भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 377

दन्तजन्मिकाध्यायः २०] सूत्रस्थानम् ९९

चतुर्थ मास में निषिक्त हुवे २ दांत दुर्बल, शीघ्र गिरने वाले तथा बहुत से रोगों से युक्त होते हैं, पांचवे मांस में निषिक्त हुए २ दांत हिलने वाले, हर्ष¹ एवं अन्य रोगों से युक्त होते हैं, छठे में निषिक्त हुवे २ दांत प्रतीप-टेढ़े, मैले, विवर्ण तथा कीड़ों से खाये हुवे (Carious) होते हैं, सातवें में निषिक्त हुए २ दांत दो पुट-जड़ वाले (इकट्ठे दो दांत निकलना), चटकनेवाले (खिरने वाले) रेखा युक्त, टूटे हुवे, रूक्ष, विषम (समान न होना) तथा आगे को उभड़े हुवे होते हैं, और ८ वें मास में निषिक्त हुए २ दांत सर्वगुण सम्पन्न होते हैं। दांतों की पूर्णता, समानता, कठोरता सफेदी स्निग्धता, चिकनापन, निर्मल होना, नीरोग होना, तथा दूध के दांतों का कुछ उन्नत-बड़े होना (जिससे वे निचले दातों को ढकलें) तथा दन्तबन्धन (मसूड़ों) का समान, लाल, स्निग्ध तथा बड़े घन एवं स्थिर मूल वाले होना (अर्थात् उनमें दांत अच्छी प्रकार जमे हुवे हों) ये दन्तसंपत् (दातों के गुण) कहलाते हैं। दांतों का हीन (कम होना), उल्बण (अधिक होना), सित-एक दम सफेद होना (स्थायी दांतों का रंग हल्का पीलापन-Yellowish tint-लिये हुवे सफेद होना चाहिये), असित-काले, तथा मसूड़ों का अलग २ न होना (प्रत्येक दांत का मसूड़ा अस्पष्ट अलग दिखाई देना चाहिये), अप्रशस्त माने गये हैं। दांतों के गढ़ों (Pits) में गर्भ के समय जो रक्त स्वाभाविक रूप से निषिक्त होता है वही रक्त¹ उत्पन्न होकर समान रूप से बढ़ने वाले व्यक्ति में क्रम से..... (दांतों को उत्पन्न करता)।

(ताडपत्र पुस्तक में ३४ वा (पृष्ठ²)

वक्तव्य—यह ग्रन्थ खण्डित रूप से मिलता है इस लिये बीच २ में इसके पृष्ठ लुप्त हैं। इस अध्याय में भी पूर्वोक्त विवरण के बाद पृष्ठों के लुप्त होने से अध्याय को यहीं अधूरा ही समाप्त कर देना पड़ा है। यदि यह अध्याय पूरा होता तो संभवतः अध्याय के उपक्रम में कहे हुए कई महत्व पूर्ण प्रश्नों की इसमें विवेचना मिलती। अस्तु, उस विषय में तो जब तक इसका खण्डित शेषांश कहीं से उपलब्ध न हो तब तक हमें अपनी जिज्ञासा को शान्त रखना ही पड़ेगा। फिर भी हम पाठकों के ज्ञान के लिये आधुनिक विज्ञान की गवेषणाओं के आधार पर यथा संभव प्रकाश डालने का प्रयत्न करेंगे।

बच्चों के दांत निकलने का समय ऐसा होता है जिसमें बच्चों को बहुत से रोग हो जाया करते हैं। दांतो के उद्गम के विषय में आधुनिक विद्वानों के परस्पर बिलकुल विपरीत दो सिद्धान्त हमारे दृष्टिगोचर होते हैं (१) दांतों के निकलने के समय बच्चे को निश्चित रूप से बहुत से रोग घेर लेते हैं (२) दांतो का उद्गम दांतों के निकलने के सिवाय और किसी बात (रोग आदि) का उत्तरदायी नहीं है। Donald Paterson अपनी पुस्तक Sick Children के १५ पृष्ठ पर लिखते हैं—“Two extreme theories of dentition are advanced. (i) that there are myriads of diseases and upsets definitly due to cutting the teeth. (2) that teething is responsible for nothing but the cutting of teeth”.

उपर्युक्त बात मुख्य रूप से ‘दूध के दांतों’ के विषय में ही है। अस्तु, आपाततः इनमें से कोई भी सिद्धान्त ठीक हो, इतना तो मानना ही पड़ेगा कि शिशु प्रसव (Childbirth) के समान दांतो का उद्गम स्वास्थ्यावस्था होने पर भी किसी २ में विकृत (रोग की) अवस्था धारण कर लेता है तथा उस अवस्था में उसे नाना प्रकार के रोग घेर लेते हैं। परन्तु दन्तोद्भेद पर लोग बच्चों के रोगों की जिम्मेदारी बहुत अधिक डाल देते हैं। दन्तोद्भेद के समय होने वाले प्रत्येक-छोटे से लेकर बड़े तक-उपद्रव की जिम्मेवारी दन्तोद्भेद पर ही थोप दी जाती है। आयुर्वेद के ग्रन्थों में इस विषय में लिखा है—पृष्ठभंगे विडालानां बर्हिणां शिखरोद्गमे। दन्तोद्भेदे च बालानां न हिं किंचिन्न दूयते॥ वास्तव में हमें दन्तोद्भेद पर इतनी अधिक जिम्मेवारी नहीं डालनी चाहिये। हां, कुछ विकृति अवश्य हो जाती हैं। बच्चों के वातसंस्थान (Nervous


१. Birch की पूर्वोक्त पुस्तक के ८१ पृष्ठ पर लिखा है-“Teeth are built out of blood” रक्त से दांत बनते हैं।
२. ताडपत्रपुस्तक में इससे आगे दो पृष्ठ खण्डित है।