काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद ३२७
महावग्ग के लेख, सिंहल तथा ब्रह्मदेश की गाथाओं और तिब्बतीय मूल लेखों के अनुसार आत्रेय के ही जीवक के गुरु होने में प्रमाणों के न मिलने से, आत्रेय के तक्षशिला के उत्थान के बाद में होने पर पाञ्चाल तथा गङ्गाद्वार के आसपास के प्रदेशों में घूम-घूम कर उपदेश देने वाले आत्रेय के द्वारा विद्यापीठ के रूप में प्रसिद्ध तक्षशिला का अवश्य उल्लेख होना चाहिये था, परन्तु उसके नाम का भी निर्देश न होने से तथा मारीच कश्यप द्वारा नाम का उल्लेख होने से आत्रेय पुनर्वसु के प्राचीन ही सिद्ध होने से तिब्बतीय कथाओं के अनुसार जीवक के गुरु आत्रेय को बुद्धकालीन मानने की शङ्का ठीक नहीं है। जीवक के गुरु के आत्रेय होने पर भी वह गोत्रनाम से व्यवहृत कोई अन्य आत्रेय भी हो सकता है। जे. जे.१ मोदी सुश्रुत का समय ईस्वी पूर्व १५०० तथा डोरोथिया च्यापलिन ने धन्वन्तरि का समय हिपोक्रिटस के समय से १२०० वर्ष पूर्व माना२ है। श्रीयुत अक्षयकुमार मजूमदार ने विदेह के राजा जनक का समय ईस्वी पूर्व २५००, अगस्त्य का समय ईस्वी पूर्व २२००, जाबाल का समय ईस्वी पूर्व २०००, जाजलि का ईस्वी पूर्व १९००, पैल का ईस्वी पूर्व १८००, कवथ का ईस्वी पूर्व १८००, धन्वन्तरि का ईस्वी पूर्व १६००, भीमस्थ के पुत्र दिवादास का ईस्वी पूर्व १५०० तथा चरक और सुश्रुतसंहिता के समय क्रमशः ईस्वी पूर्व १४०० तथा १५०० माने हैं३। F. E. Keay४ का कथन है कि 'भारत में भैषज्य विद्या भी बहुत प्राचीन काल से ही उन्नत थी'। जे. सी.५ चटर्जी का मत है कि ईस्वी पूर्व १५०० से ५०० तक धर्म, दर्शन, विज्ञान, कला, सङ्गीत तथा भैषज्य विद्या में कोई भी दूसरा राष्ट्र भारत की तुलना तथा स्पर्धा करने योग्य नहीं था।
मिश्र देश के विद्वानों तथा हिपोक्रिटस के लेखों के समान प्राचीन धन्वन्तरि, आत्रेय तथा कश्यप आदियों के मूल ग्रन्थों में पीछे संस्करण के समय कुछ अर्वाचीन विषयों के प्रवेश के मिलने पर भी, जिस प्रकार प्राचीन मन्दिरों को नूतन शिल्प आदि के द्वारा जीर्णोद्धार करने पर भी उन्हें सर्वांश में नूतन नहीं कहा जा सकता उसी प्रकार यहां भी उनकी प्राचीन मौलिकता में कोई व्याघात नहीं पहुंचता है।
प्राचीन काल में सुमेरिया तथा मिश्र देशों की उस उन्नत सभ्यता के मिलने से उसका सहयोगी भारत उस समय मोह निद्रा में सोया हुआ हो, इसकी सम्भावना नहीं हो सकती। मिश्र देश के भूगर्भ से मिले हुए शवों के शरीरों में
१. शल्यतन्त्र (क्रियात्मक शारीर) के विषय में लिखते हुए श्री जे.जे. मोदी महाशय लिखते हैं कि भारतीय शल्यशास्त्र के पिता सुश्रुताचार्य ईसा से १५ वीं सदी पूर्व हो गये हैं। (F. J. O. C. Vol. II P. 415-16.)
२. भारतीय चिकित्सा शास्त्र के संस्थापक धन्वन्तरि ने हिपोक्रेटस से कोई १२०० वर्ष पूर्व यह घोषित किया था कि आरोग्य भावात्मक वस्तु है और रोग नकारात्मक। इस नकारात्मक से भावात्मक की ओर जाने की समस्या को हल करने के लिये ही धन्वन्तरि ने बीड़ा उठाया था।
(Some Aspect of Hindu Medical Treatment
P. 11 by (Dorothea Chaplin)
३. इसकी टि. सं. उपो. पृ. १४६ में देखें।
४. धर्मशास्त्र (कानून शास्त्र) की तरह चिकित्सा शास्त्र का भारतवर्ष में पर्याप्त पहले ही विकास हो चुका था।
(Ancient Indian Education P. 42 By F.E. Keay)
५. तथ्य तो यह है कि १५०० ई. पू. से ५०० ई. पू. तक में भारतीय लोग धर्म, अध्यात्म, दर्शन, विज्ञान, कला, संगीत और चिकित्साशास्त्र में इतने अधिक आगे बढ़ गये थे कि अन्य कोई जाति इनकी स्पर्धा में नहीं खड़ी हो सकती थी और ज्ञानविज्ञानों की इन शाखाओं में से किसी में भी उनका मुकाबला कोई नहीं कर सकता था।
(J. C. Chatterji-The wisdom of the Hindus Edited
by Brian Brown P, 25.)
२२ का.सं.