भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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३२८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

कपालभेद के सन्धान के चिह्न मिलते हैं जिनका आजकल के अत्यन्त कुशल शल्यचिकित्सकों द्वारा भी समर्थन किया जाता है। ऐतिहासिकों के अनुसार मिश्र देश में विक्रमसंवत् के प्रारम्भ से २५० वर्ष पूर्व (B. C. 301) शल्य विद्या की उन्नत अवस्था तथा उसके २०० वर्ष बाद उसी के अनुसार ग्रीस देश में भी शल्य विद्या के उदय का उल्लेख मिलता है सुश्रुत के शल्य विज्ञान में अन्य देशों की शल्य विद्या की छाया न मिलने से सुश्रुत का समय अन्ततोगत्वा भी २६०० वर्ष से अर्वाचीन सिद्ध न होने से तथा पाश्चात्य विद्वानों द्वारा भी इस मत का समर्थन किया जाने से प्रतीत होता है कि अन्य देशों से पूर्व ही सुश्रुत के समय भारतीय शल्य विद्या प्रौढावस्था में पहुंची हुई थी। काश्यपसंहिता तथा आत्रेयसंहिता में भी शल्य विद्या का उल्लेख होने से इससे पूर्व भी उसके प्रचार के होने का परिचय मिलता है। महावग्ग तथा जीवक के इतिहास में भी कपालभेदन तथा आन्त्रवेधन आदि शल्यप्रस्थानीय तथा प्रस्थानान्तरीय भैषज्यों में भारत में विशेष कुशलता दिखाई देती है। उससे पूर्व भी रामायण तथा महाभारत के युद्धों में जब घायल व्यक्तियों के शरीरों में चुभे हुए बाण आदि शल्यों को निकालने की आवश्यकता होती थी उस समय भी उनको निकालने का ज्ञान होने से शल्योद्धरण विद्या नाम से शल्यविद्या की उपस्थिति की सूचना मिलती है। इतना ही नहीं अपितु आयुर्वेदीय प्रवाह के निरन्तर प्राचीन उद्गम की आलोचना करने पर हम देखते हैं कि अथर्ववेद तथा ऋग्वेद में भी भग्नसंधान आदि शल्य विषय उपलब्ध होते हैं।

प्रत्येक देश तथा काल में भारतीय स्त्रोतों की व्याप्ति

इस आयुर्वेद विज्ञान में केवल धन्वन्तरि, आत्रेय, कश्यप तथा भेड आदि—जिनके कि ग्रन्थ उपलब्ध हैं—वे ही मूल आचार्य नहीं हैं अपितु पीछे एक-एक प्रस्थान के आचार्य कश्यप, आत्रेय तथा सुश्रुत आदियों द्वारा कुछ पूर्व आचार्यों का नाम पूर्वक निर्देश किया गया है तथा कुछ को बिना नाम के 'परे' 'अपरे, इत्यादि शब्दों से ही सूचित किया गया है। प्राचीन भारद्वाज तथा आश्विन आदि भी संहिताओं के कर्ताओं के रूप में प्रसिद्ध हैं। आजकल कालक्रम से आश्विन आदि संहिताओं के न मिलने पर भी उनका विषय तथा उनके वचनों के उद्धरण आदि ताडपत्रीय ज्वरसमुच्चय आदि प्राचीन वैद्यक ग्रन्थों में मिलते हैं। आयुर्वेद के ग्रन्थों से अश्वि, इन्द्र, भरद्वाज आदि मूल आचार्यरूप में तथा उन्हीं की परम्परा के द्वारा इस सम्प्रदाय का प्रसार हुआ मिलता है। अश्वि, इन्द्र आदियों का वेदों में भी वैद्य के रूप में उल्लेख किया गया है। इस सम्प्रदाय परम्परा के कारण भारतीय स्त्रोत अत्यन्त उन्नत अवस्था में है। वैदिक काल से ही आयुर्वेद का उदय तथा उसकी समृद्धि प्रकट होती है। इस प्रकार अत्यन्त प्राचीन काल से ही वैदिक विज्ञान रूपी विशाल शैली से निकल कर यह आयुर्वेद रूपी स्त्रोत भिन्न-भिन्न आचार्यों की विचार धाराओं से वृद्धि को प्राप्त होता हुआ अनेक देशों एवं कालों में व्याप्त हो गया। यह भारतीय स्त्रोत वंशाङ्कुरों के समान केवल उपरिभाव से ही विद्यमान नहीं था अपितु नाना देशों के अनेक आचार्यों का अनुसन्धान करने पर चारों ओर फैला हुआ मिलता है।

डल्लण ने काङ्कायन का सुश्रुत के सतीर्थ्य (सहाध्यायी) के रूप में निर्देश किया है। आत्रेय ने इसका 'बाहीकभिषक्' तथा 'बाहीकभिषजां वर:' इत्यादि पदों द्वारा बाहीक देश के उत्कृष्ट वैद्य के रूप में निर्देश किया है। मारीच कश्यप ने भी नामपूर्वक इसका मत दिया है। इस प्रकार यह काङ्कायन भी उस समय के लोगों द्वारा ज्ञात दूसरे देश का प्राचीनतम आचार्य प्रतीत होता है। बाहीक देश के मुख्य वैद्य रूप में प्रसिद्ध इस काङ्कायन का दिवोदास के शिष्य के रूप में निर्देश होने से प्रतीत होता है कि भारतीय भैषज्य विद्या न केवल भारत में ही अपितु अन्य देशों में भी आदर्शरूप में प्रचलित थी, तथा यह भी ज्ञात होता है कि भारत के भिन्न-भिन्न प्रदेशों के समान अन्य देशों से भी लोग इस विद्या की प्राप्ति के लिये जिज्ञासु एवं शिष्यरूप में यहां आते थे। यदि उसे दिवोदास का शिष्य न भी माना जाय तो भी भारतीय प्राचीन आचार्यों द्वारा उसके मत का निर्देश कियां होने से उनका परस्पर परिचय तो स्पष्टरूप से था ही।

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