काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् लेहाध्यायः ? ]
को देखते हुए भी प्रतीत होता है कि इसमें लेहन के अतिरिक्त बालकों की प्रकृति आदि के सम्बन्ध में भी अन्य बहुत से प्रश्न किये गये होंगे।
इस अध्याय का मुख्य विषय लेहन है। बालकों के स्वास्थ्य, बल एवं बुद्धि की वृद्धि के लिये प्राचीन काल में बालकों को अनेक प्रकार के योग लेहन (अवलेह) के रूप में चटाने की परम्परा थी। जिस प्रकार आजकल बालकों के स्वास्थ्य एवं बुद्धि के लिये अनेक प्रकार की जन्मघुटियों का प्रयोग किया जाता है उसी प्रयोजन के लिये प्राचीन काल में इन लेहन योगों का प्रचलन था। इन लेहन योगों में स्वर्ण का विशेष स्थान था। स्वर्ण विशेषरूप से मेधावर्धक होता है। इसीलिये सद्यः जात बालक को भी मधु के साथ स्वर्ण चटाने का विधान मिलता है। बालकों के लिये प्रतिदिन व्यवहार में आने वाले इन लेहन योगों को दक्षिण भारत में ‘उरमरुन्द’ कहते हैं।
इति पृष्टो महाभागः कश्यपो लोकपूजितः । प्रश्नं प्रोवाच निखिलं प्रजानां हितकाम्यया ।।
इस प्रकार प्रश्न किये जाने पर लोक पूजित एवं ऐश्वर्यशाली भगवान् कश्यप ने लोगों के हित की कामना से उपर्युक्त प्रश्नों का पूर्ण रूप से उत्तर दिया।
यदन्नपानं प्रायेण गर्भिणी स्त्री निषेवते । रसो निर्वर्तते तादृक् त्रिधा चास्याः प्रवर्तते ।।
गर्भिणी स्त्री प्रायः जिस प्रकार के अन्नपान का सेवन करती है उससे वैसा ही रस बनता है तथा वह रस तीन प्रकार से काम में आता है १. उस रस का एक भाग माता (गर्भिणी स्त्री) के शरीर के पोषण में २. एक भाग गर्भ (Foetus) के पोषण में तथा ३. एक भाग स्तनों की पुष्टि के लिये प्रयुक्त होता है।
**वक्तव्य—**गर्भवती स्त्री जिस भोजन का सेवन करती है उससे स्वयं उसके शरीर का तो पोषण होता ही है अपितु अपरा (Placenta) द्वारा गर्भ का भी पोषण होता है। सुश्रुत में कहा है—“गर्भस्य खलु रसनिमित्ता ..... परिवृद्धिर्भवति”। इसकी टीका में डल्हण ने लिखा है—“रसनिमित्तेति मातुरिति शेषः”। इसके साथ २ गर्भिणी के स्तनों की भी पुष्टि होती है। सुश्रुतसंहिता शारीरस्थान अध्याय ४ में कहा है—“शेषं चोर्ध्वतरमागतं पयोधरावभिप्रतिपद्यते, तस्माद् गर्भिण्यः पीतोन्नतपयोधरा भवन्ति' इसकी टीका में डल्हण करता है—‘स्तनाश्रयमेव कफोपरञ्जितं स्तन्यतामुपगतं प्रसूतायाः पुनराहाररसेनाप्याय्यते'। चरक शा. अ. ६ में भी कहा है-‘स च सर्वरसवानाहारः स्त्रियास्त्रिधा रसः प्रतिपद्यते स्वशरीरपुष्टये स्तन्याय गर्भवृद्धये च’।
मातृपुष्ट्यर्थमेकांशो द्वितीयो गर्भपुष्टये । तृतीयः स्तनपुष्ट्यर्थं, नार्या गर्भस्तु पुष्यति ।।
तादृक्प्रकृतयस्तस्माद्गर्भात् प्रभृति देहिनः । वातपित्तकफस्थूणास्तिस्रः प्रकृतयश्च ताः ।।
नारी के गर्भ की जिस विधि से पुष्टि होती है, प्रारंभ (गर्भ) से ही मनुष्यों की उसी प्रकार की प्रकृतियां बन जाती हैं। ये प्रकृतियां मुख्य रूप से तीन प्रकार की—१. वातस्थूणा २. पित्तस्थूणा तथा ३. श्लेष्मस्थूणा होती हैं।
**वक्तव्य—**वास्तव में गर्भ को जिस ढंग का पोषण मिलता है उसी प्रकार की आगे उसकी प्रकृति बन जाती है। सुश्रुत शा. अ. ४ में कहा है—शुक्रशोणितसंयोगे यो भवेद्दोष उत्कटः । प्रकृतिर्जायते तेन ......। गर्भावस्था से ही प्रकृति का निर्माण होता है। उसे बदलना अत्यन्त कठिन है। “यः स्वभावो हि यस्यास्ति तस्यासौ दुरतिक्रमः । श्वायदि क्रियते राजा किं स नाश्नात्युपानहम्’ ।। (हितोपदेश)।
आयुर्वेद के सिद्धान्तानुसार वात, पित्त, तथा कफ इन तीनों दोषों पर ही शरीर की स्थिति है। जिस प्रकार तीन स्तम्भों से मकान की स्थिति है उसी प्रकार ये तीनों दोष समावस्था में विद्यमान होकर शरीर का धारण करते हैं। इसी लिये यहां वात, पित्त तथा कफ का स्थूण शब्द से निर्देश किया गया है। सुश्रुत सूत्रस्थान २१ अध्याय में भी स्थूण शब्द