काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 363, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंलेहाध्यायः ? ] सूत्रस्थानम् ५
के लिये Cowing तथा Dilling के उपाय भी प्रयुक्त किये जाते हैं परन्तु सबसे अधिक प्रचलित Young का फार्मूला ही है जो कि प्रायः व्यवहृत होता है ।।
अक्षीरा जननी येषामल्पक्षीराऽपि वा भवेत् । दुष्टक्षीरा प्रसूता वा धात्री वा यस्य तादृशी ।। दुष्प्रजाताभृशव्याधिपीडितायाश्च त्ये सुताः । वातिकाः पैत्तिका ये च ये च स्युः कफवर्जिताः ।। स्तन्येन ये न तृप्यन्ति पीत्वा पीत्वा रुदन्ति च । अनिद्रा निशि ये च स्युर्ये च बाला महाशनाः ।। अल्पमूत्रपुरीषाश्च बाला दीप्ताग्नयश्च ये । निरामयाश्च तनवो मृद्वङ्गा ये च कर्शिताः ।। वर्चःकर्म न कुर्वन्ति बाला ये च त्र्यहात् परम् । एवंविधाञ्छिशूनाह लेहयेदिति कश्यपः ।।
लेहन किन्हें कराना चाहिये—उन बालकों को जिनकी माता या धात्री के स्तनों में दूध बिलकुल न आता हो, कम आता हो या दूषित हो अथवा जो प्रसूता हो । जो दुष्प्रजाता (जिसे ठीक तरह से प्रसव न हुआ हो) तथा गंभीर रोग से पीड़ित स्त्री के बालक हों, जिनमें वात तथा पित्त दोष की प्रधानता को परन्तु साथ में जो कफदोष से रहित हों, जो दूध पीने के बाद भी तृप्त नहीं होते तथा दूध पीकर भी लगातार रोते रहते हैं, जिन्हें रात्रि में नींद नहीं आती, जो बहुत भोजन करते हों, जिन्हें मूत्र तथा मल कम आता हो, जिनकी अग्नि दीप्त हो, जो रोगशून्य होने पर भी तनु (पतले) मृदु (कमजोर) अङ्गोंवाले तथा कृश हों, जो तीन २ दिन तक मलत्याग नहीं करते, ऐसे बालकों का लेहन करावे-ऐसा भगवान् कश्यप का मत है ।
लेहन से यहां क्या तात्पर्य है इसका पूर्व भी निर्देश किया जा चुका है । बालकों की स्वास्थ्य रक्षा के लिये भिन्न २ ओषधियां तथा स्वर्ण आदि मधु में मिलाकर जो बालकों को चटाई जाती है उन्हें लेहन कहते हैं ।
......... च मन्दाग्निरठरो जनः । निद्रालुर्बहुविण्मूत्रः स्वल्पो यो दृढ़गात्रकः ।। कल्याणमातृकोऽजीर्णी गुरुस्तन्योपसेविता(तः) । सुतः सर्वरसाशिन्या ऊर्ध्वजत्रुरुजान्वितः ।। आमे ज्वरेऽतिसारे च कामलाशोथपाण्डुषु । हृद्रोगश्वासकासेषु गुदबस्त्युदरामये ।। आनाहे गण्डवैसर्पे छर्द्यरोचकयो(र्बले) । ......... हे सर्वग्रहेषु च ।। न लेहयेदलसके नाहन्यहनि नाशितम् । न दुर्दिनपुरोवाते नासात्म्यं नातिमात्रया ।।
लेहन किन्हें नहीं कराना चाहिये—मन्द जठराग्निवाले, निद्रालु, बहुत मल एवं मूत्र का त्याग करने वाले, स्वल्प एवं दृढ़ (कठोर) शरीर वाले, कल्याणमातृक, अजीर्ण के रोगी एवं भारी स्तन्य (दूध) का सेवन करने वाले, सब रसों अथवा आहार रसों का सेवन करने वाली स्त्री के पुत्रों, ऊर्ध्वजत्रु रोगों से युक्त, आमरोग, ज्वर तथा अतिसार में अथवा आमातिसार और ज्वरातिसार में, कामला (पीलिया-Jaundice) शोथ (Dropsy) तथा पाण्डुरोग में, हृद्रोग, श्वास, कास, गुदरोग, बस्तिरोग, एवं उदररोग में, आनाह (Flatulance) गण्डविसर्प, बलवान् छर्दि (वमन) एवं अरुचि (Nausea) में, सब प्रकार के ग्रहरोगों में तथा अलसक रोग में बालकों को लेहन न करावे । इसके अतिरिक्त, प्रतिदिन, भोजन करने के उपरान्त दुर्दिन में तथा सामने से तेज वायु चलती हो तब भी लेहन न करावे । असात्म्य, वस्तु का लेहन तथा अधिक मात्रा में भी लेहन नहीं कराना चाहिये ।
वक्तव्य—कल्याणमातृक-‘कल्याणी माता यस्य’ जिसकी माता कल्याण युक्त हो । कल्याण का अर्थ अक्षय स्वर्ग भी होता है । मेदिनी में कहा है—कल्याणमक्षयस्वर्गे । जिस बालक की माता अक्षय स्वर्ग (मोक्ष) को प्राप्त हो गई है तथा जिसकी विमाता (Step mother) हो । ऐसा बालक कल्याणमातृक कहलाता है । ऊर्ध्वजत्रु-जत्रु से अभिप्राय