काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 353, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद ३३९
पर कस कर उज्ज्वल किये हुये सिद्धान्तरूपी रत्नों को आजकल पाश्चात्त्य विज्ञान की चमक से चकाचौंध दृष्टि वाले विद्वान् भी अत्यन्त संमान के साथ देखते हैं। इससे प्रतीत होता है कि प्राचीन महर्षियों का विज्ञान सागर कितना अगाध था जिसमें आज भी रत्नों की कमी नहीं है। ये अत्युच्च ग्रन्थ ही भारत की प्राचीन विभूतियां हैं। आजकल मिलने वाले सब निबन्धों में इन्हीं ग्रन्थों की ही प्रधानता दिखाई देती है। सूक्ष्म दृष्टि से विषयों का अनुसन्धान करने पर इन ग्रन्थों के प्रत्येक वाक्य सार एवं निष्कर्ष पूर्ण तथा सूत्रमय दिखाई देते हैं जिन्हें परिष्कृत बुद्धि वाले विद्वान् अपने प्रवचनों से विशाल विषय का रूप दे सकते हैं। इनमें से परिश्रम करने वाले लोग भूगर्भ से नाना रत्नों के समान असंख्य सिद्धान्त रत्नों को ढूंढ कर निकाल लेते हैं। प्राचीन समय में मिलने वाले इस प्रकार के सुसंस्कृत विचारों से तत्कालीन विचारों की उन्नति का सम्यक् ज्ञान होता है परन्तु उसके बाद विचारों की वृद्धि का एक भी ऐसा उदाहरण नहीं मिलता है। शल्यचिकित्सा का सुश्रुतसंहिता के बाद वाग्भट आदि दो तीन विद्वानों ने लेशरूप से ही निर्देश किया है तथा उसमें भी सौश्रुतविज्ञान की ही आंशिक छाया दिखाई देती है। ऐतिहासिक दृष्टि से भी जीवक के समय तक यह विज्ञान हमें दिखाई देता है। इतनी उन्नत अवस्था में पहुंचा हुआ यह विज्ञान सहसा कहां लुप्त हो गया है ? इसका कारण संभवतः शस्त्रक्रिया में लेशमात्र विपरीतता से भी अनर्थ की संभावना हो, अथवा शस्त्र क्रिया के भीषण होने के कारण उसे छोड़ दिया गया हो, शान्तिप्रिय ब्राह्मणों द्वारा उसकी उपेक्षा की गई हो या धर्मशास्त्रकारों द्वारा चिकित्सावृत्ति की निन्दा की होने के कारण, अध्यात्मवाद की दृष्टि से इसमें हिंसा के दिखाई देने से अथवा अहिंसावाद और दशपारमिता¹ सिद्धान्त के विकसित होने से इसका लोप हो गया है। यह नहीं कहा जा सकता कि इनमें से कौनसा कारण सामने आया जिससे सर्वोपकारी वह विज्ञान, वह हस्तकौशल-वह उपदेश परम्परा तथा वह उपकरणों का परिष्कार इत्यादि द्रुतगति से ह्रास को प्राप्त होता हुआ विद्वत्समाज के हाथ से निकल कर आजकल भारत में विद्याविज्ञान से शून्य नापित जाति (नाइयों) में लेशरूप से मिलता है। धन्वन्तरि सदृश पूर्वाचार्यों द्वारा उन्नत की हुई वह प्राचीन विद्या आजकल ऐसे व्यक्तियों के हाथों में पड़कर उत्तरोत्तर ह्रास को प्राप्त होती हुई दीप निर्वाण के समान समाप्ति की प्रतीक्षा कर रही है। गुणग्राही तथा उन्नत पाश्चात्त्य विद्वानों ने आजकल अपने अथक विचारों, परिष्कारों तथा नये-नये प्रयोगों एवं अनुभवों से परिवर्तित एवं रूपान्तरित करके, शल्यविद्या, गर्भभैषज्य, बालभैषज्य, कायचिकित्सा तथा विकृतिविज्ञान में विशेष रूप से उन्नति करली है, जिससे आजकल अपने प्राचीन विद्याबल एवं पूर्वगौरव को भूले हुए भारत में भी चारों ओर फैली हुई पाश्चात्त्यचिकित्सा के विज्ञानयुक्त कुशलता से उपकार हो रहा है। केवल शल्यचिकित्सा को ही यह अवस्था नहीं है अपितु शालाक्य आदि अन्य विज्ञान तो उत्पन्न होते ही जीर्ण-शीर्ण हो गये थे। हां, कायचिकित्सा में अवश्य बाद में भी भैषज्य विद्या के हजारों पण्डित उत्पन्न हुए हैं तथा सैकड़ों वैद्यक ग्रन्थ लिखे गये हैं जिन्हें यदि एकत्र किया जाय तो आज भी एक विशाल ग्रन्थराशि मिल सकती है। परन्तु आत्रेय आदि महर्षियों के समय आन्तरिक विज्ञान के बल से उत्पन्न हुए जिन सिद्धान्तों एवं विचारों के कारण आयुर्वेद उन्नत एवं समृद्ध हुआ था, वैसे उन्नत एवं नवीन विचार उसके बाद प्रकाशित नहीं हुए हैं। केवल प्राचीन सिद्धान्तों को ही भङ्गीभेद से दिखाकर अथवा नवीन अनुभूत ओषधियों द्वारा संबधित करके प्राचीन ग्रन्थों के केवल अनुवाद अथवा संग्रहरूप में नवीन शरीरों को धारण करके भिन्न-भिन्न निबन्ध हमारे सामने उपस्थित होते हैं। जहां तक भैषज्य का प्रश्न है हम देखते हैं कि नवीन योगौषधियों के आबिष्कार तथा नवीन अनुभवों के अनुसार ग्रन्थों के निर्माण द्वारा धातु तथा रस ओषधियों में वृद्धि होती हुई दिखाई देती है। आजकल भी आयुर्वेद के वैद्य सब स्थानों पर इसी के मार्ग को ग्रहण करके उसके उपयोग तथा प्रयोग से सफलता प्राप्त कर रहे हैं और यदि हम यह कहें कि यही विषय आयुर्वेद के अन्य प्रस्थानों के नाम की भी रक्षा कर रहा है तो यह कोई अत्युक्ति नहीं होगी। प्राचीन महर्षियों के समान उसके बाद के वैद्य भी यदि अपने विचार विमर्श के अनुसार नये-नये सिद्धान्तों का आविष्कार करते, प्राचीन सिद्धान्तों का परिष्कार कर, अपूर्ण अंशों को पूर्ण करते, अपने अनुभव के अनुसार नये-नये संस्कार करते, उच्च विचारों वाले प्रौढ
१. दश पारमिता—बौद्ध धर्मग्रन्थों में बुद्धत्व प्राप्ति के लिये दश गुणों की पराकाष्ठा तक पहुंचना आवश्यक बताया गया है। ये दस गुण ‘पारमिता’ कहलाते हैं। पारमिता का अर्थ है उच्चतम अवस्था या पूर्णता (Perfections) जिससे मनुष्य भवसागर से पार हो जाता है। ये निम्न दस हैं—१. दान २. शील ३. शान्ति ४. वीर्य ५. ध्यान ६. प्रज्ञा ७. उपाय ८. प्रणिधान ९. बल १०. ज्ञान।