भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद

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वैदिक नक्षत्र इष्टि में शतभिषक् नामक नक्षत्र का तथा याज्या, अनुवाक्या और तैत्तिरीय¹ मन्त्रों में वरुण तथा शतभिषक् नक्षत्र का सैकड़ों ओषधियों को पूर्ण करके आयुष्य को देने वाले के रूप में उल्लेख मिलता है । इसलिये इस मन्त्र के अनुसार सैकड़ों ओषधियों को देने वाले इस नक्षत्र का उस नाम से व्यवहार प्राचीन प्रतीत होता है । वहीं दूसरे ब्राह्मण वाक्यों में शतभिषक् का एक अन्य निर्वचन² दिया है कि ‘असुरप्रहारशतस्य चिकित्सने देवानामाराेग्यलब्धिर्यस्मिन्नक्षत्रे बभूव स एव शतभिषक् इति’ अर्थात् जिस नक्षत्र में चिकित्सा द्वारा असुरों के सैकड़ों प्रहारों से देवताओं को आरोग्य लाभ हुआ हो वह शतभिषक् नक्षत्र है । कृत्तिका आदि नक्षत्रों का काल गणना से भी अत्यन्त प्राचीन सिद्ध होता है । उनमें से एक नक्षत्रवाचक शतभिषक् छन्द का वैदिक काल में भी अनुसन्धान करने पर प्रतीत होता है कि लाखों ओषधियों, उनके उपयोग तथा लाभों का अत्यन्त प्राचीनकाल से ही ज्ञान था ।

उपनिषदों³ में भी आध्यात्मिक प्रक्रियाओं में नाडी आदि का ज्ञान मिलता है । योगमार्ग में भी शारीरिक प्राणवह सूक्ष्म नाडियों का अनेक प्रकार का ज्ञान तथा आन्तरिक वायु के इच्छानुसार सञ्चार तथा निरोध आदि में कुशलता का वर्णन मिलता है । तान्त्रिक पद्धति में भी षट्चक्रभेदन, भिन्न-भिन्न स्थानों से वर्णों की उत्पत्ति, मूर्धभाग में कान, आंख, नाक आदि से संबन्ध रखने वाली इन्द्रियों का ज्ञान कराने वाली नाडियों का अनुसन्धान, ज्ञानवहा नाडियों का केन्द्रस्थानीय गुरुपद (प्रधानस्थान) में कुण्डलिनी से उत्पन्न हुई जीवशक्ति के संयोग से लाभ तथा आस्वादन आदि आन्तरिक ज्ञान के होने का वर्णन मिलने से इस विषय में उनका अन्तर्मुखी ज्ञान प्रकट होता है । महेञ्जोदारो के भूगर्भ में उपलब्ध योगावस्था की मूर्तियों की रचना को देखकर भी प्रतीत होता है कि यौगिक आन्तरिक क्रियाओं का विज्ञान प्राचीन था । वसन्त⁴ जी. रेले (V. G. Rale) ने वैदिक मन्त्रों में आये हुए आन्तर नाडी चक्र तथा उनके अधिष्ठातृदेवों के विषय में बहुत सा प्रकाश डाला है ।

याज्ञवल्क्य⁵ स्मृति में योग के द्वारा शरीर की उत्पत्ति का वर्णन करते हुए विवरण सहित ३६० अस्थियों, प्राणों के आयतन, ७०० शिराओं, ९०० स्नायुओं, २०० धमनियों, ५०० मांसपेशियों, रसों के परिमाण वाले केश, रोम आदि तथा हृदय से निकली हुई ७२ हजार नाडियों का निरूपण करके इस विज्ञान को योग के लिये उपयोगी बतलाया है । रामायण तथा महाभारत में भी शस्त्र वैद्यक के विषय के होने का निर्देश किया जा चुका है । कौटिलीय अर्थशास्त्र में भी शस्त्र वैद्यक से संबन्धित बहुत से विषय मिलते हैं । उसके चौदहवें औपनिषद अधिकरण में परघात, अद्भुत उत्पत्ति वाली भैषज्य, मन्त्रयोग तथा अपनी सेना के नाश के प्रतीकार संबन्धी बहुत सी ओषधियों के प्रयोग दिये हुए हैं ।

वेद संसार के सब साहित्यों में श्रेष्ठ माना जाता है । पूर्व निर्दिष्ट प्राचीनतम हितीति (Hittites) तथा मित्तानी (Mittani) जातियों के पारस्परिक सन्धिशिलालेख में नासत्य, मित्र, वरुण तथा इन्द्र आदि वैदिक देवताओं के साक्षिरूप में उल्लेख का अनुसन्धान करने पर उस समय अपनी प्रतिज्ञा के पालन में साक्षिरूप से किये गये वैदिक देवताओं के उल्लेख से वैदिक सभ्यता की केवल तात्कालीनता ही सूचित नहीं होती है अपितु उस समय तथा उतने दूर अन्य भाषा तथा अन्य जातियों के शिलालेख में भी वैदिक देवताओं के साक्षिरूप में निर्देश तथा उद्धरण के मिलने से वैदिक सभ्यता की सर्वोपरिभाव से प्रतिज्ञा तथा प्रचार के साथ-साथ पूर्वपरम्परा द्वारा अनुवृत्ति तथा अत्यन्त प्राचीनता भी सूचिता होती है । और इतना ही नहीं अपितु ऋग्वेद आदि वैदिक साहित्य में अनेक स्थानों पर आये हुए भैषज्य विद्या के प्राचीन आचार्य नासत्यों का भी इस शिलालेख में उल्लेख होने से भैषज्य विज्ञान की भी प्राचीनता सूचित होती है ।

इसके अतिरिक्त वैदिक यज्ञों में अश्वमेध की बड़ी प्रतिष्ठा समझी जाती थी । प्राचीन इतिहास में अनेक शक्तिशाली राजाओं द्वारा चारों ओर के राजाओं को वश में करके अपने गौरव के बढ़ाने तथा पारलौकिक कल्याण की प्राप्ति के लिये इस यज्ञ के अनुष्ठान का अनेक स्थानों पर वर्णन मिलता है । वैदिककाल से प्रवर्तित इस यज्ञ की अन्ततोगत्वा वैदिक धर्म के पुनरुद्धारक पुष्यमित्र द्वारा भी किया गया था जिससे उसकी बहुत प्रतिष्ठा बढ़ गई । समुद्रगुप्त के शिलालेख में भी इस यज्ञ का सम्मानपूर्वक उल्लेख किया गया है । इस यज्ञ का प्रायः श्रुतियों की सभी शाखाओं, संहिताओं, ब्राह्मणग्रन्थों


१. १-५ तक की टि. सं. उपो. पृ. १५४ में देखें ।