भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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लेहाध्यायः ? ] सूत्रस्थानम्

दुग्धवहस्त्रोतस् प्रायः बन्द रहते हैं अतः माता (प्रथम प्रसव में—Primiparas) तीन चार दिन तक बालक को अपने स्तनों से दूध नहीं पिला सकती है । सुश्रुत में कहा है—धमनीनां हृदिस्थानां विवृतत्वादनन्तरम् । चतूरात्रात्त्रिरात्राद्वा स्त्रीणां स्तन्यं प्रवर्तते ।। तस्मात् प्रथमेऽह्नि मधुसर्पिरनन्तामिश्रं मन्त्रपूतं त्रिकालं पाययेत्, द्वितीये लक्ष्मणासिद्धं सर्पिस्तृतीये च । परन्तु यहां उपर्युक्त सुवर्णप्राशन या लेहन से अभिप्राय प्रतीत नहीं होता है जो कि जातकर्म के बाद दो तीन दिन तक दिया जाता है । अपितु यहां निरन्तर सेवन करने के लिये ही इन लेहनों का प्रयोग दिया गया है । जैसे आजकल छोटे शिशुओं को भिन्न २ प्रकार की जन्मघुट्टियों का प्रयोग कराया जाता है उसी तरह बालकों को स्वस्थ रखने के लिये इन लेहों का प्रयोग कराया जाता हुआ प्रतीत होता है ।

आयुष्यम्—आयु की वृद्धि के लिये भी सुवर्ण का प्रयोग कराया जाता है । सुश्रुत चिकित्सास्थान के मेधापुष्कामीय अध्याय में कहा है—अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि आयुष्कामरसायनम् । मन्त्रौषधसमायुक्तं संवत्सरफलप्रदम् ।। बिल्वस्य चूर्णे पुष्ये तु हुतं वारान् सहस्रशः । श्रीसूक्तेन नरः कल्पे ससुवर्णं दिने दिने ।। सर्पिर्मधुयुतं लिह्यादलक्ष्मीनाशनं परम् । इत्यादि ।

ब्राह्मी मण्डूकपर्णी च त्रिफला चित्रको वचा । शतपुष्पाशतावर्यौ दन्ती नागबला त्रिवृत् ।। एकैकं मधुसर्पिर्भ्यां मेधाजननमभ्यसेत् । कल्याणकं पञ्चगव्यं मेध्यं ब्राह्मीघृतं तथा ।।

ब्राह्मी, मण्डूकपर्णी, त्रिफला, चित्रक, वच, सौंफ, शतावरी, दन्ती, नागबला तथा निसोध, इनका पृथक् २ मधु तथा घृत के साथ मेधावृद्धि के लिये प्रयोग करे तथा मेधावर्धक कल्याणकघृत, पञ्चगव्यघृत और ब्राह्मीघृत का भी लेहन करावे ।

वक्तव्य—चरक संहिता के उन्माद चिकित्सा में कल्याणक घृत का निम्न पाठ दिया है इसे अष्टाविंशति घृत भी कहते हैं—विशाला त्रिफला कौन्ती देवदार्वेलवालुकम् । स्थिरा नतं रजन्यौ द्वे सारिवे द्वे प्रियङ्गुकम् ।। नीलोत्पलैलामञ्जिष्ठा दन्तीदाडिमकेशरम् । तालीशपत्रं बृहती मालत्याः कुसुमं नवम् ।। विडङ्गं पृश्निपर्णी च कुष्ठ चन्दनपद्मकौ । अष्टाविंशतिभिः कल्कैरेतैः कर्षसमैर्भिषक् ।। ........... कल्याणकमिदं सर्पिः श्रेष्ठं पुंसवनेषु च । इसे ही तन्त्रान्तरों में पानीयकल्याणक घृत भी कहा है । इसकी मात्रा १/४ तोला है । चरकसंहिता के ही अपस्मार चिकित्सा में पञ्चगव्य घृत की निर्माणविधि एवं उपयोग निम्न प्रकार से दी है—गोशकृद्रसदध्यम्ल क्षीरमूत्रैः समैर्धृतम् । सिद्धं पिबेदपस्मारकामलाज्वरनाशनम् वहीं पर ब्राह्मी घृत का निम्न पाठ दिया है—ब्राह्मीरसवचाकुष्ठ शङ्खपुष्पीभिरेव च । पुराणं घृतमुन्मादलक्ष्म्यपस्मारपाप्मजित् ।। इससे आगे अन्य भी कई लेहन योग दिये गये हैं ।

समङ्गा त्रिफला ब्राह्मी द्वे बले चित्रकस्तथा । मधु सर्पिरिति प्राश्यं मेधायुर्बलवृद्धये ।।

मेधा आयु तथा बल की वृद्धि के लिये मञ्जिष्ठा, त्रिफला, ब्राह्मी, दोनों बला (बला और अतिबला) और चित्रक के चूर्ण को समभाग लेकर मधु एवं घृत में मिलाकर प्राशन (लेहन) करना चाहिये ।

कुष्ठं वटाङ्कुरा गौरी पिप्पल्यास्त्रिफला वचा । ससैन्धवैर्घृतं पक्वं मेधाजननमुत्तमम् ।।

कूठ, बढ के अङ्कुर, गौरी (पीत सर्षप) पिप्पली, त्रिफला, वच तथा सेन्धानमक को मिलाकर घृत के साथ घृतपाकविधि से पकाया जाय । यह घृत उत्तम मेधाजनक है ।

ब्राह्मी सिद्धार्थकाः कुष्ठं सैन्धवं सारिवा वचा । पिप्पल्यश्चेति तैः सिद्धं घृतं नाम्नाऽभयं स्मृतम् ।। न पिशाचा न रक्षांसि न यक्षा न च मातरः । प्रबाधन्ते कुमारं तं यः प्राश्रीयादिदं घृतम् ।।