भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद | ३४३


हुए सात-आठ सौ वर्ष की आयु वाले तथा ताडपत्र पर लिखे हुए हजारों वर्षों की आयुवाले आजकल उपलब्ध ग्रन्थों की तरह ये भी चिरकाल तक सुरक्षित रह सकते हैं। भोजपत्र पर लिखित पिप्पलादशाखा संहिता की केवल एक अवशिष्ट प्रति से ही हमें आजकल उस शाखा का ज्ञान होता है। चिरकाल से विलुप्त प्रमाणवार्तिक ताडपत्र रूपी कवच में सुरक्षित रखा हुआ हजारों वर्षों के बाद भी पुनरुज्जीवित अवस्था में उपलब्ध हुआ है। भूगर्भ से निकले हुए ईंटों पर खुदे हुए लेखों तथा शिलालेखों से उन तीन हजार वर्ष प्राचीन लोगों की सभ्यता का ज्ञान होता है जिनका नाम भी लुप्त हो चुका था। इतना ही नहीं आजकल महेञ्जोदारो तथा हरप्पा में मिलने वाली मुद्राएं पांच हजार वर्ष प्राचीन सभ्यता को प्रकाश में लाकर भारत के प्राचीन गौरव को बढ़ा रही हैं। अस्तु, इतना हो चाहे न हो परन्तु इतना तो निश्चित है कि ताडपत्र पर लिखे हुए लेख हजारों वर्ष तक नष्ट नहीं हो सकते। यह काश्यप संहिता भी ताडपत्रों पर लिखी होने के कारण ही इतने समय के व्यवधान के बाद भी विनाश से बचकर अब प्रकाशित हो सकी है। अन्त में मैं आशा करता हूँ कि ग्रन्थों के चिरसंरक्षण का यह साधन विद्वानों एवं धनी-मानी व्यक्तियों को अवश्य पसन्द आयगा। इसके साथ मैं अपने वक्तव्य को समाप्त करता हूं।

नेपाल ग्रन्थमाला का प्रथम प्रकाशन

अनेक पदवियों से विभूषित नेपाल के महाराजा श्री श्री श्री युद्ध शमशेर जंगबहादुर के विद्यानुराग तथा अपने देश में उपलब्ध प्राचीन ग्रन्थों के प्रकाशन की रुचि के अनेक अभिनन्दनों के साथ उपोद्घात सहित यह काश्यपसंहिता नेपाल ग्रन्थमाला के प्रथम प्रकाशन के रूप में प्रकाशित हो रही है।

कृतज्ञता प्रकाशन

इस उपोद्घात में जिन भी प्राचीन अर्वाचीन, प्राच्य तथा पाश्चात्त्य विद्वानों के ग्रन्थों अथवा विचारों को मैंने उद्धृत किया है उनका मैं अत्यन्त कृतज्ञ हूँ। कृतज्ञता प्रकाशन के अतिरिक्त उनके ऋण से उऋण होने का और कोई उपाय मुझे नहीं सूझता है। इस ग्रन्थ के प्रकाशन तथा संशोधन में श्री मान्यवर आचार्य यादव जी त्रिकम जी महाराज ने जो परिश्रम एवं सहायता की है उन्हें मैं सम्मानपूर्वक बहुत धन्यवाद देता हूँ। पं. सोमनाथ शर्मा ने इस उपोद्घात में प्रूफ संशोधन आदि के द्वारा असाधारण सहयोग दिया है उन्हें भी मैं बार-बार धन्यवाद देता हूँ। अन्त में डॉ. गोकुलचन्द तथा मास्टर इन्द्रबिहारी शरण को भी मैं धन्यवाद देना नहीं भूल सकता जिन्होंने अंग्रेजी ग्रन्थों के स्थल एवं उद्धरण निकाल कर दिये हैं।

अन्त में निवेदन है कि इस प्रकार के गहन विषय पर विचार करने के लिये केवल आयुर्वेदिक तथा अन्य संस्कृत ग्रन्थों का ही परिशीलन आवश्यक नहीं है अपितु भारतीयों के समान ग्रीस, मिश्र तथा इरान आदि आदि अन्य देशों के इतिहास अनेक भाषा तथा विषय, प्राच्य एवं पाश्चात्त्य विद्वानों के ग्रन्थाकार तथा प्रकीर्ण लेखरूप भिन्न-भिन्न विचारों का अनुसन्धान, ऊहापोह, अन्तर्दृष्टि से वस्तुओं का यथार्थज्ञान इत्यादि बहुत से साधनों की आवश्यकता है। इन सब साधनों द्वारा गन्तव्य मार्ग पर चलने का दुःसाहस करने वाले मुझ अकिंचन के इन टूटे-फूटे कुछ शब्दों के द्वारा अभिलक्षित स्थान पर किस प्रकार पहुंचा जा सकता है। दुर्बल अङ्गों से इस दुर्गम मार्ग पर चलना दुःसाहस ही प्रतीत होता है। तथापि ‘नभः पतन्त्यात्मसमं पतत्रिणः’ इस न्याय के अनुसार यथाशक्ति उचित मार्ग में वाणी के विनियोग तथा सरस्वती देवी की सेवा समझ कर ही आयुर्वेद का परिशीलन न किये हुए होने पर भी आयुर्वेद के प्रकाशक प्राचीन महर्षियों का ध्यान करके केवल इस मुद्रण के अवसर पर ही साहित्य की दृष्टि से यथावसर आयुर्वेद के ग्रन्थों तथा इस संहिता का अध्ययन करने से जो विचार उत्पन्न हुए हैं उन्हें, एक अनभ्यस्त व्यक्ति के लिये होने वाली स्वाभाविक त्रुटियों के लिये क्षमा याचना करता हुआ, विद्यानुरागी एवं गुणग्राही विद्वानों के विनोद एवं वैद्यों के प्रोत्साहन के लिये इस उपोद्घात पुष्पाञ्जलि के रूप में आप लोगों के करकमलों में सादर समर्पित करता हूं।

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अनुवादक—
सत्यपाल आयुर्वेदालङ्कार

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२३ का.सं.