भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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३३२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्


में सारगान वंशजों के अनन्तर 'उरगुर' अथवा 'उर एन गर' नामक राजा के समय प्रधान उर नगर था वह बेबिलोन समय के अन्त तक धार्मिक तथा वाङ्मय विषयों के लिये प्रसिद्ध था। उर नगर में 'उरनम्मु'१ (Ur Nammu B. C 2300-2200) तथा बर्सिन (Bursin) नामक राजाओं के शिलालेख प्राप्त हुए हैं। असीरिया की पूर्वजातियां असुर के रूप में मिलती हैं। इन्द्र द्वारा मारा हुरा उरण नामक असुर संभवतः इसी देश का था। उरभ्र आदि शब्दों में उर शब्द के आने से इसी देश से संबन्ध प्रतीत होता है। ए. सी.२ दास ने लिखा है कि 'उर' देश में भारतीय शालवृक्ष की लकड़ियां प्राप्त हुई हैं। यदि इस देश के वाचक उर शब्द से ही उरभ्र शब्द बना हो तो काङ्क्षायन द्वारा बाह्लीक देश के समान दिवोदास के शिष्य उरभ्र द्वारा यह उर प्रदेश भी भारतीय प्रभाव से युक्त प्रतीत होता है।

कुछ लोग गोपुर रक्षित नाम से निर्दिष्ट गोपुर तथा रक्षित दो भिन्न-भिन्न आचार्य मानते हैं। कुछ लोग संयुक्त (गोपुररक्षित) नाम से एक ही व्यक्ति मानते हैं। दक्षिण के शिल्प ग्रन्थ में गोपुर का निर्देश होने से तथा आजकल भी दाक्षिणात्य देशों में गोपुर की विशेष प्रसिद्धि होने से गोपुर नाम से व्यवहृत आचार्य संभवतः दाक्षिणात्य प्रतीत होता है। किन्तु रामायण तथा महाभारत में गोपुर का पुरद्वार के रूप में मिलने से इतने से ही देश का निर्धारण करना सम्भव नहीं है। अथवा यह भी सम्भव है कि गोपुर नामक अन्य अज्ञात नगर के सम्बन्ध से भी गोपुररक्षित नाम का व्यवहार किया गया हो।

प्राचीन भोजदेश के कान्यकुब्ज (कन्नौज) देशस्थित भागीरथी के दक्षिण तट पर १५-१६ कोस के घेरे में फैले होने का वर्णन३ मिलता है। दिवोदास के शिष्य भोज का संभवतः इसी देश के अनुसार यह नाम था।

'उपधेनोरपत्यम्' इस व्युत्पत्ति के अनुसार औषधेनव शब्द मिलता है। औषधेनव नाम का आचार्य अन्यत्र नहीं मिलता है। किन्तु 'उपगोरपत्यमौपगवः' पाणिनीय सूत्र के इस उदाहरण में महाभाष्यकार ने उपगु के अपत्य रूप में औपगव का निर्देश किया है। विष्णुपुराण में मिथिला के राजा सीरध्वज के भाई काशीराज कुशध्वज के वंश में किसी उपगु का निर्देश मिलता है। उपगु नाम का वसिष्ठ गोत्र में उत्पन्न एक ऋषि भी मिलता है। औरव कौत्स राजा के पुरोहित सौश्रवस के पंचविंश ब्राह्मण (१४. ६. ८) में उपगु का वर्णन मिलता है। महाभाष्य के (४. १. ३. ९०) 'औपगवेर्यूनश्छात्रा औपगवीयाः' इस निर्देश से औपगव छात्र सम्प्रदाय का प्रवर्तक प्रतीत होता है। यह प्रसिद्ध औपगव ही सम्भवतः औषधेनव हो क्योंकि पर्यायवाची शब्दों द्वारा व्यवहार करने की भी प्राचीन पद्धति मिलती है। यह औषधेनव कौन तथा किस प्रदेश का रहने वाला है यह निश्चित नहीं कहा जा सकता।

यद्यपि दृढ प्रमाणों के अभाव में केवल इन तर्कों के आधार पर कुछ निश्चित नहीं किया जा सकता तथापि उपर्युक्त आचार्यों के नाम भारत के भिन्न-भिन्न प्रदेशों के समान दूर विदेशों में भी सम्भवतः धान्वन्तर सम्प्रदाय के आलोक के प्रसार में द्वारभूत हैं अर्थात् इनके द्वारा धान्वन्तर सम्प्रदाय का विदेशों में प्रसार हुआ है। इस प्रकार केवल धान्वन्तर सम्प्रदाय के ही नहीं अपितु अन्य विभागीय भैषज्य विज्ञान के आलोक के लिये भी इसी प्रकार के द्वार होंगे। इससे अधिक क्या कहा जाय कि ऋग्वेद में भी प्रयुक्त होने वाले वैद्यक वाचक भिषक् तथा औषध वाचक भेषज शब्दों के विकृतरूप बिजिष्क (Bejishka) तथा भेषज (Beshaj) शब्द इरान देश की पर्शुभारती (पहलवी) भाषा में तथा बिझिष्क (Bzhishk) तथा बेझश्क (Bzhshkel) शब्द अर्मिनियन भाषा में मिलने का पहले निर्देश किया जा चुका है। जब वैद्य एवं औषध वाचक प्रधान शब्द प्राचीन काल में दूर विदेशों में पहुंचे हुए थे तब विद्या के विषय भी चारों ओर फैले हुए हों तो इसमें क्या आश्चर्य है। वाडेल४ नामक विद्वान् ने सुमेरियन देश के प्राचीन मुद्राओं पर साङ्केतिक अक्षरों में लिखे हुए उस देश के शब्दों तथा भारतीय शब्दों में निम्न समानता प्रदर्शित की है—


१. १-४ तक की टि. सं. उपो. पृ. १५१ में देखें।

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