काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंस्नेहाध्यायः २२] सूत्रस्थानम् २३
से जीवाणुओं के प्रवेश (Infection) से ज्वर आदि रोग हो जाते हैं। इसलिये पहले से ही अच्छी प्रकार स्थान देखकर वेधन करे तथा व्रण में जीवाणुओं का प्रवेश न हो सके-इसका प्रयत्न करे। इस अध्याय का नाम चूड़ाकरणीय अध्याय है जैसा कि अध्याय के अन्त में लिखे वाक्य "इति चूडाकरणीयोऽध्याय एक विंशतितमः" से स्पष्ट है। यह अध्याय प्रारम्भ में खण्डित है इसलिये संभवतः इसके खण्डित अंश में चूड़ाकर्म का प्रकरण दिया हो। चूड़ाकर्म या चूड़ाकरण से अभिप्राय प्रथम बार बालक के सिर के बालों को कटवाने से है जिसे केशच्छेदन या मुण्डन संस्कार कहते हैं। यह बालक के जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त (निषेकादिश्मशानान्तो नित्यं यस्योदितो विधिः) किये जाने वाले वैदिक संस्कारो, में से आठवां सस्कार है। आश्वलायन गृह्यसूत्र १/१७/१ के अनुसार यह संस्कार तृतीय वर्ष में किया जाता है। कहा भी है- "तृतीये वर्षे चौलम्'। पारस्कर गृह्यसूत्र २/१/१ के अनुसार यह प्रथम वर्ष में किया जाता है कहा है— सांवत्सरिकस्य चूडाकरणम्' ।
इति चूडाकरणीयोऽध्याय एकविंशतितमः ॥२१॥
द्वाविंशतितमोऽध्यायः
अथातः स्नेहाध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥
अब हम स्नेहाध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
स्नेहो द्वियोनिरुक्तश्चतुर्विकल्पश्चराचरसमुत्थः। सर्पिर्मज्जवसाख्यं खगमृगजलजप्रभवमाहुः ॥३॥
तैलानि चौद्भिदेभ्यस्तिलचूतसर्षपबिभीतबिल्वेभ्यः । एरण्डातसिशिग्रुमधूकमूलककरञ्जेभ्यः ॥४॥
स्नेह की दो योनियां (उत्पत्ति स्थान या कारण) कहीं गई हैं। तथा चर और अचर उत्पत्ति वाले इसके चार विकल्प माने गये हैं। इनमें से घृत, मज्जा, तथा वसा तीनों पक्षी, पशु तथा जल के (अर्थात् सब प्रकार के) प्राणियों से उत्पन्न होते हैं। तथा चौथा स्नेह (तैल) तिल, आम्र, सरसों, बहेड़ा, बिल्व, एरण्ड, अलसी, सुहांजना, महुआ, मूली, तथा करञ्ज आदि उद्भिदों (वनस्पतियों) से प्राप्त होता है।
**वक्तव्य—**चरक सू. अ. १३ में कहा है—स्नेहानां द्विविधा सौम्य ! योनिः स्थावरजङ्गमा । स्नेह के स्थावर और जंगम (चर-अचर) भेद से दो प्रकार के उत्पत्ति स्थान माने गये हैं। वही आगे पुनः कहा है-तिलः पियालाभिषुकौ विभीतकश्चित्राभवैरण्डमधूकसर्षपाः । कुसुम्भबिल्वारुकमूलकातसौनिकोचकाक्षोडकरञ्जशिग्रुकाः ।। स्नेहाश्च याः स्थावरसंज्ञिता तथा स्युर्जङ्गमा मत्स्यमृगाः सपक्षिणाः । तेषां दधिक्षीरघृतामिषं वसा नेहेषु मज्जा च तथोपदिश्यते ।। इस प्रकार तैल साधारणतया स्थावर तथा घृत, वसा और मज्जा जंगम स्नेह माने गये हैं। साधारणतया इसलिये कहा है कि तैल भी मछली आदि से प्राप्त किया जाता है।
घृततैलवसामज्जां पूर्वः पूर्वो वरोऽन्ये (न्ये) भ्यः । मुख्यं घृतेषु गव्यं संस्कारात् सर्वसात्म्याच्च ॥५॥
घृत, तैल, वसा तथा मज्जा इनमें से यथा पूर्व अगले से श्रेष्ठ माना गया है अर्थात् घृत तैल से, तैल वसा से तथा वसा मज्जा से श्रेष्ठ है। घृतों में भी संस्कार तथा सबके लिये सात्म्य होने के कारण गोघृत मुख्य माना गया है।
**वक्तव्य—**संस्कार से अभिप्राय संस्कार के अनुवर्तन से है अर्थात् यह अपने गुणों को त्यागे बिना ही संस्कारार्थ डाली गई अन्य ओषधियों के गुणों को अपने अन्दर धारण करता है। अन्य स्नेहों में ये गुण नहीं हैं। वे संस्कारार्थ डाली