काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 366, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | लेहाध्यायः ? ] |
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ब्राह्मी, सरसों, कूठ, सैन्धव, सारिवा (अनन्तमूल) वच तथा पिप्पली से घृतपाक विधि से घृत सिद्ध किया जाय। इसका नाम अभयघृत है। इस घृत के सेवन करने वाले बालक को पिशाच, राक्षस, यक्ष तथा मातृकाएं कोई बाधा (कष्ट) नहीं पहुंचा पाती हैं। अष्टाङ्ग ह. उ. अ. १ में भी अभय घृत का यही पाठ मिलता है—ब्राह्मीसिद्धार्थकवचासारिवाकुष्ठसैन्धवैः। सकणैः साधितं पीतं वाङ्मेधास्मृतिकृद्घृतम्॥ आयुष्यं पापरक्षोघ्नं भूतोन्मादनिबर्हणम्॥
खदिरः पृश्निपर्णी च स्यत्(न्दनः) सैन्धवं बले।
केवुकेति कषायः स्यात् पादशिष्टो जलाढके॥
अर्धप्रस्थं पचेदत्र तुल्यक्षीरं घृतस्य तु। घृतं संवर्धनं नाम लेह्यं मधुयुतं सदा॥
निर्व्याधिर्वर्धते शीघ्रं संसर्पत्याशु गच्छति। पङ्गुमूकाश्रुतिजडा युज्यन्ते चाशु कर्मभिः॥
खदिर, पृश्निपर्णी (पिठवन) स्यन्दन (तिन्दुक अथवा अर्जुन) सैन्धव, दोनों बला (बला और अतिबला) और केबुक (केमुआ-कन्दशाक विशेष)—इनका एक आढक जल में चतुर्थांश कषाय बनावे। इनमें समान मात्रा में दुग्ध तथा आधा प्रस्थ घी डालकर घृतपाकविधि से पकावे। यह संवर्धन नाम का घृत है। इसको सदा मधु के साथ मिलाकर लेहन करे। इसके सेवन से बालक शीघ्र ही व्याधिरहित होकर वृद्धि को प्राप्त होता है, शीघ्र चलने फिरने लगता है तथा पङ्गु (न चलने वाले-लूले), मूक (गूंगे), अश्रुति (न सुनने वाले-बहरे) तथा जड (Idiot) बालक जल्दी उन २ क्रियाओं से युक्त हो जाते हैं अर्थात् इसके प्रयोग से लूले चलने लगते हैं, गूंगे बोलने लगते हैं, बहरे सुनने लगते हैं तथा मूर्ख समझने लगते हैं।
स्वरसस्याढके ब्राह्म्या घृतप्रस्थं विपा^१चयेत्। स(वत्सा)ऽजागोपयसामाढकाढकमावपेत्॥
त्रिफलाऽंशुमती द्राक्षा वचा कुष्ठं हरेणवः। पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकनागरम् ॥
त्वक्पत्रबालकोशीरचन्दनोत्पलपद्मकम्। शतावरी नागबला दन्ती पाठा प्रियङ्गुका॥
देवदारु हरिद्रे द्वे जीवनीयाश्च यो गणः। विडङ्गो गुग्गुलुर्जातिः ...........॥
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(इति ताडपत्रपुस्तके २९ तमं पत्रम्^२।)
ब्राह्मी स्वरस—१ आढक। गोघृत—१ प्रस्थ। जिनके बच्चे जीवित हों उन गौ तथा बकरियों का दूध—एक २ आढक। इसमें त्रिफला, अंशुमती (शालिपर्णी), द्राक्षा, वच, कूठ, हरेणु (रेणुका-सुगन्धित द्रव्य), पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक, नागर (सोंठ), त्वक् (दालचीनी), पत्र (तेजपत्र), बालक (नेत्रबाला), उशीर (खस), श्वेत-चन्दन, उत्पल (नील कमल), पद्मक (पद्माख अथवा श्वेत-कमल) शतावरी, नागबला, दन्ती, पाठा, प्रियङ्गु, देवदारु, हरिद्रा, दारुहरिद्रा, जीवनीय गण की ओषधियां, वायविडङ्ग, गुग्गुलु तथा जाति पत्री ...... इत्यादि द्रव्यों का परिभाषानुसार कल्क डालकर घृतपाक करे। इस घृत का लेहन करावे। इससे उपर्युक्त लाभ होते हैं।
जीवनीय गण—चरक में निम्न दिया है—'जीवकर्षभकौ मेदा महामेदा, काकाली, क्षीरकाकोली, मुद्गमाषपर्ण्यौ जीवन्ती मधुकमिति'। इनमें से प्रथम ६ ओषधियां अष्टवर्ग में आती हैं जिनके प्रायः अलभ्य होने से उनके स्थान पर
१. अत्र 'विपाचयेत्' इति मुद्रितपुस्तकपाठः।
२. ३० पत्रतः ३२ पत्रपर्यन्तो ग्रन्थस्ताडपत्रपुस्तके खण्डितः।