काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 347, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद
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| वृगु | भृगु | अस्सि | अश्वि |
| वर्गव | भार्गव | गल्ह | गालव |
| गुर्गु | गर्ग | गुधिया | गाधि |
| हनक | जनक | सुसिन | सुषेण |
| सख | शक्र | एमद्गल | मुद्गल |
| इन्दुरु | इन्द्र | उर्वस् | हर्यश्व |
और तो और धन्वन्तरि तथा दिवोदास का भी वहां उद्भव दिखाया गया है। उस देश के प्राचीन राजाओं का ईस्वी संवत् के प्रारम्भ से लगभग २-३ हजार वर्ष पूर्व होना बतलाया गया है। पूर्वनिर्दिष्ट (पृ. १४) शालिहोत्र के ग्रन्थ में आयुर्वेद के आचार्यों के निर्देश में गालव का उल्लेख होने से तथा चरक के प्रारम्भ में भी आयुर्वेद के प्रवर्तकों में उसका नाम मिलने से गालव भी आयुर्वेद के आचार्य रूप में मिलता है। महाभारत में भी गालव का काशीराज दिवोदास के साथ सहवास तथा मारीच कश्यप के आश्रम के द्रष्टा के रूप में पहले (पृ. १८) निर्देश किया जा चुका है। महाभारत के अनुसार अश्वप्राप्ति के प्रसङ्ग में उसके दूर-दूर देशों में पर्यटन का निर्देश है। सुमेरियन प्रदेशीय प्राचीन मुद्रा में आये हुए गल्ह के साथ वाडेल ने गालव की समानता दिखाई है। मुद्गल तथा मौद्गल्य आदि भी भारत में वैद्याचार्यों के रूप में मिलते हैं। वाडेल के कथनानुसार सुमेरियन प्रदेश के एमद्गल के साथ वैद्यविद्या के ज्ञान का सूचक ‘अजू’ शब्द दिया हुआ है। इस प्रकार यदि गल्ह और गालव तथा एमद्गल और मुद्गल की परम्पर एकात्म्यता हो तो यह मानना पड़ेगा कि सुमेरियन प्रदेश में भी भारतीय आयुर्वेदाचार्यों का प्रभाव पहुँचा हुआ था। परन्तु अत्यन्त प्राचीन होने से प्राचीन मुद्राओं के अक्षरों के भी एक मत से निश्चित न होने से तथा उनमें आये हुए संभावित गालव, जनक, धन्वन्तरि तथा दिवोदास आदि में भैषज्य विषय के संबन्ध के न मिलने से पूर्ण अनुसन्धान के बिना केवल इतने के आधार पर निश्चयपूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता। इस काश्यपसंहिता के भोजनकल्पाध्याय (पृ. २०६) में सात्म्याशन प्रकरण में काश्मीर, चीन, अपरचीन आदि देशों के साथ बाह्लीक, दासेरक, शातसार तथा रामण आदि देशों का भी उल्लेख मिलता है, किसी¹ किसी का विचार है कि दासेरक देश मालवा प्रान्त में है। किन्तु महाभारत² में अनेक स्थलों पर दासेरक का उल्लेख होने पर भी मालवा का पृथक् उल्लेख मिलने से दासेरक मालवा से पृथक् कोई अन्य ही देश प्रतीत होता है। शातसार देश का कोई परिचय नहीं मिलता है। तथापि बाह्लीक तथा रामण देश के साथ दिये होने से दासेरक तथा शातसार भी उनके समीप के ही कोई देश प्रतीत होते हैं। रामण देश अरमे³निया (Armenia) देश को बतलाया गया है। रामण पर्वत का उल्लेख जेन्दावस्ता में भी मिलता है। महाभारत⁴ में अनेक उत्तर की जातियों के निर्देश में हूण, पारसीक तथा चीन आदि के साथ रमण जाति का तथा निषेध देश के उत्तर में रमणवर्ष का निर्देश मिलता है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि अरमेनिया देश तक भी भारतीय प्राचीन आचार्यों का परिचय था। अलेक्जेण्डर द्वारा साथ ले जाये गये तथा अशोक के समय इधर-उधर भेजे गये विद्वानों के नामों का इतिहास में कुछ पता नहीं लगता है। ईसामसीह के समय मिश्रदेश में ‘थेराप्यूत’ नामक कुछ भिक्षुवृत्ति वाले विरक्त रहते थे। जिनकी शिक्षा का प्रभावयीशुक्रीष्ट (ईसा मसीह) पर भी पड़ा है। ये पूर्व देश के व्यक्ति धर्मोपदेश के साथ-साथ चिकित्सा भी किया करते थे जिनके नाम से पाश्चात्य चिकित्सा में ‘थेराप्यूटिक्स (Therapeutics) नाम से एक विशेष विभाग भी है। इन थेराप्यूतों का जीवन भारतीय थेरो (स्थविर) भिक्षुओं के समान था। जयचन्द्र⁵ विद्यालंकार ने भारतीय इतिहास के ग्रन्थ में लिखा है कि ये ‘थेराप्यूत’ अशोक के समय
१. १-५ तक की टि. सं. उपो. पृ. १५२ में देखें।