भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 367

क्षीरोत्पत्त्यध्यायः १९ ] सूत्रस्थानम् ९

क्रमशः विदारीकन्द, शतावरी तथा अश्वगन्धा आदि प्रतिनिधि द्रव्य लिये जाते हैं। क्योंकि कहा भी है—राज्ञामप्यष्टवर्गस्तु यतोऽयमतिदुर्लभः।

नोट—यह अध्याय यहीं मध्य में ही खण्डित हो गया है।


एकोनविंशोऽध्यायः

................... । ........... ॥
......... शकुनी कटुतिक्तके। स्कन्दषष्ठीग्रहौ ज्ञेयौ व्यापन्ने सान्निपातिके।
पूतना स्वादुकटुके शेषाः संसृष्टदोषजाः ॥

वक्तव्य— यह अध्याय भी प्रारंभ में खण्डित है। इस अध्याय में धात्री के दूध के विषय में विशेष विवेचन किया गया है। इसमें धात्री के दूध की वृद्धि तथा उसके शोधन के अनेक प्रकार दिये गये हैं। ग्रहदोषों के कारण भी दूध प्रायः दूषित हो जाता है। सर्वप्रथम इस अध्याय में उन्हीं भिन्न २ ग्रहों से दूषित हुए दूध के लक्षण दिये गये हैं।

ग्रहों से दूषित दूध के लक्षण— यदि दूध का स्वाद कटु एवं तिक्त हो तो उसे शकुनी ग्रह से आक्रान्त (दूषित) समझना चाहिये। यदि दूध दूषित हो तथा उसमें सन्निपात (सब दोषों के सम्मिलित) के लक्षण दिखाई दें तो उस पर स्कन्द एवं षष्ठीग्रह का प्रभाव समझना चाहिये। यदि दूध का स्वाद स्वादु (मधुर) एवं कटु हो तो पूतना का प्रकोप समझना चाहिये। शेष सब प्रकार के दूषित दूधों में सम्मिलित दोषों का प्रभाव होता है।

बहुविण्मूत्रता स्वादौ कषाये मूत्रविग्रहः। तैलवर्णे बली तुल्या घृतवर्णे महाधनः ॥
यशस्वी धूम्रवर्णे तु शुद्धे सर्वगुणोदितः।

भिन्न २ दूषित दूधों का प्रभाव— यदि दूध स्वादु (मधुर) है तो उसे (उस दूध के सेवन करने वाले बालक को) मल तथा मूत्र बहुत होगा। यदि दूध कषाय रस वाला है तो मूत्रग्रह तथा मलग्रह (मूत्र तथा मल की रुकावट) हो जायगा। यदि दूध तैलवर्ण वाला है तो उसका सेवन करने वाला बालक बलवान् होगा। यदि दूध घृतवर्ण वाला है तो बालक स्वर्ण आदि महान् ऐश्वर्ययुक्त होगा। यदि दूध धूम्रवर्ण (धुंधला-धूसरवर्ण) का है तो बालक यशस्वी होगा। तथा यदि दूध बिलकुल शुद्ध (सब प्रकार के दोषों से रहित) है तो उसका सेवन करनेवाला बालक सर्वगुण सम्पन्न होगा।

तस्मात् संशोधनपरा नित्यं धात्री प्रशस्यते ॥

इसलिये नित्य संशोधन में लगी हुई धात्री प्रशस्त मानी गई है। अर्थात् दूध पिलाने वाली धात्री (Wetnurse) का नित्य संशोधन करते रहना चाहिये जिससे उसके दूध का संशोधन हो जाय तथा बालक रोगग्रस्त न हो सके। धात्री के दूध पर ही पूर्णरूप से बालक का स्वास्थ्य निर्भर है। अतः धात्री का वमन विरेचन आदि के द्वारा शोधन आवश्यक है।

कषायपानैर्वमनैर्विरेकैः पथ्यभोजनैः। वाजीकरणसिद्धैश्च स्नेहः क्षीरं विशुध्यति ॥

अब दूषित स्तन्य (दूध) के शोधन के भिन्न २ उपाय लिखे जायेंगे। कषायपान, वमन, विरेचन, पथ्य (हितकारी) भोजन तथा वाजीकरण के लिये अथवा वाजीकरण ओषधियों से सिद्ध किये हुए स्नेहों के सेवन से धात्री का दूध शुद्ध होता है।