भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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३४२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

भी सुगमता से हो सकता है। परन्तु इसके अतिरिक्त भारत में प्राचीन काल से ही आहिताग्नि अथवा लौकिक अग्नि के द्वारा शवों को जलाने की प्रथा होने से अन्य अवशिष्ट वस्तुओं को भी वितरित कर देने से मन्दिरों के भी बार-बार होने वाले विप्लवों के कारण लुप्त हो जाने से प्राचीन समय में आनुश्रविक पद्धति (गुरु से मौखिक रूप में शिक्षा ग्रहण करना) की प्रथा के कारण संहिता, सूत्र आदि प्राचीन ग्रन्थों के लेखन की रुचि की विरलता के कारण तथा बाद में भोजपत्र और ताडपत्र आदियों पर लिखे हुए लेखों के भी समय-समय पर होने वाले पारस्परिक एवं वैदेशिक संघर्षों के कारण बहुत कुछ जल जाने तथा नष्ट हो जाने से, आजकल भारतीय इतिवृत्त के अनुसन्धान के लिये खोतान, कासगर आदि स्थानों में हुई खुदाई तथा चीन, तिब्बत आदि में मिलने वाले लेखों के अनुसन्धान से भारतीय पुरातन इतिवृत्त के बहुत कम लक्षण मिलने से, पुराण आदि कथाओं के मिलने पर भी महाभारत के गणेशोपाख्यान के समान बीच-बीच में अनुप्रविष्ट अर्वाचीन विषयों, आलङ्कारिक दृष्टि से प्रविष्ट अतिशयोक्तियों तथा भिन्न-भिन्न सम्प्रदाय के हस्तक्षेपों से अपने-अपने अनुसार प्राचीन के लोप तथा परिवर्तन से उसे मलिन (विकृत) कर देने से तथा प्राचीन अंशों को भी अन्य देशों के लेखों, शिलालेखों तथा भूगर्भ से उपलब्ध विज्ञान आदि के साथ समानता होने से आजकल महेञ्जोदारो की खुदाई से उपलब्ध पर्याप्त प्रमाणों के मिलने से पूर्व भारत की प्राचीन परिस्थिति का वास्तविक ज्ञान होना अत्यन्त कठिन था। परन्तु आजकल महेञ्जोदारो तथा हरप्पा की खुदाई में मिलने वाले भिन्न-भिन्न विषयों से प्राचीन भारतीय परिस्थिति पर बहुत सा प्रकाश पड़ता है। भारत में महेञ्जोदारो तथा हरप्पा के समान गङ्गा के किनारे और भी बहुत से प्राचीन प्रदेश मिल सकते हैं। तथा कालक्रम से अनुसन्धान के उपायों के उन्नत होने से ज्यों-ज्यों खुदाई में और पदार्थ तथा लेख आदि प्रकाश में आते जायेंगे तथा ज्यों-ज्यों कालक्रम से हरप्पा तथा महेञ्जोदारों में मिलने वाले प्राचीन अनिश्चित अक्षरों एवं लिपि के पढ़े जाने से प्राचीन विषय प्रकट होते जायेंगे, त्यों-त्यों प्राचीन भारतीय पुरावृत्त और भी स्पष्ट होता जायगा।

अन्त में हम पाठकों की सेवा में निवेदन करना चाहते हैं कि आजकल मुद्रणयन्त्रों के बहुत प्रचार हो जाने से भारत तथा अन्य देशों में भी प्रचलित, नवोपलब्ध तथा बहुत से अप्रकाशित भारतीय ग्रन्थ भी प्रकाश में आ गये हैं इस प्रकार एक-एक पुस्तक की हजारों प्रतियां होकर घर-घर में प्रचलित हो जाती हैं जिससे प्रचलित ग्रन्थों का भी विशेषरूप से प्रचार हो जाता है, अप्रकाशित ग्रन्थों का सर्वसाधारण में प्रकाश हो जाता है, अन्वेषण तथा लेखन के परिश्रम के बिना ही अल्पव्यय से ही अधिक लाभ हो जाता है तथा अपने पूर्वजों द्वारा भी बहुत से अदृष्ट एवं अश्रुत प्राचीन ग्रन्थ सहसा ही देखने को तथा अध्ययन करने को मिल जाते हैं। यह यद्यपि सन्ताप का विषय है परन्तु आजकल के मुद्रण में स्याही के दृढ़ होने पर भी दुर्बल पत्रों पर प्रकाशित ग्रन्थ दृढ़ ताडपत्रों पर लिखे हुए ग्रन्थों की तुलना में चिरस्थायी नहीं होते हैं। इसीलिये आजकल सौ वर्ष पूर्व प्रकाशित पुस्तकों के भी वर्ण विकृत हो जाते हैं तथा वे स्वयं भी जीर्ण शीर्ण हो जाती हैं। मुद्रण कला की सुलभता के कारण लेखनकला उत्तरोत्तर ह्रास को प्राप्त हो रही है। पदच्छेद की स्पष्टता तथा शुद्धि (Accuracy) के कारण मन को आकर्षित करने वाली मुद्रित पुस्तकों के सुलभ होने से विद्यमान लिखित पुस्तकों के संरक्षण का ध्यान भी कम होता जा रहा है। मुद्रित हुई उन्हीं पुस्तकों का पुनर्मुद्रण संभव है जो प्रायः अध्ययन तथा अध्यापन के काम में आती हैं। जो विशेष काम में नहीं आती हैं। उनका पुनर्मुद्रण नहीं होता है। ऐसे बहुत से ग्रन्थ आजकल दुर्लभ हो गये हैं। ऐसे ग्रन्थों को मुद्रित हुआ जानकर कोई लिखता भी नहीं तथा एक वार मुद्रण हो जाने से उनका पुनर्मुद्रण भी नहीं होता। इसप्रकार दोनों ओर से वञ्चित हुए ये ग्रन्थ उत्तर होते हुए भी पूर्व मुद्रित पुस्तक की आयु के समाप्त हो जाने पर सौ दो सौ वर्षों में सहसा समाप्त हो जाती है। कालक्रम से अन्य भी बहुत प्राचीन आनुश्रविक विषय नष्ट हो गये हैं तथा यह शंका होने लगती है कि प्राचीन आचार्यों के गौरव का स्मरण कराने वाले अन्य भी ग्रन्थ कहीं हमारे हाथ से निकल कर नाम मात्र शेष न रह जायें। इसलिये इस भावी आशंका को पहले से ही ध्यान में रख कर प्रकाशकों का कर्तव्य है कि जिन ग्रन्थों की रक्षा करना आवश्यक हो उनकी कुछ प्रतियां सुदृढ़ एवं स्थायी पत्रों पर प्रकाशित करने की प्रवृत्ति बढ़ानी चाहिये जिससे वे शीघ्र नष्ट न हो सकें। पुस्तकालयों में भी उन्हीं दृढ़ प्रतियों को ही अत्यन्त सुरक्षा पूर्वक रखना चाहिये। तथा संहिता, ब्राह्मण, सूत्र, भाष्य आदि कुछ ऐसे ग्रन्थ जो हमारी प्राचीनता के सर्वस्व समझे जाते हैं (चाहे वे हमारी व्यावहारिक अध्ययन परम्परा में प्रविष्ट हों चाहे न हों) उनको किसी भी व्यय पर ताडपत्र अथवा अन्य सुदृढ़ पत्रों पर उत्तम स्याही से लिखकर यत्नपूर्वक पुस्तकालयों में रखना चाहिये जिससे दृढ़ पत्रों पर लिखे