भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 368

१० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् क्षीरोत्पत्त्यध्यायः १९ ]

त्रिफला सत्रिकटुका पाठा मधुरसा वचा । कोलचूर्णं त्वचो जम्ब्वा देवदारु च पेषितम् ।। सर्षपप्रसृतोन्मिश्रं पातव्यं क्षौद्रसंयुक्तम् । एतत् स्तन्यस्य दुष्टस्य श्रेष्ठं शोधनमुच्यते ।।

त्रिफला, त्रिकटु (सोंठ, मरिच, पीपल) पाठा, मधुरसा (मधुयष्टि अथवा द्राक्षा) वच, कोल (बेर) का चूर्ण, जामुन की छाल, देवदारु और सर्षप सब मिलाकर एक प्रसृत (८ तो.) चूर्ण मधु के साथ सेवन करना चाहिये । यह दूषित दुग्ध के लिये श्रेष्ठ शोधन है ।

वक्तव्य—८ तोले की मात्रा आजकल के अनुसार बहुत अधिक है । इसे समयानुसार रोगी के बल को देखकर कम किया जा सकता है ।

शृङ्गवेरपटोलाभ्यां पिप्पलीचूर्णचूर्णितम् । यूषपथ्यं विदध्याच्च ह्यन्नपानं च यल्लघु ।।

आर्द्रक तथा पटोलपत्र के रस से पिप्पलीचूर्ण का सेवन करना चाहिये तथा साथ में पथ्य के रूप में यूष और लघु अन्नपान का प्रयोग करना चाहिये ।

वक्तव्य—१८ गुने जल में मूंग आदि को पकाने से यूष सिद्ध होता है । कहा है—अष्टादशगुणे नीरे शिम्बीधान्यश्रृतो रसः । विरलान्नो घनः किञ्चित् पेयातो यूष उच्यते ।। अथवा—वैदलान् वितुषान् भृष्टान् चतुर्भागाम्बुसाधितान् । निष्पीड्य तोयमेतेषां संस्कृतं यूष उच्यते ।। यूष पेया से कुछ गाढ़ा होता है । इसीलिये कहा है—"यूषः किञ्चित् घनः स्मृतः" ।

धातकीपुष्पमेला च समङ्गा मरिचानि च । जम्बुत्वचं समधुकं क्षीरशोधनमुत्तमम् ।।

धाय के फूल, एला, मंजीठ, मरिच, जामुन की छाल तथा मुलहठी का चूर्ण उत्तम दुग्धशोधक होता है ।

नाडिका सगुडा सिद्धा हिङ्गुजातिसुसंस्कृता । क्षीरं मांभरसो मद्यं क्षीरवर्धनमुत्तमम् ।। वाजीकरणसिद्धं वा क्षीरं क्षीरविवर्धनम् । घृततैलोपसेवा च बस्तयश्च पयस्कराः ।।

नाडिका (कालशाक) को गुड के साथ सिद्ध करके उसे हींग तथा जायफल से सुसंस्कृत करे । यह सुसंस्कृत योग दूध, मांभरस, तथा मद्य अथवा वाजीकरण के निमित्त अथवा वाजीकरण ओषधियों से सिद्ध किया हुआ दूध, घृतसेवन, तैलसेवन, तथा बस्तियां सभी क्षीरवर्धक (दूध को बढ़ाने वाले) हैं ।

वक्तव्य—आगे "मधुराण्यन्नपानानि" द्वारा बहुत से क्षीरवर्धन के योग और दिये गये हैं । ये उपर्युक्त दो श्लोक भी यदि वहीं दिये जाते तो विषय को देखते हुए अधिक उपयुक्त होता । क्योंकि दुग्धशोधक प्रयोगों के बीच में ही दुग्धवर्धक योगों के दिये जाने से विषय में कुछ व्यासङ्ग हो जाता है ।

पाठा महौषधं दारु मूर्वामुस्तकवत्सकाः । सारिवारिष्टकटुकाः कैरातं त्रिफला बचा ।। गुडूची मधुकं द्राक्षा दशमूलं सदीपनम् । रक्षोघ्नश्च पटोलश्च गणः क्षीरविशोधनः ।। लाभतः क्वथितस्तेषां कषायः स तु सेवितः । क्षीरं शोधयति क्षिप्रं चिरव्यापन्नमप्युत ।।

पाठा, सोंठ, दारुहल्दी अथवा देवदारु, मूर्वा (मोरबेल), नागरमोथा, इन्द्रजौ, सारिवा, अरिष्ट (नीम), कटुकी, चिरायता, त्रिफला, बच, गिलोय, मुलहठी, द्राक्षा, दशमूल, दीपनीय द्रव्य, रक्षोघ्न (श्वेत सरसों) तथा पटोलादि गण की ओषधियां ये सभी दुग्ध के शोधक हैं । इनमें से जो २ द्रव्य प्राप्त हो सकें उनका कषाय बनाकर सेवन करने से चिरकालीन क्षीरदोष भी शीघ्र ही दूर हो जाते हैं ।

वक्तव्य—स्तन्यशोधक—चरक में निम्न १० स्तन्यशोधक ओषधियां दी हैं—पाठामहौषधसुरदारुमुस्तमूर्वागुडूचीवत्सक-फलकिराततिक्तकटुरोहिणीसारिवाकषायाणां च पानं प्रशस्यते । तथाऽन्येषां तिक्तकषायकटुकमधुराणां द्रव्याणां प्रयोगः