भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् लेहाध्यायः ? ]

ही आरोग्य कहते हैं। आरोग्य के लिये ही भेषज की प्रवृत्ति होती है। कहा भी है—चतुर्णां भिषगादीनां शस्तानां धातुवैकृते। प्रवृत्तिर्धातुसाम्यार्था चिकित्सेत्यभिधीयते। समवातपित्तकफधातु वाले पुरुष हो सकते हैं तथा होते हैं। वास्तव में वातिक, पैत्तिक तथा श्लैष्मिक प्रकृति नहीं होती है। वह तो दोषों की प्रधानता होने से दोषप्रकृति ही है तथा इसे अप्रकृति (रुग्णावस्था) ही जानना चाहिये। इसीको दृष्टि में रखते हुए कहा गया है—“वातिकाद्याः सदाऽऽतुराः” चरकसंहिता सू. अ. ७ में भी बिलकुल ऐसा ही वर्णन किया गया है—तेषामनातुराः पूर्वे वातलाद्याः सदाऽऽतुराः॥ इन वातिक प्रकृति आदि वाले मनुष्यों को हम उपचार रूप से ही स्वस्थ कह सकते हैं वस्तु-तस्तु इनमें अमुक २ दोष की प्रधानता होने से ये विकृति ही हैं।

एताः प्रकृतयः प्रोक्ता देहिनां वृद्धजीवक ! ।। एता आश्रित्य तत्त्वज्ञो भेषजान्युपकल्पयेत्।
य एता वेद तत्त्वेन न स मुह्यति भेषजे ।।

हे वृद्धजीवक ! ये मनुष्यों की प्रकृतियां कही गई हैं। तत्त्वज्ञ चिकित्सक को चाहिये कि इन प्रकृतियों के अनुसार ही ओषधियों की कल्पना करे। जो चिकित्सक इन प्रकृतियों को तत्त्वपूर्वक जानता है अथवा उन्हें ध्यान में रखता है वह चिकित्सा कार्य में कभी भी व्यामूढ़ (मोहित) नहीं होता है।

विल (ङ) ङ्गफलमात्रं तु जातमात्रस्य देहिनः। भेषजं मधुसर्पिर्भ्यां मतिमानुपकल्पयेत् ।।
वर्धमानस्य तु शिशोर्मासे मासे विवर्धयेत् । अथामलकमात्रं तु परं विद्वान्न वर्धयेत् ।।

बुद्धिमान् चिकित्सक को चाहिये कि उत्पन्न हुए बालक को विडङ्गफल (वायविडङ्ग) के बराबर (भार में) ओषधि मधु तथा सर्पिस् (असमान मात्रा) के साथ देवे। तथा ज्यों २ शिशु की वृद्धि होती जाय प्रत्येक मास ओषधि की मात्रा भी बढ़ाता जाय परन्तु विद्वान् चिकित्सक आमलक (आंवले) के परिमाण से अधिक ओषधि की मात्रा न बढ़ावे।

**वक्तव्य—**प्राचीन काल में वैज्ञानिक मापतोल का उदय न होने से प्रचलित वस्तुएं ही माप तोल में व्यवहृत होती थीं। इसीलिये बालकों की ओषधि के लिये विडङ्ग तथा आमलक द्वारा ओषधि के परिमाण का निर्देश किया गया है। सुश्रुतसंहिता के शारीरस्थान में ओषध का परिमाण भिन्न ही ढंग से बतलाया गया है—“तत्र मासाद्धूर्ध्वं क्षीरपायाङ्गुलिपर्वद्वयग्रह (ण) संमितामौषधमात्रां विदध्यात्, कोलास्थिसंमितां कल्कमात्रां क्षीरान्नादाय, कोलसंमितामन्नादाय्येति”। यहां बालकों का तीन प्रकार का श्रेणीकरण किया गया है १. क्षीराद २. क्षीरान्नाद ३. अन्नाद। एक वर्ष की उम्र तक बालक क्षीराद, दो वर्ष तक क्षीरान्नाद तथा उससे ऊपर अन्नाद कहलाता है। क्षीराद के लिये उतनी औषध का विधान है जितनी अंगुली के दो पर्व पर लग सके। क्षीरान्नाद के लिये कोलास्थि के बराबर तथा अन्नाद के लिये कोल (बेर) के बराबर (भार में) औषध निर्धारित की गई है। अन्य ग्रन्थों में बालकों को निम्न परिमाण में औषध देने का विधान किया गया है—प्रथमे मासि जातस्य शिशोर्भेषजरक्तिका। अवलेह्या तु कर्तव्या मधुक्षीरसिताघृतैः ।। एकैकां वर्धयेत्तावद्यावत् संवत्सरो भवेत्। तदूर्ध्वं माषवृद्धिः स्यात् यावत् षोडशाब्दिकः :: आजकल बालकों की औषध की मात्रा ज्ञात करने के लिये Young का निम्न फार्मूला व्यवहृत होता है—The rule is to divide the age in years by the age in years plus 12, the resulting quotient is the proper fraction of an adult dose. किसी भी आयु के बालक की मात्रा अवस्था/अवस्था+१२ के द्वारा ज्ञात की जा सकती है। उदाहरण के लिये एक वर्ष के बालक के लिये औषध की मात्रा १/१+१२ अर्थात् पूर्ण मात्रा की १/१३ होगी। इसी प्रकार तीन वर्ष के बालक के लिये ३/३+१२=३/१५ या १/५ मात्रा होनी चाहिये। इससे आगे १२ से १६ वर्ष के बालकों के लिये औषध की मात्रा पूर्णमात्रा का १/२ से २/३ तथा १७ से २० वर्ष तक २/३ से ४/५ मात्रा होनी चाहिये। इसके अतिरिक्त बालकों की औषध की मात्रा ज्ञात करने