काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 384, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| २६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | स्नेहाध्यायः २२] |
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ओदनविलेपिकाभ्यां रसमांसक्षीरदधियवागूभिः । काम्बलिकसूपयूषैः पेयाशनभक्ष्यविकृतीभिः ।।१५।।
स्नेहप्रयोग इष्टः सोर्ध्वाधः कर्मभिः खला(डा)भ्यङ्गैः । चक्षुर्वदनश्रोत्रैर्धारणयोगश्च सात्म्यज्ञैः ।।१६।।
स्नेहों की प्रविचारणाएँ—१. ओदन २. विलेपी ३. मांसरस ४. मांस ५ क्षीर (दूध) ६. दही ७. यवागू ८. काम्बलिक ९. सूप १०. यूष ११. पेया १२. अशन तथा १३. भक्ष्य की विकृतियाँ १४. ऊर्ध्वकर्म (वमन) १५. अधःकर्म (विरेचन) १६. खल या खड १७. अभ्यङ्ग (मालिश) १८ जिन्हें सात्म्य हों वे चक्षु (नेत्रतर्पण) १९. वदन (गण्डूष) तथा २०. श्रोत्र (कर्णतेल) द्वारा धारण करके स्नेह का प्रयोग कर सकते हैं।
वक्तव्य—उपर्युक्त विधियों से स्नेह का प्रयोग किया जा सकता है। चरक में इनके लिये प्रविचारणा शब्द दिया गया है। चरक में इनका निम्न रूप में वर्णन किया गया है—ओदनश्च विलेपी च रसो मांसं पयो दधि । यवागूः सूपशाकौ च यूषः काम्बलिकः खडः ।। शक्तवस्तलपिष्टं च मद्यं लेहास्तथैव च। भक्ष्यमभ्यञ्जनं बस्तिस्तथा चोत्तरबस्तयः ।। गण्डूषः कर्णतैलं च नस्यं कर्णाक्षितर्पणम् । चतुर्विंशतिरित्येताः स्नेहस्य प्रविचारणाः ।। अर्थात् चरक में इनकी संख्या २४ दी है। इससे प्रतीत होता है कि काश्यपसंहिता की अपेक्षा चरक में विकसित प्रक्रिया मिलती है। इनमें आये हुए ओदन विलेपी आदि की परिभाषाएँ निम्न हैं—अन्नं पञ्चगुणे साध्यं विलेपी तु चतुर्गुणे। मण्डश्चतुर्दशगुणे यवागूः षड्गुणेऽम्भसि ।। सिक्थकै रहितो मण्डः पेया सिक्थसमन्विता । यवागूर्बहूसिक्था स्याद्विलेपी विरलद्रवा ।। अर्थात् ओदन सिद्ध करने के लिये चावलों को पाँच गुने जल में पकाकर द्रव भाग निकाल दिया जाता है। विलेपी में चावलों की अपेक्षा चौगुना जल डालकर पकाया जाता है। मण्ड बनाने के लिये १४ गुना तथा यवागू के लिये ६ गुना जल में चावलों को पकाना चाहिये। सूप-द्रवरूप पकाई हुई दाल को सूप कहते हैं। इसमें दाल की अपेक्षा १४ या १८ गुना जल देकर पकाया जाता है। चतुर्थांश जल शेष रहने पर उतार लिया जाता है। यूष-इसके लिये दाल को पोटली में बाँधकर १८ गुने जल में पकाया जाता है। जल आधा शेष रहने पर पोटली को निकाल लें। अवशिष्ट द्रव यूष कहलाता है। खड, काम्बलिक आदि का लक्षण—पिशितेन रसस्तत्र यूषो धान्यैः खडः फलैः । मूलैश्च तिलकल्काम्लप्रायः काम्बलिकः स्मृतः ।। अर्थात् फलों से जो द्रव तैयार किये जाते हैं उन्हें खड तथा मूलों से प्रायः तिलकल्क और अनारदाने आदि की खटाई देकर जो द्रव तैयार किया जाता है उसे काम्बलिक कहते हैं।
पित्तानिलप्रकृतयः स्नेहं रात्रौ पिबेयुरुष्णे च ।
श्लेष्माधिको दिवोष्णे निर्मलसूर्ये लघुत्वे च ।।१७।।
अपवाद तथा दोषभेद से स्नेहपान का काल-पित्त और वातप्रकृति वालों को आत्ययिक रोग में यदि गर्मी में भी स्नेहपान करना पड़े तो रात्रि में करना चाहिये। तथा जिसमें कफ अधिक हो उन्हें आत्ययिक रोग में यदि स्नेहपान आवश्यक हो तो दिन की गर्मी में जब कि सूर्य निर्मल हो तथा शरीर लघु हो तब करायें। चरक में भी बिलकुल यही वर्णन मिलता है—वातपित्ताधिके रात्रावुष्णे चापि पिबेन्नरः । श्लेष्माधिके दिवा शीते पिबेच्चामलभास्करे ।। अष्टाङ्गसंग्रह में निम्न वर्णन मिलता है—सर्वं सर्वस्य च स्नेहं युञ्ज्याद् भास्वति निर्मले। ऋतौ साधारणे, दोषसाम्येऽनिलकफे कफे ।। दिवा, निश्यनिले पित्ते संसर्गे पित्तवत्यपि । त्वरमाणे तु शीतेऽपि दिवा तैलं च योजयेत् ।। उष्णोऽपि रात्रौ सर्पिश्च दोषादीन् वीक्ष्य चान्यथा ।। सुश्रुत चि. अ. ३१ में भी कहा है—शीतकाले दिवानेहमुष्णकाले पिबेन्निशि । वातपित्ताधिको रात्रौ वातश्लेष्माधिको दिवा ।। अर्थात् उपर्युक्त साधारण कालों के अतिरिक्त यदि आवश्यकता पड़े तो इनसे भिन्न कालों में भी अनुकूल समय देखकर स्नेहपान कराया जा सकता है।
तृण्मूर्च्छान्मादादीन् पूर्वो लभते विपर्ययेण पिबन् ।
आनाहारुचिपर्वण्युच्छूलं च समृच्छते शेषः ।।१८।।