काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 355, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपोद्घात का हिन्दी अनुवाद ३४१
आचार्यों के केवल नाम मात्र का बोध होता है। बहुत से भारतीय दार्शनिक तथा बौद्धग्रन्थ चीन तथा तिब्बती भाषाओं में अनूदित हुए केवल छायारूप में मिलते हैं। केवल हजार वर्ष प्राचीन बौद्धग्रन्थ भी सैकड़ों नष्ट हो चुके हैं। इस प्रकार की रोमहर्षण घटनाएं श्रुति, स्मृति, आगम, वेदाङ्ग, उपाङ्ग दर्शन, आदि में अथवा बौद्ध एवं जैन सम्प्रदायों में कहां नहीं मिलती हैं। इस आयुर्वेद में भी आत्रेय, सुश्रुत, भेड तथा काश्यप आदि की उपलब्ध संहिताओं के उल्लेख से काप्य, वायोर्विद, वामकं, वैदेह, काङ्कायन, हिरण्याक्ष, शौनक, पाराशर्य, गार्ग्य, माठर, कौत्स, मौद्गल्य, कुशिक, सुभूति, मार्कण्डेय, करवीर्य आदि बहुत से प्राचीन आयुर्वेद के आचार्यों का बोध होता है जिनमें से कइयों के स्थान-स्थान पर वचन तथा मत उद्धृत मिलते हैं। उन आचार्यों के वे ग्रन्थ कहां लुप्त हो गये हैं। यदि वे सब ग्रन्थ उपलब्ध हो सकें तो एक विशाल आयुर्वेदीय ग्रन्थराशि तैयार हो सकती है। केवल दो तीन उपलब्ध ग्रन्थों का ही अच्छी प्रकार अवगाहन करने से प्रतिभा एवं ज्ञान से उज्ज्वल सैकड़ों तत्त्वपूर्ण उपदेशों का ज्ञान मिलता है। इस प्रकार नाना प्रस्थानों में विभक्त प्राचीन आचार्यों के सब ग्रन्थ यदि मिल सकें तो विद्वानों को कितना लाभ हो सकता है। करुणामय प्राचीन महर्षियों द्वारा विचारधारा रूपी रस से विज्ञान कल्पतरु को बढ़ाने के कारण हम उनके यद्यपि अनुगृहीत हैं तथापि पूर्ण परिपक्व फलों से हम वञ्चित ही हैं।
प्राचीन काल से ही समय-समय पर होने वाले प्राकृतिक, वैकृतिक, तथा आकस्मिक क्षोभों, एक दूसरे राष्ट्रों के परस्पर होने वाले युद्ध आदि नैतिक उपद्रवों, बारम्बार होनेवाले विदेशी शासकों के विध्वंसकारक आक्रमणों, साम्प्रदायिक सघर्षों, तक्षशिला, नालन्दा तथा विक्रमशिला आदि के विशाल पुस्तकालयों के भस्मसात् एवं धूलिसात् होने तथा जल, अग्नि आदि के विप्लवों से हजारों प्राचीन ग्रन्थ लुप्त हो चुके हैं। न केवल प्राचीन काल में अपितु आजकल भी प्राचीन विद्यास्थानों में ग्रामीण पर्णशालाओं (चटशालाओं) में स्थित सैकड़ों ग्रन्थों के अग्नि के उत्पात से क्षणभर में नष्ट हो जाने से तथा बहुत से प्राचीन विद्वानों द्वारा संगृहीत ग्रन्थों के भी अब उनके परिवार तथा संतति में संरक्षक के अभाव से, अनास्था से तथा भट्टी, नदी प्रवाह, बाजारों में फैलने, भूगर्भ एवं धूलराशि में अनिश्चित काल तक पड़े रहने से, पुराने होकर जीर्ण-शीर्ण हो जाने से तथा दीमक आदि कीड़ों से खाये जाने के कारण बचे हुए ग्रन्थ भी उत्तरोत्तर नष्ट होते जा रहे हैं। इस सबको देखकर किस विद्यानुराग का हृदय दुःख से नहीं फटने लगता। अनेक विज्ञानों से पूर्ण इस प्राचीन कोश का इस प्रकार से नष्ट हो जाना बड़े दुःख की बात है।
इस प्राचीन विद्या को नाश से बचाने के लिये आजकल सैकड़ों प्रयत्नशील, गुणग्राही एवं दयालु भारतीय तथा पाश्चात्त्य विद्वान् इधर-उधर घूम-घूम कर अन्वेषण करते हुए विनाशोन्मुख बहुत से प्राचीन ग्रन्थों को ढूंढ-ढूंढ कर निकाल रहे हैं। खोटाङ् प्रदेश के भूगर्भ से निकले हुए बावर मैन्युस्क्रिप्ट नाम से प्रसिद्ध नावनीतक आदि बहुत से प्राचीन लेख आजकल खण्डित अवस्था में मिले हैं। बहुत से लोग चीन, तिब्बत आदि देशों में जाकर वहां मिलने वाले मूल लेखों तथा अनुवादों से कुछ ग्रन्थों को उपस्थित करते हैं। इन लोगों का प्रयत्न अत्यन्त प्रशंसनीय है। अब विनाशोन्मुख प्राचीन विद्या की रक्षा एकमात्र गुणग्राही विद्वान् तथा श्रीमान् (धनी) व्यक्ति ही कर सकते हैं। धनीमानी लोगों का कर्तव्य है कि जो प्राचीन ग्रन्थ अभी तक अवशिष्ट हैं उनको परिश्रम से भी ढूंढ़कर प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिये।
पुरातन वस्तुएं बाह्य तथा पुरातन लेख प्राचीन समय की अन्तः परिस्थिति को सूचित करती हैं। अतीत समय की अवस्था को जानने के लिये इनके अतिरिक्त और कोई साधन नहीं है। प्राचीन काल की जो भी वस्तुएं तथा लेख आदि उपलब्ध होते हैं उनमें न्यूनाधिक भाव से कुछ न कुछ प्राचीनता की झलक मिलती ही है। थोड़े बहुत समय के पौर्वापर्य वाले प्राचीन सभ्यता के समान सूत्रों में बंधे हुए असीरिया, बेबिलोनिया, सुमेरिया, तथा मित्र आदि प्राचीन जातियों के पाश्चात्त्य देशों में भी काल धर्म से होने वाले अलेक्जेण्ड्रिया के विशाल पुस्तकालय के अग्निकाण्ड आदि तथा समय-समय पर होने वाले राजनैतिक तथा साम्प्रदायिक विप्लवों से उनकी बहुत सी प्राचीन ऐतिहासिक वस्तुएं नष्ट हो गई हैं तथापि उनमें अनेक वस्तुओं तथा लेखों के साथ-साथ शवों के मिलने से, कहीं-कहीं पिरामिड (Pyramids) एवं स्तूप आदियों में इतिहास के मिलने से तथा कहीं-कहीं ईंटें, शिलाओं तथा धातुओं में चिरकालीन ग्रन्थ तथा इतिवृत्तों के मिलने से प्राचीन काल से प्रचलित एवं स्थान-स्थान पर मिलने वाले प्राचीन लक्षणों से असीरिया, बेबिलोनिया, सुमेरिया तथा मिश्र आदि प्राचीन देश की आनुक्रमिक प्राचीन सभ्यता के समय-निर्धारण के साथ-साथ उनके प्राचीन विषयों का ज्ञान