ख३ नामक जातकों में भी भारतीय व्यापारियों के सिंहल, बेबिलोनिया, तथा सुवर्णभूमि (दक्षिण पूर्व एशिया) आदि प्रदेशों में जाने का उल्लेख मिलता है। कालिदास ने भी रघु को लक्ष्य करके पारसीक४ देश (पार्शिया) तक स्थल मार्ग से जाने का उल्लेख किया है। बाद में भी चीन से खोतान घाटी के रास्ते स्थलमार्ग से भारत में आये हुए फाहियान नामक चीनी यात्री के सीलोन (लंका) से जलमार्ग के द्वारा अपने देश चीन को लौटने के, ग्रीस तथा रोम में जलमार्ग से ही सुविधापूर्वक पहुँच सकने वाले भारतीय हाथी तथा शेर आदियों के ले जाने के वृत्तान्त से, पश्चिम दिशा में भी भारत से शीघ्र लौटने वाले यवनराज अलेक्जेण्डर की महान् सेना के लिये पर्याप्त नौकाओं की उपस्थिति के अनुसन्धान से तथा मिश्र, मेसोपोटेमिया आदि देशों में जलमार्ग के ही अनुकूल होने से यह स्पष्ट है कि भारत क पाश्चात्य देशों के साथ प्राचीन काल से ही परस्पर यातायात, परिचय तथा सम्पर्क आदि का व्यवहार अवश्य था।
धन्वन्तरि आदियों की प्राचीनता
भारतीय आयुर्वेद रूपी स्त्रोत के मूल उद्गम का अनुसन्धान करने पर प्रतीत होता है कि उपलब्ध आयुर्वेदिक ग्रन्थों के आचार्य रूप में निर्दिष्ट धन्वन्तरि, दिवोदास, काश्यप, आत्रेय, अग्निवेश, भेड तथा सुश्रुत आदियों का समय अर्वाचीन नहीं है। धन्वन्तरि का महाभारत, हरिवंशपुराण अन्य पुराणों (पृ. २९), मिलिन्दपह्हो नामक पालीग्रन्थ (पृ. ३०) तथा अयोधर जातक (पृ. ३१) आदि में उल्लेख मिलने से, भीमसेन के पुत्र दिवोदास का हरिवंश, महाभारत तथा काठकसंहिता में और प्रतर्दन के पिता के रूप में दिवोदास का कौषीतकि ब्राह्मण, कौषीतकि उपनिषत् (पृ. २९) कात्यायनीय ऋक्सर्वानुक्रम (पृ. ३०) तथा महाभाष्य में निर्देश होने से, दिवोदास द्वारा स्थापित वाराणसी का महावग्ग आदि में उल्लेख मिलने से (पृ. २९-३०) मारीच कश्यप का महाभारत, ऋक्सर्वानुक्रम, बृहद्देवता (पृ. १८) तथा अथर्व सर्वानुक्रम में निर्देश होने से, भेड द्वारा निर्दिष्ट गान्धार के नग्नजित् का ऐतरेय तथा शतपथ ब्राह्मण में (पृ. ५२) निर्देश होने से, भेड का आत्रेय के शिष्य तथा गान्धार के नग्नजित् के साथी के रूप में निर्देश होने से, आत्रेय का मारीचकश्यप द्वारा, वाक्योद्धार सहित आचार्य रूप में भेड द्वारा तथा कृष्णात्रेय नाम से महाभारत में निर्देश होने से तथा भारद्वाज का भी महाभारत में निर्देश होने से ये भारद्वाज, धन्वन्तरि, दिवोदास, आत्रेय, मारीचिकश्यप, नग्नजित् दारुवाह तथा वार्योविद आदि परस्पर सन्निकृष्ट संबन्ध होने से उपनिषत् कालीन आचार्य प्रतीत होते हैं जिसका पहले भी कई स्थानों पर निर्देश किया जा चुका है। उपनिषदों के विषय में विचार करने पर कौषीतकि तथा ऐतरेय का समय चिन्तामणि विनायक वैद्य महोदय ने ईस्वी पूर्व २५०० वर्ष तथा ज्योतिष गणना के अनुसार दीक्षित ने ईस्वी पूर्व १८५०-२९०० निश्चित किया है। पाली तथा
१. १-४ की टि. सं. उपो. पृ. १४५ में देखें।