भारतकोश
संग्रह पर लौटें

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद ३४१

आचार्यों के केवल नाम मात्र का बोध होता है। बहुत से भारतीय दार्शनिक तथा बौद्धग्रन्थ चीन तथा तिब्बती भाषाओं में अनूदित हुए केवल छायारूप में मिलते हैं। केवल हजार वर्ष प्राचीन बौद्धग्रन्थ भी सैकड़ों नष्ट हो चुके हैं। इस प्रकार की रोमहर्षण घटनाएं श्रुति, स्मृति, आगम, वेदाङ्ग, उपाङ्ग दर्शन, आदि में अथवा बौद्ध एवं जैन सम्प्रदायों में कहां नहीं मिलती हैं। इस आयुर्वेद में भी आत्रेय, सुश्रुत, भेड तथा काश्यप आदि की उपलब्ध संहिताओं के उल्लेख से काप्य, वायोर्विद, वामकं, वैदेह, काङ्कायन, हिरण्याक्ष, शौनक, पाराशर्य, गार्ग्य, माठर, कौत्स, मौद्गल्य, कुशिक, सुभूति, मार्कण्डेय, करवीर्य आदि बहुत से प्राचीन आयुर्वेद के आचार्यों का बोध होता है जिनमें से कइयों के स्थान-स्थान पर वचन तथा मत उद्धृत मिलते हैं। उन आचार्यों के वे ग्रन्थ कहां लुप्त हो गये हैं। यदि वे सब ग्रन्थ उपलब्ध हो सकें तो एक विशाल आयुर्वेदीय ग्रन्थराशि तैयार हो सकती है। केवल दो तीन उपलब्ध ग्रन्थों का ही अच्छी प्रकार अवगाहन करने से प्रतिभा एवं ज्ञान से उज्ज्वल सैकड़ों तत्त्वपूर्ण उपदेशों का ज्ञान मिलता है। इस प्रकार नाना प्रस्थानों में विभक्त प्राचीन आचार्यों के सब ग्रन्थ यदि मिल सकें तो विद्वानों को कितना लाभ हो सकता है। करुणामय प्राचीन महर्षियों द्वारा विचारधारा रूपी रस से विज्ञान कल्पतरु को बढ़ाने के कारण हम उनके यद्यपि अनुगृहीत हैं तथापि पूर्ण परिपक्व फलों से हम वञ्चित ही हैं।

प्राचीन काल से ही समय-समय पर होने वाले प्राकृतिक, वैकृतिक, तथा आकस्मिक क्षोभों, एक दूसरे राष्ट्रों के परस्पर होने वाले युद्ध आदि नैतिक उपद्रवों, बारम्बार होनेवाले विदेशी शासकों के विध्वंसकारक आक्रमणों, साम्प्रदायिक सघर्षों, तक्षशिला, नालन्दा तथा विक्रमशिला आदि के विशाल पुस्तकालयों के भस्मसात् एवं धूलिसात् होने तथा जल, अग्नि आदि के विप्लवों से हजारों प्राचीन ग्रन्थ लुप्त हो चुके हैं। न केवल प्राचीन काल में अपितु आजकल भी प्राचीन विद्यास्थानों में ग्रामीण पर्णशालाओं (चटशालाओं) में स्थित सैकड़ों ग्रन्थों के अग्नि के उत्पात से क्षणभर में नष्ट हो जाने से तथा बहुत से प्राचीन विद्वानों द्वारा संगृहीत ग्रन्थों के भी अब उनके परिवार तथा संतति में संरक्षक के अभाव से, अनास्था से तथा भट्टी, नदी प्रवाह, बाजारों में फैलने, भूगर्भ एवं धूलराशि में अनिश्चित काल तक पड़े रहने से, पुराने होकर जीर्ण-शीर्ण हो जाने से तथा दीमक आदि कीड़ों से खाये जाने के कारण बचे हुए ग्रन्थ भी उत्तरोत्तर नष्ट होते जा रहे हैं। इस सबको देखकर किस विद्यानुराग का हृदय दुःख से नहीं फटने लगता। अनेक विज्ञानों से पूर्ण इस प्राचीन कोश का इस प्रकार से नष्ट हो जाना बड़े दुःख की बात है।

इस प्राचीन विद्या को नाश से बचाने के लिये आजकल सैकड़ों प्रयत्नशील, गुणग्राही एवं दयालु भारतीय तथा पाश्चात्त्य विद्वान् इधर-उधर घूम-घूम कर अन्वेषण करते हुए विनाशोन्मुख बहुत से प्राचीन ग्रन्थों को ढूंढ-ढूंढ कर निकाल रहे हैं। खोटाङ् प्रदेश के भूगर्भ से निकले हुए बावर मैन्युस्क्रिप्ट नाम से प्रसिद्ध नावनीतक आदि बहुत से प्राचीन लेख आजकल खण्डित अवस्था में मिले हैं। बहुत से लोग चीन, तिब्बत आदि देशों में जाकर वहां मिलने वाले मूल लेखों तथा अनुवादों से कुछ ग्रन्थों को उपस्थित करते हैं। इन लोगों का प्रयत्न अत्यन्त प्रशंसनीय है। अब विनाशोन्मुख प्राचीन विद्या की रक्षा एकमात्र गुणग्राही विद्वान् तथा श्रीमान् (धनी) व्यक्ति ही कर सकते हैं। धनीमानी लोगों का कर्तव्य है कि जो प्राचीन ग्रन्थ अभी तक अवशिष्ट हैं उनको परिश्रम से भी ढूंढ़कर प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिये।

पुरातन वस्तुएं बाह्य तथा पुरातन लेख प्राचीन समय की अन्तः परिस्थिति को सूचित करती हैं। अतीत समय की अवस्था को जानने के लिये इनके अतिरिक्त और कोई साधन नहीं है। प्राचीन काल की जो भी वस्तुएं तथा लेख आदि उपलब्ध होते हैं उनमें न्यूनाधिक भाव से कुछ न कुछ प्राचीनता की झलक मिलती ही है। थोड़े बहुत समय के पौर्वापर्य वाले प्राचीन सभ्यता के समान सूत्रों में बंधे हुए असीरिया, बेबिलोनिया, सुमेरिया, तथा मित्र आदि प्राचीन जातियों के पाश्चात्त्य देशों में भी काल धर्म से होने वाले अलेक्जेण्ड्रिया के विशाल पुस्तकालय के अग्निकाण्ड आदि तथा समय-समय पर होने वाले राजनैतिक तथा साम्प्रदायिक विप्लवों से उनकी बहुत सी प्राचीन ऐतिहासिक वस्तुएं नष्ट हो गई हैं तथापि उनमें अनेक वस्तुओं तथा लेखों के साथ-साथ शवों के मिलने से, कहीं-कहीं पिरामिड (Pyramids) एवं स्तूप आदियों में इतिहास के मिलने से तथा कहीं-कहीं ईंटें, शिलाओं तथा धातुओं में चिरकालीन ग्रन्थ तथा इतिवृत्तों के मिलने से प्राचीन काल से प्रचलित एवं स्थान-स्थान पर मिलने वाले प्राचीन लक्षणों से असीरिया, बेबिलोनिया, सुमेरिया तथा मिश्र आदि प्राचीन देश की आनुक्रमिक प्राचीन सभ्यता के समय-निर्धारण के साथ-साथ उनके प्राचीन विषयों का ज्ञान

३४२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्

भी सुगमता से हो सकता है। परन्तु इसके अतिरिक्त भारत में प्राचीन काल से ही आहिताग्नि अथवा लौकिक अग्नि के द्वारा शवों को जलाने की प्रथा होने से अन्य अवशिष्ट वस्तुओं को भी वितरित कर देने से मन्दिरों के भी बार-बार होने वाले विप्लवों के कारण लुप्त हो जाने से प्राचीन समय में आनुश्रविक पद्धति (गुरु से मौखिक रूप में शिक्षा ग्रहण करना) की प्रथा के कारण संहिता, सूत्र आदि प्राचीन ग्रन्थों के लेखन की रुचि की विरलता के कारण तथा बाद में भोजपत्र और ताडपत्र आदियों पर लिखे हुए लेखों के भी समय-समय पर होने वाले पारस्परिक एवं वैदेशिक संघर्षों के कारण बहुत कुछ जल जाने तथा नष्ट हो जाने से, आजकल भारतीय इतिवृत्त के अनुसन्धान के लिये खोतान, कासगर आदि स्थानों में हुई खुदाई तथा चीन, तिब्बत आदि में मिलने वाले लेखों के अनुसन्धान से भारतीय पुरातन इतिवृत्त के बहुत कम लक्षण मिलने से, पुराण आदि कथाओं के मिलने पर भी महाभारत के गणेशोपाख्यान के समान बीच-बीच में अनुप्रविष्ट अर्वाचीन विषयों, आलङ्कारिक दृष्टि से प्रविष्ट अतिशयोक्तियों तथा भिन्न-भिन्न सम्प्रदाय के हस्तक्षेपों से अपने-अपने अनुसार प्राचीन के लोप तथा परिवर्तन से उसे मलिन (विकृत) कर देने से तथा प्राचीन अंशों को भी अन्य देशों के लेखों, शिलालेखों तथा भूगर्भ से उपलब्ध विज्ञान आदि के साथ समानता होने से आजकल महेञ्जोदारो की खुदाई से उपलब्ध पर्याप्त प्रमाणों के मिलने से पूर्व भारत की प्राचीन परिस्थिति का वास्तविक ज्ञान होना अत्यन्त कठिन था। परन्तु आजकल महेञ्जोदारो तथा हरप्पा की खुदाई में मिलने वाले भिन्न-भिन्न विषयों से प्राचीन भारतीय परिस्थिति पर बहुत सा प्रकाश पड़ता है। भारत में महेञ्जोदारो तथा हरप्पा के समान गङ्गा के किनारे और भी बहुत से प्राचीन प्रदेश मिल सकते हैं। तथा कालक्रम से अनुसन्धान के उपायों के उन्नत होने से ज्यों-ज्यों खुदाई में और पदार्थ तथा लेख आदि प्रकाश में आते जायेंगे तथा ज्यों-ज्यों कालक्रम से हरप्पा तथा महेञ्जोदारों में मिलने वाले प्राचीन अनिश्चित अक्षरों एवं लिपि के पढ़े जाने से प्राचीन विषय प्रकट होते जायेंगे, त्यों-त्यों प्राचीन भारतीय पुरावृत्त और भी स्पष्ट होता जायगा।

अन्त में हम पाठकों की सेवा में निवेदन करना चाहते हैं कि आजकल मुद्रणयन्त्रों के बहुत प्रचार हो जाने से भारत तथा अन्य देशों में भी प्रचलित, नवोपलब्ध तथा बहुत से अप्रकाशित भारतीय ग्रन्थ भी प्रकाश में आ गये हैं इस प्रकार एक-एक पुस्तक की हजारों प्रतियां होकर घर-घर में प्रचलित हो जाती हैं जिससे प्रचलित ग्रन्थों का भी विशेषरूप से प्रचार हो जाता है, अप्रकाशित ग्रन्थों का सर्वसाधारण में प्रकाश हो जाता है, अन्वेषण तथा लेखन के परिश्रम के बिना ही अल्पव्यय से ही अधिक लाभ हो जाता है तथा अपने पूर्वजों द्वारा भी बहुत से अदृष्ट एवं अश्रुत प्राचीन ग्रन्थ सहसा ही देखने को तथा अध्ययन करने को मिल जाते हैं। यह यद्यपि सन्ताप का विषय है परन्तु आजकल के मुद्रण में स्याही के दृढ़ होने पर भी दुर्बल पत्रों पर प्रकाशित ग्रन्थ दृढ़ ताडपत्रों पर लिखे हुए ग्रन्थों की तुलना में चिरस्थायी नहीं होते हैं। इसीलिये आजकल सौ वर्ष पूर्व प्रकाशित पुस्तकों के भी वर्ण विकृत हो जाते हैं तथा वे स्वयं भी जीर्ण शीर्ण हो जाती हैं। मुद्रण कला की सुलभता के कारण लेखनकला उत्तरोत्तर ह्रास को प्राप्त हो रही है। पदच्छेद की स्पष्टता तथा शुद्धि (Accuracy) के कारण मन को आकर्षित करने वाली मुद्रित पुस्तकों के सुलभ होने से विद्यमान लिखित पुस्तकों के संरक्षण का ध्यान भी कम होता जा रहा है। मुद्रित हुई उन्हीं पुस्तकों का पुनर्मुद्रण संभव है जो प्रायः अध्ययन तथा अध्यापन के काम में आती हैं। जो विशेष काम में नहीं आती हैं। उनका पुनर्मुद्रण नहीं होता है। ऐसे बहुत से ग्रन्थ आजकल दुर्लभ हो गये हैं। ऐसे ग्रन्थों को मुद्रित हुआ जानकर कोई लिखता भी नहीं तथा एक वार मुद्रण हो जाने से उनका पुनर्मुद्रण भी नहीं होता। इसप्रकार दोनों ओर से वञ्चित हुए ये ग्रन्थ उत्तर होते हुए भी पूर्व मुद्रित पुस्तक की आयु के समाप्त हो जाने पर सौ दो सौ वर्षों में सहसा समाप्त हो जाती है। कालक्रम से अन्य भी बहुत प्राचीन आनुश्रविक विषय नष्ट हो गये हैं तथा यह शंका होने लगती है कि प्राचीन आचार्यों के गौरव का स्मरण कराने वाले अन्य भी ग्रन्थ कहीं हमारे हाथ से निकल कर नाम मात्र शेष न रह जायें। इसलिये इस भावी आशंका को पहले से ही ध्यान में रख कर प्रकाशकों का कर्तव्य है कि जिन ग्रन्थों की रक्षा करना आवश्यक हो उनकी कुछ प्रतियां सुदृढ़ एवं स्थायी पत्रों पर प्रकाशित करने की प्रवृत्ति बढ़ानी चाहिये जिससे वे शीघ्र नष्ट न हो सकें। पुस्तकालयों में भी उन्हीं दृढ़ प्रतियों को ही अत्यन्त सुरक्षा पूर्वक रखना चाहिये। तथा संहिता, ब्राह्मण, सूत्र, भाष्य आदि कुछ ऐसे ग्रन्थ जो हमारी प्राचीनता के सर्वस्व समझे जाते हैं (चाहे वे हमारी व्यावहारिक अध्ययन परम्परा में प्रविष्ट हों चाहे न हों) उनको किसी भी व्यय पर ताडपत्र अथवा अन्य सुदृढ़ पत्रों पर उत्तम स्याही से लिखकर यत्नपूर्वक पुस्तकालयों में रखना चाहिये जिससे दृढ़ पत्रों पर लिखे

उपोद्घात का हिन्दी अनुवाद | ३४३


हुए सात-आठ सौ वर्ष की आयु वाले तथा ताडपत्र पर लिखे हुए हजारों वर्षों की आयुवाले आजकल उपलब्ध ग्रन्थों की तरह ये भी चिरकाल तक सुरक्षित रह सकते हैं। भोजपत्र पर लिखित पिप्पलादशाखा संहिता की केवल एक अवशिष्ट प्रति से ही हमें आजकल उस शाखा का ज्ञान होता है। चिरकाल से विलुप्त प्रमाणवार्तिक ताडपत्र रूपी कवच में सुरक्षित रखा हुआ हजारों वर्षों के बाद भी पुनरुज्जीवित अवस्था में उपलब्ध हुआ है। भूगर्भ से निकले हुए ईंटों पर खुदे हुए लेखों तथा शिलालेखों से उन तीन हजार वर्ष प्राचीन लोगों की सभ्यता का ज्ञान होता है जिनका नाम भी लुप्त हो चुका था। इतना ही नहीं आजकल महेञ्जोदारो तथा हरप्पा में मिलने वाली मुद्राएं पांच हजार वर्ष प्राचीन सभ्यता को प्रकाश में लाकर भारत के प्राचीन गौरव को बढ़ा रही हैं। अस्तु, इतना हो चाहे न हो परन्तु इतना तो निश्चित है कि ताडपत्र पर लिखे हुए लेख हजारों वर्ष तक नष्ट नहीं हो सकते। यह काश्यप संहिता भी ताडपत्रों पर लिखी होने के कारण ही इतने समय के व्यवधान के बाद भी विनाश से बचकर अब प्रकाशित हो सकी है। अन्त में मैं आशा करता हूँ कि ग्रन्थों के चिरसंरक्षण का यह साधन विद्वानों एवं धनी-मानी व्यक्तियों को अवश्य पसन्द आयगा। इसके साथ मैं अपने वक्तव्य को समाप्त करता हूं।

नेपाल ग्रन्थमाला का प्रथम प्रकाशन

अनेक पदवियों से विभूषित नेपाल के महाराजा श्री श्री श्री युद्ध शमशेर जंगबहादुर के विद्यानुराग तथा अपने देश में उपलब्ध प्राचीन ग्रन्थों के प्रकाशन की रुचि के अनेक अभिनन्दनों के साथ उपोद्घात सहित यह काश्यपसंहिता नेपाल ग्रन्थमाला के प्रथम प्रकाशन के रूप में प्रकाशित हो रही है।

कृतज्ञता प्रकाशन

इस उपोद्घात में जिन भी प्राचीन अर्वाचीन, प्राच्य तथा पाश्चात्त्य विद्वानों के ग्रन्थों अथवा विचारों को मैंने उद्धृत किया है उनका मैं अत्यन्त कृतज्ञ हूँ। कृतज्ञता प्रकाशन के अतिरिक्त उनके ऋण से उऋण होने का और कोई उपाय मुझे नहीं सूझता है। इस ग्रन्थ के प्रकाशन तथा संशोधन में श्री मान्यवर आचार्य यादव जी त्रिकम जी महाराज ने जो परिश्रम एवं सहायता की है उन्हें मैं सम्मानपूर्वक बहुत धन्यवाद देता हूँ। पं. सोमनाथ शर्मा ने इस उपोद्घात में प्रूफ संशोधन आदि के द्वारा असाधारण सहयोग दिया है उन्हें भी मैं बार-बार धन्यवाद देता हूँ। अन्त में डॉ. गोकुलचन्द तथा मास्टर इन्द्रबिहारी शरण को भी मैं धन्यवाद देना नहीं भूल सकता जिन्होंने अंग्रेजी ग्रन्थों के स्थल एवं उद्धरण निकाल कर दिये हैं।

अन्त में निवेदन है कि इस प्रकार के गहन विषय पर विचार करने के लिये केवल आयुर्वेदिक तथा अन्य संस्कृत ग्रन्थों का ही परिशीलन आवश्यक नहीं है अपितु भारतीयों के समान ग्रीस, मिश्र तथा इरान आदि आदि अन्य देशों के इतिहास अनेक भाषा तथा विषय, प्राच्य एवं पाश्चात्त्य विद्वानों के ग्रन्थाकार तथा प्रकीर्ण लेखरूप भिन्न-भिन्न विचारों का अनुसन्धान, ऊहापोह, अन्तर्दृष्टि से वस्तुओं का यथार्थज्ञान इत्यादि बहुत से साधनों की आवश्यकता है। इन सब साधनों द्वारा गन्तव्य मार्ग पर चलने का दुःसाहस करने वाले मुझ अकिंचन के इन टूटे-फूटे कुछ शब्दों के द्वारा अभिलक्षित स्थान पर किस प्रकार पहुंचा जा सकता है। दुर्बल अङ्गों से इस दुर्गम मार्ग पर चलना दुःसाहस ही प्रतीत होता है। तथापि ‘नभः पतन्त्यात्मसमं पतत्रिणः’ इस न्याय के अनुसार यथाशक्ति उचित मार्ग में वाणी के विनियोग तथा सरस्वती देवी की सेवा समझ कर ही आयुर्वेद का परिशीलन न किये हुए होने पर भी आयुर्वेद के प्रकाशक प्राचीन महर्षियों का ध्यान करके केवल इस मुद्रण के अवसर पर ही साहित्य की दृष्टि से यथावसर आयुर्वेद के ग्रन्थों तथा इस संहिता का अध्ययन करने से जो विचार उत्पन्न हुए हैं उन्हें, एक अनभ्यस्त व्यक्ति के लिये होने वाली स्वाभाविक त्रुटियों के लिये क्षमा याचना करता हुआ, विद्यानुरागी एवं गुणग्राही विद्वानों के विनोद एवं वैद्यों के प्रोत्साहन के लिये इस उपोद्घात पुष्पाञ्जलि के रूप में आप लोगों के करकमलों में सादर समर्पित करता हूं।

<div align="right">

अनुवादक—
सत्यपाल आयुर्वेदालङ्कार

</div>

२३ का.सं.

परिशिष्ट

ज्वरसमुच्चय में काश्यपसंहिता के मिलने वाले श्लोक—

ज्वर के विषय में अनेक प्राचीन ऋषियों के वचनों का संग्रहरूप एक 'ज्वरसमुच्चय' नामक प्राचीन ग्रन्थ हैं मेरे पुस्तकालय में इस पुस्तक की ताडपत्र पर लिखी हुई दो प्रतिय हैं इनमें से एक प्राचीन अक्षरों में लिखी हुई तथा अपूर्ण है जिसके अन्त में लेख का समय ४४ नैपाली संवत्सर दिया हुआ है। दूसरी जो है वह पूर्ण है तथा नेवार (नैपाली) अक्षरों में लिखी हुई है। लिपि को देख कर वह आठ सौ वर्ष प्राचीन प्रतीत होती है। पुस्तक रूप में लिखे जाने का समय ही जब इतना प्राचीन है तब उसके निबन्ध का समय तो और भी प्राचीन होना चाहिए। इसमें आश्विन, भरद्वाज, कश्यप, चरक, सुश्रुत, भेड, हारीत, भोज, जतूकर्ण, कपिलबल आदि प्राचीन आचार्यों के ही नाम निर्देश पूर्वक ज्वरविषयक श्लोक संगृहीत हैं। अर्वाचीन आचार्यों के वचनों के उद्धरण न दिये होने से भी यह ग्रन्थ प्राचीन सिद्ध होता है। इसमें काश्यप के भी बहुत से ज्वरविषयक वचन दिये हुए हैं जो इस काश्यपसंहिता के विशेषकर पूर्वभाग तथा कुछ खिलभाग में प्रायः उसी रूप में मिलते हैं। जो यहां नहीं मिलते हैं वे ही संभवतः इस संहिता के त्रुटित भाग में आ गये हों। कहीं कहीं थोड़ा बहुत पाठभेद भी मिलता है। उदाहरण के लिये ज्वरसमुच्चय में दिये हुए पाठभेदों को मोटे अक्षरों में रखकर तथा मुद्रित काश्यपसंहिता के पृष्ठों का साथ में निर्देश करके ज्वरसमुच्चय में उद्धृत इस संहिता के श्लोक नीचे दिये जाते हैं—

'पूर्वोद्भवनिमित्तेन योऽपरो जायते गदः । तमुपद्रवमित्याहुरतीसारो यथा ज्वरे ।।
....... हिक्काश्च प्रवर्द्धन्ते ......' ।। (मूल उपोद्धात पृ. १६३ देखें)

मूल ताडपत्रीय काश्यपसंहिता के १९२ पृष्ठ के लुप्त होने से उसके स्थान पर इस मुद्रित पुस्तक में एक टिप्पणी (Foot Note) दी हुई है कि त्रुटित भाग का विषय मधुकोश व्याख्या में उद्धृत भालुकितन्त्र के श्लोकों से समानता रखता है। उसी त्रुटित (खण्डित) पृष्ठ के सन्निपातों के भेदविषयक श्लोक ज्वरसमुच्चय में कहीं कहीं कश्यप नाम से दिये हुए हैं। उस खण्डित पृष्ठ के आगे तथा पीछे के पृष्ठों के श्लोकों के भी ज्वरसमुच्चय में मिलने से बीच के श्लोक भो वे ही होने चाहिये। बीच के विलुप्त भाग के श्लोकों में कुछ निम्न श्लोक खण्डरूप में मिले हैं—

'तस्य शीतज्वरो निद्रा क्षुत्तृष्णा पार्श्वसङ्ग्रहः । .................... सन्निपातः सुदारुणः ।।'
(मूल उपोद्धात पृ. १६३-१६४ देखें)

इसके बाद मुद्रित पुस्तक से सादृश्य रखने वाले श्लोक ज्वरसमुच्चय में निम्न मिलते हैं—

'सर्वस्रोतोभवं त्वस्य रक्तपित्तं प्रकुप्यति । ................... देवामृतोपमम् ।।'
(मूल उपोद्धात पृष्ठ १६४-१६५ देखें)

इस प्रकार प्राचीन ज्वरसमुच्चय में अनेक स्थानों पर इस काश्यपसंहिता के उद्धरण तथा संवादों के मिलने से प्रतीत होता है कि उस समय तक काश्यपसंहिता का प्रचार तथा आदर था और यह प्रामाणिक समझी जाती थी। जिस ग्रन्थ में केवल प्राचीन ऋषियों के ही वचन संगृहीत हों उसमें काश्यपसंहिता के न केवल पूर्व भाग अपितु खिलभाग के भी उद्धरणों के मिलने से यह खिलभाग भी प्राचीन ही प्रतीत होता है।

॥ श्रीः ॥

श्रीकाश्यपसंहिता

वा

वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् ।

(कौमारभृत्यम्)


सूत्रस्थानम्

१........................ । ....................... ॥
किंवा लेहयितव्यं च किंवा लेहितलक्षणम् । अतिलेहितदोषाः के के च दोषा अलेहिते ।।
मन्दलीढस्य किं रूपं गुणदोषाश्च तत्र के । के लेहनोद्भवा रोगाः कश्च तेषामुपक्रमः ।।
एतन्मे भगवन् सर्वं वक्तुमर्हसि तत्त्वतः । सुख (खं) दुःखं हि बालानां दृश्यते लेहनाश्रयम् ।।

भगवन् ! बालकों को किस वस्तु का लेहन कराना चाहिये ? सम्यक् लेहित के क्या लक्षण हैं ? अतिलेहित तथा अलेहित के क्या दोष हैं ? मन्दलीढ़ का क्या स्वरूप है तथा उसके गुण और दोष क्या हैं ? लेहन से उत्पन्न होने वाले रोग कौन २ से हैं तथा उनकी चिकित्सा क्या है ? इत्यादि सब बातों का आप मुझे यथार्थ उपदेश दीजिये क्योंकि बालकों के सुख और दुःख (स्वास्थ्य एवं रोग) लेहन पर ही आश्रित हैं।

वक्तव्य—यह ग्रन्थ पूर्ण रूप से नहीं मिला है इस ग्रन्थ का प्रारम्भ ही २९वें पृष्ठ से होता है। इससे पूर्व के २८ पृष्ठों में किन २ विषयों का समावेश था—यह कहना कठिन है। सूत्रस्थान के इस अध्याय में इस लेहन सम्बन्धी प्रश्न से पूर्व भी कुछ अन्य प्रश्न जीवक द्वारा अवश्य किये गये होंगे क्योंकि यह अध्याय इस लेहन सम्बन्धी प्रश्न से पूर्व खण्डित है। यह अध्याय एकान्तरूप से यहीं से ही प्रारम्भ नहीं होता है। आगे भगवान् कश्यप द्वारा दिये गये उत्तरों


१. वृद्धजीवकीय तन्त्र की उपलब्ध ताडपत्र पुस्तक के आदि अन्त तथा मध्य में खण्डित होने से इसमें २९ से प्रारंभ कर के २६४ तक पृष्ठ हैं। तथा २९ से लेकर २६४ तक के पृष्ठों में भी बीच बीच में ३०-३२, ३५, ३६, ४०, ४७, ४८, ५०-७४, ७७, ७८, ८०, ८२, ८३, ८६, ८८, ९१, ९३, ११३, ११५, ११६, ११९, १२१, १२४, १२७, १२९, १३१, १३४, १३५, १४२, १५५-१६६. १९२, २३५, २४७, २४९, २५१,२५२ २५४-२५८ तथा २६० पृष्ठ खण्डित हैं। इस प्रकार बीच २ में खण्डित होने से अपूर्ण अंशों को बिन्दुओं द्वारा सूचित किया गया है। विद्यमान पृष्ठों में भी कुछ जीर्ण होने से तथा कुछ स्याही के लुप्त हो जाने से पढ़े नहीं जा सकते हैं—उन्हें भी बिन्दुमाला द्वारा सूचित किया गया है। पाठकों को इस ग्रन्थ को इस बात को ध्यान में रखते हुए ही पढ़ना चाहिये कि यह ग्रन्थ मूल पुस्तक के २९वें पृष्ठ से ही प्रारंभ हुआ है।

२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् लेहाध्यायः ? ]

को देखते हुए भी प्रतीत होता है कि इसमें लेहन के अतिरिक्त बालकों की प्रकृति आदि के सम्बन्ध में भी अन्य बहुत से प्रश्न किये गये होंगे।

इस अध्याय का मुख्य विषय लेहन है। बालकों के स्वास्थ्य, बल एवं बुद्धि की वृद्धि के लिये प्राचीन काल में बालकों को अनेक प्रकार के योग लेहन (अवलेह) के रूप में चटाने की परम्परा थी। जिस प्रकार आजकल बालकों के स्वास्थ्य एवं बुद्धि के लिये अनेक प्रकार की जन्मघुटियों का प्रयोग किया जाता है उसी प्रयोजन के लिये प्राचीन काल में इन लेहन योगों का प्रचलन था। इन लेहन योगों में स्वर्ण का विशेष स्थान था। स्वर्ण विशेषरूप से मेधावर्धक होता है। इसीलिये सद्यः जात बालक को भी मधु के साथ स्वर्ण चटाने का विधान मिलता है। बालकों के लिये प्रतिदिन व्यवहार में आने वाले इन लेहन योगों को दक्षिण भारत में ‘उरमरुन्द’ कहते हैं।

इति पृष्टो महाभागः कश्यपो लोकपूजितः । प्रश्नं प्रोवाच निखिलं प्रजानां हितकाम्यया ।।

इस प्रकार प्रश्न किये जाने पर लोक पूजित एवं ऐश्वर्यशाली भगवान् कश्यप ने लोगों के हित की कामना से उपर्युक्त प्रश्नों का पूर्ण रूप से उत्तर दिया।

यदन्नपानं प्रायेण गर्भिणी स्त्री निषेवते । रसो निर्वर्तते तादृक् त्रिधा चास्याः प्रवर्तते ।।

गर्भिणी स्त्री प्रायः जिस प्रकार के अन्नपान का सेवन करती है उससे वैसा ही रस बनता है तथा वह रस तीन प्रकार से काम में आता है १. उस रस का एक भाग माता (गर्भिणी स्त्री) के शरीर के पोषण में २. एक भाग गर्भ (Foetus) के पोषण में तथा ३. एक भाग स्तनों की पुष्टि के लिये प्रयुक्त होता है।

**वक्तव्य—**गर्भवती स्त्री जिस भोजन का सेवन करती है उससे स्वयं उसके शरीर का तो पोषण होता ही है अपितु अपरा (Placenta) द्वारा गर्भ का भी पोषण होता है। सुश्रुत में कहा है—“गर्भस्य खलु रसनिमित्ता ..... परिवृद्धिर्भवति”। इसकी टीका में डल्हण ने लिखा है—“रसनिमित्तेति मातुरिति शेषः”। इसके साथ २ गर्भिणी के स्तनों की भी पुष्टि होती है। सुश्रुतसंहिता शारीरस्थान अध्याय ४ में कहा है—“शेषं चोर्ध्वतरमागतं पयोधरावभिप्रतिपद्यते, तस्माद् गर्भिण्यः पीतोन्नतपयोधरा भवन्ति' इसकी टीका में डल्हण करता है—‘स्तनाश्रयमेव कफोपरञ्जितं स्तन्यतामुपगतं प्रसूतायाः पुनराहाररसेनाप्याय्यते'। चरक शा. अ. ६ में भी कहा है-‘स च सर्वरसवानाहारः स्त्रियास्त्रिधा रसः प्रतिपद्यते स्वशरीरपुष्टये स्तन्याय गर्भवृद्धये च’।

मातृपुष्ट्यर्थमेकांशो द्वितीयो गर्भपुष्टये । तृतीयः स्तनपुष्ट्यर्थं, नार्या गर्भस्तु पुष्यति ।।
तादृक्प्रकृतयस्तस्माद्गर्भात् प्रभृति देहिनः । वातपित्तकफस्थूणास्तिस्रः प्रकृतयश्च ताः ।।

नारी के गर्भ की जिस विधि से पुष्टि होती है, प्रारंभ (गर्भ) से ही मनुष्यों की उसी प्रकार की प्रकृतियां बन जाती हैं। ये प्रकृतियां मुख्य रूप से तीन प्रकार की—१. वातस्थूणा २. पित्तस्थूणा तथा ३. श्लेष्मस्थूणा होती हैं।

**वक्तव्य—**वास्तव में गर्भ को जिस ढंग का पोषण मिलता है उसी प्रकार की आगे उसकी प्रकृति बन जाती है। सुश्रुत शा. अ. ४ में कहा है—शुक्रशोणितसंयोगे यो भवेद्दोष उत्कटः । प्रकृतिर्जायते तेन ......। गर्भावस्था से ही प्रकृति का निर्माण होता है। उसे बदलना अत्यन्त कठिन है। “यः स्वभावो हि यस्यास्ति तस्यासौ दुरतिक्रमः । श्वायदि क्रियते राजा किं स नाश्नात्युपानहम्’ ।। (हितोपदेश)।

आयुर्वेद के सिद्धान्तानुसार वात, पित्त, तथा कफ इन तीनों दोषों पर ही शरीर की स्थिति है। जिस प्रकार तीन स्तम्भों से मकान की स्थिति है उसी प्रकार ये तीनों दोष समावस्था में विद्यमान होकर शरीर का धारण करते हैं। इसी लिये यहां वात, पित्त तथा कफ का स्थूण शब्द से निर्देश किया गया है। सुश्रुत सूत्रस्थान २१ अध्याय में भी स्थूण शब्द

लेहाध्यायः ? ] सूत्रस्थानम् ३

का इसी अर्थ में प्रयोग किया गया है—"वातःपित्तश्लेष्माण एव देहसंभव हेतवः। तैरेवाव्यापन्नैरधोमध्योर्ध्वसन्निविष्टै शरीरमिदं धार्यते ऽगारमिव स्थूणाभिस्तिसृभिरतश्च त्रिस्थूणमाहुरेके" । इस शरीर रूपी मकान के लिये वात, पित्त तथा श्लेष्मा तीन स्थूण (स्तम्भों) का कार्य करते हैं। उन्हीं वात पित्त कफ रूपी तीन स्तम्भों पर यह मकान स्थित है। वे ही स्थूण (स्तम्भ) जब विकृत हो जाते हैं तब शरीर के नाश का कारण होते हैं। इसी लिये शरीर की मुख्य रूप से ये ही तीन प्रकृतियां कही गई हैं।

वातिकाः पैत्तिकाः केचित् कफिनश्चैव देहिनः । द्वन्द्वप्रकृतयश्चान्ये समस्थूणास्तथाऽपरे ।। अरोगास्तु समस्थूणा वातिकाद्याः सदाऽऽतुराः ।

कुछ व्यक्ति वातप्रकृति, कुछ पित्तप्रकृति तथा कुछ श्लेष्मप्रकृति के होते हैं। कुछ व्यक्ति द्वन्द्व (दो दोषों का संयोग) प्रकृति तथा कुछ समस्थूण प्रकृति के होते हैं। इनमें से समस्थूण प्रकृति के व्यक्ति स्वस्थ होते हैं तथा वातिक आदि प्रकृति के मनुष्य सदा रोगी ही होते हैं।

वक्तव्य—वास्तव में प्रकृतियां मुख्यरूप से उपर्युक्त तीन ही होती हैं परन्तु उन्हीं दोषों के परस्पर संसर्ग से वे सात प्रकार की हो जाती हैं। यथा—१. वातिक २. पैत्तिक ३. श्लैष्मिक ४. वातपैत्तिक ५. वातश्लैष्मिक ६. पित्तश्लैष्मिक तथा ७. सम प्रकृति (जिसमें वात पित्त तथा श्लेष्मा समानरूप से विद्यमान हों)। सुश्रुत में भी सात प्रकार की प्रकृतियां मानी गई हैं-सप्तप्रकृतयो भवन्ति दोषैः पृथकद्विशः समस्तैश्च। तथा चरक सू. अ. ७ के निम्न श्लोक में भी- समपित्तानिलकफाः केचिद्गर्भादिमानवाः। दृश्यन्ते वातलाः केचित्पित्तलाः श्लेष्मलास्तथा।। 'तथा' शब्द से द्वन्द्वज का ग्रहण करते उपर्युक्त सात ही प्रकृतियां मानी गई हैं। इस सात प्रकार की प्रकृतियों में से समस्थूणा (सम) प्रकृति वाले व्यक्ति स्वस्थ माने गये हैं। तथा शेष वात आदि प्रकृति वाले सब व्यक्ति नित्य आतुर (रोगी-अस्वस्थ) माने गये हैं।

उपर्युक्त सातों प्रकार की प्रकृतियां होते हुए भी वास्तव में वे ही व्यक्ति पूर्णरूप से स्वस्थ माने जाते हैं जिनमें तीनों दोष समावस्था में विद्यमान होते हैं। समावस्था से यह अभिप्राय नहीं है कि वात पित्त तथा कफ तीनों दोष समान परिमाण में विद्यमान हों अपितु समावस्था से तात्पर्य यह है कि तीनों दोषों को जिस अनुपात (Proportion) में होना चाहिये उसी अनुपात में हों। वातिक पैत्तिक आदि वास्तव में प्रकृतियां नहीं हैं अपितु जिस व्यक्ति में जिस दोष की प्रधानता होती है उसे स्थूलरूप में वही नाम दे दिया गया है। वास्तव में वे अमुक २ दोषों की वृद्धावस्था ही समझनी चाहिये। इन्हें प्रकृति कहना उपयुक्त नहीं है। किसी भी दोष की वृद्धयवस्था सदा रोग को ही सूचित करती है। दोषों की समावस्था ही स्वास्थ्य है। विकारो धातुवैषम्य साम्यं प्रकृतिरुच्यते। सुखसंज्ञकमारोग्यं विकारो दुःखमेव च।। (चरक सू.अ. ९) दोषों की समावस्था को ही प्रकृति माना है। यहां कई लोग शंका उपस्थित करते हैं कि कोई भी व्यक्ति समवातपित्तकफ नहीं हो सकते हैं क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति के आहार में थोड़ी बहुत विषमता अवश्य होती है और माता के आहार रस के अनुसार ही व्यक्तियों की प्रकृतियों का निर्माण होता है। इसलिये माता के आहार के विषम होने से गर्भ कभी भी समधातुप्रकृति नहीं हो सकता है। अतः किसी न किसी दोष की प्रधानता होकर कोई व्यक्ति वातप्रकृति, कोई पित्तप्रकृति तथा कोई श्लेष्मप्रकृति के ही होते हैं। इसलिये “वातिकाद्याः सदाऽऽतुराः” यह कहना उचित नहीं है। भगवान् आत्रेय चरक संहिता के विमान स्थान में इस तर्क का खण्डन करते हुए कहते हैं कि—समवातपित्तश्लेष्माणं ह्यरोगमिच्छन्ति भिषजः, यतः प्रकृतिश्चारोग्यं, आरोग्यार्था च भेषजप्रवृत्तिः, सा चेष्टरूपा, तस्मात् सन्ति समवातपित्तश्लेष्मप्रकृतयः। न तु खलु सन्ति वातप्रकृतयः, पित्तप्रकृतयः श्लेष्मप्रकृतयो वा, तस्य तस्य किल दोषस्याधिकभावान्सा सा दोषप्रकृतिरुच्यते मनुष्याणां, न च विकृतेषु दोषेषु प्रकृतिस्थत्वमुप पद्यते, तस्मान्नैताः प्रकृतयः सन्ति, सन्ति तु खलु वातलाः, पित्तलाः श्लेष्मलाश्च, अप्रकृतिस्थास्तु ते ज्ञेयाः”। चिकित्सक लोग समवातपित्तकफ पुरुष को ही नीरोग अथवा स्वस्थ मानते हैं। प्रकृति को

४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् लेहाध्यायः ? ]

ही आरोग्य कहते हैं। आरोग्य के लिये ही भेषज की प्रवृत्ति होती है। कहा भी है—चतुर्णां भिषगादीनां शस्तानां धातुवैकृते। प्रवृत्तिर्धातुसाम्यार्था चिकित्सेत्यभिधीयते। समवातपित्तकफधातु वाले पुरुष हो सकते हैं तथा होते हैं। वास्तव में वातिक, पैत्तिक तथा श्लैष्मिक प्रकृति नहीं होती है। वह तो दोषों की प्रधानता होने से दोषप्रकृति ही है तथा इसे अप्रकृति (रुग्णावस्था) ही जानना चाहिये। इसीको दृष्टि में रखते हुए कहा गया है—“वातिकाद्याः सदाऽऽतुराः” चरकसंहिता सू. अ. ७ में भी बिलकुल ऐसा ही वर्णन किया गया है—तेषामनातुराः पूर्वे वातलाद्याः सदाऽऽतुराः॥ इन वातिक प्रकृति आदि वाले मनुष्यों को हम उपचार रूप से ही स्वस्थ कह सकते हैं वस्तु-तस्तु इनमें अमुक २ दोष की प्रधानता होने से ये विकृति ही हैं।

एताः प्रकृतयः प्रोक्ता देहिनां वृद्धजीवक ! ।। एता आश्रित्य तत्त्वज्ञो भेषजान्युपकल्पयेत्।
य एता वेद तत्त्वेन न स मुह्यति भेषजे ।।

हे वृद्धजीवक ! ये मनुष्यों की प्रकृतियां कही गई हैं। तत्त्वज्ञ चिकित्सक को चाहिये कि इन प्रकृतियों के अनुसार ही ओषधियों की कल्पना करे। जो चिकित्सक इन प्रकृतियों को तत्त्वपूर्वक जानता है अथवा उन्हें ध्यान में रखता है वह चिकित्सा कार्य में कभी भी व्यामूढ़ (मोहित) नहीं होता है।

विल (ङ) ङ्गफलमात्रं तु जातमात्रस्य देहिनः। भेषजं मधुसर्पिर्भ्यां मतिमानुपकल्पयेत् ।।
वर्धमानस्य तु शिशोर्मासे मासे विवर्धयेत् । अथामलकमात्रं तु परं विद्वान्न वर्धयेत् ।।

बुद्धिमान् चिकित्सक को चाहिये कि उत्पन्न हुए बालक को विडङ्गफल (वायविडङ्ग) के बराबर (भार में) ओषधि मधु तथा सर्पिस् (असमान मात्रा) के साथ देवे। तथा ज्यों २ शिशु की वृद्धि होती जाय प्रत्येक मास ओषधि की मात्रा भी बढ़ाता जाय परन्तु विद्वान् चिकित्सक आमलक (आंवले) के परिमाण से अधिक ओषधि की मात्रा न बढ़ावे।

**वक्तव्य—**प्राचीन काल में वैज्ञानिक मापतोल का उदय न होने से प्रचलित वस्तुएं ही माप तोल में व्यवहृत होती थीं। इसीलिये बालकों की ओषधि के लिये विडङ्ग तथा आमलक द्वारा ओषधि के परिमाण का निर्देश किया गया है। सुश्रुतसंहिता के शारीरस्थान में ओषध का परिमाण भिन्न ही ढंग से बतलाया गया है—“तत्र मासाद्धूर्ध्वं क्षीरपायाङ्गुलिपर्वद्वयग्रह (ण) संमितामौषधमात्रां विदध्यात्, कोलास्थिसंमितां कल्कमात्रां क्षीरान्नादाय, कोलसंमितामन्नादाय्येति”। यहां बालकों का तीन प्रकार का श्रेणीकरण किया गया है १. क्षीराद २. क्षीरान्नाद ३. अन्नाद। एक वर्ष की उम्र तक बालक क्षीराद, दो वर्ष तक क्षीरान्नाद तथा उससे ऊपर अन्नाद कहलाता है। क्षीराद के लिये उतनी औषध का विधान है जितनी अंगुली के दो पर्व पर लग सके। क्षीरान्नाद के लिये कोलास्थि के बराबर तथा अन्नाद के लिये कोल (बेर) के बराबर (भार में) औषध निर्धारित की गई है। अन्य ग्रन्थों में बालकों को निम्न परिमाण में औषध देने का विधान किया गया है—प्रथमे मासि जातस्य शिशोर्भेषजरक्तिका। अवलेह्या तु कर्तव्या मधुक्षीरसिताघृतैः ।। एकैकां वर्धयेत्तावद्यावत् संवत्सरो भवेत्। तदूर्ध्वं माषवृद्धिः स्यात् यावत् षोडशाब्दिकः :: आजकल बालकों की औषध की मात्रा ज्ञात करने के लिये Young का निम्न फार्मूला व्यवहृत होता है—The rule is to divide the age in years by the age in years plus 12, the resulting quotient is the proper fraction of an adult dose. किसी भी आयु के बालक की मात्रा अवस्था/अवस्था+१२ के द्वारा ज्ञात की जा सकती है। उदाहरण के लिये एक वर्ष के बालक के लिये औषध की मात्रा १/१+१२ अर्थात् पूर्ण मात्रा की १/१३ होगी। इसी प्रकार तीन वर्ष के बालक के लिये ३/३+१२=३/१५ या १/५ मात्रा होनी चाहिये। इससे आगे १२ से १६ वर्ष के बालकों के लिये औषध की मात्रा पूर्णमात्रा का १/२ से २/३ तथा १७ से २० वर्ष तक २/३ से ४/५ मात्रा होनी चाहिये। इसके अतिरिक्त बालकों की औषध की मात्रा ज्ञात करने

लेहाध्यायः ? ] सूत्रस्थानम् ५

के लिये Cowing तथा Dilling के उपाय भी प्रयुक्त किये जाते हैं परन्तु सबसे अधिक प्रचलित Young का फार्मूला ही है जो कि प्रायः व्यवहृत होता है ।।

अक्षीरा जननी येषामल्पक्षीराऽपि वा भवेत् । दुष्टक्षीरा प्रसूता वा धात्री वा यस्य तादृशी ।। दुष्प्रजाताभृशव्याधिपीडितायाश्च त्ये सुताः । वातिकाः पैत्तिका ये च ये च स्युः कफवर्जिताः ।। स्तन्येन ये न तृप्यन्ति पीत्वा पीत्वा रुदन्ति च । अनिद्रा निशि ये च स्युर्ये च बाला महाशनाः ।। अल्पमूत्रपुरीषाश्च बाला दीप्ताग्नयश्च ये । निरामयाश्च तनवो मृद्वङ्गा ये च कर्शिताः ।। वर्चःकर्म न कुर्वन्ति बाला ये च त्र्यहात् परम् । एवंविधाञ्छिशूनाह लेहयेदिति कश्यपः ।।

लेहन किन्हें कराना चाहिये—उन बालकों को जिनकी माता या धात्री के स्तनों में दूध बिलकुल न आता हो, कम आता हो या दूषित हो अथवा जो प्रसूता हो । जो दुष्प्रजाता (जिसे ठीक तरह से प्रसव न हुआ हो) तथा गंभीर रोग से पीड़ित स्त्री के बालक हों, जिनमें वात तथा पित्त दोष की प्रधानता को परन्तु साथ में जो कफदोष से रहित हों, जो दूध पीने के बाद भी तृप्त नहीं होते तथा दूध पीकर भी लगातार रोते रहते हैं, जिन्हें रात्रि में नींद नहीं आती, जो बहुत भोजन करते हों, जिन्हें मूत्र तथा मल कम आता हो, जिनकी अग्नि दीप्त हो, जो रोगशून्य होने पर भी तनु (पतले) मृदु (कमजोर) अङ्गोंवाले तथा कृश हों, जो तीन २ दिन तक मलत्याग नहीं करते, ऐसे बालकों का लेहन करावे-ऐसा भगवान् कश्यप का मत है ।

लेहन से यहां क्या तात्पर्य है इसका पूर्व भी निर्देश किया जा चुका है । बालकों की स्वास्थ्य रक्षा के लिये भिन्न २ ओषधियां तथा स्वर्ण आदि मधु में मिलाकर जो बालकों को चटाई जाती है उन्हें लेहन कहते हैं ।

......... च मन्दाग्निरठरो जनः । निद्रालुर्बहुविण्मूत्रः स्वल्पो यो दृढ़गात्रकः ।। कल्याणमातृकोऽजीर्णी गुरुस्तन्योपसेविता(तः) । सुतः सर्वरसाशिन्या ऊर्ध्वजत्रुरुजान्वितः ।। आमे ज्वरेऽतिसारे च कामलाशोथपाण्डुषु । हृद्रोगश्वासकासेषु गुदबस्त्युदरामये ।। आनाहे गण्डवैसर्पे छर्द्यरोचकयो(र्बले) । ......... हे सर्वग्रहेषु च ।। न लेहयेदलसके नाहन्यहनि नाशितम् । न दुर्दिनपुरोवाते नासात्म्यं नातिमात्रया ।।

लेहन किन्हें नहीं कराना चाहिये—मन्द जठराग्निवाले, निद्रालु, बहुत मल एवं मूत्र का त्याग करने वाले, स्वल्प एवं दृढ़ (कठोर) शरीर वाले, कल्याणमातृक, अजीर्ण के रोगी एवं भारी स्तन्य (दूध) का सेवन करने वाले, सब रसों अथवा आहार रसों का सेवन करने वाली स्त्री के पुत्रों, ऊर्ध्वजत्रु रोगों से युक्त, आमरोग, ज्वर तथा अतिसार में अथवा आमातिसार और ज्वरातिसार में, कामला (पीलिया-Jaundice) शोथ (Dropsy) तथा पाण्डुरोग में, हृद्रोग, श्वास, कास, गुदरोग, बस्तिरोग, एवं उदररोग में, आनाह (Flatulance) गण्डविसर्प, बलवान् छर्दि (वमन) एवं अरुचि (Nausea) में, सब प्रकार के ग्रहरोगों में तथा अलसक रोग में बालकों को लेहन न करावे । इसके अतिरिक्त, प्रतिदिन, भोजन करने के उपरान्त दुर्दिन में तथा सामने से तेज वायु चलती हो तब भी लेहन न करावे । असात्म्य, वस्तु का लेहन तथा अधिक मात्रा में भी लेहन नहीं कराना चाहिये ।

वक्तव्य—कल्याणमातृक-‘कल्याणी माता यस्य’ जिसकी माता कल्याण युक्त हो । कल्याण का अर्थ अक्षय स्वर्ग भी होता है । मेदिनी में कहा है—कल्याणमक्षयस्वर्गे । जिस बालक की माता अक्षय स्वर्ग (मोक्ष) को प्राप्त हो गई है तथा जिसकी विमाता (Step mother) हो । ऐसा बालक कल्याणमातृक कहलाता है । ऊर्ध्वजत्रु-जत्रु से अभिप्राय

६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् लेहाध्यायः ? ]

ग्रीवामूल अथवा अंसफलकास्थि (Clavicles-collar-bones) से है। उससे ऊपर के रोगों अर्थात् श्रवण, नयन, मुख, नासिका तथा सिर के रोगों को ऊर्ध्वजत्रुज या शालाक्य रोग कहते हैं।

अलसक—यह विसूचिका का भेद है। इसकी निरुक्ति निम्न प्रकार से की है—'प्रयातिनोर्ध्वं नावन्तात् आहारो न विपच्यते। आमाशयेऽलसीभूतस्तेन सोऽलसकः स्मृतः॥ कफ द्वारा मार्गों के रुक जाने से आहार आमाशय में ही स्थित रहता है। वह न नीचे की ओर आता है और न ऊपर की ओर जाता है। अन्दर ही आलसी की तरह पड़ा रहता है इसीलिये इसे अलसक कहा है। इसके लक्षण निम्न होते हैं' कुक्षिरानह्यतेऽत्यर्थं प्रताम्येत् परिकूजति। निरुद्धो मारुतश्चैव कुक्षाबुपरि धावति॥

सेवितान्यन्नपानानि गर्भिण्या यान्यभ ...... । तानि सात्म्यानि बालस्य तस्मात्तान्युपचारयेत् ।।
देशकालाग्निमात्राणां न च कुर्याद्व्यतिक्रमम् ।

गर्भ के समय गर्भिणी जिस अन्नपान का सेवन करती है बालकों को वे ही सात्म्य होते हैं। इसलिये उन्हीं का सेवक कराना चाहिये। इसमें देश, काल तथा अग्निमात्रा का व्यतिक्रम न करे। अर्थात् सात्म्य होते हुए भी देश, काल तथा अग्निमात्रा का ध्यान रखकर ही उनका सेवन करे अन्यथा सात्म्य होने पर भी वे विपरीतार्थकारी सिद्ध होंगे।

वक्तव्य—बालक को वही अन्नपान विशेष रूप से सात्म्य हो सकता है जिसका गर्भावस्था में माता द्वारा सेवन किया हो। माता के आहार रस से ही गर्भ की पुष्टि होती है। गर्भ के प्रत्येक अवयव में उस आहार रस का प्रभाव व्याप्त हो जाता है। इसीलिये माता जिस प्रकार के आहार का सेवन करती है गर्भस्थ बालक की वैसी ही प्रकृति भी बनती है। सात्म्य से अभिप्राय उस वस्तु से है जो निरन्तर उपयोग में आने से अनुकूल हो गई हो। चरक विमानस्थान अ. १ में कहा है—सात्म्यं नाम तत् यदात्मन्युपशेते, सात्म्यार्थोह्युपशयार्थः।

द्रव्याणां लेहनीयानां विधिञ्चैवोपदेक्ष्यते । विघृष्य धौते दृषदि प्राङ्मुखी लघुनाऽम्बुना ।
आमथ्य मधुसर्पिर्भ्यां लेहयेत् कनकं शिशुम् ।।
सुवर्णप्राशनं ह्येतन्मेधाग्निबलवर्धनम् । आयुष्यं मङ्गलं पुण्यं वृष्यं वर्ण्यं ग्रहापहम् ।।
मासात् परममेधावी व्याधिभिर्न च धृष्यते । षड्भिर्मासैः श्रुतधरः सुवर्णप्राशनाद्भवेत् ।।

अब लेहनीय द्रव्यों की विधि बतलाई जायगी। पूर्व दिशा में मुँह करके धोये हुए पत्थर पर थोड़े से पानी के साथ स्वर्ण को घिस कर उसमें मधु और घृत (असमान मात्रा) मिलाकर बालक को चटावे। यह सुवर्णप्राशन कहलाता है जो कि मेधा (बुद्धि), अग्नि और बल को बढ़ाने वाला है। यह आयु को देने वाला, कल्याणकारक, पुण्यकारक, वृष्य, वर्ण्य (शरीर के वर्ण को ठीक करने वाला) तथा ग्रहबाधाओं को दूर करने वाला है। सुवर्णप्राशन से बालक एक मास के अन्दर मेधायुक्त होता है तथा वह व्याधियों द्वारा आक्रान्त नहीं होता है। और वह ६ मास में श्रुतधर (सुनी हुई बात को धारण करने वाला) हो जाता है अर्थात् उसकी स्मरणशक्ति बहुत बढ़ जाती है।

वक्तव्य—बालक के उत्पन्न होते ही जातकर्मसंस्कार में भी सुवर्णप्राशन का विधान मिलता है। सुश्रुतसंहिता के शारीरस्थान में यह विधि निम्न प्रकार से दी है—'अथ कुमारं शीताभिरद्बिराश्वास्य जातकर्मणि कृते मधुसर्पिरनन्तचूर्णमङ्गुल्याऽनामिकया लेहयेत्' बालक को मधु और सर्पिस् (घृत) में मिलाकर अनन्तचूर्ण (सुवर्ण) का लेहन करावे। इसी स्थान पर किसी २ ग्रन्थ में निम्न पाठभेद भी मिलता है—मधुसर्पिरनन्ताब्राह्मीरसेन सुवर्णचूर्णमङ्गुल्याऽनामिकया लेहयेत्'। वाग्भट में यह प्राशन (लेहन) विधि भिन्न प्रकार से कही है—'ऐन्द्री ब्राह्मी शंखपुष्पी वचाकल्कं मधुघृतोपेतं हरेणुमात्रं कुशलाभिमन्त्रितं सौवर्णेनाश्वत्थपत्रेण वा मेधायुर्बलजननं प्राशयेद्वा ब्राह्मी वचानन्ता शतावर्यन्यतमचूर्णम्'। यह सुवर्णप्राशन तथा अन्य लेहन बालक के जन्म के बाद तीन चार दिन तक देने का विधान है क्योंकि तीन चार दिन तक

लेहाध्यायः ? ] सूत्रस्थानम्

दुग्धवहस्त्रोतस् प्रायः बन्द रहते हैं अतः माता (प्रथम प्रसव में—Primiparas) तीन चार दिन तक बालक को अपने स्तनों से दूध नहीं पिला सकती है । सुश्रुत में कहा है—धमनीनां हृदिस्थानां विवृतत्वादनन्तरम् । चतूरात्रात्त्रिरात्राद्वा स्त्रीणां स्तन्यं प्रवर्तते ।। तस्मात् प्रथमेऽह्नि मधुसर्पिरनन्तामिश्रं मन्त्रपूतं त्रिकालं पाययेत्, द्वितीये लक्ष्मणासिद्धं सर्पिस्तृतीये च । परन्तु यहां उपर्युक्त सुवर्णप्राशन या लेहन से अभिप्राय प्रतीत नहीं होता है जो कि जातकर्म के बाद दो तीन दिन तक दिया जाता है । अपितु यहां निरन्तर सेवन करने के लिये ही इन लेहनों का प्रयोग दिया गया है । जैसे आजकल छोटे शिशुओं को भिन्न २ प्रकार की जन्मघुट्टियों का प्रयोग कराया जाता है उसी तरह बालकों को स्वस्थ रखने के लिये इन लेहों का प्रयोग कराया जाता हुआ प्रतीत होता है ।

आयुष्यम्—आयु की वृद्धि के लिये भी सुवर्ण का प्रयोग कराया जाता है । सुश्रुत चिकित्सास्थान के मेधापुष्कामीय अध्याय में कहा है—अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि आयुष्कामरसायनम् । मन्त्रौषधसमायुक्तं संवत्सरफलप्रदम् ।। बिल्वस्य चूर्णे पुष्ये तु हुतं वारान् सहस्रशः । श्रीसूक्तेन नरः कल्पे ससुवर्णं दिने दिने ।। सर्पिर्मधुयुतं लिह्यादलक्ष्मीनाशनं परम् । इत्यादि ।

ब्राह्मी मण्डूकपर्णी च त्रिफला चित्रको वचा । शतपुष्पाशतावर्यौ दन्ती नागबला त्रिवृत् ।। एकैकं मधुसर्पिर्भ्यां मेधाजननमभ्यसेत् । कल्याणकं पञ्चगव्यं मेध्यं ब्राह्मीघृतं तथा ।।

ब्राह्मी, मण्डूकपर्णी, त्रिफला, चित्रक, वच, सौंफ, शतावरी, दन्ती, नागबला तथा निसोध, इनका पृथक् २ मधु तथा घृत के साथ मेधावृद्धि के लिये प्रयोग करे तथा मेधावर्धक कल्याणकघृत, पञ्चगव्यघृत और ब्राह्मीघृत का भी लेहन करावे ।

वक्तव्य—चरक संहिता के उन्माद चिकित्सा में कल्याणक घृत का निम्न पाठ दिया है इसे अष्टाविंशति घृत भी कहते हैं—विशाला त्रिफला कौन्ती देवदार्वेलवालुकम् । स्थिरा नतं रजन्यौ द्वे सारिवे द्वे प्रियङ्गुकम् ।। नीलोत्पलैलामञ्जिष्ठा दन्तीदाडिमकेशरम् । तालीशपत्रं बृहती मालत्याः कुसुमं नवम् ।। विडङ्गं पृश्निपर्णी च कुष्ठ चन्दनपद्मकौ । अष्टाविंशतिभिः कल्कैरेतैः कर्षसमैर्भिषक् ।। ........... कल्याणकमिदं सर्पिः श्रेष्ठं पुंसवनेषु च । इसे ही तन्त्रान्तरों में पानीयकल्याणक घृत भी कहा है । इसकी मात्रा १/४ तोला है । चरकसंहिता के ही अपस्मार चिकित्सा में पञ्चगव्य घृत की निर्माणविधि एवं उपयोग निम्न प्रकार से दी है—गोशकृद्रसदध्यम्ल क्षीरमूत्रैः समैर्धृतम् । सिद्धं पिबेदपस्मारकामलाज्वरनाशनम् वहीं पर ब्राह्मी घृत का निम्न पाठ दिया है—ब्राह्मीरसवचाकुष्ठ शङ्खपुष्पीभिरेव च । पुराणं घृतमुन्मादलक्ष्म्यपस्मारपाप्मजित् ।। इससे आगे अन्य भी कई लेहन योग दिये गये हैं ।

समङ्गा त्रिफला ब्राह्मी द्वे बले चित्रकस्तथा । मधु सर्पिरिति प्राश्यं मेधायुर्बलवृद्धये ।।

मेधा आयु तथा बल की वृद्धि के लिये मञ्जिष्ठा, त्रिफला, ब्राह्मी, दोनों बला (बला और अतिबला) और चित्रक के चूर्ण को समभाग लेकर मधु एवं घृत में मिलाकर प्राशन (लेहन) करना चाहिये ।

कुष्ठं वटाङ्कुरा गौरी पिप्पल्यास्त्रिफला वचा । ससैन्धवैर्घृतं पक्वं मेधाजननमुत्तमम् ।।

कूठ, बढ के अङ्कुर, गौरी (पीत सर्षप) पिप्पली, त्रिफला, वच तथा सेन्धानमक को मिलाकर घृत के साथ घृतपाकविधि से पकाया जाय । यह घृत उत्तम मेधाजनक है ।

ब्राह्मी सिद्धार्थकाः कुष्ठं सैन्धवं सारिवा वचा । पिप्पल्यश्चेति तैः सिद्धं घृतं नाम्नाऽभयं स्मृतम् ।। न पिशाचा न रक्षांसि न यक्षा न च मातरः । प्रबाधन्ते कुमारं तं यः प्राश्रीयादिदं घृतम् ।।

काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्लेहाध्यायः ? ]

ब्राह्मी, सरसों, कूठ, सैन्धव, सारिवा (अनन्तमूल) वच तथा पिप्पली से घृतपाक विधि से घृत सिद्ध किया जाय। इसका नाम अभयघृत है। इस घृत के सेवन करने वाले बालक को पिशाच, राक्षस, यक्ष तथा मातृकाएं कोई बाधा (कष्ट) नहीं पहुंचा पाती हैं। अष्टाङ्ग ह. उ. अ. १ में भी अभय घृत का यही पाठ मिलता है—ब्राह्मीसिद्धार्थकवचासारिवाकुष्ठसैन्धवैः। सकणैः साधितं पीतं वाङ्मेधास्मृतिकृद्घृतम्॥ आयुष्यं पापरक्षोघ्नं भूतोन्मादनिबर्हणम्॥

खदिरः पृश्निपर्णी च स्यत्(न्दनः) सैन्धवं बले।
केवुकेति कषायः स्यात् पादशिष्टो जलाढके॥
अर्धप्रस्थं पचेदत्र तुल्यक्षीरं घृतस्य तु। घृतं संवर्धनं नाम लेह्यं मधुयुतं सदा॥
निर्व्याधिर्वर्धते शीघ्रं संसर्पत्याशु गच्छति। पङ्गुमूकाश्रुतिजडा युज्यन्ते चाशु कर्मभिः॥

खदिर, पृश्निपर्णी (पिठवन) स्यन्दन (तिन्दुक अथवा अर्जुन) सैन्धव, दोनों बला (बला और अतिबला) और केबुक (केमुआ-कन्दशाक विशेष)—इनका एक आढक जल में चतुर्थांश कषाय बनावे। इनमें समान मात्रा में दुग्ध तथा आधा प्रस्थ घी डालकर घृतपाकविधि से पकावे। यह संवर्धन नाम का घृत है। इसको सदा मधु के साथ मिलाकर लेहन करे। इसके सेवन से बालक शीघ्र ही व्याधिरहित होकर वृद्धि को प्राप्त होता है, शीघ्र चलने फिरने लगता है तथा पङ्गु (न चलने वाले-लूले), मूक (गूंगे), अश्रुति (न सुनने वाले-बहरे) तथा जड (Idiot) बालक जल्दी उन २ क्रियाओं से युक्त हो जाते हैं अर्थात् इसके प्रयोग से लूले चलने लगते हैं, गूंगे बोलने लगते हैं, बहरे सुनने लगते हैं तथा मूर्ख समझने लगते हैं।

स्वरसस्याढके ब्राह्म्या घृतप्रस्थं विपा^१चयेत्। स(वत्सा)ऽजागोपयसामाढकाढकमावपेत्॥
त्रिफलाऽंशुमती द्राक्षा वचा कुष्ठं हरेणवः। पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकनागरम् ॥
त्वक्पत्रबालकोशीरचन्दनोत्पलपद्मकम्। शतावरी नागबला दन्ती पाठा प्रियङ्गुका॥
देवदारु हरिद्रे द्वे जीवनीयाश्च यो गणः। विडङ्गो गुग्गुलुर्जातिः ...........॥
...................। ...................॥
(इति ताडपत्रपुस्तके २९ तमं पत्रम्^२।)


ब्राह्मी स्वरस—१ आढक। गोघृत—१ प्रस्थ। जिनके बच्चे जीवित हों उन गौ तथा बकरियों का दूध—एक २ आढक। इसमें त्रिफला, अंशुमती (शालिपर्णी), द्राक्षा, वच, कूठ, हरेणु (रेणुका-सुगन्धित द्रव्य), पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक, नागर (सोंठ), त्वक् (दालचीनी), पत्र (तेजपत्र), बालक (नेत्रबाला), उशीर (खस), श्वेत-चन्दन, उत्पल (नील कमल), पद्मक (पद्माख अथवा श्वेत-कमल) शतावरी, नागबला, दन्ती, पाठा, प्रियङ्गु, देवदारु, हरिद्रा, दारुहरिद्रा, जीवनीय गण की ओषधियां, वायविडङ्ग, गुग्गुलु तथा जाति पत्री ...... इत्यादि द्रव्यों का परिभाषानुसार कल्क डालकर घृतपाक करे। इस घृत का लेहन करावे। इससे उपर्युक्त लाभ होते हैं।

जीवनीय गण—चरक में निम्न दिया है—'जीवकर्षभकौ मेदा महामेदा, काकाली, क्षीरकाकोली, मुद्गमाषपर्ण्यौ जीवन्ती मधुकमिति'। इनमें से प्रथम ६ ओषधियां अष्टवर्ग में आती हैं जिनके प्रायः अलभ्य होने से उनके स्थान पर


१. अत्र 'विपाचयेत्' इति मुद्रितपुस्तकपाठः।
२. ३० पत्रतः ३२ पत्रपर्यन्तो ग्रन्थस्ताडपत्रपुस्तके खण्डितः।

क्षीरोत्पत्त्यध्यायः १९ ] सूत्रस्थानम् ९

क्रमशः विदारीकन्द, शतावरी तथा अश्वगन्धा आदि प्रतिनिधि द्रव्य लिये जाते हैं। क्योंकि कहा भी है—राज्ञामप्यष्टवर्गस्तु यतोऽयमतिदुर्लभः।

नोट—यह अध्याय यहीं मध्य में ही खण्डित हो गया है।


एकोनविंशोऽध्यायः

................... । ........... ॥
......... शकुनी कटुतिक्तके। स्कन्दषष्ठीग्रहौ ज्ञेयौ व्यापन्ने सान्निपातिके।
पूतना स्वादुकटुके शेषाः संसृष्टदोषजाः ॥

वक्तव्य— यह अध्याय भी प्रारंभ में खण्डित है। इस अध्याय में धात्री के दूध के विषय में विशेष विवेचन किया गया है। इसमें धात्री के दूध की वृद्धि तथा उसके शोधन के अनेक प्रकार दिये गये हैं। ग्रहदोषों के कारण भी दूध प्रायः दूषित हो जाता है। सर्वप्रथम इस अध्याय में उन्हीं भिन्न २ ग्रहों से दूषित हुए दूध के लक्षण दिये गये हैं।

ग्रहों से दूषित दूध के लक्षण— यदि दूध का स्वाद कटु एवं तिक्त हो तो उसे शकुनी ग्रह से आक्रान्त (दूषित) समझना चाहिये। यदि दूध दूषित हो तथा उसमें सन्निपात (सब दोषों के सम्मिलित) के लक्षण दिखाई दें तो उस पर स्कन्द एवं षष्ठीग्रह का प्रभाव समझना चाहिये। यदि दूध का स्वाद स्वादु (मधुर) एवं कटु हो तो पूतना का प्रकोप समझना चाहिये। शेष सब प्रकार के दूषित दूधों में सम्मिलित दोषों का प्रभाव होता है।

बहुविण्मूत्रता स्वादौ कषाये मूत्रविग्रहः। तैलवर्णे बली तुल्या घृतवर्णे महाधनः ॥
यशस्वी धूम्रवर्णे तु शुद्धे सर्वगुणोदितः।

भिन्न २ दूषित दूधों का प्रभाव— यदि दूध स्वादु (मधुर) है तो उसे (उस दूध के सेवन करने वाले बालक को) मल तथा मूत्र बहुत होगा। यदि दूध कषाय रस वाला है तो मूत्रग्रह तथा मलग्रह (मूत्र तथा मल की रुकावट) हो जायगा। यदि दूध तैलवर्ण वाला है तो उसका सेवन करने वाला बालक बलवान् होगा। यदि दूध घृतवर्ण वाला है तो बालक स्वर्ण आदि महान् ऐश्वर्ययुक्त होगा। यदि दूध धूम्रवर्ण (धुंधला-धूसरवर्ण) का है तो बालक यशस्वी होगा। तथा यदि दूध बिलकुल शुद्ध (सब प्रकार के दोषों से रहित) है तो उसका सेवन करनेवाला बालक सर्वगुण सम्पन्न होगा।

तस्मात् संशोधनपरा नित्यं धात्री प्रशस्यते ॥

इसलिये नित्य संशोधन में लगी हुई धात्री प्रशस्त मानी गई है। अर्थात् दूध पिलाने वाली धात्री (Wetnurse) का नित्य संशोधन करते रहना चाहिये जिससे उसके दूध का संशोधन हो जाय तथा बालक रोगग्रस्त न हो सके। धात्री के दूध पर ही पूर्णरूप से बालक का स्वास्थ्य निर्भर है। अतः धात्री का वमन विरेचन आदि के द्वारा शोधन आवश्यक है।

कषायपानैर्वमनैर्विरेकैः पथ्यभोजनैः। वाजीकरणसिद्धैश्च स्नेहः क्षीरं विशुध्यति ॥

अब दूषित स्तन्य (दूध) के शोधन के भिन्न २ उपाय लिखे जायेंगे। कषायपान, वमन, विरेचन, पथ्य (हितकारी) भोजन तथा वाजीकरण के लिये अथवा वाजीकरण ओषधियों से सिद्ध किये हुए स्नेहों के सेवन से धात्री का दूध शुद्ध होता है।

१० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् क्षीरोत्पत्त्यध्यायः १९ ]

त्रिफला सत्रिकटुका पाठा मधुरसा वचा । कोलचूर्णं त्वचो जम्ब्वा देवदारु च पेषितम् ।। सर्षपप्रसृतोन्मिश्रं पातव्यं क्षौद्रसंयुक्तम् । एतत् स्तन्यस्य दुष्टस्य श्रेष्ठं शोधनमुच्यते ।।

त्रिफला, त्रिकटु (सोंठ, मरिच, पीपल) पाठा, मधुरसा (मधुयष्टि अथवा द्राक्षा) वच, कोल (बेर) का चूर्ण, जामुन की छाल, देवदारु और सर्षप सब मिलाकर एक प्रसृत (८ तो.) चूर्ण मधु के साथ सेवन करना चाहिये । यह दूषित दुग्ध के लिये श्रेष्ठ शोधन है ।

वक्तव्य—८ तोले की मात्रा आजकल के अनुसार बहुत अधिक है । इसे समयानुसार रोगी के बल को देखकर कम किया जा सकता है ।

शृङ्गवेरपटोलाभ्यां पिप्पलीचूर्णचूर्णितम् । यूषपथ्यं विदध्याच्च ह्यन्नपानं च यल्लघु ।।

आर्द्रक तथा पटोलपत्र के रस से पिप्पलीचूर्ण का सेवन करना चाहिये तथा साथ में पथ्य के रूप में यूष और लघु अन्नपान का प्रयोग करना चाहिये ।

वक्तव्य—१८ गुने जल में मूंग आदि को पकाने से यूष सिद्ध होता है । कहा है—अष्टादशगुणे नीरे शिम्बीधान्यश्रृतो रसः । विरलान्नो घनः किञ्चित् पेयातो यूष उच्यते ।। अथवा—वैदलान् वितुषान् भृष्टान् चतुर्भागाम्बुसाधितान् । निष्पीड्य तोयमेतेषां संस्कृतं यूष उच्यते ।। यूष पेया से कुछ गाढ़ा होता है । इसीलिये कहा है—"यूषः किञ्चित् घनः स्मृतः" ।

धातकीपुष्पमेला च समङ्गा मरिचानि च । जम्बुत्वचं समधुकं क्षीरशोधनमुत्तमम् ।।

धाय के फूल, एला, मंजीठ, मरिच, जामुन की छाल तथा मुलहठी का चूर्ण उत्तम दुग्धशोधक होता है ।

नाडिका सगुडा सिद्धा हिङ्गुजातिसुसंस्कृता । क्षीरं मांभरसो मद्यं क्षीरवर्धनमुत्तमम् ।। वाजीकरणसिद्धं वा क्षीरं क्षीरविवर्धनम् । घृततैलोपसेवा च बस्तयश्च पयस्कराः ।।

नाडिका (कालशाक) को गुड के साथ सिद्ध करके उसे हींग तथा जायफल से सुसंस्कृत करे । यह सुसंस्कृत योग दूध, मांभरस, तथा मद्य अथवा वाजीकरण के निमित्त अथवा वाजीकरण ओषधियों से सिद्ध किया हुआ दूध, घृतसेवन, तैलसेवन, तथा बस्तियां सभी क्षीरवर्धक (दूध को बढ़ाने वाले) हैं ।

वक्तव्य—आगे "मधुराण्यन्नपानानि" द्वारा बहुत से क्षीरवर्धन के योग और दिये गये हैं । ये उपर्युक्त दो श्लोक भी यदि वहीं दिये जाते तो विषय को देखते हुए अधिक उपयुक्त होता । क्योंकि दुग्धशोधक प्रयोगों के बीच में ही दुग्धवर्धक योगों के दिये जाने से विषय में कुछ व्यासङ्ग हो जाता है ।

पाठा महौषधं दारु मूर्वामुस्तकवत्सकाः । सारिवारिष्टकटुकाः कैरातं त्रिफला बचा ।। गुडूची मधुकं द्राक्षा दशमूलं सदीपनम् । रक्षोघ्नश्च पटोलश्च गणः क्षीरविशोधनः ।। लाभतः क्वथितस्तेषां कषायः स तु सेवितः । क्षीरं शोधयति क्षिप्रं चिरव्यापन्नमप्युत ।।

पाठा, सोंठ, दारुहल्दी अथवा देवदारु, मूर्वा (मोरबेल), नागरमोथा, इन्द्रजौ, सारिवा, अरिष्ट (नीम), कटुकी, चिरायता, त्रिफला, बच, गिलोय, मुलहठी, द्राक्षा, दशमूल, दीपनीय द्रव्य, रक्षोघ्न (श्वेत सरसों) तथा पटोलादि गण की ओषधियां ये सभी दुग्ध के शोधक हैं । इनमें से जो २ द्रव्य प्राप्त हो सकें उनका कषाय बनाकर सेवन करने से चिरकालीन क्षीरदोष भी शीघ्र ही दूर हो जाते हैं ।

वक्तव्य—स्तन्यशोधक—चरक में निम्न १० स्तन्यशोधक ओषधियां दी हैं—पाठामहौषधसुरदारुमुस्तमूर्वागुडूचीवत्सक-फलकिराततिक्तकटुरोहिणीसारिवाकषायाणां च पानं प्रशस्यते । तथाऽन्येषां तिक्तकषायकटुकमधुराणां द्रव्याणां प्रयोगः

क्षीरोत्पत्त्यध्यायः १९ ] सूत्रस्थानम् ११

क्षीरविकारविशेषानभिसमीक्ष्य मात्रां कालं चेति क्षीरविशोधनानि। इसी प्रकार सुश्रुत. सू. अ. ३८ में स्तन्यशोधन के लिये वचादि, हरिद्रादि तथा मुस्तादि तीन गण दिये हैं—वचामुस्तातिविषाभभयाभद्रदारूणि नागकेशरं चेति। हरिद्रादारुहरिद्राकलशीकुटजबीजानि मधुकं चेति ॥ एतौ वचाहरिद्रादी गणौ स्तन्यविशोधनौ। मुस्ताहरिद्रादारुहरिद्रा-हरीतक्यामलकविभीतककुष्ठहैमवतीवचापाठाकटुरोहिणीशार्ङ्गेष्टातिविषाद्राविडीभल्लातकानि चित्रकश्चेति। एष मुस्त्रादिको नाम्ना गणः श्लेष्मविपूदनः । योनिदोषहरः स्तन्यशोधनः पाचनस्तथा ॥

पटोलादि गण—सुश्रुत सू. अ. ३८ में कहा है—पटोलचन्दनकुचन्दन मूर्वा गुडूची पाठा कटुरोहिणी चेति।

सक्षौद्रः कफसंसृष्टे सघृतः शेषयोर्भवेत् । नेत्येके श्लेष्मणः स्थानात् क्षीरं हि कफसंभवम् ॥

उपर्युक्त कषाय कफ से दूषित हुए दूध के लिये मधु के साथ तथा शेष दोनों (वात तथा पित्त) से दूषित में घृत के साथ देना चाहिये। कुछ विद्वानों का मत है कि इसे घृत के साथ नहीं देना चाहिये क्योंकि घृत श्लेष्मा (कफ) का स्थान है तथा दुग्ध कफ से उत्पन्न हुआ है।

मसूरः षष्टिका मुद्गाः कुलत्थाः शालयो घृतम् । गव्यमाजं पयः काले लवणं चाप्यनौद्भिदम् ।। आहारविधिरुद्दिष्टः स्तन्यशोधनकालिकः । गुर्वन्नस्नेहमांसानि दिवास्वप्नं च वर्जयेत् ।।

दुग्ध शोधन काल में मसूर, षष्टिक (सांठी के चावल), मूंग, कुलथी, शालि चावल, घृत, गोदुग्ध, अजादुग्ध और अनौद्भिद (कृत्रिम) लवण आदि आहार का सेवन करना चाहिये तथा गुरु अन्न, स्निग्ध द्रव्य, मांस एवं दिवास्वप्न का त्याग कर देना चाहिये।

वक्तव्य—चरक शा. अ. ८ में क्षीरशोधन काल में निम्न आहार विधि दी गई है—पानाशनविधिस्तु दुष्टक्षीराया यवगोधूमशालिषष्टिकमुद्गहरेणुककुलत्थसुरासौवीरकतुषोदकमैरेयमेदकलशुनकरञ्जप्रायः स्यात्, क्षीरदोषविशेषांश्चावेक्ष्यावेक्ष्य तत्तद्विधानं कार्यं स्यात् ।। यव गोधूम आदि के सेवन के साथ २ दूध के दोषों की परीक्षा करके उन २ दोषों के अनुसार ही अन्नपान के उस २ विधान का पालन करना चाहिये।

शोधनाद्वा स्वभावाद्व्वा यस्याः क्षीरं विशुष्यति । तस्याः क्षीरप्रजनने प्रयतेत विचक्षणः ।।

विद्वान् वैद्य को चाहिये कि उपर्युक्त शोधनों द्वारा अथवा स्वभाव से ही जिस स्त्री का दूध सूख जाता है उसके क्षीरजनन (दुग्धवृद्धि) का प्रयत्न करे।

मधुराण्यन्नपानानि द्रवाणि लवणानि च । मद्यानि सीधुवर्ज्यानि शाकं सिद्धार्थकादृते ।। वराहमहिषादूर्ध्वं मांसानां च रसो हितः । लशुनानां पलाण्डूनां सेवनं शयनं सुखम् ।। (क्रोधाध्व) भयशोकानामायासानां च वर्जनम् । अ....या भवति वत्स इति क्षीरविवर्धनम्¹ ।।

आगे दुग्धवृद्धि के लिये बहुत से प्रयोग दिये गये हैं। मधुर अन्नपान, द्रवपदार्थ, लवण, सीधुरहित मद्य, सिद्धार्थक (श्वेत सरसों) से भिन्न शाक, सूअर तथा महिष (भैंसे) को छोड़कर अन्य पशुओं का मांसरस, लशुन, पलाण्डु सुखपूर्वक शयन करना, क्रोध, मार्गगमन, भय, शोक तथा अन्य परिश्रम के कार्यों का परित्याग-दुग्धरहित स्त्री के लिये सभी क्षीरवर्धक उपाय हैं।

वक्तव्य—सीधु-गन्ने के रस से बनाई हुई मद्य (Spirit distilled from sugar cane juice) को सीधु कहते हैं। यह पक्व एवं अपक्व भेद से दो प्रकार की होती है। भावप्रकाश में कहा है—इक्षोः पक्ववैः रसैः सिद्धः सीधुः पक्वरसश्च


१. अपया या भवेत्तस्या एतत् क्षीरविवर्धनम्, इति पाठश्चेत् साधु ।

१२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् क्षीरोत्पत्त्यध्यायः १९ ]


स। आमैस्तैरैव यः सीधुः स च शीतरसः स्मृतः ॥ इसी प्रकार शार्ङ्गधर संहिता में भी कहा है—ज्ञेयः शीतरसश्शीधुरपक्वमधुरद्रवैः । सिद्धः पक्वरसश्शीधुरसपक्वमधुरद्रवैः ॥

वटादीनां च वृक्षाणां क्षीरिकायाश्च वल्कलम् । पाक्यः कषायः क्वथितः क्षीरं तेन पुनः शृतम् ॥ पाक्यं गुडविडोपेतं सघृतं शालिमाशयेत् । अपि शुष्कस्तनीनां तत् क्षीरोपजननं परम् ॥

वटादि वृक्ष एवं क्षीरी वृक्षों की छाल का क्वाथ बनाकर उसमें यवक्षार डालें। अब इसमें क्षीर (दूध) डालकर पुनः पकाया जाय। इसमें पाक्य (पांशुलवण या सौवर्चल लवण), गुड, विडलवण और घृत मिलाकर शालि चावलों का सेवन करने से शुष्कस्तनी (जिनका दूध सूख गया है) स्त्रियों के भी दूध आ जाता है ।

शालिषष्टिकदर्भाणां कुशगुन्द्रेत्कटस्य च । सारिवावीरणेक्षूणां मूलानि कुशकाशयोः ॥ पेयानि पूर्वकल्पेन श्रेष्ठं क्षीरविवर्धनम् । स्वभावनष्टे शुष्के वा दुष्टे साध्वीक्षिते हितम् ॥

इसी प्रकार शालिधान्य, षष्टिक-धान्य, दर्भ, कुश, गुन्द्रा (जलज दर्भ), इत्कट (तृण भेद अथवा शर) सारिवा, वीरण (खस) इक्षु, कुश तथा काश की जड़ें लेकर उनके साथ दुग्ध का संस्कार करके पूर्वोक्तानुसार क्वाथ बनाकर सेवन करना दूध के बढ़ाने का श्रेष्ठ उपाय माना गया है । उपर्युक्त प्रयोगों से स्वभाव से ही नष्ट, शुष्क अथवा दृष्टि दोष (नजर लगने) से दूषित हुआ दुग्ध पुनः शुद्ध रूप में प्रवृत्त होने लगता है ।

वक्तव्यक्षीरीवृक्ष—न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थपारीषप्लक्षपादपाः । चरक शा. अ. ८ में दुग्धवर्धक ओषधियां निम्न दी हैं—क्षीरजननानि तु मद्यानि सीधुवर्ज्यानि ग्राम्यानूपौदकानि च शाकधान्यमांसानि द्रवमधुराम्लभूयिष्ठाश्चाहाराः क्षीरिण्यश्चौषधयः क्षीरपानं चानायासश्चेति, वीरणशालिषष्टिकेश्क्षुवालिका दर्भकुशकाशगुन्द्रेत्कटमूलकषायाणां च पानमिति क्षीरजननान्युक्तानि । इसी प्रकार सुश्रुत शा. अ. १० में कहा है—क्रोधशोकावात्सल्यादिभिश्च स्त्रियाः स्तन्यनाशो भवति । अथास्याः क्षीरजननार्थं सौमनस्यमुत्पाद्य यवगोधूमशालिषष्टिकमांसरससुरासौवीरकपपिण्याकलशुनमत्स्यकसेरुकशृङ्गाटकबिसविदारीकन्दमधुकशताव- रीनलिकालाबूकालशाकप्रभृतीनि विदध्यात् ।। घोष के मैटिरिया मैडिका में लिखा है—An injection of placental extract increases the secretion of milk, so does pituitary extract. The secretion of milk is also influenced by various other factors and reflexes. It is possible that the nerve supply of the mammary glands is different from other glands. Thus pilocarpin, which increases the secretion of other glands, has no effect on the secretion of milk. Prolactin preparations have been used to increase secretion of milk. Urea is supposed to be a true galactagog. पाश्चात्य चिकित्सा विज्ञान में Placente extract, Pituitary extract तथा Urea मुख्य रूप से दुग्ध-वर्धक ओषधियां मानी गई हैं । स्तन्यवर्धन के लिये उपर्युक्त सब ओषधियां प्रयोग में लाई जाती हैं परन्तु वास्तव में स्तन्यप्रवृत्ति का मुख्य कारण (Factor) मानसिक है अर्थात् माता या धात्री का बालक के प्रति प्रेम या आकर्षण मुख्य कारण है । यदि धात्री को बालक के प्रति प्रेम या आकर्षण नहीं है तो उपर्युक्त सब उपाय लगभग व्यर्थ सिद्ध होते हैं । इसलिये सुश्रुत के निदान स्थान अ. १० में कहा है कि शुक्र प्रवृत्ति के समान स्तन्यप्रवृत्ति भी मानसिक भावों पर आश्रित है—आहाररसयोनित्वादेवं स्तन्यमपि स्त्रियाः । तदेवापत्य संस्पर्शाद् दर्शनात् स्मरणादपि ॥ ग्रहणाच्च शरीरस्य शुक्रवत्संप्रवर्तते ॥ स्नेहो निरन्तरस्तत्र प्रस्त्रवे हेतुरुच्यते ॥ जब माता प्रेम से बालक को देखती है अथवा उसे गोद में उठाती है तब उसके स्तनों की ओर रक्त का प्रवाह बढ़कर उनसे दुग्ध का स्त्राव होने लगता है ।

अव्याहतबलाङ्गायुररोगो वर्धते सुखम् । शिशुधात्र्योरनापत्तिः शुद्धक्षीरस्य लक्षणम् ॥

क्षीरोत्पत्त्यध्यायः १९] सूत्रस्थानम् ९३

शुद्ध क्षीर के लक्षण—बालक के बल, अङ्ग तथा आयु अव्याहत (निर्बाध) हों, वह रोगों से रहित (स्वस्थ) होकर सुख पूर्वक वृद्धि को प्राप्त होता हो तथा शिशु एवं धात्री को कोई कष्ट न हो तो दूध को शुद्ध समझना चाहिये।

वक्तव्य—चरक शा. अ. ८ में शुद्ध स्तन्य के निम्न भौतिक गुण दिये हैं—प्रकृतवर्णगन्धरसस्पर्शमुदपात्रे दुह्यमानमुदकं व्येति, प्रकृतिभूतत्वात्, तत्पुष्टिकरोमारोग्यकरञ्चेति स्तन्यसम्पत्। जिसका वर्ण गन्ध, रस तथा स्पर्श स्वाभाविक हों और जो जलयुक्त पात्र में दुहा जाने पर जल के साथ मिलकर एक हो जाय वह दूध शुद्ध होता है। इसी प्रकार सुश्रुत शा. अ. १० में भी कहा है—अथास्याः स्तन्यमप्सु परीक्षेत, तच्चेच्छीतलममलं तनु शङ्खावभासमप्सु न्यस्तमेकाभावं गच्छत्यफेनिलमतन्तुमन्नोत्प्लवते न सीदति वा तच्छुद्धमिति विद्यात्। तेन कुमारस्यारोग्यं शरीरोपचयो बलवृद्धिश्च भवति। यही लक्षण सुश्रुत निदान स्थान में भी दिया है—यत्क्षीरमुदके क्षिप्तमेकीभवति पाण्डुरम्। मधुरं चाविवर्णं च प्रसन्नं तद्विनिर्दिशेत्॥

संभवन्ति महारोगा अशुद्धक्षीरसेवनात्। तेषामेवोपशान्तिस्तु शुद्धक्षीरनिषेवणात् ।।

अशुद्ध दूध के सेवन से बालक को कई बड़े २ रोग हो जाते हैं। शुद्ध दूध के सेवन से वे ही रोग शान्त हो जाते हैं। अर्थात् शिशु दूध पर ही आश्रित होता है। यदि दूध दोष-युक्त होगा तो उसे अनेक प्रकार के रोग हो जायेंगे। यदि दूध शुद्ध होगा तो सब रोग शान्त हो जाते हैं।

तृणं कीटं तुषं शूकं मक्षिकाऽङ्गमलाष्टकम् (ङ्गानि लोष्टकः)।
केशोर्णास्थ्यादिकं विद्याद्वज्रमित्युपचारतः ।।

वज्र का लक्षण—तृण, कीट (कीड़े) तुष (धान के छिलके) शूक (ऊर्णादि भक्षक कीट), मक्खियों के शरीर के अवयव तथा लोष्ठ (पत्थर), केश, इन तथा अस्थि आदि ये सब उपचार से वज्र कहलाते हैं।

सहान्नपानेन यदा धात्री वज्रं समश्नुते। पच्यमानेन पाकेन ह्यन्नत्वान्न पच्यते ।।
अपच्यमानं विक्किन्नं वायुना समुदीरितम्। रसेन सह संपृक्तं याति स्तन्यवहाः सिराः ।।
सर्वस्रोतांसि हि स्त्रीणां विवृतानि विशेषतः। तत् पयोधरमासाद्य क्षिप्रं विकुरुते स्त्रियाः ।।

स्तनरोगों का कारण—जब धात्री अन्नपान (खाने पीने) के साथ 'वज्र' को खाजाती है तो वह वज्र अन्न न होने से (foreign body होने से) पच्यमानावस्था अथवा पाकावस्था में नहीं पचता है। न पचा हुआ वह 'वज्र' क्लेद को प्राप्त हुआ २ वायु से धकेला जाकर रस के साथ मिलकर स्तन्यवहा शिरा (mammary ducts) में पहुँच जाता है। इससे स्त्रियों के सब स्रोत बन्द हो जाते हैं इस प्रकार वह स्त्री के स्तनों में पहुंचकर शीघ्र ही विकार उत्पन्न करता है। अर्थात् जब स्त्री किसी ऐसे विजातीय द्रव्य का सेवन कर लेती है जो वास्तव में शरीर के लिये सात्म्य न हो तब वह विजातीय द्रव्य (foreign body) होने से शरीर में पचता नहीं है तथा वह रसवाहिनी स्रोतों के मार्ग बन्द कर देता है। इस प्रकार वह मल स्तनों में पहुंचकर विकार उत्पन्न कर देता है।

रूपाणि पीतवज्रायाः प्रवक्ष्याम्यत उत्तरम्। अजीर्णमरतिग्लानिर्निमित्तं व्यथाऽरुचिः ।।
पर्वभेदोऽङ्गमर्दश्च शिरोरुग् द(क्ष) वथुग्रहः। कफोत्क्लेदो ज्वरस्तृष्णा विड्भेदो मूत्रसंग्रहः ।।
स्तम्भः स्रावश्च कुचयोः सिराजालने संतः। शोथशूलरुजादाहैः स्तनः स्प्रष्टुं न शक्यते ।।
स्तनकीलकमित्याहुर्भिषजस्तं विचक्षणाः। कीलवत् कठिनोऽङ्गेषु बाधमानो हि तिष्ठति ।।

अब मैं 'पीतवज्रा' (जिसने बज्र का सेवन कर लिया है) स्त्री के लक्षणों का वर्णन करूँगा। पीतवज्रा के लक्षण—उस स्त्री को अजीर्ण, अरति, ग्लानि, बिना कारण के शरीर में पीडा, अरुचि, पर्वभेद (सन्धियों में पीडा), अङ्गमर्द,

१४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् क्षीरोत्पत्त्यध्यायः १९ ]

शिरःशूल, दवथु (आंखों में जलन अथवा श्वथु-छींक), अङ्गग्रहकफोत्क्लेद (कफ के कारण जी मचलाना) ज्वर, तृष्णा, विड्भेद (अतिसार), मूत्र की रुकावट, स्तनों में स्तम्भ (अकड़ान) स्त्राव (Discharge) होते हैं और चारों ओर शिराओं का जाल (Veinulas) दिखाई देता है । तथा शोथ (Inflamation), शूल (Pain), रुजा (स्पर्शाक्षमता Tenderness) तथा दाह (Burning senation) के कारण स्तन का स्पर्श नहीं किया जा सकता । बुद्धिमान चिकित्सक इसे स्तनकीलक (स्तनविद्रधि-Mammary abscess) कहते हैं । इसका यह नाम इस लिये है कि यह कील की तरह कठिन होकर अङ्गों में बाधा पहुँचाता हुआ विद्यमान रहता है ।

एष पित्तात्मना शीघ्रं पाकं भेदं च गच्छति ।
कफाच्चिरं क्लेशयति वातादाशु निवर्तते (विवर्धते) ।।
शाखाशिरोभिस्तु यदि विमार्गान्न प्रपद्यते । आकृष्यमाणं बालेन क्षिप्रं निर्धावति स्तनात् ।।
निर्दुह्यमानमुत्पीडाद्वज्रं सक्षीरशोणितम् । अथवाऽभ्येति सहसा प्रत्यक्षं चोपलभ्यते ।।

यदि पित्त की अधिकता हो तो यह स्तन कीलक (Mammary Abscess) शीघ्र ही पक जाता है तथा पककर फूट जाता है । कफ के कारण यह चिरकाल तक कष्ट देता है तथा वायु के कारण शीघ्र ही बढ़ जाता है । बालक के द्वारा स्तनपान के समय आकृष्ट होता (चूसा जाता) हुआ यदि वह शाखा तथा शिर आदि के द्वारा विपरीत मार्गों में न चला जाय तो स्तन के द्वारा शीघ्र ही बाहर निकल जाता है । अथवा यदि उत्पीडन करके (दबाकर) दोहन किया जाय तो वह 'वज्र' दुग्ध तथा रक्त के साथ सहसा प्रत्यक्ष रूप से बाहर निकल आता है ।

वक्तव्य—आधुनिक विज्ञान के अनुसार स्तनकीलक को Mammary Abscess या Abscess of the Breast कहा जा सकता है जो बढ़कर Cancer का रूप धारण कर सकता है । यह स्तनकीलक या अन्य कोई भी स्तनरोग साधारणतया गर्भवती या प्रजाता स्त्रियों को ही प्रायः होता है । सुश्रुत संहिता के निदान स्थान में स्तन रोगों का वर्णन करते हुए कहा है—धमन्यः संवृतद्वारा कन्यानां स्तनसंश्रिताः । दोषाविसरणात्तासां न भवन्ति स्तनामयाः ।। तासामेव प्रजातानां गर्भिणीनां च ताः पुनः । स्वभावदेव विवृता जायन्ते संभवन्त्यतः ।। सक्षीरौ वाऽप्यदुग्धौ वा प्राप्य दोषः स्तनौ स्त्रियाः । रक्तं मांसं च संदूष्य स्तनरोगाय कल्पते ।। प्रसव या गर्भावस्था से पूर्व स्त्रियों में स्तन-संश्रित दुग्धवह स्रोतस् (Lacteals) संकुचित होते हैं अतः उनमें दोषों का प्रवेश नहीं हो सकता है । गर्भावस्था में या प्रसव के बाद वे स्वयमेव विस्तृत हो जाती है इसलिये उनमें स्तनरोग होने की संभावना प्रायः बनी रहती है ।

घृतपानं प्रथमतः शस्यते स्तनकीलके । स्रोतांसि मार्दवं स्नेहाद्यान्ति वज्रं च च्याव्यते ।।
निर्दोहो मर्दनं युक्त्या पायनं च गलेन च ।
(इति ताडपत्रपुस्तके ३३ तमं पत्रम् ।)
शीताः सेकाः प्रलेपाश्च विरेकः पथ्यभोजनम् ।।
स्त्रावणं चाविदग्धस्य दोषदेहव्यपेक्षया । स्य पाटनं कुर्यान्मृजां विद्रधिवच्च तत् ।।

स्तनकीलक की चिकित्सा—स्तनकीलक की चिकित्सा में सर्व प्रथम घृतपान कराना चाहिये । इस प्रकार स्नेह से स्रोत मृदु हो जाते हैं तथा 'वज्र' निकल जाता है । इसके लिये युक्ति पूर्वक रोहन (दूध निकाल देना) मर्दन, तथा गले (मुंह) से ओषधि का पान कराना चाहिये । फिर शीतसेक (Cold Compress) प्रलेप, विरेचन तथा पथ्य भोजन देना चाहिये । दोष तथा शरीर (इन दोनों के बल) को दृष्टि में रखते हुए अविदग्ध (अपक्व) विकार का स्त्रावण करना चाहिये और पके हुए का विद्रधि की तरह पाटन (Open or Incision) करना चाहिये ।

CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

दन्तजन्मिकाध्यायः २०] सूत्रस्थानम् १५

परवृद्धितभोक्त्री च परालालिततर्पणा । परवेश्मरता धात्री मुच्यते स्तनकीलकात् ।।

जो धात्री दूसरे के यहां हितकारक (पथ्य) भोजन करती है, दूसरे के यहां जिसका लालन पालन (पोषण) एवं तर्पण होता है, तथा जो दूसरे के घर में रहती है—वह स्तनकीलक नामक रोग से मुक्त हो जाती है। अर्थात् उपर्युक्त प्रकार की धात्री को स्तनकीलक नामक रोग नहीं होते हैं।

दर्शनीयौ स्तनौ पीनौ सुजातौ संहतौ समौ ।
सुकरौ पर्यकीलौ च दृष्ट्वा त्वीक्ष(त्विच्छ)न्ति दुर्हृदः ।।
ततो रुजामवाप्नोति कार्यं तन्त्रावचारणम् ।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।
इति क्षीरोत्पत्तिर्नामाध्याय ऊनविंशतितमः ॥१९॥


जिस माता या धात्री के स्तन दर्शनीय (सुन्दर) मोटे, सुन्दर आकृति वाले, उत्तम संघात वाले हों तथा दोनों स्तन आकार में समान, सुन्दर और आगे से गोल, घुण्डीदार होते हैं, उन्हें देखकर दुष्ट जन ईर्ष्या करते हैं (अर्थात् उनकी नज़र लग जाती है)। इससे धात्री या माता रुग्ण हो जाती है। इसमें तान्त्रिक प्रक्रियाओं का प्रयोग करना चाहिये।

परिहृत्याममांसं तु निशि नेयं चतुष्पथम् ।।
एतच्छ्रुत्वा वचस्तथ्यमृषिपत्न्यः प्रहर्षिताः । प्रशंसुर्महात्मानं कश्यपं लोकपूजितम् ।।

उस स्त्री को कच्चा मांस काटकर रात्रि को चौराहे पर ले जाना चाहिये। इस तथ्य वचन को सुनकर ऋषि पत्निय बहुत प्रसन्न हुई तथा लोक पूजित महात्मा कश्यप की प्रशंसा की। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।

इति क्षीरोत्पत्तिर्नामाध्याय ऊनविंशतितमः ॥१९॥


विंशतितमोऽध्यायः

अथातो दन्तजन्मिकमध्यायं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।

अब हम दन्तजन्मिक (दांतो की उत्पत्ति का जिसमें वर्णन हो) अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।

अथ खलु भगवन् देहिनां जातानामभिवर्धमानानां कतिषु मासेषु दन्ता निषिच्यन्ते, निषिक्ताश्च कियता कालेन मूर्तीभवन्ति, मूर्तीभूताश्च कदोद्भिद्यन्ते, कानि चैषां पूर्वरूपाणि, के चोपद्रवाः, कश्चैषामुपक्रमः, किञ्च दन्तजन्म प्रशस्तमप्रशस्तं च किं, कस्माच्च स्वमङ्गमभिवर्धमानं प्राणसंशयाय भवति, कियन्तश्च दन्ताः, कतिचैषां द्विजाः, कियता च कालेन पतन्ति, पतिता वा जायन्ते, दन्तसंपदसंपच्च कीदृशीति ।।३।।

भगवन् ! प्राणियों के उत्पन्न होकर बढ़ते हुये कितने मासों में दांतों का निषेचन होता है (अर्थात् मसूड़ों के अन्दर दांत बैठते हैं), निषेचन के कितने समय बाद वे मूर्तरूप धारण करते हैं, मूर्तरूप होने के बाद कब प्रकट होते (फूटते) हैं, दांतों के निकलने के क्या पूर्वरूप होते हैं, दन्तोद्भेद के समय क्या २ उपद्रव होते हैं, इन उपद्रवों की क्या चिकित्सा

२४ का.सं.

१६काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्दन्तजन्मिकाध्यायः २०]

है, कौनसी दन्तोत्पत्ति प्रशस्त तथा कौनसी अप्रशस्त मानी गई है, तथा क्यों दांत अपने निश्चित परिमाण से अधिक बढ़कर प्राणों के लिये भय (संकट) उत्पन्न कर देता है, दांतों की संख्या कितनी होती है, इनमें से द्विज (दो बार होने वाले) कितने हैं, ये कितने समय में गिरते हैं तथा गिरकर पुनः निकल आते हैं, कौन से दन्तसंपत् तथा कौन से असंपत् होते हैं।

अथोवाच भगवान् कश्यपः–इह खलु नृणां द्वात्रिंशद्दन्ताः, तत्राष्टौ सकृज्जाताः स्वरूढदन्ता भवन्ति, अतः शेषा द्विजाः। यावत्स्वेव च मासेषु दन्ता निषिच्यन्ते तावत्स्वहःसूद्भिद्यन्ते। यावत्स्वेव च मासेषु जातस्य सत उद्भिद्यन्ते तावत्स्वेवे च वर्षेषु पतिताः पुनरुद्भिद्यन्ते। तत्र मध्ये द्वावुत्तरौ राजदन्तसंज्ञौ भवतः, तौ पवित्रौ, तस्मात्ताभ्यां खण्डे न श्राद्धमर्हति, अपवित्रो हि सः। तयोरुभयतः पार्श्वयोरपि वस्त्रौ(?), तयोरपि दंष्ट्रे, शेषाः स्वरूढा हानव्या इति चोच्यन्ते; तथाऽधस्तात् ।।४।।

भगवान् कश्यप ने उत्तर दिया—मनुष्यों के ३२ दांत होते हैं, इनमें आठ सकृज्जात (केवल एक वार उत्पन्न होने वाले) तथा उसी अपने स्वरूप में ही बढ़ने वाले होते हैं। शेष (२४) द्विज¹ हैं। जितने मास में दांतो का निषेचन होता है उतने ही दिनों में वे फूट आते हैं (अर्थात् यदि चार मास में दांत निषिक्त होते हैं तो चार दिन में वे फूटकर बाहर निकल आते हैं) और बच्चे के उत्पन्न होने के बाद जितने मास में दांत फूटते (निकलते) हैं उतने ही वर्षों में गिरकर वे पुनः निकल आते हैं (अर्थात् यदि छठे मास में दांत निकलते हों तो वे छठे वर्ष में गिरकर पुनः [स्थायी दांत] निकल आते हैं)। ऊपर की पंक्ति में बीच के दो दांतों का नाम राजदन्त (मध्य त्रोटक-Central Incisers) होता है, उनको पवित्र माना गया है, इसलिये उनके खण्डित हो जाने पर मनुष्य श्राद्ध के योग्य नहीं रहता अर्थात् वह किसी का श्राद्ध नहीं कर सकता है, क्योंकि वह अपवित्र हो जाता है। उन दोनों (राजदन्त) के पार्श्व में दोनों ओर वस्त्र (Lateral Incisers) होते हैं, और इनके दोनों ओर दंष्ट्रा (शीवनकीलक, Canine या Eye teeth) होते हैं। (इस प्रकार ये ६ हुए) शेष स्वरूढ (अपने उसी स्वरूप में बढ़ने वाले) हानव्य अर्थात् हनुप्रदेश में होने वाले (चर्वण दन्त—Bicuspids or molars) कहाते हैं (अर्थात् ये १० हुवे) इसी प्रकार नीचे की पंक्ति में भी समझना चाहिये (अर्थात् २० हानव्य और १२ शेष हुवे इस प्रकार कुल ३२ दांत होते हैं)।

वक्तव्य—आधुनिक मतानुसार भी दन्तोद्भेद दो प्रकार का माना गया है। (१) बाल्यावस्था (Infancy) में तथा (२) किशोरावस्था (Childhood) में। दांतो के प्रथम समुदाय (Set) को “दूध के दांत” (Milk teeth या Primary Dentition) कहते हैं तथा दूसरे को “स्थायी दांत” (Secondary Dentition) कहते हैं।

प्रथम समुदाय के दांत (दूध के दांत) बच्चे के उत्पन्न होने के कई मास पूर्व मसूड़ों के अन्दर बीज रूप से (Germs) विद्यमान होते हैं। धीरे २ उनमें अस्थिनिर्माण (Ossification) प्रारंभ होता है तथा दांतों की आकृति बनकर बढ़ते हुवे मसूड़ों को विदीर्ण करके बाहर फूट आते हैं। इसी को हम दन्तोद्भेद या Teething कहते हैं। इस संहिता के उपर्युक्त प्रकरण में इन्हीं तीनों अवस्थाओं के लिये क्रमशः निषिक्त, मूर्तिमान् तथा उद्भेदन शब्द दिये गये हैं। इस विषय में Birch की Management and medical treatment of children in India नामक पुस्तक के ७५ पृष्ठ पर लिखा है—The germs of the first (milk or temporary) set have existed within the jaw for Several months before birth, but they are at no time covered with true bone, As ossification advances, the tooth rises and pressing upwards causes absorption of its


१. द्विज=(द्विजायन्ते-दो बार उगने वाले) अर्थात् दूध के दांत-Milk teeth, क्योंकि दूध के दांत एक बार गिर कर दोबारा उगते हैं।