काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 359, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ श्रीः ॥
श्रीकाश्यपसंहिता
वा
वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् ।
(कौमारभृत्यम्)
सूत्रस्थानम्
१........................ । ....................... ॥
किंवा लेहयितव्यं च किंवा लेहितलक्षणम् । अतिलेहितदोषाः के के च दोषा अलेहिते ।।
मन्दलीढस्य किं रूपं गुणदोषाश्च तत्र के । के लेहनोद्भवा रोगाः कश्च तेषामुपक्रमः ।।
एतन्मे भगवन् सर्वं वक्तुमर्हसि तत्त्वतः । सुख (खं) दुःखं हि बालानां दृश्यते लेहनाश्रयम् ।।
भगवन् ! बालकों को किस वस्तु का लेहन कराना चाहिये ? सम्यक् लेहित के क्या लक्षण हैं ? अतिलेहित तथा अलेहित के क्या दोष हैं ? मन्दलीढ़ का क्या स्वरूप है तथा उसके गुण और दोष क्या हैं ? लेहन से उत्पन्न होने वाले रोग कौन २ से हैं तथा उनकी चिकित्सा क्या है ? इत्यादि सब बातों का आप मुझे यथार्थ उपदेश दीजिये क्योंकि बालकों के सुख और दुःख (स्वास्थ्य एवं रोग) लेहन पर ही आश्रित हैं।
वक्तव्य—यह ग्रन्थ पूर्ण रूप से नहीं मिला है इस ग्रन्थ का प्रारम्भ ही २९वें पृष्ठ से होता है। इससे पूर्व के २८ पृष्ठों में किन २ विषयों का समावेश था—यह कहना कठिन है। सूत्रस्थान के इस अध्याय में इस लेहन सम्बन्धी प्रश्न से पूर्व भी कुछ अन्य प्रश्न जीवक द्वारा अवश्य किये गये होंगे क्योंकि यह अध्याय इस लेहन सम्बन्धी प्रश्न से पूर्व खण्डित है। यह अध्याय एकान्तरूप से यहीं से ही प्रारम्भ नहीं होता है। आगे भगवान् कश्यप द्वारा दिये गये उत्तरों
१. वृद्धजीवकीय तन्त्र की उपलब्ध ताडपत्र पुस्तक के आदि अन्त तथा मध्य में खण्डित होने से इसमें २९ से प्रारंभ कर के २६४ तक पृष्ठ हैं। तथा २९ से लेकर २६४ तक के पृष्ठों में भी बीच बीच में ३०-३२, ३५, ३६, ४०, ४७, ४८, ५०-७४, ७७, ७८, ८०, ८२, ८३, ८६, ८८, ९१, ९३, ११३, ११५, ११६, ११९, १२१, १२४, १२७, १२९, १३१, १३४, १३५, १४२, १५५-१६६. १९२, २३५, २४७, २४९, २५१,२५२ २५४-२५८ तथा २६० पृष्ठ खण्डित हैं। इस प्रकार बीच २ में खण्डित होने से अपूर्ण अंशों को बिन्दुओं द्वारा सूचित किया गया है। विद्यमान पृष्ठों में भी कुछ जीर्ण होने से तथा कुछ स्याही के लुप्त हो जाने से पढ़े नहीं जा सकते हैं—उन्हें भी बिन्दुमाला द्वारा सूचित किया गया है। पाठकों को इस ग्रन्थ को इस बात को ध्यान में रखते हुए ही पढ़ना चाहिये कि यह ग्रन्थ मूल पुस्तक के २९वें पृष्ठ से ही प्रारंभ हुआ है।