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काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

लेहाध्यायः ? ] सूत्रस्थानम्

दुग्धवहस्त्रोतस् प्रायः बन्द रहते हैं अतः माता (प्रथम प्रसव में—Primiparas) तीन चार दिन तक बालक को अपने स्तनों से दूध नहीं पिला सकती है । सुश्रुत में कहा है—धमनीनां हृदिस्थानां विवृतत्वादनन्तरम् । चतूरात्रात्त्रिरात्राद्वा स्त्रीणां स्तन्यं प्रवर्तते ।। तस्मात् प्रथमेऽह्नि मधुसर्पिरनन्तामिश्रं मन्त्रपूतं त्रिकालं पाययेत्, द्वितीये लक्ष्मणासिद्धं सर्पिस्तृतीये च । परन्तु यहां उपर्युक्त सुवर्णप्राशन या लेहन से अभिप्राय प्रतीत नहीं होता है जो कि जातकर्म के बाद दो तीन दिन तक दिया जाता है । अपितु यहां निरन्तर सेवन करने के लिये ही इन लेहनों का प्रयोग दिया गया है । जैसे आजकल छोटे शिशुओं को भिन्न २ प्रकार की जन्मघुट्टियों का प्रयोग कराया जाता है उसी तरह बालकों को स्वस्थ रखने के लिये इन लेहों का प्रयोग कराया जाता हुआ प्रतीत होता है ।

आयुष्यम्—आयु की वृद्धि के लिये भी सुवर्ण का प्रयोग कराया जाता है । सुश्रुत चिकित्सास्थान के मेधापुष्कामीय अध्याय में कहा है—अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि आयुष्कामरसायनम् । मन्त्रौषधसमायुक्तं संवत्सरफलप्रदम् ।। बिल्वस्य चूर्णे पुष्ये तु हुतं वारान् सहस्रशः । श्रीसूक्तेन नरः कल्पे ससुवर्णं दिने दिने ।। सर्पिर्मधुयुतं लिह्यादलक्ष्मीनाशनं परम् । इत्यादि ।

ब्राह्मी मण्डूकपर्णी च त्रिफला चित्रको वचा । शतपुष्पाशतावर्यौ दन्ती नागबला त्रिवृत् ।। एकैकं मधुसर्पिर्भ्यां मेधाजननमभ्यसेत् । कल्याणकं पञ्चगव्यं मेध्यं ब्राह्मीघृतं तथा ।।

ब्राह्मी, मण्डूकपर्णी, त्रिफला, चित्रक, वच, सौंफ, शतावरी, दन्ती, नागबला तथा निसोध, इनका पृथक् २ मधु तथा घृत के साथ मेधावृद्धि के लिये प्रयोग करे तथा मेधावर्धक कल्याणकघृत, पञ्चगव्यघृत और ब्राह्मीघृत का भी लेहन करावे ।

वक्तव्य—चरक संहिता के उन्माद चिकित्सा में कल्याणक घृत का निम्न पाठ दिया है इसे अष्टाविंशति घृत भी कहते हैं—विशाला त्रिफला कौन्ती देवदार्वेलवालुकम् । स्थिरा नतं रजन्यौ द्वे सारिवे द्वे प्रियङ्गुकम् ।। नीलोत्पलैलामञ्जिष्ठा दन्तीदाडिमकेशरम् । तालीशपत्रं बृहती मालत्याः कुसुमं नवम् ।। विडङ्गं पृश्निपर्णी च कुष्ठ चन्दनपद्मकौ । अष्टाविंशतिभिः कल्कैरेतैः कर्षसमैर्भिषक् ।। ........... कल्याणकमिदं सर्पिः श्रेष्ठं पुंसवनेषु च । इसे ही तन्त्रान्तरों में पानीयकल्याणक घृत भी कहा है । इसकी मात्रा १/४ तोला है । चरकसंहिता के ही अपस्मार चिकित्सा में पञ्चगव्य घृत की निर्माणविधि एवं उपयोग निम्न प्रकार से दी है—गोशकृद्रसदध्यम्ल क्षीरमूत्रैः समैर्धृतम् । सिद्धं पिबेदपस्मारकामलाज्वरनाशनम् वहीं पर ब्राह्मी घृत का निम्न पाठ दिया है—ब्राह्मीरसवचाकुष्ठ शङ्खपुष्पीभिरेव च । पुराणं घृतमुन्मादलक्ष्म्यपस्मारपाप्मजित् ।। इससे आगे अन्य भी कई लेहन योग दिये गये हैं ।

समङ्गा त्रिफला ब्राह्मी द्वे बले चित्रकस्तथा । मधु सर्पिरिति प्राश्यं मेधायुर्बलवृद्धये ।।

मेधा आयु तथा बल की वृद्धि के लिये मञ्जिष्ठा, त्रिफला, ब्राह्मी, दोनों बला (बला और अतिबला) और चित्रक के चूर्ण को समभाग लेकर मधु एवं घृत में मिलाकर प्राशन (लेहन) करना चाहिये ।

कुष्ठं वटाङ्कुरा गौरी पिप्पल्यास्त्रिफला वचा । ससैन्धवैर्घृतं पक्वं मेधाजननमुत्तमम् ।।

कूठ, बढ के अङ्कुर, गौरी (पीत सर्षप) पिप्पली, त्रिफला, वच तथा सेन्धानमक को मिलाकर घृत के साथ घृतपाकविधि से पकाया जाय । यह घृत उत्तम मेधाजनक है ।

ब्राह्मी सिद्धार्थकाः कुष्ठं सैन्धवं सारिवा वचा । पिप्पल्यश्चेति तैः सिद्धं घृतं नाम्नाऽभयं स्मृतम् ।। न पिशाचा न रक्षांसि न यक्षा न च मातरः । प्रबाधन्ते कुमारं तं यः प्राश्रीयादिदं घृतम् ।।

काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्लेहाध्यायः ? ]

ब्राह्मी, सरसों, कूठ, सैन्धव, सारिवा (अनन्तमूल) वच तथा पिप्पली से घृतपाक विधि से घृत सिद्ध किया जाय। इसका नाम अभयघृत है। इस घृत के सेवन करने वाले बालक को पिशाच, राक्षस, यक्ष तथा मातृकाएं कोई बाधा (कष्ट) नहीं पहुंचा पाती हैं। अष्टाङ्ग ह. उ. अ. १ में भी अभय घृत का यही पाठ मिलता है—ब्राह्मीसिद्धार्थकवचासारिवाकुष्ठसैन्धवैः। सकणैः साधितं पीतं वाङ्मेधास्मृतिकृद्घृतम्॥ आयुष्यं पापरक्षोघ्नं भूतोन्मादनिबर्हणम्॥

खदिरः पृश्निपर्णी च स्यत्(न्दनः) सैन्धवं बले।
केवुकेति कषायः स्यात् पादशिष्टो जलाढके॥
अर्धप्रस्थं पचेदत्र तुल्यक्षीरं घृतस्य तु। घृतं संवर्धनं नाम लेह्यं मधुयुतं सदा॥
निर्व्याधिर्वर्धते शीघ्रं संसर्पत्याशु गच्छति। पङ्गुमूकाश्रुतिजडा युज्यन्ते चाशु कर्मभिः॥

खदिर, पृश्निपर्णी (पिठवन) स्यन्दन (तिन्दुक अथवा अर्जुन) सैन्धव, दोनों बला (बला और अतिबला) और केबुक (केमुआ-कन्दशाक विशेष)—इनका एक आढक जल में चतुर्थांश कषाय बनावे। इनमें समान मात्रा में दुग्ध तथा आधा प्रस्थ घी डालकर घृतपाकविधि से पकावे। यह संवर्धन नाम का घृत है। इसको सदा मधु के साथ मिलाकर लेहन करे। इसके सेवन से बालक शीघ्र ही व्याधिरहित होकर वृद्धि को प्राप्त होता है, शीघ्र चलने फिरने लगता है तथा पङ्गु (न चलने वाले-लूले), मूक (गूंगे), अश्रुति (न सुनने वाले-बहरे) तथा जड (Idiot) बालक जल्दी उन २ क्रियाओं से युक्त हो जाते हैं अर्थात् इसके प्रयोग से लूले चलने लगते हैं, गूंगे बोलने लगते हैं, बहरे सुनने लगते हैं तथा मूर्ख समझने लगते हैं।

स्वरसस्याढके ब्राह्म्या घृतप्रस्थं विपा^१चयेत्। स(वत्सा)ऽजागोपयसामाढकाढकमावपेत्॥
त्रिफलाऽंशुमती द्राक्षा वचा कुष्ठं हरेणवः। पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकनागरम् ॥
त्वक्पत्रबालकोशीरचन्दनोत्पलपद्मकम्। शतावरी नागबला दन्ती पाठा प्रियङ्गुका॥
देवदारु हरिद्रे द्वे जीवनीयाश्च यो गणः। विडङ्गो गुग्गुलुर्जातिः ...........॥
...................। ...................॥
(इति ताडपत्रपुस्तके २९ तमं पत्रम्^२।)


ब्राह्मी स्वरस—१ आढक। गोघृत—१ प्रस्थ। जिनके बच्चे जीवित हों उन गौ तथा बकरियों का दूध—एक २ आढक। इसमें त्रिफला, अंशुमती (शालिपर्णी), द्राक्षा, वच, कूठ, हरेणु (रेणुका-सुगन्धित द्रव्य), पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक, नागर (सोंठ), त्वक् (दालचीनी), पत्र (तेजपत्र), बालक (नेत्रबाला), उशीर (खस), श्वेत-चन्दन, उत्पल (नील कमल), पद्मक (पद्माख अथवा श्वेत-कमल) शतावरी, नागबला, दन्ती, पाठा, प्रियङ्गु, देवदारु, हरिद्रा, दारुहरिद्रा, जीवनीय गण की ओषधियां, वायविडङ्ग, गुग्गुलु तथा जाति पत्री ...... इत्यादि द्रव्यों का परिभाषानुसार कल्क डालकर घृतपाक करे। इस घृत का लेहन करावे। इससे उपर्युक्त लाभ होते हैं।

जीवनीय गण—चरक में निम्न दिया है—'जीवकर्षभकौ मेदा महामेदा, काकाली, क्षीरकाकोली, मुद्गमाषपर्ण्यौ जीवन्ती मधुकमिति'। इनमें से प्रथम ६ ओषधियां अष्टवर्ग में आती हैं जिनके प्रायः अलभ्य होने से उनके स्थान पर


१. अत्र 'विपाचयेत्' इति मुद्रितपुस्तकपाठः।
२. ३० पत्रतः ३२ पत्रपर्यन्तो ग्रन्थस्ताडपत्रपुस्तके खण्डितः।

क्षीरोत्पत्त्यध्यायः १९ ] सूत्रस्थानम् ९

क्रमशः विदारीकन्द, शतावरी तथा अश्वगन्धा आदि प्रतिनिधि द्रव्य लिये जाते हैं। क्योंकि कहा भी है—राज्ञामप्यष्टवर्गस्तु यतोऽयमतिदुर्लभः।

नोट—यह अध्याय यहीं मध्य में ही खण्डित हो गया है।


एकोनविंशोऽध्यायः

................... । ........... ॥
......... शकुनी कटुतिक्तके। स्कन्दषष्ठीग्रहौ ज्ञेयौ व्यापन्ने सान्निपातिके।
पूतना स्वादुकटुके शेषाः संसृष्टदोषजाः ॥

वक्तव्य— यह अध्याय भी प्रारंभ में खण्डित है। इस अध्याय में धात्री के दूध के विषय में विशेष विवेचन किया गया है। इसमें धात्री के दूध की वृद्धि तथा उसके शोधन के अनेक प्रकार दिये गये हैं। ग्रहदोषों के कारण भी दूध प्रायः दूषित हो जाता है। सर्वप्रथम इस अध्याय में उन्हीं भिन्न २ ग्रहों से दूषित हुए दूध के लक्षण दिये गये हैं।

ग्रहों से दूषित दूध के लक्षण— यदि दूध का स्वाद कटु एवं तिक्त हो तो उसे शकुनी ग्रह से आक्रान्त (दूषित) समझना चाहिये। यदि दूध दूषित हो तथा उसमें सन्निपात (सब दोषों के सम्मिलित) के लक्षण दिखाई दें तो उस पर स्कन्द एवं षष्ठीग्रह का प्रभाव समझना चाहिये। यदि दूध का स्वाद स्वादु (मधुर) एवं कटु हो तो पूतना का प्रकोप समझना चाहिये। शेष सब प्रकार के दूषित दूधों में सम्मिलित दोषों का प्रभाव होता है।

बहुविण्मूत्रता स्वादौ कषाये मूत्रविग्रहः। तैलवर्णे बली तुल्या घृतवर्णे महाधनः ॥
यशस्वी धूम्रवर्णे तु शुद्धे सर्वगुणोदितः।

भिन्न २ दूषित दूधों का प्रभाव— यदि दूध स्वादु (मधुर) है तो उसे (उस दूध के सेवन करने वाले बालक को) मल तथा मूत्र बहुत होगा। यदि दूध कषाय रस वाला है तो मूत्रग्रह तथा मलग्रह (मूत्र तथा मल की रुकावट) हो जायगा। यदि दूध तैलवर्ण वाला है तो उसका सेवन करने वाला बालक बलवान् होगा। यदि दूध घृतवर्ण वाला है तो बालक स्वर्ण आदि महान् ऐश्वर्ययुक्त होगा। यदि दूध धूम्रवर्ण (धुंधला-धूसरवर्ण) का है तो बालक यशस्वी होगा। तथा यदि दूध बिलकुल शुद्ध (सब प्रकार के दोषों से रहित) है तो उसका सेवन करनेवाला बालक सर्वगुण सम्पन्न होगा।

तस्मात् संशोधनपरा नित्यं धात्री प्रशस्यते ॥

इसलिये नित्य संशोधन में लगी हुई धात्री प्रशस्त मानी गई है। अर्थात् दूध पिलाने वाली धात्री (Wetnurse) का नित्य संशोधन करते रहना चाहिये जिससे उसके दूध का संशोधन हो जाय तथा बालक रोगग्रस्त न हो सके। धात्री के दूध पर ही पूर्णरूप से बालक का स्वास्थ्य निर्भर है। अतः धात्री का वमन विरेचन आदि के द्वारा शोधन आवश्यक है।

कषायपानैर्वमनैर्विरेकैः पथ्यभोजनैः। वाजीकरणसिद्धैश्च स्नेहः क्षीरं विशुध्यति ॥

अब दूषित स्तन्य (दूध) के शोधन के भिन्न २ उपाय लिखे जायेंगे। कषायपान, वमन, विरेचन, पथ्य (हितकारी) भोजन तथा वाजीकरण के लिये अथवा वाजीकरण ओषधियों से सिद्ध किये हुए स्नेहों के सेवन से धात्री का दूध शुद्ध होता है।

१० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् क्षीरोत्पत्त्यध्यायः १९ ]

त्रिफला सत्रिकटुका पाठा मधुरसा वचा । कोलचूर्णं त्वचो जम्ब्वा देवदारु च पेषितम् ।। सर्षपप्रसृतोन्मिश्रं पातव्यं क्षौद्रसंयुक्तम् । एतत् स्तन्यस्य दुष्टस्य श्रेष्ठं शोधनमुच्यते ।।

त्रिफला, त्रिकटु (सोंठ, मरिच, पीपल) पाठा, मधुरसा (मधुयष्टि अथवा द्राक्षा) वच, कोल (बेर) का चूर्ण, जामुन की छाल, देवदारु और सर्षप सब मिलाकर एक प्रसृत (८ तो.) चूर्ण मधु के साथ सेवन करना चाहिये । यह दूषित दुग्ध के लिये श्रेष्ठ शोधन है ।

वक्तव्य—८ तोले की मात्रा आजकल के अनुसार बहुत अधिक है । इसे समयानुसार रोगी के बल को देखकर कम किया जा सकता है ।

शृङ्गवेरपटोलाभ्यां पिप्पलीचूर्णचूर्णितम् । यूषपथ्यं विदध्याच्च ह्यन्नपानं च यल्लघु ।।

आर्द्रक तथा पटोलपत्र के रस से पिप्पलीचूर्ण का सेवन करना चाहिये तथा साथ में पथ्य के रूप में यूष और लघु अन्नपान का प्रयोग करना चाहिये ।

वक्तव्य—१८ गुने जल में मूंग आदि को पकाने से यूष सिद्ध होता है । कहा है—अष्टादशगुणे नीरे शिम्बीधान्यश्रृतो रसः । विरलान्नो घनः किञ्चित् पेयातो यूष उच्यते ।। अथवा—वैदलान् वितुषान् भृष्टान् चतुर्भागाम्बुसाधितान् । निष्पीड्य तोयमेतेषां संस्कृतं यूष उच्यते ।। यूष पेया से कुछ गाढ़ा होता है । इसीलिये कहा है—"यूषः किञ्चित् घनः स्मृतः" ।

धातकीपुष्पमेला च समङ्गा मरिचानि च । जम्बुत्वचं समधुकं क्षीरशोधनमुत्तमम् ।।

धाय के फूल, एला, मंजीठ, मरिच, जामुन की छाल तथा मुलहठी का चूर्ण उत्तम दुग्धशोधक होता है ।

नाडिका सगुडा सिद्धा हिङ्गुजातिसुसंस्कृता । क्षीरं मांभरसो मद्यं क्षीरवर्धनमुत्तमम् ।। वाजीकरणसिद्धं वा क्षीरं क्षीरविवर्धनम् । घृततैलोपसेवा च बस्तयश्च पयस्कराः ।।

नाडिका (कालशाक) को गुड के साथ सिद्ध करके उसे हींग तथा जायफल से सुसंस्कृत करे । यह सुसंस्कृत योग दूध, मांभरस, तथा मद्य अथवा वाजीकरण के निमित्त अथवा वाजीकरण ओषधियों से सिद्ध किया हुआ दूध, घृतसेवन, तैलसेवन, तथा बस्तियां सभी क्षीरवर्धक (दूध को बढ़ाने वाले) हैं ।

वक्तव्य—आगे "मधुराण्यन्नपानानि" द्वारा बहुत से क्षीरवर्धन के योग और दिये गये हैं । ये उपर्युक्त दो श्लोक भी यदि वहीं दिये जाते तो विषय को देखते हुए अधिक उपयुक्त होता । क्योंकि दुग्धशोधक प्रयोगों के बीच में ही दुग्धवर्धक योगों के दिये जाने से विषय में कुछ व्यासङ्ग हो जाता है ।

पाठा महौषधं दारु मूर्वामुस्तकवत्सकाः । सारिवारिष्टकटुकाः कैरातं त्रिफला बचा ।। गुडूची मधुकं द्राक्षा दशमूलं सदीपनम् । रक्षोघ्नश्च पटोलश्च गणः क्षीरविशोधनः ।। लाभतः क्वथितस्तेषां कषायः स तु सेवितः । क्षीरं शोधयति क्षिप्रं चिरव्यापन्नमप्युत ।।

पाठा, सोंठ, दारुहल्दी अथवा देवदारु, मूर्वा (मोरबेल), नागरमोथा, इन्द्रजौ, सारिवा, अरिष्ट (नीम), कटुकी, चिरायता, त्रिफला, बच, गिलोय, मुलहठी, द्राक्षा, दशमूल, दीपनीय द्रव्य, रक्षोघ्न (श्वेत सरसों) तथा पटोलादि गण की ओषधियां ये सभी दुग्ध के शोधक हैं । इनमें से जो २ द्रव्य प्राप्त हो सकें उनका कषाय बनाकर सेवन करने से चिरकालीन क्षीरदोष भी शीघ्र ही दूर हो जाते हैं ।

वक्तव्य—स्तन्यशोधक—चरक में निम्न १० स्तन्यशोधक ओषधियां दी हैं—पाठामहौषधसुरदारुमुस्तमूर्वागुडूचीवत्सक-फलकिराततिक्तकटुरोहिणीसारिवाकषायाणां च पानं प्रशस्यते । तथाऽन्येषां तिक्तकषायकटुकमधुराणां द्रव्याणां प्रयोगः

क्षीरोत्पत्त्यध्यायः १९ ] सूत्रस्थानम् ११

क्षीरविकारविशेषानभिसमीक्ष्य मात्रां कालं चेति क्षीरविशोधनानि। इसी प्रकार सुश्रुत. सू. अ. ३८ में स्तन्यशोधन के लिये वचादि, हरिद्रादि तथा मुस्तादि तीन गण दिये हैं—वचामुस्तातिविषाभभयाभद्रदारूणि नागकेशरं चेति। हरिद्रादारुहरिद्राकलशीकुटजबीजानि मधुकं चेति ॥ एतौ वचाहरिद्रादी गणौ स्तन्यविशोधनौ। मुस्ताहरिद्रादारुहरिद्रा-हरीतक्यामलकविभीतककुष्ठहैमवतीवचापाठाकटुरोहिणीशार्ङ्गेष्टातिविषाद्राविडीभल्लातकानि चित्रकश्चेति। एष मुस्त्रादिको नाम्ना गणः श्लेष्मविपूदनः । योनिदोषहरः स्तन्यशोधनः पाचनस्तथा ॥

पटोलादि गण—सुश्रुत सू. अ. ३८ में कहा है—पटोलचन्दनकुचन्दन मूर्वा गुडूची पाठा कटुरोहिणी चेति।

सक्षौद्रः कफसंसृष्टे सघृतः शेषयोर्भवेत् । नेत्येके श्लेष्मणः स्थानात् क्षीरं हि कफसंभवम् ॥

उपर्युक्त कषाय कफ से दूषित हुए दूध के लिये मधु के साथ तथा शेष दोनों (वात तथा पित्त) से दूषित में घृत के साथ देना चाहिये। कुछ विद्वानों का मत है कि इसे घृत के साथ नहीं देना चाहिये क्योंकि घृत श्लेष्मा (कफ) का स्थान है तथा दुग्ध कफ से उत्पन्न हुआ है।

मसूरः षष्टिका मुद्गाः कुलत्थाः शालयो घृतम् । गव्यमाजं पयः काले लवणं चाप्यनौद्भिदम् ।। आहारविधिरुद्दिष्टः स्तन्यशोधनकालिकः । गुर्वन्नस्नेहमांसानि दिवास्वप्नं च वर्जयेत् ।।

दुग्ध शोधन काल में मसूर, षष्टिक (सांठी के चावल), मूंग, कुलथी, शालि चावल, घृत, गोदुग्ध, अजादुग्ध और अनौद्भिद (कृत्रिम) लवण आदि आहार का सेवन करना चाहिये तथा गुरु अन्न, स्निग्ध द्रव्य, मांस एवं दिवास्वप्न का त्याग कर देना चाहिये।

वक्तव्य—चरक शा. अ. ८ में क्षीरशोधन काल में निम्न आहार विधि दी गई है—पानाशनविधिस्तु दुष्टक्षीराया यवगोधूमशालिषष्टिकमुद्गहरेणुककुलत्थसुरासौवीरकतुषोदकमैरेयमेदकलशुनकरञ्जप्रायः स्यात्, क्षीरदोषविशेषांश्चावेक्ष्यावेक्ष्य तत्तद्विधानं कार्यं स्यात् ।। यव गोधूम आदि के सेवन के साथ २ दूध के दोषों की परीक्षा करके उन २ दोषों के अनुसार ही अन्नपान के उस २ विधान का पालन करना चाहिये।

शोधनाद्वा स्वभावाद्व्वा यस्याः क्षीरं विशुष्यति । तस्याः क्षीरप्रजनने प्रयतेत विचक्षणः ।।

विद्वान् वैद्य को चाहिये कि उपर्युक्त शोधनों द्वारा अथवा स्वभाव से ही जिस स्त्री का दूध सूख जाता है उसके क्षीरजनन (दुग्धवृद्धि) का प्रयत्न करे।

मधुराण्यन्नपानानि द्रवाणि लवणानि च । मद्यानि सीधुवर्ज्यानि शाकं सिद्धार्थकादृते ।। वराहमहिषादूर्ध्वं मांसानां च रसो हितः । लशुनानां पलाण्डूनां सेवनं शयनं सुखम् ।। (क्रोधाध्व) भयशोकानामायासानां च वर्जनम् । अ....या भवति वत्स इति क्षीरविवर्धनम्¹ ।।

आगे दुग्धवृद्धि के लिये बहुत से प्रयोग दिये गये हैं। मधुर अन्नपान, द्रवपदार्थ, लवण, सीधुरहित मद्य, सिद्धार्थक (श्वेत सरसों) से भिन्न शाक, सूअर तथा महिष (भैंसे) को छोड़कर अन्य पशुओं का मांसरस, लशुन, पलाण्डु सुखपूर्वक शयन करना, क्रोध, मार्गगमन, भय, शोक तथा अन्य परिश्रम के कार्यों का परित्याग-दुग्धरहित स्त्री के लिये सभी क्षीरवर्धक उपाय हैं।

वक्तव्य—सीधु-गन्ने के रस से बनाई हुई मद्य (Spirit distilled from sugar cane juice) को सीधु कहते हैं। यह पक्व एवं अपक्व भेद से दो प्रकार की होती है। भावप्रकाश में कहा है—इक्षोः पक्ववैः रसैः सिद्धः सीधुः पक्वरसश्च


१. अपया या भवेत्तस्या एतत् क्षीरविवर्धनम्, इति पाठश्चेत् साधु ।

१२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् क्षीरोत्पत्त्यध्यायः १९ ]


स। आमैस्तैरैव यः सीधुः स च शीतरसः स्मृतः ॥ इसी प्रकार शार्ङ्गधर संहिता में भी कहा है—ज्ञेयः शीतरसश्शीधुरपक्वमधुरद्रवैः । सिद्धः पक्वरसश्शीधुरसपक्वमधुरद्रवैः ॥

वटादीनां च वृक्षाणां क्षीरिकायाश्च वल्कलम् । पाक्यः कषायः क्वथितः क्षीरं तेन पुनः शृतम् ॥ पाक्यं गुडविडोपेतं सघृतं शालिमाशयेत् । अपि शुष्कस्तनीनां तत् क्षीरोपजननं परम् ॥

वटादि वृक्ष एवं क्षीरी वृक्षों की छाल का क्वाथ बनाकर उसमें यवक्षार डालें। अब इसमें क्षीर (दूध) डालकर पुनः पकाया जाय। इसमें पाक्य (पांशुलवण या सौवर्चल लवण), गुड, विडलवण और घृत मिलाकर शालि चावलों का सेवन करने से शुष्कस्तनी (जिनका दूध सूख गया है) स्त्रियों के भी दूध आ जाता है ।

शालिषष्टिकदर्भाणां कुशगुन्द्रेत्कटस्य च । सारिवावीरणेक्षूणां मूलानि कुशकाशयोः ॥ पेयानि पूर्वकल्पेन श्रेष्ठं क्षीरविवर्धनम् । स्वभावनष्टे शुष्के वा दुष्टे साध्वीक्षिते हितम् ॥

इसी प्रकार शालिधान्य, षष्टिक-धान्य, दर्भ, कुश, गुन्द्रा (जलज दर्भ), इत्कट (तृण भेद अथवा शर) सारिवा, वीरण (खस) इक्षु, कुश तथा काश की जड़ें लेकर उनके साथ दुग्ध का संस्कार करके पूर्वोक्तानुसार क्वाथ बनाकर सेवन करना दूध के बढ़ाने का श्रेष्ठ उपाय माना गया है । उपर्युक्त प्रयोगों से स्वभाव से ही नष्ट, शुष्क अथवा दृष्टि दोष (नजर लगने) से दूषित हुआ दुग्ध पुनः शुद्ध रूप में प्रवृत्त होने लगता है ।

वक्तव्यक्षीरीवृक्ष—न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थपारीषप्लक्षपादपाः । चरक शा. अ. ८ में दुग्धवर्धक ओषधियां निम्न दी हैं—क्षीरजननानि तु मद्यानि सीधुवर्ज्यानि ग्राम्यानूपौदकानि च शाकधान्यमांसानि द्रवमधुराम्लभूयिष्ठाश्चाहाराः क्षीरिण्यश्चौषधयः क्षीरपानं चानायासश्चेति, वीरणशालिषष्टिकेश्क्षुवालिका दर्भकुशकाशगुन्द्रेत्कटमूलकषायाणां च पानमिति क्षीरजननान्युक्तानि । इसी प्रकार सुश्रुत शा. अ. १० में कहा है—क्रोधशोकावात्सल्यादिभिश्च स्त्रियाः स्तन्यनाशो भवति । अथास्याः क्षीरजननार्थं सौमनस्यमुत्पाद्य यवगोधूमशालिषष्टिकमांसरससुरासौवीरकपपिण्याकलशुनमत्स्यकसेरुकशृङ्गाटकबिसविदारीकन्दमधुकशताव- रीनलिकालाबूकालशाकप्रभृतीनि विदध्यात् ।। घोष के मैटिरिया मैडिका में लिखा है—An injection of placental extract increases the secretion of milk, so does pituitary extract. The secretion of milk is also influenced by various other factors and reflexes. It is possible that the nerve supply of the mammary glands is different from other glands. Thus pilocarpin, which increases the secretion of other glands, has no effect on the secretion of milk. Prolactin preparations have been used to increase secretion of milk. Urea is supposed to be a true galactagog. पाश्चात्य चिकित्सा विज्ञान में Placente extract, Pituitary extract तथा Urea मुख्य रूप से दुग्ध-वर्धक ओषधियां मानी गई हैं । स्तन्यवर्धन के लिये उपर्युक्त सब ओषधियां प्रयोग में लाई जाती हैं परन्तु वास्तव में स्तन्यप्रवृत्ति का मुख्य कारण (Factor) मानसिक है अर्थात् माता या धात्री का बालक के प्रति प्रेम या आकर्षण मुख्य कारण है । यदि धात्री को बालक के प्रति प्रेम या आकर्षण नहीं है तो उपर्युक्त सब उपाय लगभग व्यर्थ सिद्ध होते हैं । इसलिये सुश्रुत के निदान स्थान अ. १० में कहा है कि शुक्र प्रवृत्ति के समान स्तन्यप्रवृत्ति भी मानसिक भावों पर आश्रित है—आहाररसयोनित्वादेवं स्तन्यमपि स्त्रियाः । तदेवापत्य संस्पर्शाद् दर्शनात् स्मरणादपि ॥ ग्रहणाच्च शरीरस्य शुक्रवत्संप्रवर्तते ॥ स्नेहो निरन्तरस्तत्र प्रस्त्रवे हेतुरुच्यते ॥ जब माता प्रेम से बालक को देखती है अथवा उसे गोद में उठाती है तब उसके स्तनों की ओर रक्त का प्रवाह बढ़कर उनसे दुग्ध का स्त्राव होने लगता है ।

अव्याहतबलाङ्गायुररोगो वर्धते सुखम् । शिशुधात्र्योरनापत्तिः शुद्धक्षीरस्य लक्षणम् ॥

क्षीरोत्पत्त्यध्यायः १९] सूत्रस्थानम् ९३

शुद्ध क्षीर के लक्षण—बालक के बल, अङ्ग तथा आयु अव्याहत (निर्बाध) हों, वह रोगों से रहित (स्वस्थ) होकर सुख पूर्वक वृद्धि को प्राप्त होता हो तथा शिशु एवं धात्री को कोई कष्ट न हो तो दूध को शुद्ध समझना चाहिये।

वक्तव्य—चरक शा. अ. ८ में शुद्ध स्तन्य के निम्न भौतिक गुण दिये हैं—प्रकृतवर्णगन्धरसस्पर्शमुदपात्रे दुह्यमानमुदकं व्येति, प्रकृतिभूतत्वात्, तत्पुष्टिकरोमारोग्यकरञ्चेति स्तन्यसम्पत्। जिसका वर्ण गन्ध, रस तथा स्पर्श स्वाभाविक हों और जो जलयुक्त पात्र में दुहा जाने पर जल के साथ मिलकर एक हो जाय वह दूध शुद्ध होता है। इसी प्रकार सुश्रुत शा. अ. १० में भी कहा है—अथास्याः स्तन्यमप्सु परीक्षेत, तच्चेच्छीतलममलं तनु शङ्खावभासमप्सु न्यस्तमेकाभावं गच्छत्यफेनिलमतन्तुमन्नोत्प्लवते न सीदति वा तच्छुद्धमिति विद्यात्। तेन कुमारस्यारोग्यं शरीरोपचयो बलवृद्धिश्च भवति। यही लक्षण सुश्रुत निदान स्थान में भी दिया है—यत्क्षीरमुदके क्षिप्तमेकीभवति पाण्डुरम्। मधुरं चाविवर्णं च प्रसन्नं तद्विनिर्दिशेत्॥

संभवन्ति महारोगा अशुद्धक्षीरसेवनात्। तेषामेवोपशान्तिस्तु शुद्धक्षीरनिषेवणात् ।।

अशुद्ध दूध के सेवन से बालक को कई बड़े २ रोग हो जाते हैं। शुद्ध दूध के सेवन से वे ही रोग शान्त हो जाते हैं। अर्थात् शिशु दूध पर ही आश्रित होता है। यदि दूध दोष-युक्त होगा तो उसे अनेक प्रकार के रोग हो जायेंगे। यदि दूध शुद्ध होगा तो सब रोग शान्त हो जाते हैं।

तृणं कीटं तुषं शूकं मक्षिकाऽङ्गमलाष्टकम् (ङ्गानि लोष्टकः)।
केशोर्णास्थ्यादिकं विद्याद्वज्रमित्युपचारतः ।।

वज्र का लक्षण—तृण, कीट (कीड़े) तुष (धान के छिलके) शूक (ऊर्णादि भक्षक कीट), मक्खियों के शरीर के अवयव तथा लोष्ठ (पत्थर), केश, इन तथा अस्थि आदि ये सब उपचार से वज्र कहलाते हैं।

सहान्नपानेन यदा धात्री वज्रं समश्नुते। पच्यमानेन पाकेन ह्यन्नत्वान्न पच्यते ।।
अपच्यमानं विक्किन्नं वायुना समुदीरितम्। रसेन सह संपृक्तं याति स्तन्यवहाः सिराः ।।
सर्वस्रोतांसि हि स्त्रीणां विवृतानि विशेषतः। तत् पयोधरमासाद्य क्षिप्रं विकुरुते स्त्रियाः ।।

स्तनरोगों का कारण—जब धात्री अन्नपान (खाने पीने) के साथ 'वज्र' को खाजाती है तो वह वज्र अन्न न होने से (foreign body होने से) पच्यमानावस्था अथवा पाकावस्था में नहीं पचता है। न पचा हुआ वह 'वज्र' क्लेद को प्राप्त हुआ २ वायु से धकेला जाकर रस के साथ मिलकर स्तन्यवहा शिरा (mammary ducts) में पहुँच जाता है। इससे स्त्रियों के सब स्रोत बन्द हो जाते हैं इस प्रकार वह स्त्री के स्तनों में पहुंचकर शीघ्र ही विकार उत्पन्न करता है। अर्थात् जब स्त्री किसी ऐसे विजातीय द्रव्य का सेवन कर लेती है जो वास्तव में शरीर के लिये सात्म्य न हो तब वह विजातीय द्रव्य (foreign body) होने से शरीर में पचता नहीं है तथा वह रसवाहिनी स्रोतों के मार्ग बन्द कर देता है। इस प्रकार वह मल स्तनों में पहुंचकर विकार उत्पन्न कर देता है।

रूपाणि पीतवज्रायाः प्रवक्ष्याम्यत उत्तरम्। अजीर्णमरतिग्लानिर्निमित्तं व्यथाऽरुचिः ।।
पर्वभेदोऽङ्गमर्दश्च शिरोरुग् द(क्ष) वथुग्रहः। कफोत्क्लेदो ज्वरस्तृष्णा विड्भेदो मूत्रसंग्रहः ।।
स्तम्भः स्रावश्च कुचयोः सिराजालने संतः। शोथशूलरुजादाहैः स्तनः स्प्रष्टुं न शक्यते ।।
स्तनकीलकमित्याहुर्भिषजस्तं विचक्षणाः। कीलवत् कठिनोऽङ्गेषु बाधमानो हि तिष्ठति ।।

अब मैं 'पीतवज्रा' (जिसने बज्र का सेवन कर लिया है) स्त्री के लक्षणों का वर्णन करूँगा। पीतवज्रा के लक्षण—उस स्त्री को अजीर्ण, अरति, ग्लानि, बिना कारण के शरीर में पीडा, अरुचि, पर्वभेद (सन्धियों में पीडा), अङ्गमर्द,

१४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् क्षीरोत्पत्त्यध्यायः १९ ]

शिरःशूल, दवथु (आंखों में जलन अथवा श्वथु-छींक), अङ्गग्रहकफोत्क्लेद (कफ के कारण जी मचलाना) ज्वर, तृष्णा, विड्भेद (अतिसार), मूत्र की रुकावट, स्तनों में स्तम्भ (अकड़ान) स्त्राव (Discharge) होते हैं और चारों ओर शिराओं का जाल (Veinulas) दिखाई देता है । तथा शोथ (Inflamation), शूल (Pain), रुजा (स्पर्शाक्षमता Tenderness) तथा दाह (Burning senation) के कारण स्तन का स्पर्श नहीं किया जा सकता । बुद्धिमान चिकित्सक इसे स्तनकीलक (स्तनविद्रधि-Mammary abscess) कहते हैं । इसका यह नाम इस लिये है कि यह कील की तरह कठिन होकर अङ्गों में बाधा पहुँचाता हुआ विद्यमान रहता है ।

एष पित्तात्मना शीघ्रं पाकं भेदं च गच्छति ।
कफाच्चिरं क्लेशयति वातादाशु निवर्तते (विवर्धते) ।।
शाखाशिरोभिस्तु यदि विमार्गान्न प्रपद्यते । आकृष्यमाणं बालेन क्षिप्रं निर्धावति स्तनात् ।।
निर्दुह्यमानमुत्पीडाद्वज्रं सक्षीरशोणितम् । अथवाऽभ्येति सहसा प्रत्यक्षं चोपलभ्यते ।।

यदि पित्त की अधिकता हो तो यह स्तन कीलक (Mammary Abscess) शीघ्र ही पक जाता है तथा पककर फूट जाता है । कफ के कारण यह चिरकाल तक कष्ट देता है तथा वायु के कारण शीघ्र ही बढ़ जाता है । बालक के द्वारा स्तनपान के समय आकृष्ट होता (चूसा जाता) हुआ यदि वह शाखा तथा शिर आदि के द्वारा विपरीत मार्गों में न चला जाय तो स्तन के द्वारा शीघ्र ही बाहर निकल जाता है । अथवा यदि उत्पीडन करके (दबाकर) दोहन किया जाय तो वह 'वज्र' दुग्ध तथा रक्त के साथ सहसा प्रत्यक्ष रूप से बाहर निकल आता है ।

वक्तव्य—आधुनिक विज्ञान के अनुसार स्तनकीलक को Mammary Abscess या Abscess of the Breast कहा जा सकता है जो बढ़कर Cancer का रूप धारण कर सकता है । यह स्तनकीलक या अन्य कोई भी स्तनरोग साधारणतया गर्भवती या प्रजाता स्त्रियों को ही प्रायः होता है । सुश्रुत संहिता के निदान स्थान में स्तन रोगों का वर्णन करते हुए कहा है—धमन्यः संवृतद्वारा कन्यानां स्तनसंश्रिताः । दोषाविसरणात्तासां न भवन्ति स्तनामयाः ।। तासामेव प्रजातानां गर्भिणीनां च ताः पुनः । स्वभावदेव विवृता जायन्ते संभवन्त्यतः ।। सक्षीरौ वाऽप्यदुग्धौ वा प्राप्य दोषः स्तनौ स्त्रियाः । रक्तं मांसं च संदूष्य स्तनरोगाय कल्पते ।। प्रसव या गर्भावस्था से पूर्व स्त्रियों में स्तन-संश्रित दुग्धवह स्रोतस् (Lacteals) संकुचित होते हैं अतः उनमें दोषों का प्रवेश नहीं हो सकता है । गर्भावस्था में या प्रसव के बाद वे स्वयमेव विस्तृत हो जाती है इसलिये उनमें स्तनरोग होने की संभावना प्रायः बनी रहती है ।

घृतपानं प्रथमतः शस्यते स्तनकीलके । स्रोतांसि मार्दवं स्नेहाद्यान्ति वज्रं च च्याव्यते ।।
निर्दोहो मर्दनं युक्त्या पायनं च गलेन च ।
(इति ताडपत्रपुस्तके ३३ तमं पत्रम् ।)
शीताः सेकाः प्रलेपाश्च विरेकः पथ्यभोजनम् ।।
स्त्रावणं चाविदग्धस्य दोषदेहव्यपेक्षया । स्य पाटनं कुर्यान्मृजां विद्रधिवच्च तत् ।।

स्तनकीलक की चिकित्सा—स्तनकीलक की चिकित्सा में सर्व प्रथम घृतपान कराना चाहिये । इस प्रकार स्नेह से स्रोत मृदु हो जाते हैं तथा 'वज्र' निकल जाता है । इसके लिये युक्ति पूर्वक रोहन (दूध निकाल देना) मर्दन, तथा गले (मुंह) से ओषधि का पान कराना चाहिये । फिर शीतसेक (Cold Compress) प्रलेप, विरेचन तथा पथ्य भोजन देना चाहिये । दोष तथा शरीर (इन दोनों के बल) को दृष्टि में रखते हुए अविदग्ध (अपक्व) विकार का स्त्रावण करना चाहिये और पके हुए का विद्रधि की तरह पाटन (Open or Incision) करना चाहिये ।

CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

दन्तजन्मिकाध्यायः २०] सूत्रस्थानम् १५

परवृद्धितभोक्त्री च परालालिततर्पणा । परवेश्मरता धात्री मुच्यते स्तनकीलकात् ।।

जो धात्री दूसरे के यहां हितकारक (पथ्य) भोजन करती है, दूसरे के यहां जिसका लालन पालन (पोषण) एवं तर्पण होता है, तथा जो दूसरे के घर में रहती है—वह स्तनकीलक नामक रोग से मुक्त हो जाती है। अर्थात् उपर्युक्त प्रकार की धात्री को स्तनकीलक नामक रोग नहीं होते हैं।

दर्शनीयौ स्तनौ पीनौ सुजातौ संहतौ समौ ।
सुकरौ पर्यकीलौ च दृष्ट्वा त्वीक्ष(त्विच्छ)न्ति दुर्हृदः ।।
ततो रुजामवाप्नोति कार्यं तन्त्रावचारणम् ।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।
इति क्षीरोत्पत्तिर्नामाध्याय ऊनविंशतितमः ॥१९॥


जिस माता या धात्री के स्तन दर्शनीय (सुन्दर) मोटे, सुन्दर आकृति वाले, उत्तम संघात वाले हों तथा दोनों स्तन आकार में समान, सुन्दर और आगे से गोल, घुण्डीदार होते हैं, उन्हें देखकर दुष्ट जन ईर्ष्या करते हैं (अर्थात् उनकी नज़र लग जाती है)। इससे धात्री या माता रुग्ण हो जाती है। इसमें तान्त्रिक प्रक्रियाओं का प्रयोग करना चाहिये।

परिहृत्याममांसं तु निशि नेयं चतुष्पथम् ।।
एतच्छ्रुत्वा वचस्तथ्यमृषिपत्न्यः प्रहर्षिताः । प्रशंसुर्महात्मानं कश्यपं लोकपूजितम् ।।

उस स्त्री को कच्चा मांस काटकर रात्रि को चौराहे पर ले जाना चाहिये। इस तथ्य वचन को सुनकर ऋषि पत्निय बहुत प्रसन्न हुई तथा लोक पूजित महात्मा कश्यप की प्रशंसा की। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।

इति क्षीरोत्पत्तिर्नामाध्याय ऊनविंशतितमः ॥१९॥


विंशतितमोऽध्यायः

अथातो दन्तजन्मिकमध्यायं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।

अब हम दन्तजन्मिक (दांतो की उत्पत्ति का जिसमें वर्णन हो) अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।

अथ खलु भगवन् देहिनां जातानामभिवर्धमानानां कतिषु मासेषु दन्ता निषिच्यन्ते, निषिक्ताश्च कियता कालेन मूर्तीभवन्ति, मूर्तीभूताश्च कदोद्भिद्यन्ते, कानि चैषां पूर्वरूपाणि, के चोपद्रवाः, कश्चैषामुपक्रमः, किञ्च दन्तजन्म प्रशस्तमप्रशस्तं च किं, कस्माच्च स्वमङ्गमभिवर्धमानं प्राणसंशयाय भवति, कियन्तश्च दन्ताः, कतिचैषां द्विजाः, कियता च कालेन पतन्ति, पतिता वा जायन्ते, दन्तसंपदसंपच्च कीदृशीति ।।३।।

भगवन् ! प्राणियों के उत्पन्न होकर बढ़ते हुये कितने मासों में दांतों का निषेचन होता है (अर्थात् मसूड़ों के अन्दर दांत बैठते हैं), निषेचन के कितने समय बाद वे मूर्तरूप धारण करते हैं, मूर्तरूप होने के बाद कब प्रकट होते (फूटते) हैं, दांतों के निकलने के क्या पूर्वरूप होते हैं, दन्तोद्भेद के समय क्या २ उपद्रव होते हैं, इन उपद्रवों की क्या चिकित्सा

२४ का.सं.

१६काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्दन्तजन्मिकाध्यायः २०]

है, कौनसी दन्तोत्पत्ति प्रशस्त तथा कौनसी अप्रशस्त मानी गई है, तथा क्यों दांत अपने निश्चित परिमाण से अधिक बढ़कर प्राणों के लिये भय (संकट) उत्पन्न कर देता है, दांतों की संख्या कितनी होती है, इनमें से द्विज (दो बार होने वाले) कितने हैं, ये कितने समय में गिरते हैं तथा गिरकर पुनः निकल आते हैं, कौन से दन्तसंपत् तथा कौन से असंपत् होते हैं।

अथोवाच भगवान् कश्यपः–इह खलु नृणां द्वात्रिंशद्दन्ताः, तत्राष्टौ सकृज्जाताः स्वरूढदन्ता भवन्ति, अतः शेषा द्विजाः। यावत्स्वेव च मासेषु दन्ता निषिच्यन्ते तावत्स्वहःसूद्भिद्यन्ते। यावत्स्वेव च मासेषु जातस्य सत उद्भिद्यन्ते तावत्स्वेवे च वर्षेषु पतिताः पुनरुद्भिद्यन्ते। तत्र मध्ये द्वावुत्तरौ राजदन्तसंज्ञौ भवतः, तौ पवित्रौ, तस्मात्ताभ्यां खण्डे न श्राद्धमर्हति, अपवित्रो हि सः। तयोरुभयतः पार्श्वयोरपि वस्त्रौ(?), तयोरपि दंष्ट्रे, शेषाः स्वरूढा हानव्या इति चोच्यन्ते; तथाऽधस्तात् ।।४।।

भगवान् कश्यप ने उत्तर दिया—मनुष्यों के ३२ दांत होते हैं, इनमें आठ सकृज्जात (केवल एक वार उत्पन्न होने वाले) तथा उसी अपने स्वरूप में ही बढ़ने वाले होते हैं। शेष (२४) द्विज¹ हैं। जितने मास में दांतो का निषेचन होता है उतने ही दिनों में वे फूट आते हैं (अर्थात् यदि चार मास में दांत निषिक्त होते हैं तो चार दिन में वे फूटकर बाहर निकल आते हैं) और बच्चे के उत्पन्न होने के बाद जितने मास में दांत फूटते (निकलते) हैं उतने ही वर्षों में गिरकर वे पुनः निकल आते हैं (अर्थात् यदि छठे मास में दांत निकलते हों तो वे छठे वर्ष में गिरकर पुनः [स्थायी दांत] निकल आते हैं)। ऊपर की पंक्ति में बीच के दो दांतों का नाम राजदन्त (मध्य त्रोटक-Central Incisers) होता है, उनको पवित्र माना गया है, इसलिये उनके खण्डित हो जाने पर मनुष्य श्राद्ध के योग्य नहीं रहता अर्थात् वह किसी का श्राद्ध नहीं कर सकता है, क्योंकि वह अपवित्र हो जाता है। उन दोनों (राजदन्त) के पार्श्व में दोनों ओर वस्त्र (Lateral Incisers) होते हैं, और इनके दोनों ओर दंष्ट्रा (शीवनकीलक, Canine या Eye teeth) होते हैं। (इस प्रकार ये ६ हुए) शेष स्वरूढ (अपने उसी स्वरूप में बढ़ने वाले) हानव्य अर्थात् हनुप्रदेश में होने वाले (चर्वण दन्त—Bicuspids or molars) कहाते हैं (अर्थात् ये १० हुवे) इसी प्रकार नीचे की पंक्ति में भी समझना चाहिये (अर्थात् २० हानव्य और १२ शेष हुवे इस प्रकार कुल ३२ दांत होते हैं)।

वक्तव्य—आधुनिक मतानुसार भी दन्तोद्भेद दो प्रकार का माना गया है। (१) बाल्यावस्था (Infancy) में तथा (२) किशोरावस्था (Childhood) में। दांतो के प्रथम समुदाय (Set) को “दूध के दांत” (Milk teeth या Primary Dentition) कहते हैं तथा दूसरे को “स्थायी दांत” (Secondary Dentition) कहते हैं।

प्रथम समुदाय के दांत (दूध के दांत) बच्चे के उत्पन्न होने के कई मास पूर्व मसूड़ों के अन्दर बीज रूप से (Germs) विद्यमान होते हैं। धीरे २ उनमें अस्थिनिर्माण (Ossification) प्रारंभ होता है तथा दांतों की आकृति बनकर बढ़ते हुवे मसूड़ों को विदीर्ण करके बाहर फूट आते हैं। इसी को हम दन्तोद्भेद या Teething कहते हैं। इस संहिता के उपर्युक्त प्रकरण में इन्हीं तीनों अवस्थाओं के लिये क्रमशः निषिक्त, मूर्तिमान् तथा उद्भेदन शब्द दिये गये हैं। इस विषय में Birch की Management and medical treatment of children in India नामक पुस्तक के ७५ पृष्ठ पर लिखा है—The germs of the first (milk or temporary) set have existed within the jaw for Several months before birth, but they are at no time covered with true bone, As ossification advances, the tooth rises and pressing upwards causes absorption of its


१. द्विज=(द्विजायन्ते-दो बार उगने वाले) अर्थात् दूध के दांत-Milk teeth, क्योंकि दूध के दांत एक बार गिर कर दोबारा उगते हैं।

दन्तजन्मिकाध्यायः २०] सूत्रस्थानम् १७

capsule and the gum, till by their removal the tooth makes its appearance. This upward progress, in its later stages, is what we mean when we talk of ''teething''

दूध के दांत निम्न क्रम से निकलते हैं—

१. निचले मध्य के त्रोटक (Lower central Incisers) ५ से दस मास २. ऊपर के चारों त्रोटक (upper central & lateral Incisers) ८ से १२ मास ३. निचले पार्श्व के त्रोटक (Incisers) तथा निचले और ऊपर के प्रथम चर्वण (Ist molars) १२ से १४ मास ४. निचले तथा ऊपर के शीवन या कीलक (Canine या Eye teeth) १६ से २२ मास ५. निचले तथा ऊपर के दूसरे चर्वण (2nd molars) २४ से ३० मास

इस प्रकार इन २० दांतों के निकलने के साथ २-१/२ वर्ष की अवस्था तक प्रथम दन्तोद्भेद (Primary Dentition) पूर्ण हो जाता है। इसके बाद दांतों का दूसरा समुदाय (स्थायी दांत या Secondary Dentition) प्रारंभ होता है। प्रथम समुदाय के दांतों के समान दूसरे समुदाय के दांत भी जन्म से पूर्व ही मसूड़ों में बीजरूप से स्थित होते हैं परन्तु ये प्रथम की अपेक्षा भी अधिक गहरे होते हैं। Birch की पूर्वोक्त पुस्तक में ही आगे लिखा है—Strange as it may appear, the germs of the second set also existed in the jaw before birth, more deeply seated than those of the milk teeth.

स्थायी दांत निम्न क्रम से निकलते हैं—

१. प्रथम पश्चात्-चर्वण या त्रिमूली (1 st. molars)—५ से ७ वर्ष २. मध्य के त्रोटक (Central Incisers)—६-१/२ से ८ वर्ष ३. पार्श्व के त्रोटक (Lateral Incisers)—७ से ९ वर्ष ४. प्रथम चर्वण या द्विमूली (1 st. Bicuspids)—९ से ११ वर्ष ५. द्वितीय चर्वण या द्विमूली (2 nd. Bicuspids)—१० से १२ वर्ष ६. शीवन या कीलक (Canines or Eye teeth)—११ से १४ वर्ष ७. द्वितीय पश्चात् चर्वण या त्रिमूली (2 nd. molars)—११ से १४ वर्ष ८. तृतीय पश्चात् या चर्वण या त्रिमूली या ज्ञानदन्त (3 rd. molars or wisdom teeth)—१६ से २१ वर्ष या उससे भी बाद में।

इस प्रकार ज्ञानदन्त (Wisdom teeth) के निकालने के साथ-साथ दांतों की ३२ संख्या पूरी हो जाती है तथा दन्तोद्भेद का कार्य भी पूर्ण हो जाता है।

तत्र कुमारीणामाशूतरमल्पाबाधकरं च दन्तजन्म, सुषिरत्वादंशानां मृदुस्वभावाच्च; प्रकृष्टकालमाबाधाबहुलं तु कुमाराणामाचक्षते, घनत्वादंशानां स्थिरस्वभावाच्च। दन्तानां निषेकमूर्त्तित्वोद्भेदवृद्धिपतनपुनर्भावनिवृत्ति-स्थितिपरिक्षयचलनपतनदृढ़दुर्बलता जातिविशेषात्निषेकात् स्वभावान्मातापित्रोरनुकरणात् स्वकर्मविशेषाच्चेत्याचक्षते महर्षयः; तथाऽन्येऽपि शरीरवृद्धिह्रासगुणदोषप्रादुर्भावाः ॥५॥

लड़कियों के दांत जल्दी निकलते हैं तथा कष्ट भी कम होता है क्योंकि उनके दांत सुषिर (सच्छिद्र) एवं मृदु होते हैं। लड़कों के दांत देर में निकलते हैं तथा कष्ट भी अधिक होता है क्योंकि उनके दांत घन (ठोस) तथा स्थिर (दृढ़) होते हैं। दांतों का निषेक, मूर्तरूप होना, प्रकट होना, वृद्धि, पतन (गिरना) गिरकर पुनः न निकलना, स्थिर रहना (जमे रहना), क्षीण होना हिलना, गिरना, दृढ़ता, एवं दुर्बलता इन सब बातों में जाति की विशेषता, निषेक, स्वभाव, माता-

१८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् दन्तजन्मिकाध्यायः २०]

पिता का अनुकरण (Hereditary) तथा अपने प्राक्तन कर्मों की अपेक्षा होती है ऐसा प्राचीन महर्षि कहते हैं, तथा अन्य भी शरीर की वृद्धि ह्रास, गुण, दोष उत्पन्न होते हैं।

वक्तव्य—Dr. Donald Paterson अपनी पुस्तक “Sick children” के १४ पृष्ठ पर इस विषय में लिखते हैं कि—“Many abnormalities in the appearance of teeth and the type teeth cut will appear to be hereditary and there can be no doubt that good teeth run in families” अर्थात् दांतों के बहुत से विकार तथा उनके निकलने के बहुत से विकृत तरीके आनुवंशिक प्रतीत होते हैं। सुन्दर दांत निःसन्देह एक पारिवारिक देन है। अर्थात् यदि माता पिता के दांत अच्छे होते हैं तो प्रायः सन्तति के दांत भी अच्छे होते हैं।

नृणां तु चतुर्थादिषु मासेषु दन्ता निषिच्यन्ते। तत्र सदन्तजन्म च, पूर्वमुत्तरदन्तजन्म च, विरलदन्तजन्म च, हीनदन्तता च, अधिकदन्तता च, करालदन्तता च, विवर्णदन्तता च, स्फुटितदन्तता चामङ्गल्या भवति। तत्र शान्त्यर्थं मारुतीमिष्टिं निर्वपेत्, स्थालीपाकमनाहिताग्नेः प्राजापत्यमित्येके, तथाऽन्येष्वपि स्वाङ्गोनाधिकभावेषु, तथा तद्घोरं प्रशाम्यति ॥६॥

पुरुषों के चौथे मास में दांत निषिक्त हो जाते हैं। सदन्तजन्य (दांतों से सहित जन्य), पहले ऊपर के दांतों का निकलना (साधारणतया सबसे पहले निचले तथा मध्य के त्रोटक Incisers निकलने चाहिये), दांतों का विरल (दूर २—Scattered) होना, दांतों का कम होना, दांतों की संख्या अधिक होना, दांतों का कराल¹—भयंकर (लम्बे) होना, दांतों का मैला होना, तथा दांतों का स्फुटित होना (खिरना) अदि ये सब अशुभ माने गये हैं। इनकी शान्ति के लिये मारुती इष्टि (यज्ञ) करे। कुछ लोग कहते हैं कि अनाहिताग्नि पुरुषों की स्थालीपाक (पुरोडाश) प्रजापत्य इष्टि से करे। इसी प्रकार अन्य अङ्गों के कम या अधिक होने पर ऐसा ही करे जिससे वह अनिष्ट शान्त हो जाता है।

चतुर्विधं तु दन्तजन्माचक्षते सामुद्रं, संवृतं, विवृतं, दन्तसंपदिति। तत्र सामुद्रं क्षयि, नित्यसंपातात्, संवृतमधन्यं मलिष्ठं, विवृतं वीतम नित्यलालोपहतमसंछन्नदन्तत्वादाशुदन्तवैवर्ण्यकरमासन्नाबाधमिति ॥७॥

चार प्रकार की दांतों की उत्पत्ति मानी गई है—(१) सामुद्र (२) संवृत (३) विवृत (४) दन्तसंपत्। इनमें 'सामुद्र' बच्चों के दांतों के क्षय की अवस्था में होते हैं क्योंकि उनके दांत सदा गिरते रहते हैं। संवृत-अधन्य (अप्रशस्त) है, इसमें दांत मैले होते हैं। विवृत-जिसमें नित्य लालास्राव (Saliva) होता रहता है तथा होठों द्वारा दांतों के पूरे ढके न जाने के कारण दांत मैले हो जाते हों तथा उनमें सदा रोग होते रहते हों ॥७॥

चतुर्थे तु मासि दन्ता निषिक्ता दुर्बला भवन्त्याशुक्षयिणश्चामयबहुलाश्च, पञ्चमे स्यन्दनाश्च प्रहर्षिणश्चामयबसुलाश्च षष्ठे प्रतीपाश्च मलग्राहिणश्च विवर्णाश्च घुणदन्ताश्च भवन्ति, सप्तमे द्विपुटाः स्फोटिनश्च राजिमन्तश्च खण्डाश्च रूक्षाश्च विषमाश्रोन्नतश्च भवन्ति, तथाऽष्टमे मासि सर्वगुणसंपन्ना भवन्ति। पूर्णता समता घनता शुक्लता स्निग्धता श्लक्ष्णता निर्मलता निरामयता किञ्चिदुत्तरोन्नतता, दन्तबन्धनानां च समता रक्तता स्निग्धता बृहद्वनस्थिरमूलता चेति दन्तसंपदुच्यते। हीनोल्बणसितासिताऽप्रविभक्तदन्तबन्धनत्वमप्रशस्तमृषयो वदन्ति। तत् स्वभावादन्तोदूखलकेषु यच्छोणितं गर्भे निषिक्तं तदेव जातस्य समतोऽभिवर्धमानस्य क्रमेण .....................................। (इति ताडपत्रपुस्तके ३४ तमं पत्रम्।)


१. शनैः प्रकुरुते यत्र दन्ताश्रितोऽनिलः । करालान्विकटान्दन्तान्स करालो न सिध्यति । (भा.प्र. मध्यमखण्ड चि. ७२)
२. शीतरूक्षप्रवाताम्लस्पर्शनासाहाः द्विजाः । तत्र स्युर्वातपित्ताभ्यां दन्तहर्ष; स कीर्तितः ॥ (भा.प्र. मध्यमखण्ड चि. ६८)

दन्तजन्मिकाध्यायः २०] सूत्रस्थानम् ९९

चतुर्थ मास में निषिक्त हुवे २ दांत दुर्बल, शीघ्र गिरने वाले तथा बहुत से रोगों से युक्त होते हैं, पांचवे मांस में निषिक्त हुए २ दांत हिलने वाले, हर्ष¹ एवं अन्य रोगों से युक्त होते हैं, छठे में निषिक्त हुवे २ दांत प्रतीप-टेढ़े, मैले, विवर्ण तथा कीड़ों से खाये हुवे (Carious) होते हैं, सातवें में निषिक्त हुए २ दांत दो पुट-जड़ वाले (इकट्ठे दो दांत निकलना), चटकनेवाले (खिरने वाले) रेखा युक्त, टूटे हुवे, रूक्ष, विषम (समान न होना) तथा आगे को उभड़े हुवे होते हैं, और ८ वें मास में निषिक्त हुए २ दांत सर्वगुण सम्पन्न होते हैं। दांतों की पूर्णता, समानता, कठोरता सफेदी स्निग्धता, चिकनापन, निर्मल होना, नीरोग होना, तथा दूध के दांतों का कुछ उन्नत-बड़े होना (जिससे वे निचले दातों को ढकलें) तथा दन्तबन्धन (मसूड़ों) का समान, लाल, स्निग्ध तथा बड़े घन एवं स्थिर मूल वाले होना (अर्थात् उनमें दांत अच्छी प्रकार जमे हुवे हों) ये दन्तसंपत् (दातों के गुण) कहलाते हैं। दांतों का हीन (कम होना), उल्बण (अधिक होना), सित-एक दम सफेद होना (स्थायी दांतों का रंग हल्का पीलापन-Yellowish tint-लिये हुवे सफेद होना चाहिये), असित-काले, तथा मसूड़ों का अलग २ न होना (प्रत्येक दांत का मसूड़ा अस्पष्ट अलग दिखाई देना चाहिये), अप्रशस्त माने गये हैं। दांतों के गढ़ों (Pits) में गर्भ के समय जो रक्त स्वाभाविक रूप से निषिक्त होता है वही रक्त¹ उत्पन्न होकर समान रूप से बढ़ने वाले व्यक्ति में क्रम से..... (दांतों को उत्पन्न करता)।

(ताडपत्र पुस्तक में ३४ वा (पृष्ठ²)

वक्तव्य—यह ग्रन्थ खण्डित रूप से मिलता है इस लिये बीच २ में इसके पृष्ठ लुप्त हैं। इस अध्याय में भी पूर्वोक्त विवरण के बाद पृष्ठों के लुप्त होने से अध्याय को यहीं अधूरा ही समाप्त कर देना पड़ा है। यदि यह अध्याय पूरा होता तो संभवतः अध्याय के उपक्रम में कहे हुए कई महत्व पूर्ण प्रश्नों की इसमें विवेचना मिलती। अस्तु, उस विषय में तो जब तक इसका खण्डित शेषांश कहीं से उपलब्ध न हो तब तक हमें अपनी जिज्ञासा को शान्त रखना ही पड़ेगा। फिर भी हम पाठकों के ज्ञान के लिये आधुनिक विज्ञान की गवेषणाओं के आधार पर यथा संभव प्रकाश डालने का प्रयत्न करेंगे।

बच्चों के दांत निकलने का समय ऐसा होता है जिसमें बच्चों को बहुत से रोग हो जाया करते हैं। दांतो के उद्गम के विषय में आधुनिक विद्वानों के परस्पर बिलकुल विपरीत दो सिद्धान्त हमारे दृष्टिगोचर होते हैं (१) दांतों के निकलने के समय बच्चे को निश्चित रूप से बहुत से रोग घेर लेते हैं (२) दांतो का उद्गम दांतों के निकलने के सिवाय और किसी बात (रोग आदि) का उत्तरदायी नहीं है। Donald Paterson अपनी पुस्तक Sick Children के १५ पृष्ठ पर लिखते हैं—“Two extreme theories of dentition are advanced. (i) that there are myriads of diseases and upsets definitly due to cutting the teeth. (2) that teething is responsible for nothing but the cutting of teeth”.

उपर्युक्त बात मुख्य रूप से ‘दूध के दांतों’ के विषय में ही है। अस्तु, आपाततः इनमें से कोई भी सिद्धान्त ठीक हो, इतना तो मानना ही पड़ेगा कि शिशु प्रसव (Childbirth) के समान दांतो का उद्गम स्वास्थ्यावस्था होने पर भी किसी २ में विकृत (रोग की) अवस्था धारण कर लेता है तथा उस अवस्था में उसे नाना प्रकार के रोग घेर लेते हैं। परन्तु दन्तोद्भेद पर लोग बच्चों के रोगों की जिम्मेदारी बहुत अधिक डाल देते हैं। दन्तोद्भेद के समय होने वाले प्रत्येक-छोटे से लेकर बड़े तक-उपद्रव की जिम्मेवारी दन्तोद्भेद पर ही थोप दी जाती है। आयुर्वेद के ग्रन्थों में इस विषय में लिखा है—पृष्ठभंगे विडालानां बर्हिणां शिखरोद्गमे। दन्तोद्भेदे च बालानां न हिं किंचिन्न दूयते॥ वास्तव में हमें दन्तोद्भेद पर इतनी अधिक जिम्मेवारी नहीं डालनी चाहिये। हां, कुछ विकृति अवश्य हो जाती हैं। बच्चों के वातसंस्थान (Nervous


१. Birch की पूर्वोक्त पुस्तक के ८१ पृष्ठ पर लिखा है-“Teeth are built out of blood” रक्त से दांत बनते हैं।
२. ताडपत्रपुस्तक में इससे आगे दो पृष्ठ खण्डित है।

२०काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्दन्तजन्मिकाध्यायः २०]

System) में कुछ विकार उत्पन्न हो जाते हैं जिससे बच्चा चिड़चिड़ा तथा कमजोर अवश्य हो जाता है। इसके अतिरिक्त और कोई रोग हो यह आवश्यक नहीं है। यदि बच्चे के भोजन एवं परिधान (कपड़ों) की ओर ध्यान रखा जाय तो बच्चे को साधारण तथा कोई कष्ट नहीं होता है। बच्चों का निम्न उपद्रव मुख्यरूप से हो जाते हैं—

१. ज्वर—किसी-किसी बच्चे को दन्तोद्भेद के समय ज्वर हो जाया करता है।

२. वमन—कभी-कभी बच्चों को दन्तोद्भेद के समय वमन प्रारंभ हो जाते हैं। यह अवस्था विशेष रूप से तब होती है जब कि बच्चा लगभग १-१, १/२ वर्ष का हो जाता है। इस समय तक वह केवल दूध या अन्य तरल भोजन ही ले रहा होता है। अब बच्चे को धीरे-धीरे ठोस भोजन (Solid) देना प्रारंभ किया जाता है। इस समय बच्चे के मसूड़े बहुत नरम होते हैं, कठोर भोजन को चबाने से उसके दांतों में दर्द होता है इसलिये वह उस भोजन को आधा चबाया हुवा ही निगल जाता है वह बिना चबाया हुवा भोजन उसे पचता नहीं और परिणाम स्वरूप उसे वमन हो जाता है जिसमें कि कठोर भोजन का अंश ही मुख्यरूप से निकलता है। यह वमन दन्तोद्भेद के बाद स्वयं शान्त हो जाती है।

अतिसार—दन्तोद्भेद के समय बच्चे को अतिसार भी लग जाते हैं। इसमें मल पतला अवश्य होता है परन्तु उसका रंग ठीक होता है तथा उसमें बिना पचा हुआ अंश नहीं होता। भोजन में परिवर्तन करने से भी मल की संख्या में कोई विशेष अन्तर नहीं होता तथा इस अतिसार से बच्चे के भार में भी कोई कमी नहीं होती है।¹ कुछ लोगों का विचार है कि दन्तोद्भेद के समय अतिसार एक स्वाभाविक एवं लाभप्रद प्रक्रिया है। परन्तु यह धारणा ठीक नहीं है। Birch की पूर्वोक्त पुस्तक के ७८ पृष्ठ पर स्पष्ट लिखा है कि “Diarrhoea is never a good thing, it is always a bad sign” अर्थात् अतिसार कभी भी अच्छा नहीं है यह सदा बुरा लक्षण है। सामान्य लोग घरों में कहा करते हैं कि दन्तोद्भेद के समय होने वाले अतिसार को नहीं रोकना चाहिये। परिणाम यह होता है कि जब बच्चा दिन प्रति-दिन दुर्बल होता जाता है तब चिकित्सक को बुलाते हैं जो कि अतिसार को रोकने का प्रयत्न करता है परन्तु तब तक वह रोगी असाध्यावस्था को पहुंच चुका होता है। अन्त में वह अभागा बच्चा आक्षेप (Convulsions) के द्वारा अपनी इहलीला को समाप्त कर देता है। परन्तु इसका दोष भी लोग चिकित्सक को ही देते हैं और कहते हैं कि दस्तों को रोकने से वह दिमाग में पहुंच गया है (It went to head) और इसी लिये बच्चा मर गया है। अपने इस अज्ञान को हमें दूर करने का अवश्य प्रयत्न करना चाहिये।

कास बच्चे को इस समय खांसी भी हो जाती है। परन्तु खांसी का कारण प्रायः दन्तोद्भेद न होकर दूसरा ही होता है। बच्चे को लालास्राव बहुत हुआ करता है। दिन में तो यह स्राव स्वाभाविक रूप से मुंह से बाहर को गिरता रहता है। परन्तु जब बच्चा रात्रि में या दिन में सोता है तब वह स्राव बाहर न निकल कर अन्दर गले में जाकर स्वरयन्त्र के मुंह को बन्द कर देता है जिससे बच्चा बार २ खांसता है।

आक्षेप (Convulsions)—दन्तोद्भेद के समय साधारणतया आक्षेप नहीं होते परन्तु यदि बच्चे को Ricket² हो या कोई अन्य मानसिक दुर्बलता हो तो उसे आक्षेप हो जाया करते हैं।

पामा (Eczema)—इस समय बच्चों को पामा तथा खुजली भी हो जाया करती है। साथ ही प्रायः शीत पित्त के दाग (urticarial Rashes) भी हो जाया करते हैं।

पूर्वरूप—मुंह से लालास्राव होना, मसूड़ों का सूजना तथा वेदना युक्त होना, तथा वस्तुओं को काटने की इच्छा करना ये दन्तोद्भेद के पूर्व रूप होते हैं।


१. देखें—Donald Paterson की Sick children का पृष्ठ १५।
२. Ricket—बच्चों का एक रोग है जिसमें विटामिन डी (Vitamin-D) की कमी से उनकी हड्डियां कमजोर होकर टेढ़ी हो जाती हैं।

चूडाकरणीयाध्यायः २१] सूत्रस्थानम् २१

उपक्रम—दन्तोद्भेद के उपद्रव यदि विशेष प्रबल रूप धारण न करलें तो विशेष उपक्रम की आवश्यकता नहीं होती है, दांतो के निकलने के बाद वे स्वयं शान्त हो जाते हैं। कहा भी है—दन्तोद्भेदेषु रोगेषु न बालमतियन्त्रयेत् । स्वयमेवोपशाम्यन्ति जातदन्तस्य ये गदाः ।। परन्तु यदि उपद्रव अधिक गंभीर हो जांय तो उस २ उपद्रव का उपाय अवश्य सावधानी से करना चाहिये। साधारणतया बच्चे का भोजन ठीक करने का प्रयत्न करना चाहिये। बच्चे को ठीक अनुपात में विटामिन, शुद्ध वायु, सूर्य की धूप तथा उपर्युक्त भोजन मिलने की पूर्ण व्यवस्था रखनी चाहिये। दन्तोद्भेद के समय बच्चे के मसूड़ों पर मधु में मिलाकर सुहागे की खील, उंगली में लगाकर ग्लिसरीन या नींबू का टुकड़ा रगड़ना चाहिये, इससे दांत सुखपूर्वक निकल आते हैं। दन्तोद्भेद के समय बच्चे के भोजन की मात्रा घटाकर १/४ कर देना चाहिये तथा उस कम की हुई भोजन की मात्रा को शुद्ध जल द्वारा पूरा करना चाहिये। प्रयत्न करना चाहिये कि बच्चे को कोष्ठबद्धता (Constipation) न रहे, एतदर्थ १/२ ग्रेन मुग्धरस (Grey powder) दिन में दो बार देकर पेट साफ कर देना चाहिये। मुंह में चूसने के लिये बच्चे को कोई कड़ी चीज देनी चाहिये जिससे उसके हनु (Jaw) की वृद्धि (विकास) पूर्ण रूप से हो सके।


एकविंशतितमोऽध्यायः ।

............................. रोहिणी स्वयङ्गुप्तामूलं द्वे हरिद्रे बृहतीफलरसैर्धृतार्धवत् पचेत्, पच्यमानेऽपामार्गं चावपेत् । सिद्धेन कर्णपालीमहन्यहनि प्रक्षयेद्दिमृद्दीयाच्च, आशु वर्धते पीना समा च पाली भवति । मधूच्छिष्टसर्जरसयववत्सकैरण्डान्यन्तर्धूमं दग्ध्वा तेन भस्मना म्रक्षितां कर्णपालीं विमृद्दीयात्, आशु वर्तते पीना समा च पाली भवतीति ।

.............................

कर्णपाली की वृद्धि के उपाय—रोहिणी (कुटकी) कौंच की जड़, हरिद्रा, दारुहरिद्रा तथा कटेरी के रस में इनसे आधे परिमाण में घृत डालकर पकावे। पकती हुई अवस्था में ही इसमें अपामार्ग का चूर्ण डाल दे। इस सिद्ध घृत से कर्णपाली (लौर—Lobule) को प्रतिदिन रगड़े तथा मालिश करे। इससे कर्णपाली शीघ्र बढ़ती है तथा मोटी और समान (स्पर्श में समान—चिकनी) होती है। उपर्युक्त घृत से स्निग्ध हुई कर्णपाली पर मोम, राल, जौ, इन्द्रजौ तथा एरण्ड के पत्तों को अन्तर्धूम विधि से जलाकर उस भस्म को उस पर लगावे (Dust करे)। इससे कर्णपाली शीघ्र बढ़ती है तथा मोटी और चिकनी भी हो जाती है।

वक्तव्य—कर्णपाली बढ़ाने के लिये सुश्रुत सू. अ. १६ में निम्न योग दिये हैं—१. अथास्याप्रदुष्टस्याभिवर्धनार्थंप्रयत्य्ङ्गः । तद्यथा-गोधाप्रतुदविष्किरानूपौदकवसामज्जानी पयः सर्पिस्तैलं गौरसर्षपजं च यथालाभं संभृत्यार्कलर्कबलातिबलानन्ता-पामार्गाश्वगन्धाविदारिगन्धा क्षीरशुक्लाजलशूकमधुरवर्गपयस्याप्रतिवापं तैलं वा पाचयित्वा स्वनुगुप्तं निदध्यात् । स्वेदितोन्मर्द्दितं कर्णं स्नेहेनैतेन योजयेत् । अथानुपद्रवः सम्यग्बलवांश्च विवर्धते ।। स्वेद और मालिश किये हुए कान पर उपर्युक्त ओषधियों से सिद्ध किये हुए तैल का प्रयोग करने से कर्णपाली वृद्धि को प्राप्त होती है। २. यवाश्वगन्धाष्ट्याह्नैस्तैलैश्चोद्वर्तनं हितम् । ३. शतावर्यह्वगन्धाभ्यां पयस्यैरण्डजीवनैः । तैलं विपक्वं सक्षीरमभ्यङ्गात् पलिवर्धनम् ।। ४. ये तु कर्णा न वर्धन्ते स्वेदस्नेहोपपादिताः । तेषामपाङ्गदेशे तु कुर्यात् प्रच्छानमेव तु ।। उपर्युक्त स्नेहन, स्वेदन अभ्यङ्ग आदि के द्वारा यदि कर्णपाली की वृद्धि न हो तो अपाङ्गदेश (कर्णपुत्रिका के थोड़ा नीचे) छिद्र करना चाहिये।

तत्र श्लोकाः ।

नाभिश्रराजपुत्राणामन्येषां वा महात्मनाम् । कर्णान् विध्येत् सुखप्रेप्सुरिह लोके परत्र च ।।

२२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् चूडाकरणीयाध्यायः २१]

आमच्छेदेऽत्ययो ह्यत्र कुवेधाद्ग्रोपजायते । अभिषक् तत्र मन्दात्मा किं करिष्यत्यशास्त्रवित् ।।

इह लोक तथा परलोक में सुख को चाहने वाले अज्ञानी वैद्य को राजपुत्रों अथवा अन्य बड़े लोगों के कानों का वेध नहीं करना चाहिये । आमच्छेद (कच्चे वेध) अथवा कुवेध (गलत तरीके से वेध) करने पर यदि कोई उपद्रव हो जाय तो शास्त्रों को न जानने वाला, मन्दबुद्धि तथा अज्ञानी वैद्य क्या करेगा ।

कदा वेध्यं कथं वेध्यं कुत्र वेध्यं कथं व्यधः ।
हितोऽहितोऽत्ययः कश्च तत्राज्ञः किं प्रपत्स्यते ।।
तस्माद्भिषक् सुकुशलः कर्णं विध्येद्विचक्षणः । शिशोर्हर्षप्रमत्तस्य धर्मकामार्थसिद्धये ।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।
इति चूडाकरणीयोऽध्याय एकविंशतितमः ।।२१।।


कर्णवेधन कब, कैसे, तथा कहां करना चाहिये ? किस प्रकार का वेध हितकर तथा अहितकर है ? इसके उपद्रव क्या हैं ? इत्यादि बातों का मूर्ख वैद्य को कुछ पता नहीं होता । इसलिये अत्यन्त कुशल एवं निपुण चिकित्सक को धर्म, काम तथा अर्थ (धन) की प्राप्ति के लिये हर्ष से युक्त शिशु के कर्ण का वेधन करना चाहिये । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।

**वक्तव्य—**भारत में साधारणतया सब प्रदेशों में उत्पत्ति के पश्चात् बालकों के कानों के वेधन की प्रथा प्रचलित है । कर्णवेधन से बहुत से रोग नहीं हो पाते हैं—ऐसा प्राचीन ऋषियों का विश्वास था । हमारे चिकित्सा ग्रन्थों एवं धर्मशास्त्रों में अनेक स्थानों पर इसका उल्लेख मिलता है । सुश्रुत में कर्णवेधन की विधि अत्यन्त विस्तार से दी हुई है । वहां उसकी विधि के साथ २ उसका प्रयोजन, उपद्रव, तथा चिकित्सा आदि का भी वर्णन मिलता है । सुश्रुत सू. अ. १६ में कहा है—'रक्षाभूषणनिमित्तं बालस्य कर्णौ विध्येते । तौ षष्ठे मासि सप्तमे वा शुक्लपक्षे प्रशस्तेषु तिथिकरणमुहूर्तनक्षत्रेषु कृतमङ्गलस्वस्तिवाचनं धात्र्यङ्के कुमारधराङ्के वा कुमारमुपवेश्य बालक्रीडनकैकैः प्रलोभ्याभिसान्त्वयन् भिषग् वामहस्तेनाकृष्य कर्णं दैवकृते छिद्र आदित्यकरावभासिते शनैः शनैर्दक्षिणहस्तेनर्जु विध्येत्, प्रतनुकं सूच्या, बहलमारया, पूर्वं दक्षिणंकुमारस्य, वामं कुमार्याः, ततः पिचुवर्ति प्रवेशयेत् ।। इससे प्रतीत होता है कि कर्णवेधन का उद्देश्य बालकों की ग्रहबाधाओं से रक्षा करना तथा उनमें आभूषण पहनाना है । कहा भी है-कर्णव्यधे कृते बालो न ग्रहैरभिभूयते । भूष्यते तु मुखं यस्मात् कार्यस्तत् कर्णयोर्व्यधः ।। कर्णवेधन छठे या सातवें मास में किया जाता है । डल्हण के अनुसार कर्णवेधन के लिये छटा या सातवां महीना जन्म से न लेकर भाद्रपद से लेना चाहिये । तदनुसार माघ या फाल्गुन मास आता है । यह शिशिर ऋतु है । इस ऋतु में कर्णवेधन का मुख्य कारण यह प्रतीत होता है कि उस समय व्रण में पाक (Suppuration) का डर बहुत कम होता है तथा व्रण का रोपण भी शीघ्र हो है । इसीलिये धर्मशास्त्रों में जो कर्णवेधन का विधान दिया है वह छठे या सातवें मास में नहीं दिया है अपितु तीसरे या पांचवें वर्ष में दिया है । कात्यायन गृह्यसूत्र १-२ का वचन है-‘‘कर्णवेधो वर्षे तृतीये पञ्चमे वा’’ । कर्णपाली के बीच में एक स्वाभाविक पतला सा छिद्र होता है उसी में वेध करना चाहिये क्योंकि उस स्थान पर शिरा, धमनी नाड़ी आदि नहीं होती हैं तथा इस भाग में तरुणास्थि भी नहीं होती है । यहां केवल fibrous tissue तथा थोड़ी वसा होती है । इसी स्थान को दैवकृत छिद्र शब्द से कहा गया है । वेधन के बाद छिद्र में एक पतला सा धागा डाल दिया जाता है जिससे वह छिद्र बन्द न हो जाय ।

**उपद्रव—**विपरीत कर्णवेधन से तीन प्रकार के उपद्रव हो सकते हैं । (१) रक्तस्राव-धमनी आदि के बिंध जाने से होता है (२) वेदना-यह नाडी (Nerve) के बिंध जाने से होती है (३) ज्वर इत्यादि-व्रण में सफाई आदि के न होने

स्नेहाध्यायः २२] सूत्रस्थानम् २३

से जीवाणुओं के प्रवेश (Infection) से ज्वर आदि रोग हो जाते हैं। इसलिये पहले से ही अच्छी प्रकार स्थान देखकर वेधन करे तथा व्रण में जीवाणुओं का प्रवेश न हो सके-इसका प्रयत्न करे। इस अध्याय का नाम चूड़ाकरणीय अध्याय है जैसा कि अध्याय के अन्त में लिखे वाक्य "इति चूडाकरणीयोऽध्याय एक विंशतितमः" से स्पष्ट है। यह अध्याय प्रारम्भ में खण्डित है इसलिये संभवतः इसके खण्डित अंश में चूड़ाकर्म का प्रकरण दिया हो। चूड़ाकर्म या चूड़ाकरण से अभिप्राय प्रथम बार बालक के सिर के बालों को कटवाने से है जिसे केशच्छेदन या मुण्डन संस्कार कहते हैं। यह बालक के जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त (निषेकादिश्मशानान्तो नित्यं यस्योदितो विधिः) किये जाने वाले वैदिक संस्कारो, में से आठवां सस्कार है। आश्वलायन गृह्यसूत्र १/१७/१ के अनुसार यह संस्कार तृतीय वर्ष में किया जाता है। कहा भी है- "तृतीये वर्षे चौलम्'। पारस्कर गृह्यसूत्र २/१/१ के अनुसार यह प्रथम वर्ष में किया जाता है कहा है— सांवत्सरिकस्य चूडाकरणम्' ।

इति चूडाकरणीयोऽध्याय एकविंशतितमः ॥२१॥


द्वाविंशतितमोऽध्यायः

अथातः स्नेहाध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥

अब हम स्नेहाध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।

स्नेहो द्वियोनिरुक्तश्चतुर्विकल्पश्चराचरसमुत्थः। सर्पिर्मज्जवसाख्यं खगमृगजलजप्रभवमाहुः ॥३॥
तैलानि चौद्भिदेभ्यस्तिलचूतसर्षपबिभीतबिल्वेभ्यः । एरण्डातसिशिग्रुमधूकमूलककरञ्जेभ्यः ॥४॥

स्नेह की दो योनियां (उत्पत्ति स्थान या कारण) कहीं गई हैं। तथा चर और अचर उत्पत्ति वाले इसके चार विकल्प माने गये हैं। इनमें से घृत, मज्जा, तथा वसा तीनों पक्षी, पशु तथा जल के (अर्थात् सब प्रकार के) प्राणियों से उत्पन्न होते हैं। तथा चौथा स्नेह (तैल) तिल, आम्र, सरसों, बहेड़ा, बिल्व, एरण्ड, अलसी, सुहांजना, महुआ, मूली, तथा करञ्ज आदि उद्भिदों (वनस्पतियों) से प्राप्त होता है।

**वक्तव्य—**चरक सू. अ. १३ में कहा है—स्नेहानां द्विविधा सौम्य ! योनिः स्थावरजङ्गमा । स्नेह के स्थावर और जंगम (चर-अचर) भेद से दो प्रकार के उत्पत्ति स्थान माने गये हैं। वही आगे पुनः कहा है-तिलः पियालाभिषुकौ विभीतकश्चित्राभवैरण्डमधूकसर्षपाः । कुसुम्भबिल्वारुकमूलकातसौनिकोचकाक्षोडकरञ्जशिग्रुकाः ।। स्नेहाश्च याः स्थावरसंज्ञिता तथा स्युर्जङ्गमा मत्स्यमृगाः सपक्षिणाः । तेषां दधिक्षीरघृतामिषं वसा नेहेषु मज्जा च तथोपदिश्यते ।। इस प्रकार तैल साधारणतया स्थावर तथा घृत, वसा और मज्जा जंगम स्नेह माने गये हैं। साधारणतया इसलिये कहा है कि तैल भी मछली आदि से प्राप्त किया जाता है।

घृततैलवसामज्जां पूर्वः पूर्वो वरोऽन्ये (न्ये) भ्यः । मुख्यं घृतेषु गव्यं संस्कारात् सर्वसात्म्याच्च ॥५॥

घृत, तैल, वसा तथा मज्जा इनमें से यथा पूर्व अगले से श्रेष्ठ माना गया है अर्थात् घृत तैल से, तैल वसा से तथा वसा मज्जा से श्रेष्ठ है। घृतों में भी संस्कार तथा सबके लिये सात्म्य होने के कारण गोघृत मुख्य माना गया है।

**वक्तव्य—**संस्कार से अभिप्राय संस्कार के अनुवर्तन से है अर्थात् यह अपने गुणों को त्यागे बिना ही संस्कारार्थ डाली गई अन्य ओषधियों के गुणों को अपने अन्दर धारण करता है। अन्य स्नेहों में ये गुण नहीं हैं। वे संस्कारार्थ डाली

२४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् स्नेहाध्यायः २२]

गई अन्य ओषधियों के संसर्ग से अपने गुणों को त्याग देते हैं। चरक में भी घृत को सब स्नेहों से श्रेष्ठ माना है। परन्तु वहां गोघृत का विशेष परिगणन नहीं किया गया है अपितु सामान्य रूप से ही घृत के गुण लिखे हैं। कहा है—सर्पिस्तैल वसा मज्जा सर्वस्नेहोत्तमा मताः। एभ्यश्चैवोत्तमः सर्पिः संस्कारस्यानुवर्तनात् ॥ घृत की सर्वोत्तमता को दिखाते हुए अष्टाङ्ग संग्रह में कहा है—माधुर्यादविदाहित्वाज्जन्माद्येव च शीलनात्। अर्थात् उसकी श्रेष्ठता के मधुर, अविदाहि एवं जन्म से ही घृत का निरन्तर प्रयोग—ये तीन हेतु अधिक दिये हैं। जन्म से जिस वस्तु का सेवन किया जाता है वह सात्म्य हो जाती है इसी लिये प्रकृत संहिता के उपर्युक्त श्लोक में 'सर्वसात्म्याच्च' विशेषण दिया गया है।

विनिहन्ति पित्तमनिलं पीतं सर्पिः कफं न च चिनोति।
जनयति बलाग्निमेधाः शोधयति शुक्रं च योनिं च ।।६।।

घृत के सामान्य गुण—घृत सेवन किया जाने पर पित्त तथा वायु का शमन करता है परन्तु कफ का संचय नहीं करता। यह बल, अग्नि और बुद्धि को बढ़ाता है तथा शुक्र और योनि का शोधन करता है। चरक निदान स्थान के प्रथम अध्याय में कहा है—स्नेहात्वात् शमयति शैत्यात्पित्तं नियच्छति। घृतं तुल्यगुणं दोषं सस्कारात्तु जयेत् कफम्।। उपर्युक्त श्लोक द्वारा घृत के अन्य गुण दिये गये हैं। सुश्रुत सू. अ. ४५ में घृत के निम्न सामान्य गुण दिये गये हैं—घृतं तु मधुरं सौम्यं मृदु शीतवीर्यमल्पाभिष्यन्दिस्नेहनमुदावर्त्तोन्मादापस्मारशूलज्वरानाहवातपित्तप्रशमनमग्निदीपनं स्मृतिमतिमेधा-कान्तिस्वरलावण्यसौकुमार्यौजस्तेजोबलकरमायुष्यं वृष्यं मेध्यं वयःस्थापनं गुरु चक्षुष्यं श्लेष्माभिवर्धनं पाप्मालक्ष्मीप्रशमनं विषहरं रक्षोघ्नं च।।

उष्णं कफानिलघ्नं स्वरवर्णकरं तनुस्थिरीकरणम्। भग्नच्युतसन्धानं धातुव्रणशोधनं तैलम् ।।७।।

तैलों के सामान्य गुण—तैल उष्ण, कफ तथा वायु का नाशक (उष्ण एवं स्निग्ध होने से), स्वर तथा वर्ण को निखारने वाला, शरीर को स्थिर-दृढ़ करनेवाला, भग्न (Fracture) एवं च्युत (सन्धिभ्रंश-Dislocation) को ठीक करनेवाला तथा धातु एवं व्रण का शोधक है। चरक सूत्रस्थान के स्नेहाध्याय में तैलों के निम्न गुण दिये हैं-मारुतघ्नं न च श्लेष्मवर्धनं बलवर्धनम्। त्वच्यमुष्णं स्थिरकरं तैलं योनिविशोधनम्।। सुश्रुत सूत्रस्थान में भी तैलों के बहुत से गुण दिये हुए हैं। उन्हें वहीं देखना चाहिये।

मज्जावसे विशेषाद्वातघ्ने वृष्यसंमते चैव। बलिनां तत्सात्म्यानां प्रजाबलायुः स्थिरीकरणे ।।८।।

मज्जा तथा वसा के सामान्य गुण—मज्जा तथा वसा विशेषकर वातघ्न हैं, ये वृष्य माने गये हैं तथा बलवान् एवं जिन्हें ये सात्म्य हों-उन पुरुषों में सन्तानोत्पत्ति, बल एवं आयु को स्थिर करते हैं। चरक सू. अ. १३ में इनके निम्न गुण दिये हैं—विद्धभग्नाहतभ्रष्टयोनिकर्णशिरोरुजि। पौरुषोपचये स्नेहे व्यायामे चेष्यते वसा ।। बलशुक्ररसश्लेष्म मेदोमज्जविवर्धनः। मज्जा विशेषतोऽस्थां च बलकृत्स्नेहने हितः ।। अर्थात् इनका प्रयोग मुख्य रूप से बल एवं वीर्यवृद्धि के लिये होता है।

नित्यानित्यात्मविधौ तिलतैलघृते बुधः प्रयुञ्जीत।
एरण्डशङ्खिनीभ्यां स्त्रंसनमन्यद्रसायनं नास्ति ।।९।।

ज्ञानी मनुष्य को दैनिक व्यवहार में प्रतिदिन तिलतैल तथा घृत का प्रयोग करना चाहिये। तथा एरण्ड और शङ्खिनी (श्वेत अपराजिता) के तैल द्वारा होनेवाले विरेचन से बढ़-कर दूसरा कोई रसायन नहीं है। अर्थात् दैनिक प्रयोग के लिये घृत अथवा तिलों का तैल ही काम में लेना चाहिये। जहाँ विरेचन देने का उद्देश्य हो वहाँ एरण्ड तथा शङ्खिनी के तेल का प्रयोग करना चाहिये।

स्नेहाध्यायः १२] सूत्रस्थानम् २५

मज्जावसे वसन्ते, प्रावृषि तैलं, पिबेच्छरदि सर्पिः।
सर्पिर्वा सर्वेषां सर्वस्मिञ्छक्यते पातुम् ॥१०॥

स्नेहों के सेवन काल—मज्जा तथा वसा का वसन्त ऋतु में, तैल का प्रावृट् में तथा घृत का शरद् ऋतु में सेवन करना चाहिये। अथवा घृत का सब व्यक्ति सब ऋतुओं में सेवन कर सकते हैं।

वक्तव्य—वसन्त, प्रावृट् तथा शरद् साधारण ऋतुयें कहाती हैं। इनमें न सर्दी अधिक पड़ती है; न गरमी तथा न वर्षा। शोधन की दृष्टि से ही इन तीनों ऋतुओं का परिगणन किया गया है। क्योंकि स्नेहन के बाद स्वेदन तथा फिर पञ्चकर्म द्वारा शोधन कराया जाता है। अष्टाङ्गसंग्रह सू. अ. २५ में निम्न प्रकार से वर्णन किया गया है—तैलं प्रावृषि वर्षान्ते सर्पिरन्यौ तु माधवे। सर्वं सर्वस्य च स्नेहं युज्याद् भास्वति निर्मले॥ ऋतौ साधारणे ........................॥ अर्थात् स्नेहपान साधारण ऋतुओं में ही किया जाता है। अधिक सर्दी, गर्मी एवं वर्षा में स्नेहपान साधारणतया निषिद्ध है। आत्ययिक अथवा शीघ्रकारी व्याधियों के लिये शास्त्रों में इसके अपवाद भी दिये हैं।

अनुपानमुष्णमुदकं घृतस्य, तैलस्य यूषमिच्छन्ति।
मज्जवसयोस्तु मण्डं, सर्वेषां कश्यपः पूर्वम् ॥११॥

स्नेहों के अनुपान-घृत का अनुपान उष्ण उदक है (घृत के पश्चात् उष्ण जल पीना चाहिये), तैल का यूष तथा मज्जा और वसा का अनुपान मण्ड है। अथवा भगवान् कश्यप के मत में पहला अर्थात् उष्णजल सब स्नेहों का अनुपान हो सकता है। चरक में इसी अभिप्राय को निम्न श्लोकों में प्रकट किया गया है—जलमुष्णं घृते पेयं, यूषस्तैलेऽनुशस्यते। वसामज्जोस्तु मण्डः स्यात्सर्वेषूष्णमथाम्बु वा॥ स्नेहों के अनुपान के रूप में उष्णोदक के प्रयोग के विषय में सुश्रुत सू. अ. ४६ में कहा है—उष्णोदकानुपानस्तु स्नेहानामथ शस्यते। ऋते भल्लातकस्नेहात्स्नेहात्तोवरकात्तथा॥ अर्थात् उसने भिलावे और तुवरक (Chaulmoogra oil) के तेल में अनुपान रूप में उष्णोदक का निषेध किया है। इनके बाद शीतल जल का ही प्रयोग करना चाहिये।

शूलकफानिलतृष्णाहिक्कारोचकविबन्धगुल्मघ्नम्। व्रणधातुमृदूकरणं दीपनमुष्णोदकमुशन्ति ॥१२॥

उष्णजल के गुण—उष्णजल--शूल, कफ, वायु, तृष्णा, हिक्का, अरुचि, मलबन्ध तथा गुल्म का नाशक है। यह व्रण और धातुओं को मृदु करता है तथा दीपन है।

पादावशेषसिद्धं तद्दोषघ्नैः शृतं जलं मुख्यम्। पेयं कवलग्राहं स्नेहं हि तथा विलाययति ॥१३॥

उष्णोदक की अनुपानविधि—भिन्न २ दोषों को नष्ट करनेवाले द्रव्यों से शृत बनाकर (पकाकर) चतुर्थांश शेष रहने पर उस जल का पान करना चाहिये तथा कवल धारण करना चाहिये। इससे सेवन किये हुए स्नेह का विलय हो जाता है।

वक्तव्य—कवल से अभिप्राय मुँह में पानी लेकर कुल्ले (गरारे-Gargles) करने से है। कहा भी है—सुखं संचार्यते या तु मात्रा सा कवलग्रहा। असंचार्या तु या मात्रा गण्डूषः स प्रकीर्तितः॥ अर्थात् यदि जल केवल मुँह में धारण किया जाय तो उसे गण्डूष कहते हैं। यह दोनों में अन्तर है।

पयसि दधनि मधुमये तूक्ते नोष्णोदकं भवेत् पथ्यम्।
पित्ते रक्तस्रावे गर्भच्यवने च गर्भदाहे च ॥१४॥

उष्णोदक अनुपान का निषेध—दूध, दही तथा मधु युक्त द्रव्य के सेवन के बाद तथा पित्तप्रकोप, रक्तस्राव (Haemorrhage) गर्भच्युति (Abortion) तथा गर्भदाह में उष्णोदक का अनुपान नहीं करना चाहिये।

२६काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्स्नेहाध्यायः २२]

ओदनविलेपिकाभ्यां रसमांसक्षीरदधियवागूभिः । काम्बलिकसूपयूषैः पेयाशनभक्ष्यविकृतीभिः ।।१५।।
स्नेहप्रयोग इष्टः सोर्ध्वाधः कर्मभिः खला(डा)भ्यङ्गैः । चक्षुर्वदनश्रोत्रैर्धारणयोगश्च सात्म्यज्ञैः ।।१६।।

स्नेहों की प्रविचारणाएँ—१. ओदन २. विलेपी ३. मांसरस ४. मांस ५ क्षीर (दूध) ६. दही ७. यवागू ८. काम्बलिक ९. सूप १०. यूष ११. पेया १२. अशन तथा १३. भक्ष्य की विकृतियाँ १४. ऊर्ध्वकर्म (वमन) १५. अधःकर्म (विरेचन) १६. खल या खड १७. अभ्यङ्ग (मालिश) १८ जिन्हें सात्म्य हों वे चक्षु (नेत्रतर्पण) १९. वदन (गण्डूष) तथा २०. श्रोत्र (कर्णतेल) द्वारा धारण करके स्नेह का प्रयोग कर सकते हैं।

वक्तव्य—उपर्युक्त विधियों से स्नेह का प्रयोग किया जा सकता है। चरक में इनके लिये प्रविचारणा शब्द दिया गया है। चरक में इनका निम्न रूप में वर्णन किया गया है—ओदनश्च विलेपी च रसो मांसं पयो दधि । यवागूः सूपशाकौ च यूषः काम्बलिकः खडः ।। शक्तवस्तलपिष्टं च मद्यं लेहास्तथैव च। भक्ष्यमभ्यञ्जनं बस्तिस्तथा चोत्तरबस्तयः ।। गण्डूषः कर्णतैलं च नस्यं कर्णाक्षितर्पणम् । चतुर्विंशतिरित्येताः स्नेहस्य प्रविचारणाः ।। अर्थात् चरक में इनकी संख्या २४ दी है। इससे प्रतीत होता है कि काश्यपसंहिता की अपेक्षा चरक में विकसित प्रक्रिया मिलती है। इनमें आये हुए ओदन विलेपी आदि की परिभाषाएँ निम्न हैं—अन्नं पञ्चगुणे साध्यं विलेपी तु चतुर्गुणे। मण्डश्चतुर्दशगुणे यवागूः षड्गुणेऽम्भसि ।। सिक्थकै रहितो मण्डः पेया सिक्थसमन्विता । यवागूर्बहूसिक्था स्याद्विलेपी विरलद्रवा ।। अर्थात् ओदन सिद्ध करने के लिये चावलों को पाँच गुने जल में पकाकर द्रव भाग निकाल दिया जाता है। विलेपी में चावलों की अपेक्षा चौगुना जल डालकर पकाया जाता है। मण्ड बनाने के लिये १४ गुना तथा यवागू के लिये ६ गुना जल में चावलों को पकाना चाहिये। सूप-द्रवरूप पकाई हुई दाल को सूप कहते हैं। इसमें दाल की अपेक्षा १४ या १८ गुना जल देकर पकाया जाता है। चतुर्थांश जल शेष रहने पर उतार लिया जाता है। यूष-इसके लिये दाल को पोटली में बाँधकर १८ गुने जल में पकाया जाता है। जल आधा शेष रहने पर पोटली को निकाल लें। अवशिष्ट द्रव यूष कहलाता है। खड, काम्बलिक आदि का लक्षण—पिशितेन रसस्तत्र यूषो धान्यैः खडः फलैः । मूलैश्च तिलकल्काम्लप्रायः काम्बलिकः स्मृतः ।। अर्थात् फलों से जो द्रव तैयार किये जाते हैं उन्हें खड तथा मूलों से प्रायः तिलकल्क और अनारदाने आदि की खटाई देकर जो द्रव तैयार किया जाता है उसे काम्बलिक कहते हैं।

पित्तानिलप्रकृतयः स्नेहं रात्रौ पिबेयुरुष्णे च ।
श्लेष्माधिको दिवोष्णे निर्मलसूर्ये लघुत्वे च ।।१७।।

अपवाद तथा दोषभेद से स्नेहपान का काल-पित्त और वातप्रकृति वालों को आत्ययिक रोग में यदि गर्मी में भी स्नेहपान करना पड़े तो रात्रि में करना चाहिये। तथा जिसमें कफ अधिक हो उन्हें आत्ययिक रोग में यदि स्नेहपान आवश्यक हो तो दिन की गर्मी में जब कि सूर्य निर्मल हो तथा शरीर लघु हो तब करायें। चरक में भी बिलकुल यही वर्णन मिलता है—वातपित्ताधिके रात्रावुष्णे चापि पिबेन्नरः । श्लेष्माधिके दिवा शीते पिबेच्चामलभास्करे ।। अष्टाङ्गसंग्रह में निम्न वर्णन मिलता है—सर्वं सर्वस्य च स्नेहं युञ्ज्याद् भास्वति निर्मले। ऋतौ साधारणे, दोषसाम्येऽनिलकफे कफे ।। दिवा, निश्यनिले पित्ते संसर्गे पित्तवत्यपि । त्वरमाणे तु शीतेऽपि दिवा तैलं च योजयेत् ।। उष्णोऽपि रात्रौ सर्पिश्च दोषादीन् वीक्ष्य चान्यथा ।। सुश्रुत चि. अ. ३१ में भी कहा है—शीतकाले दिवानेहमुष्णकाले पिबेन्निशि । वातपित्ताधिको रात्रौ वातश्लेष्माधिको दिवा ।। अर्थात् उपर्युक्त साधारण कालों के अतिरिक्त यदि आवश्यकता पड़े तो इनसे भिन्न कालों में भी अनुकूल समय देखकर स्नेहपान कराया जा सकता है।

तृण्मूर्च्छान्मादादीन् पूर्वो लभते विपर्ययेण पिबन् ।
आनाहारुचिपर्वण्युच्छूलं च समृच्छते शेषः ।।१८।।