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काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 380, कुल 942 में से

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२२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् चूडाकरणीयाध्यायः २१]

आमच्छेदेऽत्ययो ह्यत्र कुवेधाद्ग्रोपजायते । अभिषक् तत्र मन्दात्मा किं करिष्यत्यशास्त्रवित् ।।

इह लोक तथा परलोक में सुख को चाहने वाले अज्ञानी वैद्य को राजपुत्रों अथवा अन्य बड़े लोगों के कानों का वेध नहीं करना चाहिये । आमच्छेद (कच्चे वेध) अथवा कुवेध (गलत तरीके से वेध) करने पर यदि कोई उपद्रव हो जाय तो शास्त्रों को न जानने वाला, मन्दबुद्धि तथा अज्ञानी वैद्य क्या करेगा ।

कदा वेध्यं कथं वेध्यं कुत्र वेध्यं कथं व्यधः ।
हितोऽहितोऽत्ययः कश्च तत्राज्ञः किं प्रपत्स्यते ।।
तस्माद्भिषक् सुकुशलः कर्णं विध्येद्विचक्षणः । शिशोर्हर्षप्रमत्तस्य धर्मकामार्थसिद्धये ।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।
इति चूडाकरणीयोऽध्याय एकविंशतितमः ।।२१।।


कर्णवेधन कब, कैसे, तथा कहां करना चाहिये ? किस प्रकार का वेध हितकर तथा अहितकर है ? इसके उपद्रव क्या हैं ? इत्यादि बातों का मूर्ख वैद्य को कुछ पता नहीं होता । इसलिये अत्यन्त कुशल एवं निपुण चिकित्सक को धर्म, काम तथा अर्थ (धन) की प्राप्ति के लिये हर्ष से युक्त शिशु के कर्ण का वेधन करना चाहिये । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।

**वक्तव्य—**भारत में साधारणतया सब प्रदेशों में उत्पत्ति के पश्चात् बालकों के कानों के वेधन की प्रथा प्रचलित है । कर्णवेधन से बहुत से रोग नहीं हो पाते हैं—ऐसा प्राचीन ऋषियों का विश्वास था । हमारे चिकित्सा ग्रन्थों एवं धर्मशास्त्रों में अनेक स्थानों पर इसका उल्लेख मिलता है । सुश्रुत में कर्णवेधन की विधि अत्यन्त विस्तार से दी हुई है । वहां उसकी विधि के साथ २ उसका प्रयोजन, उपद्रव, तथा चिकित्सा आदि का भी वर्णन मिलता है । सुश्रुत सू. अ. १६ में कहा है—'रक्षाभूषणनिमित्तं बालस्य कर्णौ विध्येते । तौ षष्ठे मासि सप्तमे वा शुक्लपक्षे प्रशस्तेषु तिथिकरणमुहूर्तनक्षत्रेषु कृतमङ्गलस्वस्तिवाचनं धात्र्यङ्के कुमारधराङ्के वा कुमारमुपवेश्य बालक्रीडनकैकैः प्रलोभ्याभिसान्त्वयन् भिषग् वामहस्तेनाकृष्य कर्णं दैवकृते छिद्र आदित्यकरावभासिते शनैः शनैर्दक्षिणहस्तेनर्जु विध्येत्, प्रतनुकं सूच्या, बहलमारया, पूर्वं दक्षिणंकुमारस्य, वामं कुमार्याः, ततः पिचुवर्ति प्रवेशयेत् ।। इससे प्रतीत होता है कि कर्णवेधन का उद्देश्य बालकों की ग्रहबाधाओं से रक्षा करना तथा उनमें आभूषण पहनाना है । कहा भी है-कर्णव्यधे कृते बालो न ग्रहैरभिभूयते । भूष्यते तु मुखं यस्मात् कार्यस्तत् कर्णयोर्व्यधः ।। कर्णवेधन छठे या सातवें मास में किया जाता है । डल्हण के अनुसार कर्णवेधन के लिये छटा या सातवां महीना जन्म से न लेकर भाद्रपद से लेना चाहिये । तदनुसार माघ या फाल्गुन मास आता है । यह शिशिर ऋतु है । इस ऋतु में कर्णवेधन का मुख्य कारण यह प्रतीत होता है कि उस समय व्रण में पाक (Suppuration) का डर बहुत कम होता है तथा व्रण का रोपण भी शीघ्र हो है । इसीलिये धर्मशास्त्रों में जो कर्णवेधन का विधान दिया है वह छठे या सातवें मास में नहीं दिया है अपितु तीसरे या पांचवें वर्ष में दिया है । कात्यायन गृह्यसूत्र १-२ का वचन है-‘‘कर्णवेधो वर्षे तृतीये पञ्चमे वा’’ । कर्णपाली के बीच में एक स्वाभाविक पतला सा छिद्र होता है उसी में वेध करना चाहिये क्योंकि उस स्थान पर शिरा, धमनी नाड़ी आदि नहीं होती हैं तथा इस भाग में तरुणास्थि भी नहीं होती है । यहां केवल fibrous tissue तथा थोड़ी वसा होती है । इसी स्थान को दैवकृत छिद्र शब्द से कहा गया है । वेधन के बाद छिद्र में एक पतला सा धागा डाल दिया जाता है जिससे वह छिद्र बन्द न हो जाय ।

**उपद्रव—**विपरीत कर्णवेधन से तीन प्रकार के उपद्रव हो सकते हैं । (१) रक्तस्राव-धमनी आदि के बिंध जाने से होता है (२) वेदना-यह नाडी (Nerve) के बिंध जाने से होती है (३) ज्वर इत्यादि-व्रण में सफाई आदि के न होने

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