भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद ३२९

सुश्रुत के लेख से ज्ञात होता है कि न केवल काङ्कायन अपितु औषधेनवष वैतरण, औरभ्र, पौष्कलावत, करवीर्य, गोपुररक्षित तथा भोज आदि भी दिवोदास के शिष्य थे। अयोधर नामक पालीजातक में बुद्ध के पूर्वजन्म के उल्लेख में अतीत वैद्य धन्वन्तरि के साथ मिलनेवाले सुश्रुत के सतीर्थ्य भोज तथा वैतरण का उल्लेख भी इनके प्राचीन संबन्ध को सिद्ध करता है। इस प्रकार प्रतीत होता है कि ये औषधेनव आदि आचार्य प्राचीन काल के तथा विभिन्न देशों के थे।

पौष्कलावत, करवीर्य तथा औरभ्र आदि आचार्यों के विषय में विचार

प्राचीन आचार्यों के नाम प्रायः पिता, माता, आचार्यगोत्र, देश अथवा किन्हीं असाधारण गुणों के अनुसार होते थे। इसलिये प्राचीन व्यक्तियों के नामों को देखकर यह स्वाभाविक जिज्ञासा होती है कि इनके नामों का मूल (आधार) क्या है। इसलिये पौष्कलावत आदि नाम भी किसी देश अथवा व्यक्ति विशेष के अनुसार 'तत्र जातः' अथवा 'तत्र भवः' अर्थ में प्रयुक्त किये गये प्रत्ययों सहित बने हुए प्रतीत होते हैं।

पुष्कलावत नाम का कोई भी व्यक्ति भारतीय इतिहास में नहीं मिलता है। किन्तु यह शब्द देश विशेष के बोधक के रूप में मिलता है। इसलिये 'पुष्कलावत नामक देश में होने वाले' इस अर्थ को लेकर देश के अनुसार यह नाम प्रयुक्त किया गया प्रतीत होता है विष्णुपुराण¹ के अनुसार पौष्कलावत भरत के पुत्र पुष्कल द्वारा स्थापित देश है। बाल्मीकि रामायण² में भी इसका उल्लेख मिलता है। वेदों में आये हुए आसन्दीवत्, पस्त्यावत्, शर्यणावत् इत्यादि तथा महाभारत के वारणावत् आदि नामों के सदृश होने से यह पौष्कलावत भी भारत के पश्चिम विभाग का कोई प्राचीन देश प्रतीत होता है। गान्धार राज्य की प्राचीन राजधानी का यह नाम था। अलेक्जेण्डर के आगमन के समय भी यह नगरी गान्धार में प्रधानरूप से विद्यमान थी। एरियन्-स्ट्रैबो तथा टालेमी आदि बहुत से प्राचीन ग्रीक विद्वानों द्वारा भी सिन्धु के समीप महानगरी के रूप में इसका उल्लेख होने से प्रतीत होता है कि यह ग्रीक लोगों द्वारा विशेषरूप से परिचित तथा उल्लिखित³ थी। यह पौष्कलावत नामक आचार्य उसी देश का प्रतीत होता है। सुश्रुत द्वारा विशेषरूप से शल्यप्रधान⁴ तन्त्र के कर्ता के रूप में इसका निर्देश होने से प्रतीत होता है कि प्राचीन काल में गान्धार देश की भी शस्त्रचिकित्सा में प्रतिष्ठा थी।

करवीर्य शब्द भी 'करवीर देश में होने वाले' अर्थ का सूचक प्रतीत होता है। करवीरपुर⁵ का दृषद्वती के किनारे पर होने का उल्लेख मिलता है। कालिका पुराण में भी करवीरपुर का उल्लेख है। दृषद्वती वेद में भी प्रसिद्ध थी। करवीर पुर में होने के अनुसार उसका यह होने से इस आचार्य का यह स्थान प्रतीत होता है। अथवा शस्त्रचिकित्सक होने से हाथ में कुशलतारूप वीर्य को धारण करने के (हस्तकुशल) कारण भी संभवतः इस आचार्य का यह (करवीर्य) नाम हो।

इसके अतिरिक्त ईरानदेश के प्राचीन अवेस्ता ग्रन्थ के वेन्दिदाद नामक भैषज्य प्रकरण में उस देश की शल्य चिकित्सा के मूल आचार्य का क्षथ्रवैर्य नाम से उल्लेख मिलता है। आजकल व्यवहृत होने वाले वेन्दिदाद शब्द का प्राचीन स्वरूप 'विदैवोदात'⁶ कहा जाता है। वैदिकसम्प्रदाय में सुन्दर भावों के बोधक सुर, देव आदि शब्दों में विपरीत (असुन्दर) अर्थ को सूचित करने के लिये असुर तथा विदेव आदि प्रयोग मिलते हैं। उसी न्याय से दैवोदात शब्द में 'दिव' शब्द के साथ 'वि' शब्द लगाकर भैषज्य विद्याविभाग का बोधक 'विदैवोदात' शब्द दिवोदास सम्प्रदाय का ही अपभ्रंश रूप हो सकता है। थ्रित नामक वैद्य ने अहुरमज्ड से ओषधियों तथा क्षथ्रवैर्य और सोहरवर से कायचिकित्सा तथा शस्त्रचिकित्सा में शिक्षाग्रहण की, इस उल्लेख से उस देश में शस्त्रचिकित्सा का प्रारंभ करने वाला क्षथ्रवैर्य⁷ सिद्ध होता है। थ्रि नामक वैद्य के भी आचार्यरूप में निर्दिष्ट क्षथ्रवैर्य तथा सोहरवर कौन हैं—इस पर विचार करने पर हम देखते हैं कि विदैवोदात शब्द में दिवोदास शब्द का सादृश्य होने से उसके साहचर्य से चिकित्सा विज्ञान में सोहरवर की सुश्रुत से तथा


१. १-७ की टि. सं. उपो. पृ. १४८ में देखें।