भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद ३३७

की जा सकती है। वहीं भूगर्भ से वहां उत्पन्न न होकर हिमालय में उत्पन्न होने वाले हरिणों के सींगों के अनेक ढेर मिलते हैं। आथर्वण¹ संहिता में हरिण के सींगों का क्षेत्रिय (क्षय, कुष्ठ, अपस्मार आदि) रोग के प्रतीकारार्थ उपयोग मिलने से तथा वैदिक काल में भी भेषजरूप से उसके उपयोग का उल्लेख होने से प्रतीत होता है कि यहां मिलने वाले हरिण के सींगों का, ओषधि रूप में प्रयोग करने के लिये ही संग्रह किया गया होगा। हरिण के सींगों को आजकल भी भारतीय वैद्य ओषधियों में प्रयुक्त करते हैं। इस विषय में जान मार्शल ने भी लिखा है कि हरिण के सींगों का ओषधियों अथवा वाणिज्य के लिये संग्रह किया गया होगा।

वहां पर बहुत से धातु अथवा मिट्टी के खिलौने भी मिले हैं। काश्यपसंहिता के जातकर्मोत्तरीय अध्याय में तथा चरक के जातिसूत्रीय अध्याय में भी बालकों के विनोद तथा बुद्धि के विकास के लिये अनेक प्रकार के पशु-पक्षियों की आकृति वाले खिलौनों का वर्णन मिलता है। खिलौनों का आयुर्वेद के साथ संबन्ध होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। इस प्रकार इतिहास के अनुसार भी भारतीय चिकित्सा विज्ञान पांच हजार वर्ष से प्राचीन सिद्ध होता है।

भिन्न-भिन्न देशों के प्राचीन भैषज्य के विमर्श की आवश्यकता

यहां यह कह देना आवश्यक है कि जिस प्रकार महेञ्जोदारी की खुदाई का अनुसन्धान करने से भारतीय सभ्यता पांच हजार वर्षों से प्राचीन सिद्ध होती है उसी प्रकार प्राचीन लेख तथा वस्तु आदियों के चिह्नों के मिलने से मिश्र, बेबिलोनिया, सीरिया तथा चीन आदि देशों की सभ्यता भी चार-पांच हजार वर्ष प्राचीन निश्चित होती है। इन प्राचीन सभ्य तथा उन्नत देशों में प्राचीन काल में भी ज्ञान-विज्ञान की विशेषता अवश्य रही होगी तथा जीवन के लिये उपयोगी व्यावहारिक भैषज्य विद्या का होना तो और भी आवश्यक है। प्राचीन उन्नत देशों के भैषज्यसम्बन्धी अपने पूर्व स्रोत भी होंगे। पेपरी नामक त्वक्पत्र में पल्लीरुधिर, सूअर आदियों के मांस तथा भेद, कच्छप-मस्तिष्क तथा मनुष्य शुक्र आदि बहुत सी ऐसी असाधारण ओषधियां मिलती हैं जिनका भारतीय आयुर्वेद सम्प्रदाय में निर्देश नहीं मिलता है। इस प्रकार की ओषधियां उसी देश के प्राचीन स्रोतों से निकली हुई प्रतीत होती हैं। इसी प्रकार अन्य देशों में भी बहुत से ऐसे असाधारण विषय हो सकते हैं जो उसी देश के प्राचीन सम्प्रदाय से निकले हुए प्रतीत होते हैं। बाह्लीक भिषक् काङ्कायन का निर्देश होने से यह कहा जा सकता है कि अन्य भी बहुत से विदेशी चिकित्सक भारतीयों द्वारा तथा भारतीय चिकित्सक विदेशियों द्वारा ज्ञात थे। काश्यपसंहिता के खिलभाग के सूतिकोपक्रमणीय अध्याय में दिये हुए 'वैदेश्याश्च प्रयच्छन्ति विविधा म्लेच्छजातयः' उल्लेख से प्रतीत होता है कि इस ग्रन्थ के आचार्य को भी भारत से बाहर की बहुत सी म्लेच्छ जातियों का ज्ञान था। म्लेच्छ शब्द महाभारत तथा हरिवंश आदि प्राचीन ग्रन्थों में भी मिलता है। ययाति की कथा में पिता की आज्ञा का पालन न करने से तुर्वसु तथा अनुर्दुह्यु का शाप के कारण वेदबाह्य म्लेच्छ जातियों के वंशप्रवर्तक के रूप में उल्लेख किया गया है। कोशकार के 'प्रत्यन्तो म्लेच्छदेशः स्यात्' इस उल्लेख के आधार पर संभवतः भारत की सीमाओं पर स्थित देश के म्लेच्छों की ओर यह निर्देश प्रतीत होता है। पाणिनीय धातुपाठ में भी 'म्लेच्छ' धातु दी हुई है। महाभाष्यकार पतञ्जलि ने 'तेऽसुराः हेलयो हेलय इति पराबभूवुस्तस्मान्म्लेच्छा मा भूमेत्यध्येयं व्याकरणम्'


भारत सरकार के पुरातत्त्व विभाग के कैमिस्ट श्री सनाउल्ला महोदय उस काले पदार्थ की जांच करने में कृतकार्य हुए हैं। यह स्याही का टुकड़ा नहीं है। यह एक प्राचीन ओषधि है जिसे शिलाजीत कहते हैं और जो आजकल भारत में खूब प्रयोग में लाई जाती है और अनेक रोगों को अच्छा करती है। अजीर्ण, मधुमेह तथा यकृत् एवं प्लीहा के रोगों के लिये यह अतिशय उपयोगी है। यह हृदय की प्रक्रिया को नियमित करती है तथा श्वाससंस्थान के लिये हितकारी है। यह उत्तेजक और कफनिस्सारक है।
डॉ. हमीद द्वारा किया गया इस पदार्थ का विश्लेषण प्रथम परिशिष्ट में दिया गया है। यह काला शिलाजीत चट्टानों में से निकलता है जो कि महेंजोदारों में पाये गये हैं। यह हिमालय की अधोवर्ती, मध्यवर्ती और ऊपर की पर्वत श्रेणियों में पाया जाता है। Mohenjedaro & the Indus Civilization Vol. II by John Marshall.

१. इसकी टि. सं. उपो. पृ. १५६ में देखें।