काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 386, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें२८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् स्नेहाध्यायः २२]
स्नेह की ह्रस्व मात्रा देनी चाहिये। चरक सू. अ. १३ में कहा है—ये तु वृद्धाश्च बालाश्च सुकुमाराः सुखोचिताः । रिक्तकोष्ठत्वमहितं येषां मन्दाग्नयश्च ये ।। ज्वरातिसारकासाश्च येषां चिरसमुत्थिताः । स्नेहमात्रां पिबेयुस्ते ह्रस्वां ये चावरा बले ।।
दोषानुकर्षिण्यनुसारिणी च यत्नोपचर्या बलवर्धनी च । ज्येष्ठाऽथ मध्या न बलं निहन्ति त्वन्योन्योः(?) स्नेहयते सुखाच्च ।। २३ ।। ह्रस्वा परिहारसुखाऽविकारा वृष्याऽथ बल्याऽप्यनुवर्तनी च । देशं वयःकालबलाग्निसात्म्यान्यालक्ष्यमात्रां मतिमान् विदध्यात् ।। २४ ।।
उपर्युक्त मात्राओं के गुण—स्नेह की उत्तम मात्रा सम्पूर्ण रोगों के मार्गों में जाते हुए दोषों को क्षीण या नष्ट करती है। यह यत्नपूर्वक सेवन करनी चाहिये (अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति आसानी से इस मात्रा का सेवन नहीं कर सकता) यह बल को बढ़ानेवाली है। मध्यम मात्रा—परस्पर एक दूसरे के बल को अधिक कम नहीं करती तथा सुख से स्नेहन कर देती है। ह्रस्व मात्रा—यह परिहार अर्थात् परहेज में सुखकर है (इस मात्रा का सेवन करते हुए परहेज स्वल्प मात्रा में तथा स्वल्प काल तक ही है) यह विकारों उपद्रवों को उत्पन्न नहीं करती तथा वृष्य (वीर्योत्पादक) है, यह बल को बढ़ाती है तथा शरीर में चिरकाल तक रहती है अर्थात् शीघ्र ही बाहर नहीं निकल जाती है। बुद्धिमान वैद्य को चाहिये कि वह देश (जांगल-आनूप आदि), अवस्था (बाल, वृद्ध, युवा आदि), काल (ग्रीष्म, शरद्, वर्षा आदि), अग्निबल तथा सात्म्य को देखकर मात्रा का निर्धारण करे अर्थात् उसे उत्तम, मध्यम और ह्रस्व में से कौन सी मात्रा देनी है—इसका निश्चय करे। इन मात्राओं के गुण चरक में निम्न प्रकार से दिये हैं—उत्तम मात्रा—विकारान् शमय येषां शीघ्रं सम्यक् प्रयोजिता । दोषानुकर्षिणी मात्रा सर्वमार्गानुसारिणी । बल्या पुनर्नवकरी शरीरेन्द्रियचेतसाम् ।। मध्यममात्रा—मात्रैषा मन्दविभ्रंशा न चातिबलहारिणी । सुखेन च स्नेहयति शोधनार्थे च युज्यते ।। ह्रस्वमात्रा—परिहारे सुखा चैषा मात्रा स्नेहनबृंहणी । वृष्या बल्या निराबाधा चिरं चाप्यनुवर्तते ।।
पित्तानिलात्माऽनिलपित्तरोगी क्षामः शिशुर्वर्णबलायुरक्तः (क्षी) । मेधेन्द्रियार्थी विषशस्त्रदाहैरार्ताः पिबेयुर्घृतमेव काले ।। २५ ।।
अब यह बतलाया जायगा कि उपर्युक्त स्नेहों में से कौन सा स्नेह किसके लिये हितकर है। घृत का सेवन किन्हें करना चाहिये—जिनकी पित्त एवं वातप्रकृति हो अथवा जिन्हें पैत्तिक एवं वातिक रोग हों, जो कमजोर हों, जो शिशु हों, जो वर्ण, बल, आयु, मेधा (धारण शक्ति) तथा इन्द्रियों को चाहनेवाले तथा जो विष, शस्त्र एवं दाह से पीडित हों— वे उचित काल में घृत का ही पान करें।
वक्तव्य—'काले' से अभिप्राय घृत के लिये निर्दिष्ट काल अर्थात् शरद् काल से है। पूर्व कहा है—‘पिबेच्छरदि सर्पिः’। चरक में निम्न वर्णन मिलता है—वातपित्तप्रकृतयो वातपित्तविकारिणः । चक्षुष्कामाः क्षताः क्षीणावृद्धाबालास्तथाऽबलाः ।। आयुः प्रकर्षकामाश्च बलवर्णस्वरार्थिनः । पुष्टिकामाः प्रजाकामाः सौकुमार्यार्थिनश्च ये ।। दीप्त्योजः स्मृतिमेधाग्निबुद्धीन्द्रियबलार्थिनः । पिबेयुः सर्पिरार्ताश्च दाहशस्त्रविषाग्निभिः ।। सुश्रुत चि. अ. ३१ में घृत के निम्न गुण दिये हैं—रूक्षक्षतविषार्तानां वातपित्तविकारिणाम्। हीनमेधास्मृतीनां च सर्पिः पानं प्रशस्यते ।।
प्रवृद्धमेदःकफमांसवाता नाडीकृमिव्याध्यनिलार्तदेहाः । क्रूरानुकोष्ठास्तनुवीर्यकामास्तैलं पिबेयुर्न तु तीव्रकुष्ठे ।। २६ ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके ३७ तमं पत्रम्।)