काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३३४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
पाश्चात्य देशों में गये हुए भारतीय भिक्षुक अथवा चिकित्सकों की सन्तति प्रतीत होती है। पोकाक¹ ने भी इसी आशय के विचार प्रकट किये हैं। अन्य देशों के इतिहासों में भी बहुत ऐसे व्यक्ति निलीन अवस्था में मिल सकते हैं। अन्य देशों के इतिहासों में भी बहुत से ऐसे भारतीय नाम मिलते हैं जो कि उन-उन देशों की भाषाओं के कारण विकृत होकर उन-उन देशों के व्यक्तियों के ही नाम प्रतीत होते हैं। जिस प्रकार विद्वानों के कथनानुसार कलोनस (Kalonos) नामक भारतीय व्यक्ति कल्याण प्रतीत होता है उसी प्रकार इतिहास में अन्य भी बहुत से भारतीय व्यक्ति हो सकते हैं जो अपरिचित तथा अन्य देश के प्रतीत होते हैं चरक, सुश्रुत, काश्यप तथा भेड आदियों के ग्रन्थों में आये हुए तथा अन्य भी प्राचीन आचार्यों के नामों का निर्वचन, पर्यालोचन तथा विषयानुसन्धान करने पर भी देश, काल तथा स्वरूप के अनुसार आयुर्वेद की पूर्वावस्था का थोड़ा बहुत परिचय मिल सकता है। किन्तु विस्तारमय से अब हम अधिक नहीं लिखते हैं।
वैदिक साहित्य मूलक भारतीय भैषज्य
वैदिक साहित्य में मान्त्रिक प्रक्रियाओं के मिलने पर भी अकेली भेषज प्रक्रिया के भी उदाहरण कम नहीं हैं। अपितु बहुत से असाधारण विषय ऋग्वेद में भी मिलते हैं और अथर्ववेद में तो शारीरिक ओषधियां, शस्त्रचिकित्सा, रोगनिर्देश, रोगोपचार इत्यादि भैषज्य संबन्धी विषय ओतप्रोत रूप से मिलने का पूर्व (पृ. ५-८) निर्देश किया जाचुका है। वैदिक मन्त्रों से ३६० अस्थियों² तथा सैकड़ों हजारों सिराओं³ (हिरा) और धमनियों का पौर्वकालिक ज्ञान स्पष्ट है। शतपथ⁴ ब्राह्मण में ३६० अस्थियों का वर्णन मिलता है। वैदिक याग (यज्ञ) प्रक्रिया के पाशुकविभाग में न केवल पशुओं का अपितु मनुष्यों के भी बलि में भिन्न-भिन्न अवयवों के पृथक्करण तथा जोडने का वर्णन मिलने से तद्विषयक ज्ञान स्पष्ट प्रकट होता है। चर्बी तथा हृदय के निकालने में हस्तकुशलता भी विज्ञान को बढ़ाने वाले अभ्यास को सूचित करती है। वैदिक विषयों के पण्डित कीथ तथा म्याकडोनल⁵ आदियों ने भी लिखा है कि 'अथर्व वेद के दशम काण्ड के द्वितीयसूक्त में शारीरिक अस्थियों का सुन्दर एवं आनुक्रमिक वर्णन मिलता है। वैदिक काल के भारतीयों को प्रारंभ में शरीर तथा शारीरिक विज्ञान से संबद्ध विषयों का ज्ञान था।
ऋग्वेद, अथर्ववेद तथा यजुर्वेद के मन्त्रों के अनुसार बहुत सी ओषधियों के ज्ञान तथा उपयोग का वर्णन पहले किया जा चुका है। विकृत तथा भग्न अवयवों के रोहण तथा सन्धान के लिये ओषधियों की प्रार्थना अथर्ववेद⁶ में मिलती है। ऋग्वेद में सोम का ओषधियों के राजा के रूप में वर्णन भी अनेक स्थानों पर मिलता है। सोम संबन्धी यज्ञ की प्रक्रिया के प्रारंभ होने के साथ ही सोम का प्रधान ओषधि के रूप में परिचय मिलता है। बहुत से मन्त्रों से अश्विनीकुमारों के वैद्य होने तथा सोम और अश्विनीकुमारों के पारस्परिक घनिष्ठ संबन्ध का ज्ञान होता है। सुश्रुत में भी अनेक स्थानों पर सोम का ओषधि रूप में निर्देश मिलता है। सोम का याज्ञिक तथा भेषजसंस्थाओं से विशेष संबन्ध होने से भी यह विद्या प्राचीन सिद्ध होती है। अथर्ववेद में कुछ ओषधि के वर्णन कारक सूक्त⁷ में कुछ ओषधि का प्राचीनकाल में इक्ष्वाकु काम्य तथा वस द्वारा ज्ञान होने के निर्देश से प्रतीत होता है कि प्राचीन काल से ही ओषधियों का अन्वेषण तथा ज्ञान बहुत से लोगों को था। इतना ही नहीं, अपितु वैदिक मन्त्रों से उस समय हजारों ओषधियों तथा सैकड़ों वैद्यों के होने का ज्ञान भी मिलता है। और वैदिक काल में ही नहीं, अपितु 'या ओषधीः पूर्वा जाता देवेभ्यस्त्रियुगं पुरा' इत्यादि वैदिक मन्त्रों से भी ज्ञात होता है कि तीनों युगों से पूर्व भी ओषधियों का ज्ञान था।
१. १-४ तक की टि. सं. उपो. पृ. १५२-१५३ देखें।
५. वैदिक कालीन भारतीय लोगों की अभिरुचि पर्याप्त पहले ही शारीर शास्त्र के महत्त्वपूर्ण प्रश्नों की ओर आकृष्ट हो गई थी। अथर्ववेद के एक मन्त्र में मानवशरीर के विविध अङ्गों का वर्णन बड़ी सूक्ष्मता और पूर्णता के साथ उपलब्ध होता है।
६. ६-७ तक की टि. सं. उपो. पृ. १५३ में देखें।