भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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लेहाध्यायः ? ] सूत्रस्थानम् ३

का इसी अर्थ में प्रयोग किया गया है—"वातःपित्तश्लेष्माण एव देहसंभव हेतवः। तैरेवाव्यापन्नैरधोमध्योर्ध्वसन्निविष्टै शरीरमिदं धार्यते ऽगारमिव स्थूणाभिस्तिसृभिरतश्च त्रिस्थूणमाहुरेके" । इस शरीर रूपी मकान के लिये वात, पित्त तथा श्लेष्मा तीन स्थूण (स्तम्भों) का कार्य करते हैं। उन्हीं वात पित्त कफ रूपी तीन स्तम्भों पर यह मकान स्थित है। वे ही स्थूण (स्तम्भ) जब विकृत हो जाते हैं तब शरीर के नाश का कारण होते हैं। इसी लिये शरीर की मुख्य रूप से ये ही तीन प्रकृतियां कही गई हैं।

वातिकाः पैत्तिकाः केचित् कफिनश्चैव देहिनः । द्वन्द्वप्रकृतयश्चान्ये समस्थूणास्तथाऽपरे ।। अरोगास्तु समस्थूणा वातिकाद्याः सदाऽऽतुराः ।

कुछ व्यक्ति वातप्रकृति, कुछ पित्तप्रकृति तथा कुछ श्लेष्मप्रकृति के होते हैं। कुछ व्यक्ति द्वन्द्व (दो दोषों का संयोग) प्रकृति तथा कुछ समस्थूण प्रकृति के होते हैं। इनमें से समस्थूण प्रकृति के व्यक्ति स्वस्थ होते हैं तथा वातिक आदि प्रकृति के मनुष्य सदा रोगी ही होते हैं।

वक्तव्य—वास्तव में प्रकृतियां मुख्यरूप से उपर्युक्त तीन ही होती हैं परन्तु उन्हीं दोषों के परस्पर संसर्ग से वे सात प्रकार की हो जाती हैं। यथा—१. वातिक २. पैत्तिक ३. श्लैष्मिक ४. वातपैत्तिक ५. वातश्लैष्मिक ६. पित्तश्लैष्मिक तथा ७. सम प्रकृति (जिसमें वात पित्त तथा श्लेष्मा समानरूप से विद्यमान हों)। सुश्रुत में भी सात प्रकार की प्रकृतियां मानी गई हैं-सप्तप्रकृतयो भवन्ति दोषैः पृथकद्विशः समस्तैश्च। तथा चरक सू. अ. ७ के निम्न श्लोक में भी- समपित्तानिलकफाः केचिद्गर्भादिमानवाः। दृश्यन्ते वातलाः केचित्पित्तलाः श्लेष्मलास्तथा।। 'तथा' शब्द से द्वन्द्वज का ग्रहण करते उपर्युक्त सात ही प्रकृतियां मानी गई हैं। इस सात प्रकार की प्रकृतियों में से समस्थूणा (सम) प्रकृति वाले व्यक्ति स्वस्थ माने गये हैं। तथा शेष वात आदि प्रकृति वाले सब व्यक्ति नित्य आतुर (रोगी-अस्वस्थ) माने गये हैं।

उपर्युक्त सातों प्रकार की प्रकृतियां होते हुए भी वास्तव में वे ही व्यक्ति पूर्णरूप से स्वस्थ माने जाते हैं जिनमें तीनों दोष समावस्था में विद्यमान होते हैं। समावस्था से यह अभिप्राय नहीं है कि वात पित्त तथा कफ तीनों दोष समान परिमाण में विद्यमान हों अपितु समावस्था से तात्पर्य यह है कि तीनों दोषों को जिस अनुपात (Proportion) में होना चाहिये उसी अनुपात में हों। वातिक पैत्तिक आदि वास्तव में प्रकृतियां नहीं हैं अपितु जिस व्यक्ति में जिस दोष की प्रधानता होती है उसे स्थूलरूप में वही नाम दे दिया गया है। वास्तव में वे अमुक २ दोषों की वृद्धावस्था ही समझनी चाहिये। इन्हें प्रकृति कहना उपयुक्त नहीं है। किसी भी दोष की वृद्धयवस्था सदा रोग को ही सूचित करती है। दोषों की समावस्था ही स्वास्थ्य है। विकारो धातुवैषम्य साम्यं प्रकृतिरुच्यते। सुखसंज्ञकमारोग्यं विकारो दुःखमेव च।। (चरक सू.अ. ९) दोषों की समावस्था को ही प्रकृति माना है। यहां कई लोग शंका उपस्थित करते हैं कि कोई भी व्यक्ति समवातपित्तकफ नहीं हो सकते हैं क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति के आहार में थोड़ी बहुत विषमता अवश्य होती है और माता के आहार रस के अनुसार ही व्यक्तियों की प्रकृतियों का निर्माण होता है। इसलिये माता के आहार के विषम होने से गर्भ कभी भी समधातुप्रकृति नहीं हो सकता है। अतः किसी न किसी दोष की प्रधानता होकर कोई व्यक्ति वातप्रकृति, कोई पित्तप्रकृति तथा कोई श्लेष्मप्रकृति के ही होते हैं। इसलिये “वातिकाद्याः सदाऽऽतुराः” यह कहना उचित नहीं है। भगवान् आत्रेय चरक संहिता के विमान स्थान में इस तर्क का खण्डन करते हुए कहते हैं कि—समवातपित्तश्लेष्माणं ह्यरोगमिच्छन्ति भिषजः, यतः प्रकृतिश्चारोग्यं, आरोग्यार्था च भेषजप्रवृत्तिः, सा चेष्टरूपा, तस्मात् सन्ति समवातपित्तश्लेष्मप्रकृतयः। न तु खलु सन्ति वातप्रकृतयः, पित्तप्रकृतयः श्लेष्मप्रकृतयो वा, तस्य तस्य किल दोषस्याधिकभावान्सा सा दोषप्रकृतिरुच्यते मनुष्याणां, न च विकृतेषु दोषेषु प्रकृतिस्थत्वमुप पद्यते, तस्मान्नैताः प्रकृतयः सन्ति, सन्ति तु खलु वातलाः, पित्तलाः श्लेष्मलाश्च, अप्रकृतिस्थास्तु ते ज्ञेयाः”। चिकित्सक लोग समवातपित्तकफ पुरुष को ही नीरोग अथवा स्वस्थ मानते हैं। प्रकृति को