भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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स्नेहाध्यायः १२] सूत्रस्थानम् २७

इनमें पूर्व अर्थात् पित्त और वातप्रकृति वाले पुरुष को विपरीत काल में अर्थात् अधिक गर्मी में स्नेहपान कराने से तृष्णा, मूर्छा तथा उन्माद हो जाता है। तथा शेष अर्थात् कफ प्रकृति वाले पुरुष को अधिक सर्दी में स्नेहपान कराने से आनाह, अरुचि तथा पर्वशूल हो जाता है।

स्नेहाच्छपाने त्रिविधा तु मात्रा ह्रस्वाऽथ मध्या महती तृतीया ।
ह्रस्वा दिनार्धेन, दिनेन मध्या, जीर्यत्यहोरात्रवशात् प्रधाना ॥१९॥

अच्छस्नेह की मात्रा—अच्छ (केवल-शुद्ध) स्नेहपान की तीन प्रकार की मात्रा मानी गई हैं। १. ह्रस्व (minimum) २. मध्यम (medium) ३. महान् (maximum)। ह्रस्व मात्रा आधे दिन (६ घण्टे) में, मध्यम मात्रा दिन भर (१२ घण्टे) में, तथा प्रधान मात्रा अहोरात्र (२४ घण्टे) में जीर्ण होती है। चरक में भी केवल शब्दों के भेद से यही अभिप्राय निम्न रूप में प्रकट किया गया है—अहोरात्रमहः कृत्स्नमर्धाहं च प्रतीक्षते । प्रधाना मध्यमा ह्रस्वा स्नेहमात्रां जरां प्रति ॥ इति तिस्रः समुद्दिष्टा मात्राः स्नेहस्य मानतः ॥ सुश्रुत ने ५ प्रकार की स्नेह की मात्राएँ बताई हैं—या मात्रा परिजीर्येत चतुर्थभागगतेऽहनि । सा मात्रा दीपयत्यग्निमल्पदोषे च पूजिता ॥ या मात्रा परिजीर्येत तथार्धदिवसे गते । सा वृष्या बृंहणी चैव मध्यदोषे च पूजिता ॥ या मात्रां परिजीर्येत चतुर्भागावशेषिते । स्नेहनीया च या मात्रा बहुदोषे च पूजिता । या मात्रा परिजीर्येत्तु तथा परिणतेऽहनि । ग्लानिर्मूर्छामदान् हित्वा सा मात्रा पूजिता भवेत् ॥ अहोरात्रादसन्दुष्टा या मात्रा परिजीर्यति । सा तु कुष्ठ विषोन्मादग्रहापस्मारनाशिनी ॥ अर्थात् जो मात्रा क्रमशः एक, दो, तीन, चार तथा आठ प्रहर में जीर्ण हो।

दीप्ताग्नयो बलिनः स्नेहनित्या उन्मादिनो धृतिविण्मूत्रसक्ताः ।
गुल्मार्दिताश्चाहिदष्टा विरूक्षा वैसर्पिणः प्रवरां ते पिबेयुः ॥२०॥

स्नेह की उत्तममात्रा किन्हें देनी चाहिये—जिनकी जाठराग्नि दीप्त है, जो बलवान् हैं, जो प्रतिदिन स्नेह का प्रयोग करते हैं, जिन्हें उन्माद रोग हो, जिनकी धृति (धारण शक्ति) कमजोर हो, जिन्हें मल एवं मूत्र कठिनता से आता हो, जो गुल्मरोग से पीडित हों, जो सर्प द्वारा दष्ट हों, जिनकी प्रकृति रूक्ष हो तथा जिन्हें विसर्प रोग हो-उन्हें स्नेह की उत्तम मात्रा पीनी चाहिये। चरक सू. अ. १३ में कहा है—प्रभूतस्नेहनित्या ये क्षुत्पिपासा सहा नराः । पावकश्चोत्तमबलो येषां ये चोत्तमा बले ॥ गुल्मिनः सर्पदष्टाश्च वीसर्पोपहताश्च ये । उन्मत्ताः कृच्छ्रमूत्राश्च गाढवर्चस एव च ॥ पिबेयुरुत्तमां मात्रां ।

प्रमेहकुष्ठानिलशोणितारुचिविचर्चिकास्फोटविशेषु कण्डौ ।
मृदौ तथाऽग्नौ प्रवदन्ति मध्यां बले च मध्या अशने च ये स्युः ॥२१॥

स्नेह की मध्यम मात्रा किन्हें देनी चाहिये—प्रमेह, कुष्ठ, वातरक्त, अरुचि, विचर्चिका (Pemphigus) फोड़े, विषविकार तथा कण्डू (खुजली) के रोगियों में, जिनकी जाठराग्नि मृदु है, जो मध्यबल वाले हैं तथा जो खाने में भी मध्यम हों अर्थात् जो न बहुत अधिक खाते हों और न बहुत कम—उन्हें स्नेह की मध्यम मात्रा देनी चाहिये। चरक सू. अ. १३ में कहा है—अरुष्कास्फोटपिडकाकण्डूपामाभिरर्दिताः । कुष्ठिनश्च प्रमीढाश्च वातशोणितिकाश्च ये ॥ नातिबद्धाशिनश्चैव मृदुकोष्ठास्तथैव च । पिबेयुर्मध्यमां मात्रां मध्यमाश्नापि ये बले ॥

बालेषु वृद्धेषु सुखोचितेषु जीर्णेऽतिसारे ज्वरकासयोश्च ।
येषां हि कोष्ठो न गुणाय रिक्तो मन्दाग्निकाश्ये॑ च कनीयसी स्यात् ॥२२॥

स्नेह की ह्रस्व मात्रा किन्हें देनी चाहिये—बालक, वृद्ध तथा जो सुख के अभ्यासी हैं (अर्थात् जो किसी प्रकार के परिश्रम के कार्य को करने के अभ्यासी नहीं हैं), जीर्ण अतिसारज्वर तथा कासरोग में, कोष्ठ का खाली होना जिनके लिये हितकर न हो अर्थात् कोष्ठ के खाली होने पर जिन्हें कष्ट होता हो, जिनकी जाठराग्नि मन्द हो, तथा जो कृश हों—उन्हें