भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 382

२४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् स्नेहाध्यायः २२]

गई अन्य ओषधियों के संसर्ग से अपने गुणों को त्याग देते हैं। चरक में भी घृत को सब स्नेहों से श्रेष्ठ माना है। परन्तु वहां गोघृत का विशेष परिगणन नहीं किया गया है अपितु सामान्य रूप से ही घृत के गुण लिखे हैं। कहा है—सर्पिस्तैल वसा मज्जा सर्वस्नेहोत्तमा मताः। एभ्यश्चैवोत्तमः सर्पिः संस्कारस्यानुवर्तनात् ॥ घृत की सर्वोत्तमता को दिखाते हुए अष्टाङ्ग संग्रह में कहा है—माधुर्यादविदाहित्वाज्जन्माद्येव च शीलनात्। अर्थात् उसकी श्रेष्ठता के मधुर, अविदाहि एवं जन्म से ही घृत का निरन्तर प्रयोग—ये तीन हेतु अधिक दिये हैं। जन्म से जिस वस्तु का सेवन किया जाता है वह सात्म्य हो जाती है इसी लिये प्रकृत संहिता के उपर्युक्त श्लोक में 'सर्वसात्म्याच्च' विशेषण दिया गया है।

विनिहन्ति पित्तमनिलं पीतं सर्पिः कफं न च चिनोति।
जनयति बलाग्निमेधाः शोधयति शुक्रं च योनिं च ।।६।।

घृत के सामान्य गुण—घृत सेवन किया जाने पर पित्त तथा वायु का शमन करता है परन्तु कफ का संचय नहीं करता। यह बल, अग्नि और बुद्धि को बढ़ाता है तथा शुक्र और योनि का शोधन करता है। चरक निदान स्थान के प्रथम अध्याय में कहा है—स्नेहात्वात् शमयति शैत्यात्पित्तं नियच्छति। घृतं तुल्यगुणं दोषं सस्कारात्तु जयेत् कफम्।। उपर्युक्त श्लोक द्वारा घृत के अन्य गुण दिये गये हैं। सुश्रुत सू. अ. ४५ में घृत के निम्न सामान्य गुण दिये गये हैं—घृतं तु मधुरं सौम्यं मृदु शीतवीर्यमल्पाभिष्यन्दिस्नेहनमुदावर्त्तोन्मादापस्मारशूलज्वरानाहवातपित्तप्रशमनमग्निदीपनं स्मृतिमतिमेधा-कान्तिस्वरलावण्यसौकुमार्यौजस्तेजोबलकरमायुष्यं वृष्यं मेध्यं वयःस्थापनं गुरु चक्षुष्यं श्लेष्माभिवर्धनं पाप्मालक्ष्मीप्रशमनं विषहरं रक्षोघ्नं च।।

उष्णं कफानिलघ्नं स्वरवर्णकरं तनुस्थिरीकरणम्। भग्नच्युतसन्धानं धातुव्रणशोधनं तैलम् ।।७।।

तैलों के सामान्य गुण—तैल उष्ण, कफ तथा वायु का नाशक (उष्ण एवं स्निग्ध होने से), स्वर तथा वर्ण को निखारने वाला, शरीर को स्थिर-दृढ़ करनेवाला, भग्न (Fracture) एवं च्युत (सन्धिभ्रंश-Dislocation) को ठीक करनेवाला तथा धातु एवं व्रण का शोधक है। चरक सूत्रस्थान के स्नेहाध्याय में तैलों के निम्न गुण दिये हैं-मारुतघ्नं न च श्लेष्मवर्धनं बलवर्धनम्। त्वच्यमुष्णं स्थिरकरं तैलं योनिविशोधनम्।। सुश्रुत सूत्रस्थान में भी तैलों के बहुत से गुण दिये हुए हैं। उन्हें वहीं देखना चाहिये।

मज्जावसे विशेषाद्वातघ्ने वृष्यसंमते चैव। बलिनां तत्सात्म्यानां प्रजाबलायुः स्थिरीकरणे ।।८।।

मज्जा तथा वसा के सामान्य गुण—मज्जा तथा वसा विशेषकर वातघ्न हैं, ये वृष्य माने गये हैं तथा बलवान् एवं जिन्हें ये सात्म्य हों-उन पुरुषों में सन्तानोत्पत्ति, बल एवं आयु को स्थिर करते हैं। चरक सू. अ. १३ में इनके निम्न गुण दिये हैं—विद्धभग्नाहतभ्रष्टयोनिकर्णशिरोरुजि। पौरुषोपचये स्नेहे व्यायामे चेष्यते वसा ।। बलशुक्ररसश्लेष्म मेदोमज्जविवर्धनः। मज्जा विशेषतोऽस्थां च बलकृत्स्नेहने हितः ।। अर्थात् इनका प्रयोग मुख्य रूप से बल एवं वीर्यवृद्धि के लिये होता है।

नित्यानित्यात्मविधौ तिलतैलघृते बुधः प्रयुञ्जीत।
एरण्डशङ्खिनीभ्यां स्त्रंसनमन्यद्रसायनं नास्ति ।।९।।

ज्ञानी मनुष्य को दैनिक व्यवहार में प्रतिदिन तिलतैल तथा घृत का प्रयोग करना चाहिये। तथा एरण्ड और शङ्खिनी (श्वेत अपराजिता) के तैल द्वारा होनेवाले विरेचन से बढ़-कर दूसरा कोई रसायन नहीं है। अर्थात् दैनिक प्रयोग के लिये घृत अथवा तिलों का तैल ही काम में लेना चाहिये। जहाँ विरेचन देने का उद्देश्य हो वहाँ एरण्ड तथा शङ्खिनी के तेल का प्रयोग करना चाहिये।