काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंस्नेहाध्यायः १२] सूत्रस्थानम् २५
मज्जावसे वसन्ते, प्रावृषि तैलं, पिबेच्छरदि सर्पिः।
सर्पिर्वा सर्वेषां सर्वस्मिञ्छक्यते पातुम् ॥१०॥
स्नेहों के सेवन काल—मज्जा तथा वसा का वसन्त ऋतु में, तैल का प्रावृट् में तथा घृत का शरद् ऋतु में सेवन करना चाहिये। अथवा घृत का सब व्यक्ति सब ऋतुओं में सेवन कर सकते हैं।
वक्तव्य—वसन्त, प्रावृट् तथा शरद् साधारण ऋतुयें कहाती हैं। इनमें न सर्दी अधिक पड़ती है; न गरमी तथा न वर्षा। शोधन की दृष्टि से ही इन तीनों ऋतुओं का परिगणन किया गया है। क्योंकि स्नेहन के बाद स्वेदन तथा फिर पञ्चकर्म द्वारा शोधन कराया जाता है। अष्टाङ्गसंग्रह सू. अ. २५ में निम्न प्रकार से वर्णन किया गया है—तैलं प्रावृषि वर्षान्ते सर्पिरन्यौ तु माधवे। सर्वं सर्वस्य च स्नेहं युज्याद् भास्वति निर्मले॥ ऋतौ साधारणे ........................॥ अर्थात् स्नेहपान साधारण ऋतुओं में ही किया जाता है। अधिक सर्दी, गर्मी एवं वर्षा में स्नेहपान साधारणतया निषिद्ध है। आत्ययिक अथवा शीघ्रकारी व्याधियों के लिये शास्त्रों में इसके अपवाद भी दिये हैं।
अनुपानमुष्णमुदकं घृतस्य, तैलस्य यूषमिच्छन्ति।
मज्जवसयोस्तु मण्डं, सर्वेषां कश्यपः पूर्वम् ॥११॥
स्नेहों के अनुपान-घृत का अनुपान उष्ण उदक है (घृत के पश्चात् उष्ण जल पीना चाहिये), तैल का यूष तथा मज्जा और वसा का अनुपान मण्ड है। अथवा भगवान् कश्यप के मत में पहला अर्थात् उष्णजल सब स्नेहों का अनुपान हो सकता है। चरक में इसी अभिप्राय को निम्न श्लोकों में प्रकट किया गया है—जलमुष्णं घृते पेयं, यूषस्तैलेऽनुशस्यते। वसामज्जोस्तु मण्डः स्यात्सर्वेषूष्णमथाम्बु वा॥ स्नेहों के अनुपान के रूप में उष्णोदक के प्रयोग के विषय में सुश्रुत सू. अ. ४६ में कहा है—उष्णोदकानुपानस्तु स्नेहानामथ शस्यते। ऋते भल्लातकस्नेहात्स्नेहात्तोवरकात्तथा॥ अर्थात् उसने भिलावे और तुवरक (Chaulmoogra oil) के तेल में अनुपान रूप में उष्णोदक का निषेध किया है। इनके बाद शीतल जल का ही प्रयोग करना चाहिये।
शूलकफानिलतृष्णाहिक्कारोचकविबन्धगुल्मघ्नम्। व्रणधातुमृदूकरणं दीपनमुष्णोदकमुशन्ति ॥१२॥
उष्णजल के गुण—उष्णजल--शूल, कफ, वायु, तृष्णा, हिक्का, अरुचि, मलबन्ध तथा गुल्म का नाशक है। यह व्रण और धातुओं को मृदु करता है तथा दीपन है।
पादावशेषसिद्धं तद्दोषघ्नैः शृतं जलं मुख्यम्। पेयं कवलग्राहं स्नेहं हि तथा विलाययति ॥१३॥
उष्णोदक की अनुपानविधि—भिन्न २ दोषों को नष्ट करनेवाले द्रव्यों से शृत बनाकर (पकाकर) चतुर्थांश शेष रहने पर उस जल का पान करना चाहिये तथा कवल धारण करना चाहिये। इससे सेवन किये हुए स्नेह का विलय हो जाता है।
वक्तव्य—कवल से अभिप्राय मुँह में पानी लेकर कुल्ले (गरारे-Gargles) करने से है। कहा भी है—सुखं संचार्यते या तु मात्रा सा कवलग्रहा। असंचार्या तु या मात्रा गण्डूषः स प्रकीर्तितः॥ अर्थात् यदि जल केवल मुँह में धारण किया जाय तो उसे गण्डूष कहते हैं। यह दोनों में अन्तर है।
पयसि दधनि मधुमये तूक्ते नोष्णोदकं भवेत् पथ्यम्।
पित्ते रक्तस्रावे गर्भच्यवने च गर्भदाहे च ॥१४॥
उष्णोदक अनुपान का निषेध—दूध, दही तथा मधु युक्त द्रव्य के सेवन के बाद तथा पित्तप्रकोप, रक्तस्राव (Haemorrhage) गर्भच्युति (Abortion) तथा गर्भदाह में उष्णोदक का अनुपान नहीं करना चाहिये।