भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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३३० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

शल्यचिकित्सा विज्ञान के प्रारंभिक क्षथ्रवैर्य की दिवोदास के शिष्य, शल्यप्रस्थान के आचार्य तथा सुश्रुत के सतीर्थ्य करवीर्य से शब्दों तथा कार्यों में समानता दिखाई देती है। भारत के प्राचीन आचार्यों के निर्देशानुसार बाह्लीकभिषक् कांकायन का भारत से परिचय की तरह वेन्दिदाहा के लेख के अनुसार दिवोदास, सुश्रुत, करवीर्य आदि भारतीय आचार्यों का इरान से परिचय प्रकट होता है। अवेस्ता नामक ग्रन्थ में भारतीय शब्दों तथा विषय की समानता का पूर्व वर्णन किया जा चुका है। उसमें आये हुए रोगों में भी हमें निम्न समानताएं मिलती हैं—

अथर्ववेदअवेस्ताअर्थ
तक्मन्तफ्नुज्वर
अप्वाअजह्वअपवाह
पामा (सुश्रुत में भी)पामन्चर्मरोग
शीर्षक्तिःसारस्त्यशिरोरोग
सारणःसारन¹

इसी प्रकार कुरुघ (दुष्टव्रण), दुरूक् (अश्मरी), अघोस्ति (शीर्णास्थि), दङ्गु (ज्व) र इत्यादि शब्द भी क्रमशः कुरुक्, दृषत्, अस्थि तथा दाह आदि संस्कृत शब्दों के अपभ्रंश प्रतीत होते हैं। अन्य भी बहुत से शब्दों में समानता तथा प्रतिच्छाया मिलती है। अवेस्ता में मानसिक तथा शारीरिक दो प्रकार² के स्वास्थ्य का वर्णन मिलता है। सुश्रुत में भी 'पुनश्च द्विविधाः—शारीरा, मानसाश्च' (सू. अ. २४) द्वारा द्वैविध्य का उल्लेख किया गया है। अवेस्ता में मन्त्र (मन्त्र), उर्वर (उर्वीरुह) तथा केरेत (कर्तिका, कर्तरी अथवा करपत्र) द्वारा मन्त्र, वानस्पतिक ओषधियां तथा शस्त्ररूप तीन प्रकार के रोगनिवर्तन³ के उपायों का वर्णन किया है। भारतीय भैषज्य सम्प्रदाय में भी ये ही मन्त्र, ओषधि एवं शस्त्ररूप तीन रोगप्रतीकार के उपाय मिलते हैं। अवेस्ता में 'गौकिरन'⁴ शब्द (जिसका बाद में गोकार्त रूप हो गया है) का प्रधान औषधवृक्ष के रूप में निर्देश किया गया है जो कि अश्वगन्धा के संस्कृत पर्याय गोकर्ण शब्द की विकृति प्रतीत होती है। अश्वगन्धा का आयुर्वेद में भी बहुत माहात्म्य लिखा गया है। दोनों सम्प्रदायों में सोम का यज्ञ तथा ओषधि दोनों रूपों में उपयोग मिलता है। अवेस्ता में भैषज्यविज्ञान, वैद्य, रोग तथा रोगनिवृत्ति के उपाय आदि चिकित्सा के चार⁵ पादों का वर्णन मिलता है। आयुर्वेद में भी धन्वन्तरि⁶, कश्यप, आत्रेय तथा भेड आदियों ने थोड़े बहुत भेद के साथ भैषज्यविज्ञान, वैद्य, रोगी एवं परिचारकरूप चतुष्पाद सिद्धान्त का ही वर्णन किया है। थ्रित द्वारा अहुरमज्द से विषप्रतीकार के लिये ‘विसचित्त’ तथा शल्यचिकित्सा के लिये सौवर्णाग्र छुरिका प्राप्त करने का वर्णन⁷ मिलता है। ‘विसचित्त’ शब्द में


१. सारण तथा सारन शब्दों में शाब्दिक समानता होते हुए भी, अथर्ववेद में अतिसार तथा अवेस्ता में शिरोरोग का बोधक होने से अर्थ में भेद है।
२. २-४ तक की टि. सं. उपो. पृ. १४९ में देखें।
५. यह एक अद्भुत संकेत है कि भारतीय चिकित्साशास्त्र के भी चार पाद बताये गये हैं। उनकी गणना चिकित्सक, रोग, औषध और परिचारक के रूप में की गई है जब कि हिपोक्रेटस ने केवल तीन ही भाग किये हैं।
(de morb, vulg i L.) E. R. E. Vol. IV P. 759 by L. C. Casartelli.
६. इसकी टि. सं. उपो (पृ. १४९ में देखें।
७. (a) क्षथ्रवैर्य धातुओं का प्रथम प्रयोग करने वाला था। उसने एक चाकू प्राप्त किया जिसका कि आधार एवं प्रान्त भाग सोने के बने हुए थे। इस प्रकार चाकू (शस्त्र) से चिकित्सा करने वाला वह प्रथम व्यक्ति था। इसी प्रकार वनस्पतियों द्वारा चिकित्सा करने वाला भी वही प्रथम व्यक्ति था।
(Zendavesta Part I (S. B. E. Vol IV.), P. 227.)
(b) E. R. E. Vol. IV P. 758.