भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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३३८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

में असुरों का म्लेच्छ जाति के रूप में उल्लेख किया है। सिन्धु नदी के किनारे उपलब्ध वस्तुओं में अनेक समानताओं के कारण ईरानियन् तथा असीरियन् आदि प्राचीन म्लेच्छ जातियों का भारतीयों के साथ परस्पर परिचय का ज्ञान होने से संभवतः उस समय प्रसिद्ध ईरानियन् तथा असीरियन् आदि भारत से बाहर की विविध उन्नत म्लेच्छ जातियों का म्लेच्छ शब्द से निर्देश किया गया हो। इन विदेशी म्लेच्छ जातियों का उल्लेख इस संहिता के खिलभाग में होने से प्रतीत होता है कि जीवक अथवा वात्स्य के समय अन्यदेशीय चिकित्साओं का भी ज्ञान होने से संभवतः उसने ऐसा निर्देश किया हो। चरक के विमान स्थान में भी 'विविधानि हिषजां शास्त्राणि प्रचरन्ति लोके' के द्वारा उस समय व्यवहार में अनेक चिकित्सा पद्धतियों के प्रचार का निर्देश किया गया है। आजकल सौरचिकित्सा (सूर्य चिकित्सा), जलचिकित्सा, भैषज्यचिकित्सा तथा शस्त्रचिकित्सा आदि अनेक चिकित्साओं के प्रचार के समान उस समय भारत तथा विदेशों में भी अन्य प्रक्रियाओं के द्वारा भी भैषज्य प्रचार का ज्ञान होता है। वैदिक काल से प्रवृत्त भारतीय आयुर्वेद सम्प्रदाय के भारतीय ही सिद्ध होने पर भी कालक्रम से न्यूनाधिक रूप में भारतीय विषयों का विदेशी सम्प्रदायों में तथा विदेशी विषयों का भारतीय सम्प्रदाय में अनुप्रवेश हो गया प्रतीत होता है। भिन्न-भिन्न प्राचीन देशों की चिकित्साओं के यथावत् अनुसन्धान के बिना केवल सामान्य ज्ञान के आधार पर यह कहना कठिन है कि उनके तत्कालीन भैषज्य-संबन्धी ज्ञान का क्या स्वरूप था तथा उनकी चिकित्सा के विषय अपने ही देश के असाधारण प्राचीन स्त्रोत से निकले हुए थे अथवा अन्यदेशीय स्रोतों से उनका उद्गम हुआ था। भिन्न-भिन्न स्थानों पर मिलने वाले भिन्न-भिन्न विषयों को देखकर हम केवल अनुमान ही कर सकते हैं। इस विषय का निश्चित ज्ञान कुछ नहीं हो सकता है। प्राचीन देशों के प्राचीन विषयों को लेकर यदि पृथक्-पृथक् प्रत्येक की यथावत् आलोचना की जाय तो संभवतः हमें कुछ परिणाम निकालने में सहायता मिल सकती है कि उस समय अमुक-अमुक अंशों में इन सम्प्रदायों में समानता थी, तथा अमुक अंश में विषमता थी। समान विषयों का भी अमुक सम्प्रदाय से अमुक का उद्गम हुआ था तथा अमुक-अमुक विषय उस-उस सम्प्रदाय के अपने ही थे। कालक्रम से प्राचीन देशों की पूर्व परिस्थिति का यथावत् ज्ञान कराने वाले बहुत से चिन्हों के लुप्त हो जाने से सम्पूर्णरूप से ज्ञान होना यद्यपि कठिन है तथापि जो अवशिष्ट चिह्न उपलब्ध होते हैं उनके आधार पर भी उनकी अन्तः स्थिति का बहुत कुछ ज्ञान हो सकता है। मिश्र में प्राचीन भैषज्य संबन्धी त्वक्पत्र तथा रोगप्रतीकार व्यवस्थापत्र (Prescription forms) आदि उपलब्ध हुए हैं, असीरिया में हेमुर्वन् राजा के समय के भैषज्य विषयक तेरह शिलालेख मिले हैं, इरान के प्राचीन अवेस्ता नामक ग्रन्थ के वेन्दिदाद, यश्न तथा यश्त प्रकरणों में भैषज्य संबन्धी विषय मिलते हैं तथा ब्रिटिश म्यूज़ियम के संग्रहालय में रखे हुए सुमेरिया प्रदेश के भूगर्भ से निकली हुई ईंटों पर खुदे हुए जो शिलालेख मिले हैं उनमें भी भैषज्य संबन्धी विषय मिलते हैं। चीन में भी प्राचीन भैषज्य संबन्धी विषय मिलते हैं। इसी प्रकार अन्वेषण करने पर अन्य भी बहुत से विषय मिल सकते हैं। सब ओर दृष्टिपात किये बिना केवल अपने सम्प्रदाय अथवा चिकित्सापद्धति को ही मौलिक कहने से व्यक्ति वास्तविकता पर नहीं पहुंच सकता। इसलिये इस समय आवश्यकता इस बात की है कि प्राचीन इतिहास, महेञ्जोदारो के भूगर्भ से निकली वस्तुओं तथा प्राचीन विचारों को सामने रखकर पांच हजार से अधिक वर्षों की सभ्यता वाले तथा प्राचीन काल में भी परस्पर परिचय, यातायात तथा सम्पर्क वाले भारत, मिश्र, इरान, चाल्डिया, बाहीक, बेबिलोनिया, सीरिया तथा चीन आदि प्राचीन देशों के जितने भी भैषज्य सम्बन्धी विषय मिले हैं अथवा मिलते रहते हैं उन सब को सामने रखकर तथा भारतीय प्राचीन आयुर्वेद की परिस्थिति का भी अनुसन्धान करके समानता तथा विषमता की तुलना की दृष्टि से यह देखना चाहिये कि कहाँ के कौन से विषय कहां है, कौन सा विषय कहां से प्रतिफलित हुआ है तथा किस विषय का प्रभाव अथवा आलोक किस विषय पर पड़ा है इत्यादि। दूसरे देशों के आलोक को धारण करने वाले तथा अर्धवयस्क ग्रीक वैद्यक के भारतीय वैद्यक पर प्रभाव की शंका बिलकुल निर्मूल है।

(५) उपसंहार

प्राचीन आचार्यों का गौरव

विद्वानों को यह ज्ञात ही है कि प्राचीन समय में धन्वन्तरि, कश्यप तथा आत्रेय आदियों द्वारा विचारों की कसौटी