काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 350, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३३६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् |
|---|
तथा श्रौतसूत्रों में निर्देश मिलता है। इस अश्वमेध के समय राजाओं की परिषद् में महर्षियों के सम्मुख वर्ष भर गाई जानेवाली भिन्न-भिन्न गाथाओं में तीसरे दिन भेषज विद्या के कीर्तन किये जाने का आश्वलायन १ तथा शाङ्ख्यायन २ सूत्र में भी निर्देश मिलता है। मैक्समूलर ३ (Moxmuller) का भी कहना है कि अश्वमेध में भेषज विद्या का कीर्तन किया जाता था चरणव्यूहकार ने ऋक्, यजु, साम तथा अथर्व प्रस्थानों की सैकड़ों तथा हजारों शाखाओं के विभक्त होने का प्रतिपादन किया है। कालक्रम से बहुत सी शाखाओं के नष्ट हो जाने पर भी आजतक अनेक शाखाएं उपलब्ध होती हैं। कुछ अन्य शाखाओं के जो श्रौत एवं स्मार्त सूत्र उपलब्ध होते हैं उनसे उन-उन मूल श्रुति शाखाओं के विलोप होने का अनुमान होता है। ये वेद आनुश्रविक प्रक्रिया से उन-उन शाखाओं के रूप में अत्यन्त प्राचीन काल से असंख्य आर्य महर्षियों के भावनाओं, हृदयों तथा मुखों में ओतप्रोत हुए अपनी चारों और फैली हुई गौरवपूर्ण स्थिति को सूचित करते हैं इस प्रकार के वैदिक सम्प्रदाय में अश्वमेध सदृश महत्त्वपूर्ण यज्ञ के अङ्गरूप में भेषज संबन्धी आख्यान का गान होता था। इससे श्रुतियों की अध्ययन तथा अध्यापन प्रक्रिया, निरन्तर पारायण तथा अभ्यास, याज्ञिक कल्प, प्रयोग, चर्चा, अनुष्ठान तथा ऋत्विक् आदियों के द्वारा आर्ष विचारों में चारों ओर से ओतप्रोत होने के कारण मन्दिर आदियों में मिलने वाले कुछ भैषज्यसंबन्धी लेखों तथा कहीं-कहीं मिलनेवाले शिलालेखों में आये हुए भैषज्य संबन्धी विषयों से पूर्व प्रतिष्ठित वैद्यक सभ्यता के उदय के साथ-साथ भारतीय भैषज्य-प्रस्थान के महत्त्व व्यापक स्थिति तथा प्राचीनता सिद्ध होती है। इस प्रकार नाना शाखा-प्रशाखाओं में फैले हुए ऋक्, अथर्व आदियों में भी इसके विषयों के व्याप्त होने से, याज्ञिक प्रक्रियाओं में भी इसका कीर्तन होने से तथा आयुर्वेद नाम से वैदिक प्रस्थान के प्राचीन काल से ही विभक्त होने से प्राचीन भारतीय वैदिक मूलरूपी स्त्रोत से परम्परा द्वारा प्रवृत्त इस भारतीय भैषज्य विज्ञान की प्राचीनता निश्चित रूप से प्रकट होती है। कोलब्रुक (Mr. Colebrooke) नामक विद्वान् ने इसके विषय में कहा है कि—'The Hindoos were teachers and not learners' अर्थात् हिन्दु सदा गुरु रहे हैं न कि शिष्य। तथा मोनियर विलियम्स ने कहा है कि— 'Is not the case........' (मूल उपोद्घात पृ. ११२ देखें) सभ्यता एवं प्रकाश के प्रथम अङ्कूर सदा पूर्व में ही उदित हुए हैं तथा पूर्व से पश्चिम की ओर ही सदा उनका प्रचार हुआ है न कि पश्चिम से पूर्व की ओर।
भारतीय भूगर्भ के अनुसार प्राचीन भैषज्यविषयक विमर्श
जिस भारत की प्राचीन सभ्यता मिश्र, मेसोपोटामिया आदि प्राचीन देशों की सभ्यता के साथ सादृश्य रखती हुई उनसे भी आगे बढ़ी हुई है उस भारत के महेञ्जोदारो प्रदेश की खुदाई में मिले हुए प्राचीन निवास स्थान, स्नानागार तथा मलप्रणाली आदि की स्थापत्य विद्या के पण्डितों द्वारा भी प्रशंसित प्राचीन निर्माण कला से पांच हजार वर्ष पूर्व भी भारतीय स्वास्थ्य विज्ञान (Hygenic condition) का पूर्णरूप से परिचय मिलता है, वहीं खुदाई में एक काले रंग का बड़ गोला सा मिला है जिसका अनुसन्धान एवं परीक्षा करके डॉ. सनाउल्ला नामक रसायनाचार्य (Chemist) तथा डॉ. हमीद ने कहा है कि–‘यह शिलाजीत का पत्थर है जो कि पर्वतीय प्रदेश से वहां आया है, यह मूत्ररोग आदि में प्रयुक्त होता है तथा विशेषरूप से यह औषध कार्य में ही प्रयुक्त होता है’। जान ४ मार्शल ने भी परीक्षकों के इस प्रकार के परिणामों के सहित इसका विवरण प्रकाशित किया है। इस प्रकार वहां शिलाजीत के मिलने से भैषज्य विद्या पर अच्छा प्रकाश पड़ता है। धन्वन्तरि, आत्रेय तथा कश्यप आदियों ने भी अनेक स्थानों पर शिलाजीत के उपयोग का निर्देश किया है। नावनीतक में भी इसका प्रयोग दिया हुआ है। जिस शिलाजीत की उत्पत्ति उस प्रदेश में नहीं होती अपितु दूर के पर्वतीय प्रदेशों से उसे लाया गया है, उसका भैषज्य के रूप में प्राचीन आचार्यों ने भी निर्देश किया है। तथा उसके रसायन कल्प एवं महिमा का भारतीय आयुर्वेद में वर्णन है। चिरकाल तक भूगर्भ में दबने से नष्ट हुई ओषधियों का न मिलना स्वाभाविक ही है परन्तु भाग्यवश जो कोई ओषधि अथवा वस्तु मिली भी है, उस असाधारण वस्तु के चिरकाल के बाद मिलने से भारतीय प्राचीन वैद्यक का गौरव ही बढ़ता है। इतने प्राचीन समय में और कौन से वैद्यक चिह्नों के प्राप्त होने की आशा
१. १-३ की टि. सं. उपो. पृ. १५५ में देखें।
४. DK प्रदेश VS तथा प्रदेश में पाया गया कोयले जैसे काले पदार्थ का टुकड़ा बहुत दिनों तक एक समस्या बना रहा........