काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 354, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें३४० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्
निबन्धों की पुनः-पुनः रचना करते तो भारतीय आयुर्वेद भी इतने समय में उन्नति के शिखर पर पहुँच जाता। आजकल बहुत से विद्वान् वैद्य कालवश तथा उपेक्षा से ह्रास को प्राप्त हुए भारतीय आयुर्वेद के प्राचीन गौरव को दृष्टि में रखते हुए उसके प्रचार तथा परिष्कार के लिये नवीन विचारपूर्ण निबन्धों, प्रचार संस्थाओं, परिष्कृत मार्गों तथा औषध निर्माणशालाओं के द्वारा प्रयत्न में लगे हुए दिखाई देते हैं। आजकल श्रीयुत गणनाथ सेन जी द्वारा प्रत्यक्ष शारीर तथा सिद्धान्त निदान का निर्माण करके प्राचीन शारीरिक अवयव तथा रोगनिदान के विषय में बहुत से विशेष विचार प्रकट किये गये हैं। इसी प्रकार कविरत्न श्रीयामिनी भूषण राय ने रोगविनिश्चय, शालाक्य, विष तथा प्रसूति के विषय में छोटे-छोटे तन्त्रों का निर्माण किया है तथा डॉ. बालकृष्ण शिवराम मुञ्जे ने नेत्र चिकित्सा के विषय में कोई ग्रन्थ लिखा है। इन संस्कृत भाषा के नवीन निबन्धों को देखकर बहुत आशा दिखाई देती है। जराजीर्ण हुई भी यह भारतीय आयुर्वेद विद्या जागरूक; सूक्ष्म बुद्धि वाले तथा उद्योगी भारतीय एवं विदेशी विद्वानों के सहयोग रूपी रसायन से ही संभवतः च्यवन ऋषि के समान पुनः यौवन को प्राप्त करले। समयवश बहुत से विषयों में वैज्ञानिक प्रकृति, परिष्कृत रासायनिक प्रक्रियाओं, नवीन आविष्कृत दूरवीक्षण तथा अन्तर्वीक्षण आदि विशेष यन्त्रों, भिन्न-भिन्न देशों के विद्वानों के साथ साक्षात् अथवा लेख, निबन्ध आदि के द्वारा विमर्श, शारीरिक अवयवों की सूक्ष्म दृष्टि तथा नवीन विचार युक्त सैकड़ों निबन्धों के प्रकाशन के कारण आजकल पाश्चात्त्य विद्वानों द्वारा उन्नत तथा अनेक शाखायुक्त भैषज्य विद्या की आलोचना करते हुए प्राचीन भारतीय आयुर्वेद विद्या कुछ लोगों की आजकल स्थूल एवं बालक्रीडा भले ही प्रतीत हो, किन्तु प्राचीन समय में जब कि विचार विमर्श के लिये दुर्गम नदी, वन, पर्वत आदि के व्यवधान के कारण एक दूसरे देश में जाना दुष्कर था उस समय वन के मृग आदि पशुओं के साथ रहने वाले धन्वन्तरि, कश्यप, आत्रेय आदि प्राचीन आचार्यों द्वारा यन्त्र आदि भौतिक साधनों के अभाव में केवल अपनी प्रणिधान शक्ति एवं आन्तरिक बुद्धि के सहारे जो विचार आविष्कृत किये गये थे उनका आधुनिक उन्नत विज्ञान के द्वारा परिष्कृत दृष्टि वाले विद्वान् आज भी जो आदर करते हैं, वह कोई कम गौरव की बात नहीं है। भारतीय तथा अन्य विद्वान् भी चिरकाल तक उनकी इस कृपा के लिये ऋणी रहेंगे। उन प्राचीन आचार्यों का हमें सैकड़ों बार अभिनन्दन करना चाहिये।
प्राचीन ग्रन्थों का लोप तथा उनकी रक्षा
देवयुग से ही लेकर आर्यों का यह विज्ञान-प्रवाह संहिता, ब्राह्मण, उपनिषत्, सूत्र, तन्त्र, भाष्य, टीका, उपटीका तथा निबन्धरूप अनेक शाखाओं द्वारा बहता हुआ तथा ऋषियों, आचार्यों और निबन्धलेखक की विचार धाराओं से पुष्ट होता हुआ मानव समाज का निरन्तर कल्याण कर रहा है। इसीलिये आजकल उस विज्ञान के सैकड़ो विभाग मिलते हैं तथा प्रत्येक विभाग के अनेक प्राचीन आचार्य तथा तारतम्य के अनुसार उनके विभिन्न विचार दृष्टिगोचर होते हैं। परन्तु आर्यों के मूल सर्वस्वभूत आद्यविज्ञान रूप महाकल्पतरु वेद की भी अनेक शाखायें अङ्ग तथा उपाङ्ग भी बहुत कुछ विच्छिन्न होकर विलुप्त हो गये हैं। बहुत सी शाखाओं के तो नाम भी शेष नहीं रहे हैं तथा किन्हीं-किन्हीं का संहिता, ब्राह्मण तथा सूत्र आदियों में कहीं-कहीं निर्देश मिलता है। इसी प्रकार प्राचीन महर्षि आदि आचार्यों के उपदेश रूप लेख भी लुप्त हो चुके हैं। किन्हीं-किन्हीं मतों का केवल नाम मात्र मिलता है तथा बहुतों के नाम भी लुप्त हो गये होंगे।
यदि हम आजकल किसी भी विषय के किसी एक भी उपलब्ध प्राचीन ग्रन्थ का अध्ययन करें तो उससे हमें बहुत से प्राचीन आचार्य, उनके द्वारा ज्ञात ग्रन्थ तथा विशेष-विशेष मतों के केवल नामोल्लेख मिलते हैं। यास्क के निरुक्त से अन्य भी बहुत से वेदों के अर्थ करने वालों का ज्ञान होता है। इसी प्रकार पाणिनि के सूत्रों से शाकल्य, गालव, गार्ग्य आपिशलि, काश्यप तथा स्फोटायन आदि प्राचीन वैयाकरणाचार्यों का तथा पाराशर्य, कर्मन्द, शिलालि, कृशाश्व आदि भिक्षु, नट तथा सूत्र आदि अन्य प्रस्थानों के आचार्यों का, कौटिलीय अर्थशास्त्र से पराशर, उशनस्, विशालाक्ष, कौणप, दन्त, भरद्वाज, वातव्याधि, बाहुदन्ती, पुत्रपिशुन आदि प्राचीन अर्थशास्त्रियों का, सायन के वेदभाष्य से मेधातिथि, शाकपूणि तथा अग्निस्वामी आदि प्राचीन वेद के व्याख्याताओं का, पूर्वोत्तर-मीमांसासूत्र से आश्मरथ्य, काशकृत्स्न, औडुलोमि, बादरी आदि प्राचीन वेदोपनिषत् के मीमांसकों का बोध होता है। इसीप्रकार उपलब्ध श्रौत स्मार्त दर्शन, ज्योतिष आदि के ग्रन्थों से भी हजारों संहिताओं, तन्त्र, सूत्र, व्याख्यान तथा निबन्धों के रचयिता महर्षि आदि तथा भिन्न-भिन्न विषयों के