काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 358, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट
ज्वरसमुच्चय में काश्यपसंहिता के मिलने वाले श्लोक—
ज्वर के विषय में अनेक प्राचीन ऋषियों के वचनों का संग्रहरूप एक 'ज्वरसमुच्चय' नामक प्राचीन ग्रन्थ हैं मेरे पुस्तकालय में इस पुस्तक की ताडपत्र पर लिखी हुई दो प्रतिय हैं इनमें से एक प्राचीन अक्षरों में लिखी हुई तथा अपूर्ण है जिसके अन्त में लेख का समय ४४ नैपाली संवत्सर दिया हुआ है। दूसरी जो है वह पूर्ण है तथा नेवार (नैपाली) अक्षरों में लिखी हुई है। लिपि को देख कर वह आठ सौ वर्ष प्राचीन प्रतीत होती है। पुस्तक रूप में लिखे जाने का समय ही जब इतना प्राचीन है तब उसके निबन्ध का समय तो और भी प्राचीन होना चाहिए। इसमें आश्विन, भरद्वाज, कश्यप, चरक, सुश्रुत, भेड, हारीत, भोज, जतूकर्ण, कपिलबल आदि प्राचीन आचार्यों के ही नाम निर्देश पूर्वक ज्वरविषयक श्लोक संगृहीत हैं। अर्वाचीन आचार्यों के वचनों के उद्धरण न दिये होने से भी यह ग्रन्थ प्राचीन सिद्ध होता है। इसमें काश्यप के भी बहुत से ज्वरविषयक वचन दिये हुए हैं जो इस काश्यपसंहिता के विशेषकर पूर्वभाग तथा कुछ खिलभाग में प्रायः उसी रूप में मिलते हैं। जो यहां नहीं मिलते हैं वे ही संभवतः इस संहिता के त्रुटित भाग में आ गये हों। कहीं कहीं थोड़ा बहुत पाठभेद भी मिलता है। उदाहरण के लिये ज्वरसमुच्चय में दिये हुए पाठभेदों को मोटे अक्षरों में रखकर तथा मुद्रित काश्यपसंहिता के पृष्ठों का साथ में निर्देश करके ज्वरसमुच्चय में उद्धृत इस संहिता के श्लोक नीचे दिये जाते हैं—
'पूर्वोद्भवनिमित्तेन योऽपरो जायते गदः । तमुपद्रवमित्याहुरतीसारो यथा ज्वरे ।।
....... हिक्काश्च प्रवर्द्धन्ते ......' ।। (मूल उपोद्धात पृ. १६३ देखें)
मूल ताडपत्रीय काश्यपसंहिता के १९२ पृष्ठ के लुप्त होने से उसके स्थान पर इस मुद्रित पुस्तक में एक टिप्पणी (Foot Note) दी हुई है कि त्रुटित भाग का विषय मधुकोश व्याख्या में उद्धृत भालुकितन्त्र के श्लोकों से समानता रखता है। उसी त्रुटित (खण्डित) पृष्ठ के सन्निपातों के भेदविषयक श्लोक ज्वरसमुच्चय में कहीं कहीं कश्यप नाम से दिये हुए हैं। उस खण्डित पृष्ठ के आगे तथा पीछे के पृष्ठों के श्लोकों के भी ज्वरसमुच्चय में मिलने से बीच के श्लोक भो वे ही होने चाहिये। बीच के विलुप्त भाग के श्लोकों में कुछ निम्न श्लोक खण्डरूप में मिले हैं—
'तस्य शीतज्वरो निद्रा क्षुत्तृष्णा पार्श्वसङ्ग्रहः । .................... सन्निपातः सुदारुणः ।।'
(मूल उपोद्धात पृ. १६३-१६४ देखें)
इसके बाद मुद्रित पुस्तक से सादृश्य रखने वाले श्लोक ज्वरसमुच्चय में निम्न मिलते हैं—
'सर्वस्रोतोभवं त्वस्य रक्तपित्तं प्रकुप्यति । ................... देवामृतोपमम् ।।'
(मूल उपोद्धात पृष्ठ १६४-१६५ देखें)
इस प्रकार प्राचीन ज्वरसमुच्चय में अनेक स्थानों पर इस काश्यपसंहिता के उद्धरण तथा संवादों के मिलने से प्रतीत होता है कि उस समय तक काश्यपसंहिता का प्रचार तथा आदर था और यह प्रामाणिक समझी जाती थी। जिस ग्रन्थ में केवल प्राचीन ऋषियों के ही वचन संगृहीत हों उसमें काश्यपसंहिता के न केवल पूर्व भाग अपितु खिलभाग के भी उद्धरणों के मिलने से यह खिलभाग भी प्राचीन ही प्रतीत होता है।