काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचूडाकरणीयाध्यायः २१] सूत्रस्थानम् २१
उपक्रम—दन्तोद्भेद के उपद्रव यदि विशेष प्रबल रूप धारण न करलें तो विशेष उपक्रम की आवश्यकता नहीं होती है, दांतो के निकलने के बाद वे स्वयं शान्त हो जाते हैं। कहा भी है—दन्तोद्भेदेषु रोगेषु न बालमतियन्त्रयेत् । स्वयमेवोपशाम्यन्ति जातदन्तस्य ये गदाः ।। परन्तु यदि उपद्रव अधिक गंभीर हो जांय तो उस २ उपद्रव का उपाय अवश्य सावधानी से करना चाहिये। साधारणतया बच्चे का भोजन ठीक करने का प्रयत्न करना चाहिये। बच्चे को ठीक अनुपात में विटामिन, शुद्ध वायु, सूर्य की धूप तथा उपर्युक्त भोजन मिलने की पूर्ण व्यवस्था रखनी चाहिये। दन्तोद्भेद के समय बच्चे के मसूड़ों पर मधु में मिलाकर सुहागे की खील, उंगली में लगाकर ग्लिसरीन या नींबू का टुकड़ा रगड़ना चाहिये, इससे दांत सुखपूर्वक निकल आते हैं। दन्तोद्भेद के समय बच्चे के भोजन की मात्रा घटाकर १/४ कर देना चाहिये तथा उस कम की हुई भोजन की मात्रा को शुद्ध जल द्वारा पूरा करना चाहिये। प्रयत्न करना चाहिये कि बच्चे को कोष्ठबद्धता (Constipation) न रहे, एतदर्थ १/२ ग्रेन मुग्धरस (Grey powder) दिन में दो बार देकर पेट साफ कर देना चाहिये। मुंह में चूसने के लिये बच्चे को कोई कड़ी चीज देनी चाहिये जिससे उसके हनु (Jaw) की वृद्धि (विकास) पूर्ण रूप से हो सके।
एकविंशतितमोऽध्यायः ।
............................. रोहिणी स्वयङ्गुप्तामूलं द्वे हरिद्रे बृहतीफलरसैर्धृतार्धवत् पचेत्, पच्यमानेऽपामार्गं चावपेत् । सिद्धेन कर्णपालीमहन्यहनि प्रक्षयेद्दिमृद्दीयाच्च, आशु वर्धते पीना समा च पाली भवति । मधूच्छिष्टसर्जरसयववत्सकैरण्डान्यन्तर्धूमं दग्ध्वा तेन भस्मना म्रक्षितां कर्णपालीं विमृद्दीयात्, आशु वर्तते पीना समा च पाली भवतीति ।
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कर्णपाली की वृद्धि के उपाय—रोहिणी (कुटकी) कौंच की जड़, हरिद्रा, दारुहरिद्रा तथा कटेरी के रस में इनसे आधे परिमाण में घृत डालकर पकावे। पकती हुई अवस्था में ही इसमें अपामार्ग का चूर्ण डाल दे। इस सिद्ध घृत से कर्णपाली (लौर—Lobule) को प्रतिदिन रगड़े तथा मालिश करे। इससे कर्णपाली शीघ्र बढ़ती है तथा मोटी और समान (स्पर्श में समान—चिकनी) होती है। उपर्युक्त घृत से स्निग्ध हुई कर्णपाली पर मोम, राल, जौ, इन्द्रजौ तथा एरण्ड के पत्तों को अन्तर्धूम विधि से जलाकर उस भस्म को उस पर लगावे (Dust करे)। इससे कर्णपाली शीघ्र बढ़ती है तथा मोटी और चिकनी भी हो जाती है।
वक्तव्य—कर्णपाली बढ़ाने के लिये सुश्रुत सू. अ. १६ में निम्न योग दिये हैं—१. अथास्याप्रदुष्टस्याभिवर्धनार्थंप्रयत्य्ङ्गः । तद्यथा-गोधाप्रतुदविष्किरानूपौदकवसामज्जानी पयः सर्पिस्तैलं गौरसर्षपजं च यथालाभं संभृत्यार्कलर्कबलातिबलानन्ता-पामार्गाश्वगन्धाविदारिगन्धा क्षीरशुक्लाजलशूकमधुरवर्गपयस्याप्रतिवापं तैलं वा पाचयित्वा स्वनुगुप्तं निदध्यात् । स्वेदितोन्मर्द्दितं कर्णं स्नेहेनैतेन योजयेत् । अथानुपद्रवः सम्यग्बलवांश्च विवर्धते ।। स्वेद और मालिश किये हुए कान पर उपर्युक्त ओषधियों से सिद्ध किये हुए तैल का प्रयोग करने से कर्णपाली वृद्धि को प्राप्त होती है। २. यवाश्वगन्धाष्ट्याह्नैस्तैलैश्चोद्वर्तनं हितम् । ३. शतावर्यह्वगन्धाभ्यां पयस्यैरण्डजीवनैः । तैलं विपक्वं सक्षीरमभ्यङ्गात् पलिवर्धनम् ।। ४. ये तु कर्णा न वर्धन्ते स्वेदस्नेहोपपादिताः । तेषामपाङ्गदेशे तु कुर्यात् प्रच्छानमेव तु ।। उपर्युक्त स्नेहन, स्वेदन अभ्यङ्ग आदि के द्वारा यदि कर्णपाली की वृद्धि न हो तो अपाङ्गदेश (कर्णपुत्रिका के थोड़ा नीचे) छिद्र करना चाहिये।
तत्र श्लोकाः ।
नाभिश्रराजपुत्राणामन्येषां वा महात्मनाम् । कर्णान् विध्येत् सुखप्रेप्सुरिह लोके परत्र च ।।