काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 345, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद
विषचिकित्सा अथवा ‘विषकृत्य’ शब्द की झलक दिखाई देती है। भारतीय सम्प्रदाय में भी कर्णवेधन संस्कार के लिये सुवर्णसूचि तथा चूडाकर्म संस्कार में सुवर्णयुक्त उत्तर का विधान मिलता है। सुश्रुत में शल्यचिकित्सा में प्रयुक्त होने वाले शस्त्रों के विषय में लिखा है कि ‘तानि (शस्त्राणि) प्रायशो लौहानि भवन्ति’। इसकी व्याख्या में लिखा है कि ‘लोहाः पञ्च सुवर्णादयः’ अर्थात् सुवर्ण आदि पांच धातुओं के द्वारा सुवर्ण का प्रमुखरूप से निर्देश किया है। उपर्युक्त वर्णन के अनुसार उनके ‘त्रित’ नामक प्रथम वैद्य के भी आचार्यरूप में निर्दिष्ट क्षथ्रवैर्य शब्द में करवीर्य, क्षेत्रवीर्य, क्षतवीर्य इत्यादि भारतीय संस्कृत शब्दों की समानता दिखाई देने से यह भारतीय सम्प्रदाय का करवीर्य या अन्य कोई भारतीय आचार्य के समान प्रतीत होता है।
तूङ्ग्हाङ् स्थान में हार्नले नामक विद्वान् द्वारा उपलब्ध लेखों में जीवक के प्रति दिये गये बुद्ध के भेषज्यसम्बन्धी उपदेशों में संस्कृत के साथ प्राचीन ईरानी भाषा का भी अनुवाद उपलब्ध होने से प्रतीत होता है कि प्राचीन इरान ने भारतीय भेषज्य का ग्रहण किया था तथा उसका आदरपूर्वक अपनी भाषा में अनुवाद किया था।
अवेस्ता में भेषज्य प्रस्थान के उद्भावक के रूप में थ्रित तथा रोगनिवृत्ति की प्रार्थना करनेवाले त्रैतान का निर्देश है। इसीप्रकार वेद में भी त्रित तथा त्रैतन का उल्लेख मिलता है जिससे कुछ विद्वानों¹ की राय है कि शब्दों के सादृश्य के कारण वेद तथा अवेस्ता में आये हुए ये एक ही व्यक्ति हैं। ऋग्वेद में त्रैतन का एक बार ही उल्लेख होने पर भी मारने की इच्छा से दीर्घतमस ऋषिको जल तथा अग्नि में गिराने वाले तथा उसके अङ्गों को काटने वाले दासजाति² वाले का निर्देश होने से, वह अश्वियों द्वारा पुनः रक्षा किये गये भी दीर्घतमस ऋषि के प्रतिपक्षी के रूप में मिलने वाला त्रैतन प्रतीत होता है। परन्तु वैदिक लेख के अनुसार उसका भेषज्य से संबन्ध नहीं मिलता है। त्रित का ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में अनेक वार उल्लेख होने पर भी कहीं-कहीं यह त्रित शब्द अग्नि आदि देवता परक मिलता है। जहां यह त्रित शब्द मानव भावों को सूचित करता है वहां कहीं-कहीं सूक्तद्रष्टा ऋषि के रूप में उसका उल्लेख मिलता है। बृहद्देवता तथा यास्क की निरुक्ति में भी उसका ऋषि के रूप में उल्लेख मिलता है। इन स्थलों पर इसका अर्थ भिन्न प्रतीत होता है। जहां वेद के ‘आप्यः आप्य्यः त्रितः’ तथा अवेस्ता के ‘आथ्व्यः त्रितः’ में समानता दिखाई देती है वहां त्रित का परिवेदन (दुःख), दुःस्वप्न, स्वर्णकार, मालाकार आदि दुष्कृत मार्जन स्थानी के रूप में भी उल्लेख मिलने³ से वैदिक सम्प्रदाय में सुरों के लिये असुरों की तरह हेयरूप में ग्रहण होने से यह त्रित भी विपक्षी प्रतीत होता है। त्रित तथा थ्रित की एकात्म्यता होने से वैदिक आश्विन भेषज्य सम्प्रदाय की तरह ईरानी थ्रित भेषज्य सम्प्रदाय का समय भी प्राचीन सिद्ध होता है। परन्तु वेद में त्रित का कहीं भी भेषज्य संबन्ध नहीं मिलता है। मार्टिन⁴ (Martin) नामक विद्वान् का कहना है कि तैत्तिरीय संहिता में एक स्थान पर (१. ८. १०. २) आयुष्य के दाता के रूप में त्रित की प्रार्थना के मिलने से वैदिक त्रित में भी भेषज्य संबन्ध दिखाई देता है। तथापि त्रित शब्द की अग्निपरक व्याख्या दी होने से तथा राजसूय का प्रकरण होने से वहां भी त्रित का भेषज्य सम्बन्ध स्पष्ट नहीं मिलता है। इस विषय में और विचार की आवश्यकता है।
औरभ्र शब्द ‘उरभ्रस्यापत्यम्’ अथवा ‘उरभ्रे भवः’ अर्थ के अनुसार व्यक्ति अथवा देशवाचक उरभ्र शब्द से बना हुआ प्रतीत होता है। उरभ्र नामक कोई व्यक्ति अथवा देश प्राचीन भारत में नहीं मिलता है। वेद में उरभ्र तथा उरण शब्द मेष (भेड़) के बोधक के रूप में प्रसिद्ध हैं। वेद में भी सिन्ध में बहने वाली ऊर्णावती नदी का उल्लेख मिलता है। गान्धार तथा उससे उत्तर के देशों में प्राचीन काल से ही मेषों के प्राचुर्य का वर्णन मिलता है। उसी प्राचुर्य के कारण ही संभवतः नदी का नाम भी ऊर्णावती था। ‘अध्वर्यवो य उरणं जघान’ इस ऋग्वेद के मन्त्र में (२. १४. ४) इन्द्र द्वारा मारे हुए उरण नामक असुर का उल्लेख मिलता है। बेबिलोन देश के प्राचीन नगरों में एक 'उर' नाम का नगर मिलता है जो चाल्डियनों के समय अब्राहम का प्रधान स्थान तथा सुमेरियनों के ईस्वी पूर्व ३००० वर्ष पूर्व सेमेटिक सत्ता के प्रारंभ
१. १-४ की टि. सं. उपो. पृ. १५० में देखें।