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काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 378, कुल 942 में से

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पृष्ठ 378
२०काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्दन्तजन्मिकाध्यायः २०]

System) में कुछ विकार उत्पन्न हो जाते हैं जिससे बच्चा चिड़चिड़ा तथा कमजोर अवश्य हो जाता है। इसके अतिरिक्त और कोई रोग हो यह आवश्यक नहीं है। यदि बच्चे के भोजन एवं परिधान (कपड़ों) की ओर ध्यान रखा जाय तो बच्चे को साधारण तथा कोई कष्ट नहीं होता है। बच्चों का निम्न उपद्रव मुख्यरूप से हो जाते हैं—

१. ज्वर—किसी-किसी बच्चे को दन्तोद्भेद के समय ज्वर हो जाया करता है।

२. वमन—कभी-कभी बच्चों को दन्तोद्भेद के समय वमन प्रारंभ हो जाते हैं। यह अवस्था विशेष रूप से तब होती है जब कि बच्चा लगभग १-१, १/२ वर्ष का हो जाता है। इस समय तक वह केवल दूध या अन्य तरल भोजन ही ले रहा होता है। अब बच्चे को धीरे-धीरे ठोस भोजन (Solid) देना प्रारंभ किया जाता है। इस समय बच्चे के मसूड़े बहुत नरम होते हैं, कठोर भोजन को चबाने से उसके दांतों में दर्द होता है इसलिये वह उस भोजन को आधा चबाया हुवा ही निगल जाता है वह बिना चबाया हुवा भोजन उसे पचता नहीं और परिणाम स्वरूप उसे वमन हो जाता है जिसमें कि कठोर भोजन का अंश ही मुख्यरूप से निकलता है। यह वमन दन्तोद्भेद के बाद स्वयं शान्त हो जाती है।

अतिसार—दन्तोद्भेद के समय बच्चे को अतिसार भी लग जाते हैं। इसमें मल पतला अवश्य होता है परन्तु उसका रंग ठीक होता है तथा उसमें बिना पचा हुआ अंश नहीं होता। भोजन में परिवर्तन करने से भी मल की संख्या में कोई विशेष अन्तर नहीं होता तथा इस अतिसार से बच्चे के भार में भी कोई कमी नहीं होती है।¹ कुछ लोगों का विचार है कि दन्तोद्भेद के समय अतिसार एक स्वाभाविक एवं लाभप्रद प्रक्रिया है। परन्तु यह धारणा ठीक नहीं है। Birch की पूर्वोक्त पुस्तक के ७८ पृष्ठ पर स्पष्ट लिखा है कि “Diarrhoea is never a good thing, it is always a bad sign” अर्थात् अतिसार कभी भी अच्छा नहीं है यह सदा बुरा लक्षण है। सामान्य लोग घरों में कहा करते हैं कि दन्तोद्भेद के समय होने वाले अतिसार को नहीं रोकना चाहिये। परिणाम यह होता है कि जब बच्चा दिन प्रति-दिन दुर्बल होता जाता है तब चिकित्सक को बुलाते हैं जो कि अतिसार को रोकने का प्रयत्न करता है परन्तु तब तक वह रोगी असाध्यावस्था को पहुंच चुका होता है। अन्त में वह अभागा बच्चा आक्षेप (Convulsions) के द्वारा अपनी इहलीला को समाप्त कर देता है। परन्तु इसका दोष भी लोग चिकित्सक को ही देते हैं और कहते हैं कि दस्तों को रोकने से वह दिमाग में पहुंच गया है (It went to head) और इसी लिये बच्चा मर गया है। अपने इस अज्ञान को हमें दूर करने का अवश्य प्रयत्न करना चाहिये।

कास बच्चे को इस समय खांसी भी हो जाती है। परन्तु खांसी का कारण प्रायः दन्तोद्भेद न होकर दूसरा ही होता है। बच्चे को लालास्राव बहुत हुआ करता है। दिन में तो यह स्राव स्वाभाविक रूप से मुंह से बाहर को गिरता रहता है। परन्तु जब बच्चा रात्रि में या दिन में सोता है तब वह स्राव बाहर न निकल कर अन्दर गले में जाकर स्वरयन्त्र के मुंह को बन्द कर देता है जिससे बच्चा बार २ खांसता है।

आक्षेप (Convulsions)—दन्तोद्भेद के समय साधारणतया आक्षेप नहीं होते परन्तु यदि बच्चे को Ricket² हो या कोई अन्य मानसिक दुर्बलता हो तो उसे आक्षेप हो जाया करते हैं।

पामा (Eczema)—इस समय बच्चों को पामा तथा खुजली भी हो जाया करती है। साथ ही प्रायः शीत पित्त के दाग (urticarial Rashes) भी हो जाया करते हैं।

पूर्वरूप—मुंह से लालास्राव होना, मसूड़ों का सूजना तथा वेदना युक्त होना, तथा वस्तुओं को काटने की इच्छा करना ये दन्तोद्भेद के पूर्व रूप होते हैं।


१. देखें—Donald Paterson की Sick children का पृष्ठ १५।
२. Ricket—बच्चों का एक रोग है जिसमें विटामिन डी (Vitamin-D) की कमी से उनकी हड्डियां कमजोर होकर टेढ़ी हो जाती हैं।

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