काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
२८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् स्नेहाध्यायः २२]
स्नेह की ह्रस्व मात्रा देनी चाहिये। चरक सू. अ. १३ में कहा है—ये तु वृद्धाश्च बालाश्च सुकुमाराः सुखोचिताः । रिक्तकोष्ठत्वमहितं येषां मन्दाग्नयश्च ये ।। ज्वरातिसारकासाश्च येषां चिरसमुत्थिताः । स्नेहमात्रां पिबेयुस्ते ह्रस्वां ये चावरा बले ।।
दोषानुकर्षिण्यनुसारिणी च यत्नोपचर्या बलवर्धनी च । ज्येष्ठाऽथ मध्या न बलं निहन्ति त्वन्योन्योः(?) स्नेहयते सुखाच्च ।। २३ ।। ह्रस्वा परिहारसुखाऽविकारा वृष्याऽथ बल्याऽप्यनुवर्तनी च । देशं वयःकालबलाग्निसात्म्यान्यालक्ष्यमात्रां मतिमान् विदध्यात् ।। २४ ।।
उपर्युक्त मात्राओं के गुण—स्नेह की उत्तम मात्रा सम्पूर्ण रोगों के मार्गों में जाते हुए दोषों को क्षीण या नष्ट करती है। यह यत्नपूर्वक सेवन करनी चाहिये (अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति आसानी से इस मात्रा का सेवन नहीं कर सकता) यह बल को बढ़ानेवाली है। मध्यम मात्रा—परस्पर एक दूसरे के बल को अधिक कम नहीं करती तथा सुख से स्नेहन कर देती है। ह्रस्व मात्रा—यह परिहार अर्थात् परहेज में सुखकर है (इस मात्रा का सेवन करते हुए परहेज स्वल्प मात्रा में तथा स्वल्प काल तक ही है) यह विकारों उपद्रवों को उत्पन्न नहीं करती तथा वृष्य (वीर्योत्पादक) है, यह बल को बढ़ाती है तथा शरीर में चिरकाल तक रहती है अर्थात् शीघ्र ही बाहर नहीं निकल जाती है। बुद्धिमान वैद्य को चाहिये कि वह देश (जांगल-आनूप आदि), अवस्था (बाल, वृद्ध, युवा आदि), काल (ग्रीष्म, शरद्, वर्षा आदि), अग्निबल तथा सात्म्य को देखकर मात्रा का निर्धारण करे अर्थात् उसे उत्तम, मध्यम और ह्रस्व में से कौन सी मात्रा देनी है—इसका निश्चय करे। इन मात्राओं के गुण चरक में निम्न प्रकार से दिये हैं—उत्तम मात्रा—विकारान् शमय येषां शीघ्रं सम्यक् प्रयोजिता । दोषानुकर्षिणी मात्रा सर्वमार्गानुसारिणी । बल्या पुनर्नवकरी शरीरेन्द्रियचेतसाम् ।। मध्यममात्रा—मात्रैषा मन्दविभ्रंशा न चातिबलहारिणी । सुखेन च स्नेहयति शोधनार्थे च युज्यते ।। ह्रस्वमात्रा—परिहारे सुखा चैषा मात्रा स्नेहनबृंहणी । वृष्या बल्या निराबाधा चिरं चाप्यनुवर्तते ।।
पित्तानिलात्माऽनिलपित्तरोगी क्षामः शिशुर्वर्णबलायुरक्तः (क्षी) । मेधेन्द्रियार्थी विषशस्त्रदाहैरार्ताः पिबेयुर्घृतमेव काले ।। २५ ।।
अब यह बतलाया जायगा कि उपर्युक्त स्नेहों में से कौन सा स्नेह किसके लिये हितकर है। घृत का सेवन किन्हें करना चाहिये—जिनकी पित्त एवं वातप्रकृति हो अथवा जिन्हें पैत्तिक एवं वातिक रोग हों, जो कमजोर हों, जो शिशु हों, जो वर्ण, बल, आयु, मेधा (धारण शक्ति) तथा इन्द्रियों को चाहनेवाले तथा जो विष, शस्त्र एवं दाह से पीडित हों— वे उचित काल में घृत का ही पान करें।
वक्तव्य—'काले' से अभिप्राय घृत के लिये निर्दिष्ट काल अर्थात् शरद् काल से है। पूर्व कहा है—‘पिबेच्छरदि सर्पिः’। चरक में निम्न वर्णन मिलता है—वातपित्तप्रकृतयो वातपित्तविकारिणः । चक्षुष्कामाः क्षताः क्षीणावृद्धाबालास्तथाऽबलाः ।। आयुः प्रकर्षकामाश्च बलवर्णस्वरार्थिनः । पुष्टिकामाः प्रजाकामाः सौकुमार्यार्थिनश्च ये ।। दीप्त्योजः स्मृतिमेधाग्निबुद्धीन्द्रियबलार्थिनः । पिबेयुः सर्पिरार्ताश्च दाहशस्त्रविषाग्निभिः ।। सुश्रुत चि. अ. ३१ में घृत के निम्न गुण दिये हैं—रूक्षक्षतविषार्तानां वातपित्तविकारिणाम्। हीनमेधास्मृतीनां च सर्पिः पानं प्रशस्यते ।।
प्रवृद्धमेदःकफमांसवाता नाडीकृमिव्याध्यनिलार्तदेहाः । क्रूरानुकोष्ठास्तनुवीर्यकामास्तैलं पिबेयुर्न तु तीव्रकुष्ठे ।। २६ ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके ३७ तमं पत्रम्।)
स्नेहाध्यायः १२] सूत्रस्थानम् २९
तैल का किन्हें सेवन करना चाहिये—जिनमें मेद, कफ, मांस तथा वात बढ़े हुए हों, जो नाडीव्रण, उदरकृमि तथा वातरोग से पीडित हों, जिनके कोष्ठ क्रूर हों, जो तनुता (कृशता-पतलापन) तथा वीर्य को चाहनेवाले हैं—उन व्यक्तियों को तैल का पान करना चाहिये। परन्तु तीव्र कुष्ठ में तैल का पान न करें। चरक सू. अ. १३ में कहा है—प्रवृद्धश्लेष्ममेदस्काश्चलस्थूलगलोदराः । वातव्याधिभिराविष्टा वातप्रकृतयश्च ये ।। बलं तनुत्वं लघुतां दृढतां स्थिरगात्रताम् । स्निग्धश्लक्ष्णतनुत्वक्तां ये च काङ्क्षन्ति देहिनः ।। कृमिकोष्ठाः क्रूरकोष्ठास्तथा नाडिभिर्दिताः । पिबेयुः शीतले काले तैलं तैलोचिताश्च ये ।। यद्यपि तैलपान का काल पहले प्रावृट् ऋतु बतलाया है परन्तु आत्ययिक विकारों में शीतकाल में भी तैल (स्नेह) पान कराया जा सकता है। इसीलिये अष्टाङ्गसंग्रह सू. अ. २५ में कहा है—निश्यनिले पित्ते संसर्गे पित्तवत्यपि । त्वरमाणे तु शीतेऽपि दिवा तैलं च योजयेत् ।।
(इति ताडपत्र पुस्तके ३७ तमं पत्रम्)
संशुष्कमेदःकफरक्तशुक्रा वातातपाध्वश्रमरौक्ष्यनित्याः ।
भृशाग्नयो वातनिपीडिताङ्गा वसां पिबेयुर्धृतिधातुकामाः ।।२७।।
वसा का किन्हें सेवन करना चाहिये—जिनके मेद, कफ, रक्त तथा शुक्र (वीर्य) सूख गये हों (क्षीण हो गये हों), जो नित्य वात, आतप (धूप) तथा मार्ग चलने के श्रम एवं रूक्षता को सहते हैं, जिनकी अग्नि तीव्र हो, वायु से जिनके अङ्ग पीडित हों, तथा जो धृति (धारण शक्ति) और धातुओं की वृद्धि चाहते हों उन्हें वसा का पान करना चाहिये। चरक सू. अ. १३ में कहा है—वातातपसहा ये च रूक्षा भाराध्वकर्शिताः । संशुष्करेतोरुधिरा निष्पीतकफमेदसः ।। अस्थिसन्धिशिरास्नायुमर्मकोष्ठमहारुजः । बलवामारुतो येषां खानि चावृत्य तिष्ठति ।। महच्चाग्निबलं येषां वसासात्म्याश्च ये नराः । तेषां स्नेहयितव्यानां वसापानं विधीयते ।। इसी प्रकार सुश्रुत चि. अ. ३१ में भी कहा है—व्यायामकशिताः शुष्करेतोरक्ता सहारुजः । महाग्निमारुतप्राणा वसायोग्या नराः स्मृताः ।।
दीप्ताग्नयो घस्मराः स्नेहनित्याः क्लेशक्षमाः क्रूरकोष्ठानिलार्ताः ।
मज्जानमेतेषु भिषग्विद्ध्यात् स्नेहो भवेत्सात्म्यतो यस्य यो वा ।।२८।।
मज्जा का किन्हें सेवन करना चाहिये—जिनकी अग्नि दीप्त हो, बहुत खानेवाले हों, जो नित्य स्नेह का सेवन करते हों, क्लेशों को सहनेवाले हों, जिनके कोष्ठ क्रूर हों तथा जो वातरोगी हों—उन्हें चिकित्सक को मज्जा का सेवन कराना चाहिये। अथवा जिनको जो भी स्नेह सात्म्य हों उसका सेवन करना चाहिये। चरक सू. अ. १३ में भी कहा है—दीप्ताग्नयः क्लेशसहा घस्मराः स्नेहसेविनः । वातार्ताः क्रूरकोष्ठाश्च स्नेह्मा मज्जानमाप्नुयुः ।। इसी प्रकार सुश्रुत चि.अ. ३१ में भी कहा हैं—क्रूराशयाः क्लेशसहा वातार्ता दीप्तवह्नयः । मज्जानमाप्नुयुः सर्वे ......... ।।
व्यायाममद्यचिन्तामैथुननित्याः श्रमाध्वकृशदेहाः ।
स्नेह्यास्तथाविधाः स्युर्बलकालवयोग्निसात्म्यज्ञैः ।।२९।।
किनका स्नेहन करना चाहिये—बल, काल, अवस्था, जाठराग्नि तथा सात्म्य को जाननेवालों को चाहिये कि नित्य व्यायाम करनेवाले, नित्य मद्य पीनेवाले, नित्य चिन्ता में लगे रहनेवाले अथवा मस्तिष्क संबन्धी कार्य अधिक करनेवाले, नित्य मैथुन (भोगविलास) में लगे रहने वाले, श्रम तथा मार्ग चलने से कृश देहवाले तथा अन्य भी इसी प्रकार के पुरुषों को स्नेहन करायें। चरक में स्नेहन के योग्य निम्न व्यक्ति दिये हैं—स्वेद्याः शोधयितव्याश्च रूक्षा वातविकारिणः । व्यायाममद्यस्त्रीनित्याः स्नेह्माः स्युर्ये च चिन्तकाः ।। अर्थात् यहाँ स्वेदन एवं संशोधन (वमन-विरेचन) के योग्य पुरुषों को विशेषरूप से गिनाया है। स्वेदन एवं संशोधन से पूर्व स्नेहन का करना अत्यन्त आवश्यक है। कहा भी है—स्नेहमग्रे प्रयुञ्जीत ततः स्वेदमन्तरम् । स्नेहस्वेदोपपन्नस्य संशोधनमनन्तरम् ।।
३० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् स्नेहाध्यायः २२]
न स्नेहयेद्गर्भिणीं न प्रसूतां न क्षीरपं नैव दग्धातिवृद्धौ । न श्लेष्मपित्तोपहतान्तराग्निं मूर्च्छारुचिग्लानिभृशामतृट्सु ॥ ३० ॥ बस्तौ न नस्तश्च विधिक्रियायां छर्द्यां ज्वरे विट्प्रकोपे कफे च । बृहत्त्वजाड्येषु गलामयेषु नस्नेहयेत् स्नेहमदात्ययेषु ॥ ३१ ॥ तेषां स्नेहाच्छपानान्ते (त्ते) वर्धन्ते व्याधयो भृशम् । असाध्यतां वा गच्छन्ति स्नेहपानाभिवर्धिताः ॥ ३२ ॥
किनका स्नेहन नहीं करना चाहिये—गर्भिणी, प्रसूता, दूध पीनेवाले बालक, दग्ध (जले हुए), जिनकी अतिवृद्धि हो (जिनके शरीर की आवश्यकता से अधिक वृद्धि हुई है), श्लेष्म एवं पित्त से जिनकी आन्तराग्नि क्षीण हुई है, मूर्च्छा, अरुचि, ग्लानि, अत्यन्त आमदोष तथा प्यास में, बस्ति एवं नस्यकर्म जिस समय किये जा रहे हों, छर्दि (वमन), ज्वर, मलरोग (अतिसार) तथा कफ के प्रकोप में, शरीर की अत्यन्त जड़ता में गले के रोगों में तथा स्नेह के अधिक सेवन से जिन्हें मदात्यय रोग हो जाता हो—उनका स्नेहन न करे इनको केवल स्वच्छ स्नेह का पान कराने से वे व्याधियाँ बढ़ जाती हैं तथा स्नेहपान से बढ़ी हुई व्याधियाँ असाध्य हो जाती हैं।
वक्तव्य—जो नित्य मद्य पीते हैं उनको स्नेहन करना चाहिये परन्तु जिन्हें अधिक मद्य के सेवन से मदात्यय रोग हो गया हो उनका स्नेहन नहीं करना चाहिये। चरक में निम्न पुरुष स्नेहन के अयोग्य गिनाये हैं—अभिष्यण्णाननगुदा नित्यं मन्दाग्नयश्च ये । तृष्णामूर्च्छापरीताश्च गर्भिण्यस्तालुशोषिणः ॥ अन्नद्विषश्छर्दयन्तो जठरामरगार्दिताः । दुर्बलाश्च प्रतान्ताश्च स्नेहम्लाना मदातुराः ॥ न स्नेह्या वर्तमानेषु न नस्तोबस्तिकर्मसु । स्नेहपानात्प्रजायन्ते तेषां रोगाः सुदारुणाः ॥ सुश्रुत चि. ३१ अ. में भी कहा है—विवर्जयेत् स्नेहपानमजीर्णी चोदरी ज्वरी । दुर्बलोऽरोचकी स्थूलो मूर्च्छार्तो मदपीडितः । छर्दार्दितः पिपासार्तः श्रान्तः पानक्लमान्वितः ॥ दत्तबस्तिर्विरिक्तश्च वान्तो यश्चापि मानवः । अकाले दुर्दिने चैव न च स्नेहं पिबेन्नरः ॥ अकाले च प्रसूता स्त्री स्नेहपानं विवर्जयेत् । स्नेहपानाद्भवन्त्येषां नृणां नानाविधा गदाः ॥ गदा वा कृच्छ्रतां यान्ति न सिध्यन्त्यथवा पुनः ॥ गर्भाशये सशेषा स्यू रक्तक्लेदमलास्ततः । स्नेहं जह्यान्त्रिषेवेत पाचनं रूक्षमेव च ॥
वायोरप्रगुणत्वं रौक्ष्यं खरताऽधृतिर्ज्वलनहानिः । शुष्कग्रथितपुरीषं लक्षणमस्निग्धगात्रस्य ॥ ३३ ॥
अस्निग्ध व्यक्ति के लक्षण—वायु का अपने गुणों से युक्त न होना अर्थात् अनुलोम न होना, रूक्षता, कर्कशता, अधैर्य (बेचैनी—uneasiness), जाठराग्नि की दुर्बलता, तथा पुरीष (मल) का सूखा और गाँठोंवाला होना—ये अस्निग्ध व्यक्ति के लक्षण हैं। चरक सू. अ. १३ में अस्निग्ध के निम्न लक्षण बताये हैं—पुरीषं ग्रथितं रूक्षं, वायुरप्रगुणो, मृदुः । पक्ता, खरत्वं रौक्ष्यं च गात्रस्यास्निग्धलक्षणम् ॥ इसी प्रकार सुश्रुत में भी ये ही लक्षण दिये हैं—पुरीषं ग्रथितं रूक्षं कृच्छ्रादन्नं विपच्यते । उरो विदहते वायुः कोष्ठादुपरि धावति ॥ दुर्वर्णो दुर्बलश्चैव रूक्षो भवति मानवः ॥
धृतिर्मृदुपुरीषत्वं मेधापुष्ट्यग्नितेजसां वृद्धिः । काले शरीरवृत्तिः स्निग्धस्य वदन्ति लिङ्गानि ॥ ३४ ॥
सम्यक् स्निग्ध के लक्षण—रोगी धैर्य (easiness) अनुभव करता है, मल मृदु (नरम) हो जाता है, मेधा, पोषण, जाठराग्नि तथा तेज की वृद्धि होती है और शरीर की सब वृत्तियाँ (कार्य) ठीक समय पर होती रहती हैं—ये सम्यक् स्निग्ध के लक्षण हैं। चरक सू. अ. १३ में सम्यक् स्निग्ध के निम्न लक्षण दिये हैं—वातानुलोम्य दीप्तोऽग्निर्वर्चः स्निग्धमसंहतम् । मार्दव स्निग्धता चाङ्गे स्निग्धानामुपजायते ॥
गौरवजाड्योत्क्लेशाध्मानानि पुरीषमविपक्वम् । अरुचिरपि पाण्डुतन्द्रे वदन्त्यतिस्निग्धलिङ्गानि ॥ ३५ ॥
स्नेहाध्यायः २२] सूत्रस्थानम् ३१
अतिस्निग्ध के लक्षण—शरीर का भारीपन, जड़ता, शरीर या इन्द्रियों का अच्छी प्रकार कार्य न करना, उत्क्लेश (जी मचलाना—Nausca), आध्मान (पेट का वायु के कारण फूलना), कच्चा मल आना (Undigested foeces), अरुचि, पाण्डुता तथा तन्द्रा—ये अतिस्निग्ध के लक्षण हैं। चरक सू. अ. १३ में इसके निम्न लक्षण दिये हैं—पाण्डुता गौरवं जाड्यं पुरीषस्याविपक्वता। तन्द्रीरुचिरुत्क्लेशः स्यादतिस्निग्धलक्षणम् ।। इसी प्रकार सुश्रुत चि. अ. ३१ में भी कहा है—भक्तद्वेषो मुखस्रावो गुददाहः प्रवाहिका। पुरीषातिप्रवृत्तिश्च भृशं स्निग्धस्य लक्षणम् ।।
द्रवमितलघूष्णमन्नं काले सात्म्यं बलाग्निरुग्युक्तम्। स्वः स्नेहपानमिच्छन् भुञ्जीत शयीत गुप्तश्च ।।३६।।
स्नेहपान से पूर्व क्या हितकर है—अपने लिये स्नेहपान की इच्छावाले व्यक्ति को चाहिये कि वह द्रव (liquid), मित (मपा हुआ-मात्रा में), लघु, उष्ण, सात्म्य, बल एवं अग्नि से युक्त अन्न को उपयुक्त काल में (जो समय उपयुक्त समझा जाये) खाये तथा एकान्त में शयन करे।
वक्तव्य—यहाँ 'स्वः' के स्थान पर 'श्वः' पाठ होता तो अधिक उपयुक्त था अर्थात् अगले दिन जिसने स्नेहपान करना है उसे पहले दिन उपर्युक्त विधि का पालन करना चाहिये। चरक में कहा है—द्रवोष्णमनभिष्यन्दि भोज्यमन्नं प्रमाणतः। नातिस्निग्धमसंकीर्णं श्वः स्नेहं पातुमिच्छता ।।
उष्णोदकोपचारी जितेन्द्रियः स्यान्निवातशयनस्थः। व्यायामवेगरोधत्यागी स्नेहाच्छपोऽस्वप्नः ।।३७।।
स्नेहपान के पश्चात् क्या हितकर तथा क्या अहितकर है—स्नेह को पीकर (जीर्ण हो जाने पर) तथा पान करते हुए भी दोनों अवस्थाओं में पुरुष को उष्ण जल का सेवन (प्रयोग) करना चाहिये। जितेन्द्रिय होकर (ब्रह्मचर्यपूर्वक) रहना चाहिये। सोने तथा बैठने की जगह ऐसी होनी चाहिये जहाँ सीधी हवा न आती हो। तथा व्यायाम (परिश्रम के कार्य) वेग (मल मूत्र अपानवायु आदि के वेग) क्रोध तथा दिवास्वप्न का त्याग कर देना चाहिये। चरक सू. अ. १३ में कहा है—स्नेहं पीत्वा नरः स्नेहं प्रतिभुञ्जान एव च। उष्णोदकोपचारी स्यात् ब्रह्मचारी क्षपाशयः ।। शकृन्मूत्रानिलोद्गारानुदीर्णींश्च न धारयेत्। व्यायाममुच्चैर्वचनं क्रोधशोकौ हिमातपौ ।। वर्जयेत्प्रवातं च सेवेत शयनासनम्। स्नेहमथ्योपचाराद्धि जायन्ते दारुणाः गदाः ।। इस विधि का पालन स्नेहपान के दिनों में तथा उसके बाद उतने ही दिन और करना चाहिये। इस विषय में चरक सिद्धिस्यान अध्याय १ में कहा है—कालस्तु बस्त्यादिषु याति यावांस्तावन् भवेद्विद्विःपरिहारकालः। अत्यासनस्थानवचांसि पानं स्वप्नं दिवा मैथुनवेगरोधान् ।। शीतोपचारात्तपशोकरोषांस्त्यजेदकालाहितभोजनं च ।। इसी प्रकार अष्टाङ्गसंग्रह में भी कहा है—भोज्योन्नं मात्रया पास्यन् श्वः पिबन् पीतवानपि। द्रवोष्णमनभिष्यन्दि नातिस्निग्धमसङ्करम् ।। उष्णोदकोपचारी स्यात् ब्रह्मचारी क्षपाशयः। व्यायामवेगसंरोधशोकहर्षहिमातपान् ।। प्रवातयानापानाध्वभाष्यात्याशनसंस्थितीः। नीचात्युच्चोपधानाहः स्वप्नधूमरजांसि च ।। यान्यहानि पिबेत्तानि तावन्त्यन्यान्यपि त्यजेत् ।।
संस्निह्यति मृदुकोष्ठो नरस्त्रिरात्रेण, सप्तरात्रेण। स्नेहाच्छपानयोगाज्जीवक ! यः क्रूरकोष्ठस्तु ।।३८।।
हे जीवक ! अच्छ स्नेह के पान से मृदु कोष्ठ वाला व्यक्ति तीन दिन में स्निग्ध हो जाता है तथा कठोर कोष्ठ वाला व्यक्ति सात दिन में स्निग्ध होता है। चरक में कहा है—मृदुकोष्ठस्त्रिरात्रेण स्निह्यत्यच्छोपसेवया। स्निह्यति क्रूरकोष्ठस्तु सप्तरात्रेण मानवः ।।
द्राक्षापीलुत्रिफलागोरसतप्ताम्बुतरुणमद्यानि । भुक्त्वाऽथ पायसं यो मृदुकोष्ठःस्रंस्य(स)ते नान्यः ।।३९।।
२५ का.सं.
३२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् स्नेहाध्यायः २२]
मृदु कोष्ठ वाले व्यक्ति को द्राक्षा (अंगूर या मुनक्के का रस) पीलुरस, त्रिफला, गोमूत्र, उष्णजल, नवीन तैयार की हुई मद्य, तथा दूध के सेवन करने से ही विरेचन हो जाता है। परन्तु इनसे क्रूर कोष्ठ व्यक्ति को विरेचन नहीं होता है। चरक सू. अ. १३ में कहा है—गुडमिक्षुरसं यस्तु क्षीरमृल्लोडितं दधि। पायसं कृसरं सर्पिः काश्मर्यत्रिफलारसम्।। द्राक्षारसं पीलुरसं जलमुष्णमथापि वा। मद्यं वा तरुणं पीत्वा मृदुकोष्ठो विरिच्यते। विरेचयन्ति नैतानि क्रूरकोष्ठं कदाचन। भवति क्रूरकोष्ठस्य ग्रहबृत्यल्बणानिला।। सुश्रुत में तीन प्रकार के कोष्ठों का वर्णन किया गया है—तत्र मृदुः क्रूरो मध्य इति त्रिविधः कोष्ठो भवति। तत्र बहुपित्तो मृदु। स दुग्धेनापि विरिच्यते। बहुवातश्लेष्मा क्रूरः स दुर्विरेच्यः। समदोषो मध्यमः, स साधारणः।।
पित्तबहुलेतराल्पा ग्रहणी भवति मृदुकोष्ठानां तस्मात्।
सुविरेच्या मृदुकोष्ठाः प्रायः पित्तं ह्यधोभागि ।।४०।।
मृदु कोष्ठ वाले व्यक्तियों की ग्रहणी में पित्त का आधिक्य होता है तथा इतर दोष (वात और कफ) अल्प मात्रा में होते हैं इसलिये इन्हें विरेचन सुगमता से हो जाता है। क्योंकि पित्त इनके अधोभाग में स्थित होता है। चरक सू. अ. १३ में कहा है—उदीर्णपित्ताऽल्पकफा ग्रहणी मन्दमारुता। मृदुकोष्ठस्य तस्मात् स सुविरेच्यो नरः स्मृतः।।
वक्तव्य—ग्रहणी से अभिप्राय क्षुद्रान्त्र का प्रारम्भिक भाग है। इसका परिमाण १२ अंगुल होता है। इसमें अर्धपक्व अन्न को पकाने के लिये पित्ताशय (Gall Bladder) से पाचक पित्त (Bile) तथा अग्न्याशय (Pancreas) से उसका रस पृथक् २ स्रोतों द्वारा आकर एक सम्मिलित मुख (Ampulla of Water) के द्वारा ग्रहणी में पहुँचता है। उनके द्वारा अपक्व अन्न का पाक होकर आगे जाता है इसे पित्तधरा कला भी कहा गया है। सुश्रुत में कहा है—षष्ठी पित्तधरा नाम या कला परिकीर्तिता। पक्वामाशयमध्यस्था ग्रहणी परिकीर्तिता।। इसी प्रकार चरक में भी इसे अग्नि का अधिष्ठान माना गया है। कहा है—अग्न्यधिष्ठानमन्नस्य ग्रहणात् ग्रहणी मता। नाभेरुपरि सा ह्यग्नि बलोपस्तम्भबृंहिता।। अपक्वं धारयत्यन्नं पक्वंत्यजति चाप्यधः।।
तृण्मूर्छामुखशोषैः शब्दद्वेषाङ्गमर्दजृम्भाभिः। तन्द्रीवाग्देहसादैः स्नेहज्ञा(ज्ञोऽ)जीर्यतीत्याह ।।४१।।
स्नेह के जीर्ण न होने के लक्षण—स्नेह के गुणों को जाननेवाला व्यक्ति प्यास, मूर्छा, मुखशोष, शब्दद्वेष, (किसी प्रकार का शब्द अच्छा न लगना), अङ्गमर्द, जँभाई, तन्द्रा तथा वाणी और देह का अवसाद (खिन्न होना) इन लक्षणों से स्नेह के अजीर्ण को जानता है। अर्थात् उपर्युक्त लक्षणों को देखकर यह जाना जा सकता है कि सेवन किया हुआ स्नेह जीर्ण नहीं हुआ है।
जीर्णाजीर्णविशङ्की केवलमुष्णोदकं पिबेत् तद्धि।
उद्गारस्य विशुद्धिं जनयति भक्ताभिलाषं च।।४२।।
स्नेहाजीर्ण की चिकित्सा—जिस व्यक्ति को सेवन किये हुए स्नेह के जीर्ण होने या न होने की शंका हो वह केवल उष्ण जल पीये। इससे उद्गार (डकार) ठीक हो जाती है तथा भोजन में भी रुचि उत्पन्न होती है।
तैलेऽधिको(के)विदाहः, सर्पिषि मूर्च्छा, वसासु हल्लासः।
मज्जनि गौरवमेषां दोषैरल्पा प्रवृत्तिस्तु ।।४३।।
यदि स्नेहाजीर्ण तैल के आधिक्य से हो तो विदाह (कोष्ठ में जलन), घृत के आधिक्य से हो तो मूर्छा, वसा से हल्लास (जी मचलाना) तथा मज्जा से शरीर का भारीपन होगा। इन व्यक्तियों की (प्रवृद्ध) दोषों के कारण प्रवृत्ति (कार्य में रुचि) भी अल्प होती है।
स्नेहाध्यायः २२] सूत्रस्थानम् ३३
स्नेहाजीर्णे तृष्णा शूलं परिकर्तिका च यस्य स्यात् ।
समतीतजरणकाले तस्य प्रच्छर्दनं श्रेयः ॥४४॥
स्नेह के द्वारा अजीर्ण होने पर जिसे प्यास, शूल तथा परिकर्तनवत् वेदना हो उसे स्नेह के जीर्ण होने के काल के व्यतीत हो जाने पर वमन कराना श्रेयस्कर है। चरक में भी कहा है—अजीर्णे यदि तु स्नेहे तृष्णा स्याच्छर्दयेद्भिषक् । शीतोदकं पुनः पीत्वा भुक्त्वा रूक्षान्नमुल्लिखेत् ।। अर्थात् यदि वमन करने पर भी अजीर्ण लक्षण शान्त न हों तो शीतल जल पीकर पुनः वमन करे। सुश्रुत में उस अवस्था में उष्ण जल से वमन कराने का विधान दिया है—एव चानुपशाम्यन्त्यां स्नेहमुष्णाम्बुना वमेत् ।। इन दोनों के विरोध के परिहार के लिये अष्टाङ्गसंग्रह में लिखा है—अजीर्णे बलवत्यां तु शीतैर्दिग्धाच्छिरो मुखम् । छर्दयेत् तदशान्तौ च पीत्वा शीतोदकं पुनः ।। रूक्षान्नमुल्लिखेत् भुक्त्वा तादृश्यां तु कफानिले समदोषस्य निःशेषं स्नेहमुष्णा बूनोद्धरेत् ।। अर्थात् पित्त प्रकृति वाले पुरुष में शीतल जल तथा कफ वात प्रकृति एवं समदोष पुरुष में उष्ण जल का प्रयोग करे।
उद्गारस्य विशुद्धिः कांक्षा स्थिरता लघुत्वमविषादः ।
बलवागिन्द्रियसंपज्जीर्णे स्नेहे बलसुखे च ॥४५॥
कर्णाक्षिघ्राणबलं स्मृतिकेशौजसां वृद्धिधृतिपुष्टिः । शान्तिस्तद्व्याधीनां भुक्त्वाऽनु स्नेहपीतस्य ॥४६॥
स्नेह के जीर्ण हो जाने के लक्षण—उद्गार (डकार) का साफ आना, भोजन या अन्य कार्यों में रुचि होना, शरीर की स्थिरता, लघुता (हलकापन), अविषाद (खिन्नता न होना), बल, वाणी तथा इन्द्रियों का सम्पत् (श्रेष्ठ गुणों से युक्त होना) तथा बल और सुख की प्राप्ति होती है। तथा स्नेहपान के बाद कान, आँख तथा घ्राणशक्ति बलवान होती है, स्मरणशक्ति, केश, ओज की वृद्धि होती है, धारणशक्ति पुष्ट होती है तथा उन २ व्याधियों की शान्ति हो जाती है। अर्थात् जिन २ व्याधियों के उद्देश्य से स्नेह का सेवन किया गया था, स्नेहपान के बाद वे व्याधियां शान्त हो जानी चाहिये।
पित्तानिलामयघ्नं बस्त्यूरुकटीदृढीकरं वृष्यम् । ऊर्जस्करं श्रमघ्नं विद्यात् स्नेहावपीडं तु ॥४७॥
स्नेह के अवपीडन के गुण—स्नेह का अवपीडन (नासिका में स्नेह का डालना) पित्त तथा वायु के रोगों को नष्ट करता है तथा यह बस्ति, ऊरु एवं कटिप्रदेश को दृढ़ करता है और वृष्य ऊर्जस्कर (बल देनेवाला) तथा श्रम (थकावट) को दूर करने वाला है।
वक्तव्य—अवपीडन से अभिप्राय निचोड़कर रस निकालना है। कहा है—अवपीड्य दीयते यस्मादवपीडस्ततः स्मृतः। कल्कीकृतादौषधाद्यः पीडितो निस्रुतो रसः ।। सोऽवपीडः समुद्दिष्टः तीक्ष्णद्रव्यसमुद्भवः ।। गलरोगे सन्निपाते निद्रायां विषमज्वरे। मनोविकारे कृमिषु युज्यते चावपीडनम् ।। अर्थात् किसी औषधि का रस निकालकर नाक में बूँद २ टपकाने को अवपीडन कहते हैं। सन्निपात आदि रोगों में यह प्रयुक्त होता है।
वर्णस्वरमेधौजःशुक्रायुर्धृतिबलाग्निसंवृद्धिः । विण्मूत्रानिलवृत्तिः सुखेन संभोजनस्नेहात् ॥४८॥
स्नेह के सम्यक् प्रकार सेवन करने से वर्ण, स्वर, मेधा, ओज, शुक्र, आयु, धृति (धारण शक्ति) बल तथा जाठराग्नि की वृद्धि होती है तथा मल, मूत्र एवं वायु सुखपूर्वक सर जाते हैं।
ज्वरपाण्डुकुष्ठशोथास्तृण्मूर्च्छाच्छर्दिरोचकोत्क्लेदाः । ग्रहणीन्द्रियोपघातस्तैमित्यानाहशूलाद्याः ॥४९॥
स्नेह के अपचार अर्थात् विधिपूर्वक सेवन न करने से ज्वर, पाण्डु, कुष्ठ, शोथ, प्यास, मूर्च्छा, छर्दि (वमन), अरुचि उत्क्लेद (जी मचलाना), ग्रहणीरोग अर्थात् संग्रहणी (अथवा ग्रहणी रोग और इन्द्रियोपघात अर्थात् इन्द्रियों का स्वस्थ न होना), स्तैमित्य (जड़ता), आनाह (अफारा) तथा शूल आदि रोग हो जाते हैं। चरक सू. अ. १३ में कहा है—तन्द्रा
३४ कश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् स्नेहाध्यायः २२]
सोत्क्लेश आनाहो ज्वरः स्तम्भो विसञ्ज्ञता । कुष्ठानि कण्डूः पाण्डुत्वं शोफार्शांस्यरुचिस्तृषा ।। जठरं ग्रहणीदोषः स्तैमित्यं वाक्यनिग्रहः । शूलमामप्रदोषश्च जायन्ते स्नेहविभ्रमात् ।।
स्नेहापचारजास्ते रोगाः, स्वेदोपपादिता ये (ते) षु ।
वमनविरेचनयोगा रूक्षाशनतक्रमूत्राद्याः ।।५०।।
स्नेह के विधिपूर्वक सेवन न करने से उत्पन्न होनेवाले रोगों में स्वेदन, वमन, विरेचन के योग (औषध) रूक्ष अन्न का भोजन तथा तक्र और मूत्र का सेवन करना चाहिये । चरक में कहा है—तत्राप्युल्लेखनं शस्तं स्वेदः कालप्रतीक्षणम् । प्रति प्रति व्याधिबलं बुद्ध्वा संस्रसनमेव च ।। तक्रारिष्टप्रयोगश्च रूक्षपानान्नसेवनम् । मूत्राणां त्रिफलायाश्च स्नेहव्यापत्तिभेषजम् ।।
मात्राकालवियुक्तः स्नेहः सात्म्योपचारगुणहीनः ।
युक्तो व्यापदमृच्छति तस्मिन् संशोधनं पथ्यम् ।।५१।।
उपद्रवों के कारण मात्रा तथा काल से रहित (अर्थात् जिस मात्रा में स्नेह का प्रयोग करना चाहिये उससे भिन्न मात्रा तथा जिन २ कालों में भिन्न २ स्नेहों के सेवन का पूर्वविधान बतलाया है उनसे अतिरिक्त कालों में) तथा सात्म्य उपचार (पथ्यापथ्य) से रहित स्नेह (अर्थात् स्नेह के बाद पथ्यापथ्य का पालन न करने से) उपद्रवों को उत्पन्न कर देता है । इन उपद्रवों में संशोधन अर्थात् वमन विरेचन कराना चाहिये । इसी भाव को चरक में निम्नरूप में प्रकट किया गया है—अकाले चाहितश्चैव मात्रया न च योजितः । स्नेहो मिथ्योपचाराच्च व्यापद्येतातिसेवितः ।।
स्नेहद्वेषी क्षामो मृदुकोष्ठः स्नेहमद्यनित्यश्च । अध्वप्रजागरस्त्रीश्रान्ता नाच्छं पिबेयुस्ते ।।५२।।
तेषामन्नैर्विविधैः स्नेहस्य विचारणा सात्म्यम् । निर्दिश्यवा मासाद्यैः कालाग्निवयःप्रकर्षाच्च ।।५३।।
गुरुपानभोज्यमांसैर्गुडदधितिलशाकदुग्धनिर्यूहैः । न स्नेहयेत् प्रमेहे न कुष्ठकफशोषरोगार्तान् ।।५४।।
अच्छ (केवल) स्नेह का किन्हें सेवन नहीं करना चाहिये—जो स्नेह को न चाहते हों, जो कमजोर तथा मृदुकोष्ठ हों, जो नित्य स्नेह एवं मद्य का सेवन करते हों, मार्ग के चलने, जागरण तथा स्त्रीगमन के कारण जो थक गये हों उन्हें अच्छ स्नेह का पान नहीं करना चाहिये । उनको मास (ऋतु) आदि का निर्देश करके काल, जाठराग्नि तथा अवस्था के अनुसार गुरु पान, गुरु भोजन, गुरु मांस तथा गुड, दधि, तिल, शाक, दुग्ध तथा निर्यूह आदि विविध अन्नपानों में से जो सात्म्य हों—उसके साथ स्नेह की विचारणा बनाकर देनी चाहिये । परन्तु इनके द्वारा प्रमेह, कुष्ठ, कफ तथा शोषरोग से पीडित व्यक्तियों का स्नेहन नहीं करना चाहिये । चरक में कहा है—स्नेहद्विषः स्नेहनित्या मृदुकोष्ठाश्च ये नराः । क्लेशासहा मद्यनित्यास्तेषामिष्टा विचारणा ।। अर्थात् इन्हें केवल (अच्छ) स्नेह न देकर उपर्युक्त विचारणाओं के रूप में प्रयोग करना चाहिये । इसी भाव को सुश्रुत चि. अ. ३१ में निम्न रूप में दिया है—सुकुमारं कृशं वृद्धं शिशुं स्नेहद्विषं तथा । तृष्णार्तमुष्णकाले च सहभक्तेन दापयेत् ।। यहाँ भक्त अर्थात् भात (ओदन) शब्द केवल उपलक्षण मात्र है । इससे अन्य विचारणाओं का भी ग्रहण करना चाहिये ।
तद्दोषघ्नैर्द्रव्यैः स्नेहैः सिद्धैर्यास्वमविकारैः । स्नेहास्तथाविधाः स्युस्त्रिफलासव्योषलवणाद्यैः ।।५५।।
उपर्युक्त प्रमेह आदि के रोगियों का रोगानुसार तत्तद्दोषहरत्रिफला, त्रिकटु तथा लवण आदि द्रव्यों से सिद्ध किये हुए अविकारी अर्थात् विकार न करनेवाले—स्नेहों से स्नेहन करे । चरक में कहा है—स्नेहैर्यथास्वं तान् सिद्धैः स्नेहयेदविकारिभि । पिप्पलीभिर्हरीतक्या सिद्धैस्त्रिफलयाऽपि वा । इसी प्रकार अष्टाङ्ग संग्रह में भी कहा है—गुडानूपामिषक्षीरतिलमाषसुरा दधि । कुष्ठ शोफप्रमेहेषु स्नेहार्थं न प्रकल्पयेत् ।। त्रिफला पिप्पली पथ्या गुग्गुल्वादिभिविपञ्चितान् । स्नेहान्यथास्वमेतेषां योजयेदविकारिणः ।।
स्वेदाध्यायः २३] सूत्रस्थानम् ३५
स्नेहितदेहस्यादौ स्वेदमन्तरमथ प्रयुञ्जीत । सम्यक्स्निग्धस्विन्नैर्विशोधनमन्तरं कार्यम् ।। ५६ ।।
इति स्नेहाध्यायो द्वाविंशतितमः ।। २२ ।।
जिस व्यक्ति का स्नेहन कर लिया गया है उसे पहले स्वेदन कराना चाहिये । फिर ठीक प्रकार से स्नेहन और स्वेदन हो जाने पर संशोधन (वमन, विरेचन आदि पञ्चकर्म की क्रियायें) कराना चाहिये । चरक में भी कहा है—स्नेहमग्रे प्रयुञ्जीत ततः स्वेदमन्तरम् । स्नेहस्वेदोपपन्नस्य संशोधनमथेतरत् ।।
इति स्नेहाध्यायो द्वाविंशतितमः ।। २२ ।।
त्रयोविंशतितमोऽध्यायः
अथातः स्वेदाध्यायं व्याख्यास्यामः ।। १ ।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।। २ ।।
अब हम स्वेदाध्याय का व्याख्यान करेंगे । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।
सम्यक्स्निग्धस्य भगवन् कथं स्वेदं प्रयोजयेत् ।
अनत्ययं भिषग्वाले द्रव्यं स्वेदोपगं च किम् ।। ३ ।।
मन्दातिसम्यक्स्विन्नानां बालानां लक्षणं च किम् ।
कः स्वेद्यो न च कः स्वेद्य इत्युक्तः प्राह कश्यपः ।। ४ ।।
शृणु स्वेदविधिं कृत्स्नं वृद्धजीवक ! तत्त्वतः ।
यथा बाले प्रयोक्तव्यः प्रयुक्तश्च यथा हितः ।। ५ ।।
वृद्धजीवक ने पूछा भगवन् ! सम्यक् स्निग्ध व्यक्ति को किस प्रकार स्वेदन करना चाहिये ? बालक में कौन से स्वेदोपग (स्वेदन में सहायता देनेवाले) द्रव्य स्वास्थ्य को देने वाले हैं ? मन्दस्विन्न, अस्विन्न, अतिस्विन्न, तथा सम्यक् स्विन्न बालकों के क्या २ लक्षण हैं ? स्वेदन के योग्य तथा अयोग्य कौन हैं अर्थात् किनका स्वेदन करना चाहिये तथा किनका नहीं ? इस प्रश्न किये जाने पर महर्षि कश्यप ने उत्तर दिया—हे वृद्धजीवक ! तू स्वेदन की सम्पूर्ण विधि को अच्छी प्रकार सुन । किस प्रकार बालक में उसका प्रयोग करना चाहिये जिससे प्रयुक्त किया हुआ वह स्वेदन हितकारी हो सके ।
स्तैमित्यशूलकाठिन्यविबन्धानाहवाग्ग्रहैः । हल्लासारुच्यलसकशीतासहनवेपनैः ।। ६ ।।
(इति ताडपत्रपुस्तके ३८ तमं पत्रम् ।)
वातश्लेष्मोद्भवं दृष्ट्वा पृथग्वा स्वेद इष्यते ।
वाते स्निग्धः कफे रूक्षो द्वयोः साधारणो मतः ।। ७ ।।
स्तैमित्य, (जड़ता), शूल, कठोरता, मलबन्ध, आनाह, वाणी का निग्रह (बोल न सकना-गूंगापन), हल्लास (जी मचलाना), अरुचि, अलसक, शीत को न सहन कर सकना तथा कम्पन–इत्यादि लक्षणों को देखकर वातश्लेष्म अथवा
३६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | स्वेदाध्यायः २३]
पृथक् २ (वातिक एवं श्लैष्मिक) स्वेदन करना चाहिये । वात की प्रधानता में स्निग्ध, कफ की प्रधानता में रूक्ष तथा दोनों का संयोग होने पर साधारण अर्थात् स्निग्ध एवं रूक्ष मिला हुआ स्वेदन देना चाहिये । चरक सू. अ. १४ में कहा है—वातश्लेष्मणि वाते वा कफे वा स्वेद इष्यते । स्निग्धरूक्षस्तथा स्निग्धो रूक्षश्चायुपकल्पितः ।। अर्थात् केवल वात में स्निग्ध, श्लेष्म में रूक्ष तथा वातकफ (द्वन्द्वज) में स्निग्ध और रूक्ष दोनों प्रकार के द्रव्यों से तैयार किया हुआ स्वेदन देना चाहिये ।
बालानां कृशमध्यानां स्वेद आवस्थिको हितः । शीतव्याधिशरीराणां बालानां च विशेषतः ।।८।।
कृश एवं मध्यबल वाले बालकों को आवस्थिक (रोग एवं बल की अवस्था के अनुसार) स्वेद देना चाहिये । बालकों को स्वेद देते हुए विशेषकर शीत (सर्दी), व्याधि एवं शरीर का ध्यान रखना चाहिये अर्थात् सर्दी कम है या अधिक तथा इसी प्रकार व्याधि और शारीरिक बल को भी दृष्टि में रखना चाहिये ।
वक्तव्य—सर्दी अधिक हो तो स्वेद अधिक मात्रा में दिया जा सकता है । इसी प्रकार यदि रोग बलवान है तथा शारीरिक बल भी पर्याप्त है तो स्वेद अधिक दिया जा सकता है । परन्तु यदि रोग मृदु एवं शारीरिक बल भी कम हो तो स्वेद भी थोड़ा ही देना चाहिये ।
वृषणौ हृदयं चक्षुर्मृदु वा स्वेदयेन्न वा । शेपोवङ्क्षणसन्धींस्तु मध्यमं, शेषमिष्टतः ।।९।।
अण्डकोष, हृदय तथा नेत्रों को मृदु ही स्वेद देना चाहिये अथवा बिलकुल ही स्वेद न दें । शेप (जननेन्द्रिय) वङ्क्षण (रानों) तथा सन्धियों में मध्य स्वेद देना चाहिये । तथा शरीर के शेष अवयवों पर यथाप्रयोजन मृदु, मध्य अथवा महास्वेद दे सकते हैं ।
वक्तव्य—यहाँ देशभेद से स्वेद मृदु, मध्य तथा महान् तीन प्रकार का स्वेद बताया है । इनमें से अण्डकोष, हृदय तथा नेत्रों को साधारणतया स्वेद नहीं देना चाहिये अपितु अन्य उपायों का ही अवलम्बन करना चाहिये । परन्तु यदि इनमें स्वेद से ही अच्छे होनेवाले रोग हों तो मृदु स्वेद देना चाहिये । जननेन्द्रिय, रानों तथा सन्धियों में मध्य स्वेद तथा शेष अङ्गों पर आवश्यकता के अनुसार मृदु, मध्य अथवा महास्वेद निर्भयता के साथ दिया जा सकता है । चरक सू. अ. १४ में भी कहा है—'वृषणौ हृदयं दृष्टी स्वेदयेन्मृदु नैव वा । मध्यमं वङ्क्षणं शेषमङ्गावयवमिष्टतः' ।।
कुमुदोत्पलपद्मानां पत्रैराच्छाद्य लोचने । वाससा वाऽथ श्लक्ष्णेन बाले स्वेदं प्रयोजयेत् ।।१०।।
मुक्तावलीचन्द्रकान्तशीताम्बुकरभाजनैः । स्पृशेदभीक्ष्णं हृदयं बालस्य स्वेदकर्मणि ।।११।।
सम्पूर्ण शरीर का स्वेदन करते समय चक्षु तथा हृदय की रक्षा का उपाय—कुमुद, उत्पल (नीलकमल) तथा कमल के पत्तों अथवा नरम कपड़े से बालक के नेत्रों को अच्छी प्रकार ढककर स्वेद देना चाहिये । तथा स्वेद देते हुए मोतियों की मालाओं, चन्द्रकान्त मणि तथा शीतल जल से भरे हुए पात्रों से बालक के हृदय का निरन्तर स्पर्श करते रहना चाहिये । अर्थात् जब बालक को स्वेद देना हो तब कमल आदि के कोमल पत्तों से बालक की आँखें ढक दें तथा हृदयप्रदेश को भी यथासंभव उपायों द्वारा शीतल रखने का प्रयत्न करें जिससे उन प्रदेशों पर स्वेद न पहुँचे । चरक सू. अ. १४ में कहा है—सुशुद्धैर्लक्तकैः पिण्ड्या गोधूमानांमथापि वा । पद्मोत्पलपलाशैर्वा स्वेद्यः संवृत्य चक्षुषी ।। मुक्तावलीभिः शीताभिः शीतलैर्भाजनैरपि । जलाद्रैर्जलजहस्तैः स्विद्यतो हृदयं स्पृशेत् ।। सुश्रुत चि. अ. ३२ में कहा है—स्नेहाभ्यक्तशरीरस्य शीतैराच्छाद्य चक्षुषी । स्विद्यमानस्य च मुहुर्हृदयं शीतलैः स्पृशेत् ।। इसी प्रकार अष्टाङ्गसंग्रह सू. अ. २६ में भी कहा है—पद्मोत्पलादिभिः सक्तुपिण्ड्या वाच्छाद्य चक्षुषी । शीतैर्मुक्तावली पद्मकुमुदोत्पलभाजनैः ।। मुहुः करैश्च तोयार्द्रैः स्विद्यतो हृदयं स्पृशेत् ।।
स्वेदाध्यायः २३] सूत्रस्थानम् ३७
कर्पूरचूर्णमास्येन धारयेत् स्विद्यतः सुखम्।
फलाम्लयुक्तं खण्डं वा मृद्वीकां वा सशर्कराम्।।१२।।
सुखपूर्वक स्वेदन करने के लिये मुख में कर्पूरचूर्ण को धारण करे अथवा खाण्डयुक्त अम्लवेतस या अम्लरस वाले फलों या शर्करा से युक्त मृद्वीका (मुनक्का) धारण करे। अर्थात् स्वेदन करते समय मुँह में कर्पूर, खाण्ड से युक्त अम्लफल अथवा मुनक्का धारण करने से सुखपूर्वक स्वेदन हो जाता है।
शीतगौरवविष्टम्भशूलादीनां निवर्तने। तद्विपर्ययभावे च स्वेदं प्राज्ञो निवर्तयेत् ।।१३।।
स्वेद देना कब बन्द करना चाहिये—शीत, गौरव (शरीर का भारीपन) विष्टम्भ तथा शूल (वेदना) आदियों के शान्त हो जाने पर तथा इनसे विपरीत भाव उत्पन्न हो जाने पर बुद्धिमान् व्यक्ति स्वेद को बन्द कर दे। अर्थात् जब शरीर में उष्णता तथा हलकापन आ जाय और विष्टम्भ शूल आदि शान्त हो जायं तब स्वेद बन्द कर देना चाहिये।
विषादमूर्च्छातृड्दाहपित्तकोपारतिभ्रमाः। स्वराङ्गहानिर्वैह्वल्यमतिस्विन्नस्य लक्षणम्।।१४।।
अतिस्विन्न के लक्षण—विषाद, मूर्छा, प्यास, दाह, पित्त-प्रकोप, अरति (ग्लानि) भ्रम, स्वर और अङ्गों की दुर्बलता तथा विह्वलता (व्याकुलता)—ये अतिस्विन्न पुरुष के लक्षण हैं। चरक सू. अ. १४ में कहा है—पित्तप्रकोपो मूर्छा च शरीरसदनं तृषा। दाहस्वेदाङ्गदौर्बल्यमतिस्विन्नस्य लक्षणम्।। सुश्रुत चि. अ. ३२ में कहा है—स्विन्नेऽत्यर्थं सन्धिपीडाविदाहः स्फोटोत्पत्तिः पित्तरक्तप्रकोपः। मूर्छा भ्रान्तिर्दाहतृष्णो क्लमश्च ।। इसी प्रकार अष्टाङ्गहृदय में भी कहा है—पित्तास्रकोपतृन्मूर्छास्वराङ्गसदनभ्रमाः। सन्धिपीडाज्वरश्यावरक्तमण्डलदर्शनम् ।। स्वेदातियोगाच्छर्दिंश्च ..... ।।
तच्चिकित्सां प्रयुञ्जीत यथा वैसर्पिणां तथा। रागव्रणविसंज्ञाभिः कृच्छ्रसाध्यं तमादिशेत् ।।१५।।
अतिस्विन्न की चिकित्सा—विसर्प रोग के रोगी की तरह इसकी चिकित्सा करे। तथा जब राग, व्रण तथा विसंज्ञा (मूर्छा) हो जाय तब उसे कृच्छ्र साध्य जाने।
वक्तव्य—चरक चि. अ. २१ में विसर्प रोग का निम्न चिकित्सासूत्र दिया है—लङ्घनोल्लेखने शस्ते तिक्तकानां च सेवनम्। कफस्थानगते सा मे रूक्षशीतैः प्रलेपनम् ।। इसी प्रकार अतिस्विन्न व्यक्ति में भी लङ्घन, वमन, तिक्त ओषधियों का सेवन करना चाहिये तथा रूक्ष एवं शीत द्रव्यों का प्रलेप लगाना चाहिये। अष्टाङ्गहृदय में भी यही विधान दिया है। वहाँ शीत प्रलेप की व्याख्या करते हुए अत्यन्त शीतप्रलेपों का निषेध करके अनुष्णशीत प्रलेपों का प्रयोग लिखा है। चरक सू. अ. १४ में अतिस्विन्न की चिकित्सा में लिखा है—उक्तस्तस्या-शितीये यो ग्रैष्मिकः सर्वशोविधिः। सोऽतिस्विन्नस्य कर्तव्यो मधुरः स्निग्धशीतलः ।। अर्थात् अतिस्विन्न व्यक्ति के लिये ग्रीष्मचर्योक्त मधुर स्निग्ध तथा शीतल विधियों का प्रयोग करना चाहिये। परन्तु ग्रीष्मचर्या में दिये हुए मद्यपान को टीकाकारों ने सर्वथा वर्जित बताया है।
वातस्याप्रगुणत्वं च गुरुत्वं स्तब्धगात्रता।
मन्दस्विन्ने न च ग्लानिस्तृष्णादीनां च विभ्रमः।।१६।।
तत्र स्वेदं प्रयुञ्जीत भिषग्भूयो विचारयन्। बलकालवयोदोषान् पथ्यचेष्टाशनस्थितीः।।१७।।
मन्दस्विन्न के लक्षण—स्वेदन मात्रा से थोड़ा होने पर वायु अनुलोम नहीं होती, शरीर भारी तथा स्तब्ध (जकड़ा हुआ) होता है तथा ग्लानि और तृष्णा शान्त नहीं होती। इस अवस्था में अर्थात् सम्यक् स्वेदन न होने पर चिकित्सक को चाहिये कि रोगी के बल, काल (ऋतु), अवस्था, दोष, चेष्टा तथा भोजन (आहार-विहार) के पथ्य का विचार करते हुए पुनः स्वेदन करावे।
३८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् स्वेदाध्यायः २३]
स्वेदाभिनन्दिता सौख्यं मृदुता रोगदेहयोः । काले विसृष्टिः क्षुत्तृष्णा सम्यक्स्विन्नस्य लक्षणम् ।। १८ ।।
सम्यक् स्विन्न के लक्षण—स्वेद से प्रसन्नता एवं सुख की प्राप्ति हो, रोग मृदु (कम बलवाला) हो जाय, देह भी मृदु हो जाय, मल, मूत्र आदि का वेग यथासमय हो तथा भूख और प्यास लगे—ये सम्यक् स्विन्न के लक्षण हैं। अर्थात् इन लक्षणों को देखकर जाना जा सकता है कि स्वेदन ठीक हो गया है तथा अब स्वेदन बन्द कर देना चाहिये। सुश्रुत चि. अ. ३२ में कहा है—स्वेदास्त्रावो व्याधिहानिर्लघुत्वं शीतार्थित्वं मार्दवं चातुरस्य। सम्यक्स्विन्ने लक्षणं प्राहुरेतन्मिथ्यास्विन्ने व्यत्यये नैतदेव।। अर्थात् सम्यक् स्विन्न में स्वेदास्त्राव, व्याधि का शमन, शरीर की लघुता, शीतपदार्थों की इच्छा तथा शरीर की मृदुता आदि लक्षण होते हैं। तथा असम्यक् स्विन्न में इससे विपरीत लक्षण होते हैं अर्थात् स्वेद नहीं आता, तथा व्याधि की वृद्धि, शरीर का भारीपन, उष्ण पदार्थों की इच्छा तथा शरीर की कठोरता आदि लक्षण होते हैं। इसी प्रकार अष्टाङ्गसंग्रह में कहा है—शीतशूलक्षये स्विन्नो जातोऽङ्गानां च मार्दवे।
पित्तात्मा पित्तरोगी च गर्भिणी मधुमेहिनः । क्षुत्तृष्णाशोषरोषार्ताः कामल्युदरविक्षताः ।। १९ ।। कार्श्यमद्यविषातार्ताश्च भृशाग्नितिमिरस्रुताः । भ्रष्टभग्नविदग्धाङ्गा न स्वेद्यास्ते कथंचन ।। २० ।।
किन्हें स्वेदन नहीं कराना चाहिये—पित्तप्रकृति अथवा पित्त के रोगी, गर्भिणी, मधुमेही, भूख, प्यास, शोष तथा रोष से पीडित, कामला तथा उदररोग के रोगी, विक्षत (जिन्हें घाव लगा हो) कृश, मद्य एवं विष के विकारों से पीड़ित, जिनकी जठराग्नि अत्यन्त तीव्र हो, तिमिर रोग से पीड़ित तथा अतिसार रोगी भ्रष्ट (जिनकी आंत अथवा गुदा-कांच निकली हुई हो, जिनकी अस्थि भग्न हो तथा जिनके अंग जले हुए हों—उन्हें कभी स्वेदन न करावें। चरक में कहा है—कषायमद्यनित्यानां गर्भिण्या रक्तपित्तिनाम्। पित्तिनां सातिसाराणां रूक्षाणां मधुमेहिनाम् ।। विदग्धभ्रष्टवध्नानां विषमद्यविकारिणाम् । श्रान्तानां नष्टसंज्ञानां स्थूलानां पित्तमेहिनाम् ।। तृष्यतां क्षुधितानां च क्रुद्धानां शोचतामपि। कामल्युदरिणां चैव क्षतानामाढ्यरोगिणाम् ।। दुर्बलातिविशुष्काणामुपक्षीणौजसां तथा । भिषक् तैमिरिकाणां च न स्वेदमवतारयेत् ।। इसी प्रकार सुश्रुत में भी कहा है—पाण्डुर्मेही रक्तपित्ती क्षयार्तः क्षामोऽजीर्णी चोदरार्तो गरार्तः । तृट्छद्यर्त्तो गर्भिणी पीतमद्यो नैते स्वेद्या यश्च मर्त्योऽतिसारी ।।
स्वरभेदप्रतिश्यायगलग्रहशिरोरुजि । मन्याकर्णशिरःशूले गौरवे श्वासकासयोः ।। २१ ।। कुक्षिपाश्र्वेकटीपृष्ठविङ्ग्रहे मूत्रयक्ष्मणि । शुक्राघाते पक्षवधे कोष्ठानाहविबन्धयोः ।। २२ ।। विनामार्दितजृम्भासु हनुमन्याशिरोग्रहे । अङ्गमर्दे महत्त्वे च वेपथौ वातकण्टके ।। २३ ।। शीतशोथामखल्वी(ल्ली)षु पाणिपादाङ्गमारुते । आयामाक्षेपशूलादौ स्वेदः पथ्यतमो नृणाम् ।। २४ ।।
स्वेदन कहां २ करना चाहिये—स्वरभेद, प्रतिश्याय, गलग्रह (गले का पकड़ा जाना) शिररोग, मन्या (ग्रीवा शिरा) शूल, कर्णशूल तथा शिरःशूल, गौरव (अङ्गों का भारीपन) श्वास एवं कासरोग, कुक्षिग्रह, पाश्र्वग्रह, कटिग्रह, पृष्ठग्रह, तथा विङ्ग्रह (मलबन्ध), मूत्ररोग, यक्ष्मारोग, शुक्राघात (शुक्ररोध अथवा वीर्य का बाहर क्षरण न होना), पक्षाघात, कोष्ठ का आनाह (आध्मान), विबन्ध (मल तथा मूत्र के रुक जाने पर), विनाम (वातप्रकोप से शरीर के नमन होने वाले लक्षणों से युक्त अपतानक, धनुस्तम्भ, बाह्यायाम तथा आभ्यन्तरायाम आदि रोग) अर्दित (Facial Paralysis), जृम्भारोग (जंभाई) हनुग्रह, मन्याग्रह, शिरोग्रह, अङ्गमर्द, महत्त्व (अण्डवृद्धि-Hydrocele आदि), वेपथु (कम्पन), वातकण्टक (पैरों में वातिक वेदना), शीत (सर्दी लगना), शोथ, आमदोष (विसूचिका-अलसक आदि), खल्ली (खल्ली तु पादजंघोरुकरमूलावमोटनी-हाथ पैर आदि में खिंचावट के साथ दर्द होना), हाथ, पैर तथा अन्य अङ्गों में वायु का प्रकोप, आयाम (अङ्गों का फैलना), आक्षेप तथा (Convulsions) तथा शूल में मनुष्यों को स्वेद करना अत्यन्त हितकर माना गया है। चरक सू. अ. १४ में स्वेदन के लिये निम्न रोगों का परिगणन किया गया है—प्रतिश्याये च कासे च
स्वेदाध्यायः २३] सूत्रस्थानम् ३९
हिक्काश्वासेष्वलाघवे । कर्णमन्याशिरःशूले स्वरभेदे गलग्रहे ॥ अर्दितैकाङ्गसर्वाङ्ग पक्षावाते विनामके । कोष्ठानाहविबन्धेषु शुक्राघाते विजृम्भिके ॥ पार्श्वपृष्ठकटीकुक्षिसंग्रहे गृध्रसीषु च । मूत्रकृच्छ्रे महत्त्वे च मुष्कयोरङ्गमर्दने ॥ पादोरुजानुजङ्घार्तिसंग्रहेश्चयथावपि । खल्लीष्वामेषु शीते च वेपथौ वातकण्टके ।। सङ्कोचायामशूलेषु स्तम्भगौरवसुप्तिषु । सर्वेष्वेव विकारेषु स्वेदनं हितमुच्यते ॥
जन्मप्रभृति बालानां स्वेदमष्टविधं भिषक् । प्रयुञ्जीत यथाकालं रोगदेहव्यपेक्षया ।।२५।।
जन्म से लेकर चिकित्सक बालकों में यथाकाल रोग तथा शरीर (शारीरिक बल) के अनुसार आठ प्रकार का स्वेदन प्रयुक्त करें।
हस्तस्वेदः प्रदेहश्च नाडीप्रस्तरसंकराः । उपनाहोऽवगाहश्च परिषेकस्तथाऽष्टमः ।।२६।।
आठ प्रकार के स्वेद—(१) हस्तस्वेद (२) प्रदेह (३) नाडी-स्वेद (४) प्रस्तरस्वेद (५) सङ्करस्वेद (६) उपनाह (७) अवगाह तथा (८) परिषेक।
वक्तव्य--चरक में स्वेदों की संख्या इससे अधिक दी है। वहां मुख्य रूप से अग्निस्वेद एवं अनग्निस्वेद (जिनमें अग्नि का सम्पर्क न हो) दो भेद देकर अग्निस्वेदों के पुनः १३ भेद दिये गये हैं—सङ्करः प्रस्तरो नाडी परिषेकोऽवगाहनम् । जेन्ताकोऽश्मघनः कर्षुः कुटीभूकुष्मिकैव च ।। कूपो होलाक इत्येते स्वेदयन्ति त्रयोदश ।। सुश्रुत में केवल चार प्रकार का स्वेद गिनाया है—१. तापस्वेद २. ऊष्मस्वेद ३. उपनाहस्वेद ४. द्रवस्वेद । चरक में इनके अतिरिक्त दूसरे प्रकार के स्वेदन वे दिये हैं जो अग्नि के गुण के बिना ही स्वेदन करते हैं अर्थात् इनमें अग्नि का सम्पर्क नहीं होता है। ये १० गिनाये गये हैं—व्यायाम उष्णसदनं गुरुप्रावरणं क्षुधा। बहुपानं भयक्रोधावाहवातातपवातपाः ॥ स्वेदयन्ति दशैतानि नरमग्निगुणादृते ।। इनमें साक्षात् बाह्य अग्नि का सम्पर्क नहीं होता है। ये अपने उष्ण स्वभाव के कारण ही स्वेदन करते हैं। इसी प्रकार अनग्निस्वेदों के विषय में सुश्रुत में कहा है—कफ मेदोऽन्विते वायौ निवातातपगुरुप्रावरणनियुद्धाध्वव्यायामभारहरणामर्षैः स्वेदमुत्पादयेत् ।। परन्तु यहां केवल आठ स्वेदों का वर्णन किया है। यहां वे ही स्वेद दिये गये हैं जो बालकों को सुविधा पूर्वक दिये जा सकते हैं। क्योंकि इस संहिता में विशेष रूप से बालकों का ही विषय दिया गया है।
जातस्य चतुरो मासान् हस्तस्वेदं प्रयोजयेत् । अप्रमादी निवातस्थो विधूमाग्न्यूष्मणा शनैः ।।२७।।
हस्तस्वेद का विधान—उत्पन्न हुए बालक को चार मास तक प्रमादरहित होकर निवातस्थान (जहां सीधी एवं तेज हवा न आती हो) में बैठकर धुएं से रहित अग्नि की ऊष्मा के द्वारा धीरे २ हस्तस्वेद का प्रयोग करे।
वक्तव्य—हस्तस्वेद का तात्पर्य अग्नि के द्वारा अपने हाथों को गरम करके उससे बालक के शरीर को स्पर्श करना है। छोटे बालक को विशेषकर शीतऋतु में गरम रखने की आवश्यकता होती है परन्तु उस अवस्था में बालक बहुत अधिक नाजुक (Sensitive) होते हैं। वे जरा भी अधिक उष्णता को सहने में असमर्थ होते हैं। हाथों के द्वारा स्वेदन करने का उद्देश्य यह है कि बालक को कहीं अधिक स्वेदन न दे दिया जाय। अपने हाथों को गरम करने से व्यक्ति को पहले अग्नि का अपने शरीर पर अनुभव हो जाता है इससे बालक को अधिक उष्णता लगने की सम्भावना बिलकुल कम रहती है। इस प्रकार बालक को निर्भयतापूर्वक स्वेदन दिया जा सकता है। परन्तु स्वेदन करते हुए यह ध्यान रखना चाहिये कि ऐसे स्थान पर न बैठा जाय जहां सीधी एवं तेज हवा आती हो। तथा अग्नि भी धूम्र रहित होनी चाहिये अन्यथा बालक के नेत्रों तथा श्वासमार्ग में कष्ट होगा।
निवर्तमाने बालस्य सौकुमार्ये यथाक्रमम् । प्रवर्त्तमाने काठिन्ये तेषां स्वेदं प्रवर्धयेत् ।।२८।।
धीरे २ बालक की सुकुमारता (Delicacy) हटकर शरीर में कठिनता (कठोरता) आने पर उनका स्वेदन बढ़ाना चाहिये।
४० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् स्वेदाध्यायः २३]
सन्ति चाप्यपरे बालाः सुकुमाराः सदासुखाः । घृतक्षीराशिनः कल्या ईश्वराणां महात्मनाम् ।।२९।।
कुछ बालक ऐश्वर्यशाली महापुरुषों के पुत्र होते हैं। वे सुकुमार तथा सदा सुखी होते हैं, उन्हें खाने पीने को पर्याप्त घृत तथा दूध मिलता है तथा वे स्वस्थ होते हैं।
मध्यमा मध्यमानां च दरिद्राणां च दुःखिनाम् । निषेकदेशसात्म्ये च तान् विद्यात् पण्डितो भिषक् ।।३०।।
दूसरे बालक मध्यम कहलाते हैं जो मध्यम श्रेणी वालों के तथा दरिद्र एवं दुखी व्यक्तियों के पुत्र होते हैं। इसलिये बुद्धिमान चिकित्सक को चाहिये कि इनके निषेक (उत्पत्ति) तथा देश (स्थान) के सात्म्य को जाने। अर्थात् चिकित्सक बालक के घराने (कुल) का ज्ञान प्राप्त करे तथा यह भी जाने की उसका पालन-पोषण किस प्रकार की स्थिति (धनी अथवा निर्धन) में हुआ है। जिससे वह प्रत्येक बालक की पृथक् २ परिस्थिति के अनुसार चिकित्सा का विधान कर सके।
अविशेषेण बाधन्ते सर्वे सर्वान्ररान् गदाः । विशेषस्तु महान् दृष्टो दक्षिणाहारभेषजे ।।३१।।
सब प्रकार के रोग सब प्रकार के मनुष्यों को बिना भेद भाव के कष्ट पहुंचाते हैं। अर्थात् रोग धनी एवं निर्धन के भेद के बिना ही सब लोगों को समान रूप से आक्रान्त करते हैं। अन्तर (भेद) केवल दक्षिणा (धन) आहार तथा ओषधि में होता है। धनी एवं निर्धन व्यक्ति में अन्तर केवल आर्थिक परिस्थिति का ही होता है। रोग की दृष्टि से कोई अन्तर नहीं है अर्थात् रोगों से धनी व्यक्ति भी नहीं बच पाते हैं। केवल धन होने के कारण वे अच्छी से अच्छी ओषधि एवं पथ्य का सेवन कर सकते हैं जबकि निर्धन व्यक्ति को धन के अभाव में अधिक कष्टों को झेलना पड़ता है।
देशकालवयोमात्रासर्व्रगुरुलार्घवैः । स्वेदोऽतिरिक्तो हीनो वा हन्याद्बालं यथा विषम् ।।३२।।
देश, काल, अवस्था, मात्रा तथा सब प्रकार के रोगों की गुरुता अथवा लघुता की दृष्टि से अतिस्वेद तथा हीनस्वेद विष के समान बालक को मार देते हैं। अर्थात् बालक को स्वेद देते समय यह ध्यान रखना चाहिये कि किसी भी दृष्टि से स्वेद का अतियोग तथा अयोग न हो।
तस्मादवेक्ष्य देशादीन् काठिन्यं सुकुमारताम् । शिशोः स्वेदं प्रयुञ्जीत यशोधन्या (र्मा) र्थसिद्धये ।।३३।।
इस लिये यश, धन्यवाद (अथवा धर्म) तथा धन की प्राप्ति के लिये चिकित्सक को चाहिये कि वह देश, काल, अवस्था आदि तथा कठोरता एवं सुकुमारता को दृष्टि में रखते हुए बालक को स्वेदन का प्रयोग करावे।
गलकर्णशिरोमन्याकर्णाक्षिचिबुकोरसि । अभिष्यन्दात् समुच्छूने प्रदेहस्वेद इष्यते ।।३४।।
प्रदेहस्वेद कहां देना चाहिये—गलकर्ण, शिर, मन्या, कर्ण, आँखों, चिबुक (ठोडी-Chin) तथा छाती में और अभिष्यन्द रोग के कारण शरीर में शोथ होने पर प्रदेह स्वेद करना चाहिये।
वक्तव्य—प्रदेह स्वेद से अभिप्राय प्रलेप (लेप करने) से है।
एरण्डवृषशिग्रूणां त्वक्पत्रैः कल्कसाधितैः । समूत्रबुक्क(किण्व)लवणैः प्रदेहः स्यात् सुखोष्मभिः ।।३५।।
शीतीभूतं तु निर्मृज्य लेपयेदपरापरम् । अनेकशस्तु विज्ञाय स्विन्नं स्वेदं निवर्तयेत् ।।३६।। द्रव्यैर्वातकफघ्नैश्च प्रदेहः शिग्रुवद्धितः । अन्यैरपि करीषैश्च गोखराश्वाविबस्तजैः ।।३७।।
स्वेदाध्यायः २३] सूत्रस्थानम् ४१
प्रदेहस्वेद की विधि—एरण्ड, बांसा तथा सुहांजने की त्वचा (छाल) तथा पत्तों का कल्क (लुगदी) बनाकर उसमें गोमूत्र बुक्क—(अग्रमांस-हृदय का मांस) अथवा किण्व (सुराबीज-yeast) तथा सैन्धव डालकर उस कल्क की हल्की गर्मी के द्वारा प्रदेहस्वेद किया जाता है। ठण्डा हो जाने पर पूर्व लेप को उतार कर दूसरा लेप कर देना चाहिये। इस प्रकार अनेक तरह से (पर्याप्त) स्विन्न (पसीना आया हुआ) जानकर उस स्वेद (प्रदेह) को हटा दे। इसी प्रकार अन्य वात एवं कफनाशक द्रव्यों-तथा गौ, गदहे, घोड़े भेड़ तथा बकरी के पुरीष (गोबर-उपलों) के द्वारा किया गया प्रदेह (प्रलेप) भी सुहांजने की तरह ही हितकारी होता है।
वक्तव्य—पहले लेप के ठण्डा हो जाने पर दूसरा लेप कर दे तथा उसके भी ठण्डा हो जाने पर तीसरा नया लेप कर देना चाहिये इस प्रकार लेपों के द्वारा जब पसीना आजाय तब लेपों के द्वारा स्वेदन बन्द कर देना चाहिये।
वंशमुञ्जनलाद्यैश्च यथायोगं यथासुखम् । नाडीस्वेदं प्रयुञ्जीत निवाते वस्त्रसंवृतम् ।।३८।।
नाडी स्वेद की विधि—बांस, मूंज तथा नल आदि के द्वारा आवश्यकता के अनुसार वस्त्रों से ढककर निवातस्थान में बैठकर सुखपूर्वक नाडीस्वेद का प्रयोग करे। चरक सू. अ. १४ में नाडीस्वेद की विधि निम्न प्रकार से दी है—
स्वेदनद्रव्याणां पुनर्मूलफलपत्रशुङ्गादीनां मृगशकुनिपिशितशिरः-पदादीनामुष्णस्वभावानां वा यथार्हमम्ललवणस्नेहोपसंहितानां मूत्रक्षीरादीनां वा कुम्भ्यां वाष्पमनुद्गमन्त्यामुत्क्वथितानां नाड्याशरेषीकावंशदलकरञ्जार्कपत्रान्यतमकृतया गजाग्रहस्तसंस्थानया व्यामदीर्घया व्यामार्धदीर्घया वा व्यामचतुर्भागाष्टभागमूलाग्रपरिणाहस्रोतसा सर्वतो वातहरपत्रसंवृतच्छिद्रया द्वित्रिर्वा विनामितया वातहरसिद्धस्नेहाभ्यक्तगात्रो वाष्पमुपहरेत्, वाष्पो ह्यनूर्ध्वगामी विहतचण्डवेगस्त्वचमविदहन् सुखं स्वेदयतीति नाडीस्वेदः ।। सुश्रुत चि. अ. ३२ में कहा है—
पार्श्वच्छिद्रेण वा कुम्भेनाधोमुखेन तस्य मुखमभिसन्धाय तस्मिंश्छिद्रे हस्तिशुण्डाकारां नाडीं प्रणिधाय तं स्वेदयेत् । सुखोपविष्टं स्वभ्यक्तं गुरुप्रावरणावृतम् । हस्तिशुण्डिकया नाड्या स्वेदयेद्वातरोगिणम् ।। सुखा सर्वाङ्गगा ह्येषा न च क्लिश्नाति मानवम् । व्यामार्थमात्रा त्रिवक्रा हस्तिहस्तसमाकृतिः ।। स्वेदनार्थे हिता नाडी कलिङ्गी हस्तिशुण्डिका ।। इसी प्रकार अष्टाङ्ग हृदय में भी नाडी स्वेद का विधान दिया गया है।
उष्णान् पुलाकानास्तीर्य पायसं कृसरादि वा ।
वाससान्तरिते(तं) बालमभ्यक्तं शाययेत् सुखम् ।।३९।।
पद्माङ्गुलोरुबूकार्कपत्रैर्वा स्नेहितोष्णितैः । प्रस्तरस्वेदमित्याहुरभीक्ष्णपरिवर्तिनः ।।४०।।
प्रस्तरस्वेद की विधि—गरम किये हुए पुलाक (क्षुद्रधान्य) अथवा तुष, पायस (खीर) अथवा कृशरा (खिचड़ी) को बिछाकर (फैलाकर) उस पर श्वेत एरण्ड, लाल एरण्ड तथा आक के पत्तों पर स्नेह लगाकर उन्हें गरम करके बिछा दें उन पर अच्छी प्रकार अभ्यक्त किए हुए (स्नेह की मालिश किये हुए) बालक को वस्त्रों से ढककर सूखपूर्वक लिटा दें। इसे प्रस्तरस्वेद कहते हैं। इसे निरन्तर बदलते रहना चाहिये। चरक सू. अ. १४ में कहा है—
शूकशमीधान्यपुलाकानां वेशवारायसकृशरोत्कारिकादीनां वा प्रस्तरे कौशेयाविकोत्तरप्रच्छदे पद्माङ्गुलोरुबूकार्कपत्रप्रच्छदे वा स्वभ्यक्तसर्वाङ्गस्य शयानस्योपरि स्वेदनं प्रस्तरस्वेद इति विद्यात्। सुश्रुत चि. अ. ३२ में कहा है—कोशधान्यानि वा सम्यगुपस्वेद्यास्तीर्य कलिञ्जेऽन्यस्मिन् वा तत्प्रतिरूपके शयानं प्रावृत्य स्वेदयेत् । एवं पांशुगोशकृत्तुषबुसपलालोष्मभिः स्वेदयेत् । इसीलिए अष्टाङ्गसंग्रह में भी कहा है—यथार्हस्वेदद्रव्याणि पिहितमुखायामुखायां सम्यगुपस्वेद्य निवातशरणशयनस्थे कलिञ्जे प्रस्तीर्याविककौशेयवातहरपत्रान्यतमोत्तरप्रच्छदे रौरवाजिनप्रावारादिभिः स्ववच्छन्नं स्वेदयेदिति संस्तरस्वेदः ।।
४२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | स्वेदाध्यायः २३]
पायसैः कृशरैर्मांसरौदनैस्त्रिकठोरकैः । उष्णैः सलवणस्नेहैरम्बरास्तरितैः सुखैः ।।४१।।
किण्ववातसीदधिक्षीरसंयुक्तैः पिण्डकैः कृतैः । स्थानस्वेदनमिच्छन्ति सङ्करस्वेद उच्यते ।।४२।।
सङ्करस्वेद की विधि—लवण एवं स्नेह के सहित उष्ण तथा सुखकारी खीर, कृशरा (यवागू-खिचड़ी), मांस ओदन तथा तीन प्रकार की कठोर वस्तुओं (चरक के स्वेद प्रकरण¹ में, सिकता-बालु, पांशु-धूलि तथा पाषाण-पत्थर का उल्लेख होने से यहाँ भी त्रिकठोर शब्द से वे ही अभिप्रेत प्रतीत होते हैं)—को वस्त्र पर फैलाकर तथा उन्हें किण्व (सुराबीज), अलसी, दही तथा दूध के साथ मिलाकर पिण्ड बनाकर इनके द्वारा स्थानिक स्वेदन (विशेष स्थान का स्वेदन) किया जाता है। इसे सङ्करस्वेद कहते हैं। अर्थात् यह स्वेद सम्पूर्ण स्थान के लिये नहीं है अपितु किसी विशेष अङ्ग के लिये व्यवहृत होता है। चरक सू. अ. १४ में सङ्करस्वेद की निम्न विधि दी है—तत्र वस्त्रान्तरितैरवस्त्रान्तरितैर्वा पिण्डैर्यथोक्तैरुपस्वेदनं सङ्करस्वेद इति विद्यात् । वहीं पिण्ड द्रव्यों का भी उल्लेख किया है—तिलमाषकुलत्थाम्लघृततैलामिषौदनैः । पायसैः कृशरैर्मांसैः पिण्डस्वेदं प्रयोजयेत् ।। गोखरोष्ट्रवराहाश्वशकृद्भिः सतुषैर्यवैः । सिकतापांशुपाषाणकरीषायसपूटकैः ।। श्लैष्मिकान् स्वेदयेत् पूर्वैर्वातिकान् समुपाचरेत् ।। सङ्करस्वेद का ही दूसरा नाम पिण्ड स्वेद भी है। अष्टाङ्गसंग्रह में यह विधि निम्न प्रकार से दी है—तत्र मृत्कपालपाषाणलोष्ट्रलोहपिण्डानग्निवर्णान् संदंशेन गृहीत्वाऽम्लम्भस्यम्ले वा निमज्जयेत् । तैराद्र्राविकवस्त्रेण वेष्टितैः श्लेष्ममेदोभूयिष्ठं सरुजमङ्गं ग्रन्थिंमद्वा स्वेदयेत् । पांशुसिकतागवादिकरीषधान्यबुसपुलाकपलालैर्वाऽम्लोत्क्वथितैः पूर्ववद्वेष्टितैः । गवादिशकृताद्रेण पिण्डीकृतेन वा उपनाहद्रव्योत्कारिकाकृसरमांसपिण्डैर्वा वातरोगेष्विति पिण्डस्वेदः । स एव सङ्कराख्यः ।।
किण्ववातसीदधिक्षीरलवणैः साम्लचिक्कणैः । कुष्ठादिभिश्च सस्नेहैरुपनाहः प्रशस्यते ।।४३।।
किण्व (सुराबीज), अलसी, दही, दूध, सैन्धव, अम्ल (कांजी), कुष्ठ आदि चिकने पदार्थों एवं स्नेह (तिल तैल) इनसे तैयार किया हुआ उपनाह प्रशस्त है।
वक्तव्य— उपनाह से अभिप्राय पुलटिस से है। चरक सू. अ. १४ में इसका निम्न वर्णन मिलता है—गोधूमशकलैश्चूर्णैर्यवानामाम्लसंयुतैः । सस्नेहकिण्वलवणैरुपनाहः प्रशस्यते ।। गन्धैःसुरायाः किण्वेन जीवन्त्या शतपुष्पया । उमया कुष्ठतैलाभ्यां युक्त्या चोपनाहयेत् ।। चर्मभिश्चोपनाह्यव्यः सलोमभिरपूतिभिः । उष्णवीर्यैरलाभे तु कौशेयाविकशाटकैः ।। रात्रौ बद्धं दिवा मुञ्चेन्मुञ्चेद्रात्रौ दिवाकृतम् । विदाहपरिहारार्थं, स्यात्कर्षंस्तु शीतले ।। अर्थात् स्वेद्य स्थान पर उपनाह रखकर ऊपर से किसी वस्त्र की पट्टी अथवा अन्य चमड़े आदि से बांध देना चाहिये जिससे उसकी गर्मी स्थिर रह सके । उपनाह में लगातार अधिक समय तक पट्टी रखने से उस स्थान पर विदाह होने का डर रहता है अतः उसे आवश्यकता के अनुसार खोलकर बदल देना चाहिये।
खराजाविविडालेन(लोन्द्र)द्वीपिंसिंहतरक्षुजैः ।
..................................................... ।।४४।।
..................................................... ।
(इति ताडपत्रपुस्तके ३८ तमं पत्रम्² ।)
गदहे, भेड़, बकरी, विडाल (वन मार्जार) उन्द्र (कूलचर पशुभेद), चीता, सिंह तथा तरक्षु-भालू के (मांसरसों से सिद्ध द्रव आदियों से अवगाह स्वेद करना चाहिये) ।
(इति ताडपत्रपुस्तके ३९ तमं पत्रम्)
१. चरकीये स्वेदप्रकरणे सिकतापांशुपाषाणेत्युल्लेखदर्शनेनात्रापि त्रिकठोरपदेन तान्येवाभिप्रेतानि स्युः ।।
२. अतः परं ४० तमं पत्रं ताडपत्रपुस्तके त्रुटितम् ।।
उपकल्पनीयाध्यायः २४] सूत्रस्थानम् ४३
वक्तव्य—यह श्लोक बीच में ही खण्डित हो गया है। पूरा श्लोक न होने से निश्चयपूर्वक यह कहना कठिन है कि इसका क्या अभिप्राय है। फिर भी यह स्वेदों का प्रकरण चल रहा है। इसी अध्याय में पूर्व आठ प्रकार के स्वेद गिनाये गये हैं। उनमें से यहां ६ का वर्णन किया जा चुका है। दो का वर्णन शेष है। इन दोनों में से भी अवगाह स्वेद का क्रम ग्रन्थ में पहले दिया होने से यह संभवतः उसीका वर्णन है। अवगाहन से अभिप्राय कोष्ठ (Tubs) आदि में बैठकर अवगाह द्वारा स्वेदन करने से है। चरक सू. अ. १४ में नाडीस्वेद देने के उपरान्त अवगाहस्वेद की निम्न विधि मिलती है—एत एव च निर्यूहाः प्रयोज्या जलकोष्ठके। स्वेदनार्थं घृतक्षीरतैलकोष्ठांश्च कारयेत् ।। अर्थात् ग्राम्य आनूप मांस आदि, वरुण आदि तथा भूतीक आदि द्रव्यों के क्वाथों को तथा घृत दूध एवं तैल को स्वेदनार्थ अवगाहन के लिये टब में भरकर प्रयोग करें। वहीं पर पुनः कहा है—वातहरोत्क्वाथक्षीरतैलघृतपिशितसोष्णसलिल कोष्ठकावगाहस्तु यथोक्त एव अवगाहः। अष्टाङ्ग संग्रह सू. अ. २६ में भी कहा है—तैरेवाद्भिः पूर्णे महति कटाहे कुण्डे द्रोण्यां वावगाहयेत्। सुश्रुत में इसीका द्रवस्वेद के रूप में वर्णन मिलता है—द्रवस्वेदस्तु वातहरद्रव्यक्वाथपूर्णे कोष्ठे कटाहे द्रोण्यां वावगाह्य स्वेदयेत् । एवं पयोमांसरसयूषतैलधान्याम्लघृतेवसामूत्रेष्ववगाहयेत् । इस उपर्युक्त विधियों के द्वारा अवगाहनस्वेद किया जाता है। अब हम ग्रन्थोक्त अन्तिम परिषेक (स्वेद) का भी अन्य ग्रन्थों के आधार पर वर्णन करते हैं। चरक सू. अ. १४ में इसका निम्न वर्णन मिलता है—वातिकोत्तरवातिकानां पुनर्मूलादीनामुत्क्वाथैः सुखोष्णैः कुम्भीर्वपुलिकाः प्रनाडीर्वा पूरयित्वा यथार्हसिद्धस्ने हाभ्यक्तगात्रं वस्त्रावच्छन्नं परिषेचयेदिति परिषेकः ।। अर्थात् परिषेक से अभिप्राय जल का सिंचन करने से है। सबसे पूर्व रोगी के शरीर पर यथायोग्य द्रव से सिद्ध तैल आदि की मालिश करनी चाहिये। उसके बाद देह को वस्त्र से ढककर आवश्यकतानुसार ओषधियों के सुखोष्ण क्वाथों से किसी घड़े, फुआरे अथवा Douche को भरकर उसके द्वारा परिषेचन किया जाता है।
इस प्रकार यह स्वेदाध्याय समाप्त होता है।
चतुर्विंशतितमोऽध्यायः
....................................................................... ।
....................................................................... ।।
................................................... प्रोक्तं चिकित्सितम् ।
वक्तव्य—यह उपकल्पनीय अध्याय है। चरक में भी स्नेहन तथा स्वेदन के बाद उपकल्पनीय अध्याय दिया गया है। उसमें बतलाया गया है कि वमन तथा विरेचन कराने के लिये तथा उनसे उत्पन्न होने वाले उपद्रवों की शान्ति के लिये तात्कालोपयोगी कौन २ से द्रव्य तैयार रखने चाहिये। इस संहिता के भी स्नेहाध्याय में कहा है कि स्नेहन के बाद स्वेदन करावे तथा फिर सम्यक् स्निग्ध एवं स्विन्न हो जाने पर संशोधन करना चाहिये। इसलिये स्वेद सम्बन्धी वर्णन के बाद अब संशोधन का प्रकरण ही होना चाहिये। संशोधन से अभिप्राय वमन एवं विरेचन से है। यह अध्याय प्रारम्भ में खण्डित होने से इससे पूर्व का विषय उपलब्ध नहीं है। परन्तु प्रसङ्ग तथा अन्य ग्रन्थों के विषयों को देखते हुये कहा जा सकता है कि इस खण्डित भाग में वमन एवं विरेचन की विधि का ही सम्भवतः वर्णन किया गया होगा। पाठकों के ज्ञान के लिये हम संक्षेप से पहले वमन विधि का यहां वर्णन करेंगे। चरक सू. अ. १५ में कहा है—ततस्तं पुरुषं स्नेहस्वेदोपपन्नमनुपहतमनसम भसमीक्ष्य सुखोषितं सुप्रजीर्णभक्तं शिरःस्नातममुलिप्तगात्रं स्त्रग्वीणमनुपहतवस्त्रसंवीतं देवताग्निद्विजगुरुवृद्धवैद्यानर्चितवन्तम्, इष्टे नक्षत्रतिथिकरणमुहूर्ते कारयित्वा ब्राह्मणान् स्वस्तिवाचनं प्रयुक्ताभिराशीर्भीरभिमन्त्रितां
| ४४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | उपकल्पनीयाध्यायः २४] |
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मधुमधुकसैन्धवफाणितोपहितां मदनफलकषायमात्रां पाययेत्। अर्थात् स्नेहन और स्वेदन कराने के बाद संशोध्य पुरुष को शुभ दिन एवं मुहूर्त में पूर्व रात्रि का भोजन पच जाने पर प्रातः काल मधु, मुलहठी तथा सैन्धव से युक्त मदन फल का कषाय पिलावे। इसमें मधु एवं सैन्धव कफ को पतला करने के लिये मिलाया जाता है। यदि पूर्व रात्रि का भोजन जीर्ण न हुआ हो तो उसे संशोधन न करावें क्योंकि उस अवस्था में संशोधन ओषधि पिलाने से विपरीत प्रभाव होगा। ओषधि पान के बाद थोड़ी देर तक प्रतीक्षा करें। यदि वमन न हो तो अप्रवृत्त दोषों को प्रवृत्त करने के लिये गले में अङ्गुली डालकर वमन कर दे। वमन का अतियोग, हीनयोग अथवा मिथ्यायोग नहीं होना चाहिये।
इसी प्रकार रोगी को यथाविधि विरेचन भी करवा देना चाहिये। संशोधन का विषय चरक सू. अ. १५ में विस्तार से दिया गया है। जिज्ञासु पाठकों को उसे वहीं पर देखना चाहिये।
इस खण्डित अध्याय का प्रारम्भ संशोधित रोगी के पथ्य से है अर्थात् संशोधन के बाद रोगी को क्या पथ्य (भोजन) देना चाहिये तथा किस क्रम से पथ्य की मात्रा धीरे २ बढ़ाकर साधारण भोजन दिया जाना चाहिये इत्यादि विषय का इस अध्याय में वर्णन किया गया है। इस अध्याय के प्रारम्भ में खण्डित अंश में सम्भवतः संशोधन का प्रकरण चल रहा होगा जैसा कि पहले भी कहा गया है। अन्त में वमन एवं विरेचन के अतियोग आदि से जो उपद्रव हो जाते हैं उनकी चिकित्सा का वर्णन किया गया है। वही भाव खण्डित अध्याय के प्रारम्भिक निम्न श्लोकांश से प्रकट होता है (इस प्रकार वमन एवं विरेचन से होने वाले उपद्रवों की) चिकित्सा का वर्णन किया गया है।
अतः पञ्चजनात् कञ्चित्सम्यक्शुद्धं प्रकाङ्क्षितम्। लघुं विशदसर्वाङ्गं प्रसन्नेन्द्रियमिच्छुकम् ।।
सुखाम्बुसिक्तसर्वाङ्गमनुलिप्तं विभूषितम्। कृतपूजानमस्कारं मनोज्ञासनवेश्मगम् ।।
पुराणरक्तशालीनां मण्डपूर्वां सुसाधिताम्। यवागूं त्रिःस्रुतामुष्णां दीपनीयोपसंस्कृताम् ।।
भोजयेद्युक्तलवणां रूक्षां युक्ताशितो भवेत्। भोजनेषु सुहृद्येषु सुधौतेष्वपराह्रिके ।।
अब अच्छी प्रकार शुद्ध होने के बाद, जिसे भोजन में रुचि हो, संशोधन से जिसका शरीर हलका हो गया हो तथा सम्पूर्ण अङ्ग निर्मल हो गये हों, जिसकी सम्पूर्ण इन्द्रियां प्रसन्न हों, सुखोष्ण जल से जिसने सर्वाङ्ग स्नान किया हो, शरीर पर चन्दन आदि का लेप करके जिसने अपने शरीर को आभूषण आदि से अलंकृत किया हुआ हो, देवता, ब्राह्मण तथा वृद्ध पुरुषों की जिसने पूजा तथा नमस्कार किया हो, जो सुन्दर आसन तथा घर में बैठा हुआ है—ऐसे पञ्चजन (मनुष्य) को पुराने लाल शालि चावलों द्वारा साधित (बनाई हुई), तीन बार स्रुत की हुई, दीपनीय द्रव्यों से संस्कृत, लवणयुक्त, रूक्ष एवं मण्डप्रधान (सिक्थकैः रहितो मण्डः) यवागू मन को अच्छे लगने वाले तथा अच्छी प्रकार धोये हुए पात्रों में अपराह्न काल में पिलावे।
शिरोललाटहृद्ग्रीवावृषणे साक्षशङ्खके। स्वेदश्चेत् पीतमण्डस्य सम्यक्शुद्धं तमादिशेत् ।।
उद्गारवातकर्मभ्यां विशुद्धाभ्यां दिने दिने। निरुपद्रवपुष्टिभ्यां सम्यक्शुद्धं विनिर्दिशेत् ।।
**सम्यक् संशोधित पुरुष के लक्षण—**मण्ड पीने के बाद जिस व्यक्ति को सिर, मस्तिष्क, हृदय, ग्रीवा, अण्डकोश, अक्ष एवं शङ्खप्रदेश (Temporal region) में पसीना आजाय तथा प्रतिदिन डकार एवं अन्य वातकर्मों से शुद्ध हो जाय (अर्थात् अपानवायु, मल आदि में वायु का अनुलोमन हो), कोई उपद्रव न हो तथा शरीर का पोषण ठीक प्रकार से हो—उस व्यक्ति का अच्छी प्रकार संशोधन हुआ समझना चाहिये।
सुखोषितं जीर्णभक्तं द्वितीयेऽहनि भोजयेत्। यवागूं तु तृतीयेऽह्नि दद्यादस्मै विलेपिकाम् ।।
दीपनोदकसंसिद्धां रूक्षामुष्णां ससैन्धवाम्। चतुर्थे मुद्गमण्डः स्यादोदनश्च सुसाधितः ।।
उपकल्पनीयाध्यायः २४] सूत्रस्थानम् ४५
पुराणरक्तशालीनां भृष्टानां वा कृशात्मनः ।
निस्तुषाणां च मुद्गानां मण्डः स्यादु(द्यु)क्तवेषणः (सनः) ।
ईषत्फलाम्लः कर्तव्यो मुद्गमण्डोऽह्नि पञ्चमे । ईषत्स्नेहः कृतः षष्ठे सप्तमे च विधीयते ।।
जाङ्गलानां रसं सिद्धं तनुकं मांसवर्जितम् । दिनेऽष्टमेऽथ नवमे दद्यात् स्नेहाल्पसंस्कृतम् ।।
दशमैकादशे चाह्नि लवणस्नेहसंस्कृतः । फलाम्लसिद्धो युक्तोष्णः शस्यते रसकौदनः ।।
उष्णोदकानुपानौ तु स्यातां वातकफात्मकौ । तत उत्तरकालं तु भोज्यसंसर्ग इष्यते ।।
एषां(ष) मण्डादिसंसर्गो सर्वव्याधिक्रियोपगः । एवं व्यभिचरन्मोहाद्दारुणांल्लभते गदान् ।।
भोजन का संसर्जन क्रम—सुखपूर्वक जिसने रात्रि में शयन किया है तथा पहले दिन का जिसका भोजन जीर्ण हो चुका है उस व्यक्ति को दूसरे दिन केवल यवागू का भोजन करावे । तीसरे दिन इसे दीपनीय जलों से सिद्ध की हुई रूक्ष, उष्ण तथा सैन्धवयुक्त विलेपी (विलेपी विरलद्रवा) देनी चाहिये । चौथे दिन कृश शरीर वाले व्यक्ति को मूंग का मण्ड तथा अच्छी प्रकार सिद्ध किये हुए ओदन देवे । मण्ड पुराने लाल चावल तथा भुने हुए, एवं छिलके रहित मूंगों का बनाया जाता है जिसमें उचित मात्रा में बेसन आदि डाला हुआ हो । पांचवें दिन इसी मुद्गमण्ड में थोड़ा सा फलाम्ल डालकर खट्टा करके देना चाहिये । छठें तथा सातवें दिन उस मुद्गमण्ड में थोड़ा स्नेह डाल देना चाहिये । आठवें दिन जांगल पशुओं का मांस रहित केवल पतला रस (मांस रस) सिद्ध करके देना चाहिये । नौवें दिन उसमें थोड़ा सा स्नेह भी डाला जा सकता है । दसवें तथा ग्यारहवें दिन लवण तथा स्नेह (घृत) से संस्कृत तथा थोड़ी खटाई डालकर बनाया हुआ थोड़ा २ उष्ण मांसरहित रस तथा ओदन देना चाहिये । वात तथा कफ रोग वालों को साथ में उष्णोदक अनुपान के रूप में देना चाहिये । इसके बाद सामान्य भोजन दिया जाना चाहिये । यह उपर्युक्त मण्ड आदि का क्रम सब व्याधियों में किया जाना चाहिये । जो इस मण्ड आदि के संसर्जन क्रम का भ्रम से उल्लंघन करता है उसको भयंकर रोग (उपद्रव) हो जाते हैं ।
वक्तव्य—यवागू—चावल, मूंग, तिल आदि के द्वारा बनाई हुई खिचड़ी को यवागू कहते हैं । कहा है—यवागू षड्गुणे तोये सिद्धा स्यात् कृसरा घना । तण्डुलैर्मुद्गमाषैश्च तिलैर्वा साधिता हि सा ।। यवागूर्ग्राहिणी बल्या तर्पणी वातनाशिनी ।। यवागू पुनः मण्ड, पेया एवं विलेपी भेद से तीन प्रकार की होती है । पके तण्डुल आदि के घन भाग में से ऊपर के केवल द्रव भाग को मण्ड कहते हैं । १४ गुने जल में चावल डालकर खूब पकालें । बिना छाने भक्तावयव सहित उस द्रवभाग को पेया कहते हैं । तथा १४ गुने जल में चावलों को खूब पकाया जाय, जब उसमें द्रव कम होकर गाढ़ा हो जाय उस गाढ़े पदार्थ को विलेपी कहते हैं । कहा भी है—सिक्थकैः रहितो मण्डः पेया सिक्थसमन्विता । विलेपी बहुसिक्था स्यात् यवागू विरलद्रवा ।। बेसन—दालयश्चणकाणान्तु निस्तुषाः यन्त्रपेषिताः । तच्चूर्णं बेसनं प्रोक्तं ............... ।। चरक सू. अ. १५ में यह संसर्जन क्रम अत्यन्त विस्तार से दिया है—अथैनं सायाह्ने परे वाऽह्नि सुखोदकपरिषिक्तं पुराणानां लोहितशालितण्डुलानां स्ववक्लिन्नानां मण्डपूर्वां सुखोष्णां यवागूं पाययेदग्निबलमभिसमीक्ष्य च, एवं द्वितीये तृतीये चान्नकाले; चतुर्थे त्वन्नकाले तथाविधानामेव शालितण्डुलानामूतिस्रस्त्रां विलेपीमुष्णोदकद्वितीयामस्नेहलवणामल्पस्नेहलवणां वा भोजयेत् । एवं पञ्चमे षष्ठे चान्नकाले; सप्तमे त्वन्नकाले तथाविधानामेव शालीनां द्विपसृतं सुस्विन्नमोदनमुष्णोदकानुपानं तनुना तनुस्नेहलवणोपपन्नेन मुद्गयूषेण भोजयेत्; एवमष्टमे नवमे चान्नकाले; दशमे त्वन्नकाले लावकपिञ्जलादीनामन्यत-मस्यमांसरसेनौदकलावणिकेनापि सारवता भोजयेदुष्णोदकानुपानम्; एवमेकादशे द्वादशे चान्नकाले; अत ऊर्ध्वमनुगुणान् क्रमेणोपभुञ्जानः सप्तरात्रेण प्रकृतिभोजनमागच्छेत् । इस प्रकार १२ भोजनकाल का संसर्जन क्रम बताया है । जिसके बाद क्रमशः भोजन बढ़ाते हुए सात दिन के बाद स्वाभाविक भोजन पर आजावे ।
४६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | उपकल्पनीयाध्यायः २४]
सुश्रुत चि. अ. ३९ में भी यह विषय निम्न प्रकार से दिया है—प्रस्थे परिस्रुते देया यवागू स्वल्पतण्डुला। द्वे चैवार्धाढके देये तिस्रश्चाप्याढके गते ।। विलेपीमुचिताद्भाक्ताच्चतुर्थांशकृतां ततः। दद्यादुक्तेन विधिना क्लिन्नसिक्थामपिच्छिलाम् ।। अस्निग्धलवणं स्वच्छमुद्गयूषयुतं ततः। अंशद्वयप्रमाणेन दद्यात् सुस्विन्नमोदनम् ।। ततस्तु कृतसंज्ञेन हृद्येनेन्द्रियबोधिना। त्र्यंशान् वितरेद्भोक्तुमातुरायोदनं मृदुम् ।। ततो यथोचितं भक्तं भोक्तुमस्मै विचक्षणः। लावैणहरिणगदीनां रसैर्दद्यात् सुसंस्कृतैः ।। संसर्गेण विवृद्धेऽग्नौ दोषकोपभयाद्भजेत्। प्राक् स्वादुतिक्तौ स्निग्धाम्ललवणान् कटुकं ततः ।। स्वाद्वम्ललवणान् भूयः स्वादुतिक्तावतः परम् ।। स्निग्धरूक्षान् रसांश्चैव व्यत्यासात् स्वस्थवृत्ततः ।। आगे सुश्रुत में कहा है कि जिस व्यक्ति को केवल स्नेहन अथवा वमन ही कराया गया है उसे ७ दिन में साधारण भोजन दिया जा सकता है परन्तु जिसका शिरावेधन अथवा अन्य विरेचन आदि शोधन किये गये हों उसे एक मास तक लघु भोजन आदि पर ही रहना चाहिये। कहा है— केवलं स्नेहपीतो वा वान्तो यश्चापि केवलम्। स सप्तरात्रं मनुजो भुञ्जीत लघु भोजनम् ।। कृतः सिराव्यधो यस्य कृतं यस्य च शोधनम्। स न परिहरेन्मासं यावद्वा बलवान् भवेत् ।।
ज्वरामकामलापाण्डुकर्णकुष्ठगलामयाः । हिक्कातिसारश्वयथुकासाद्या व्यभिचारजाः ।।
शूलातिसरौ शुद्धस्य शीतपानांन्नसेवनात् । शोथोदरज्वरा अम्लभृशस्नेहदिवाशयात् ।।
उपर्युक्त संसर्जनक्रम तथा उसके बाद पथ्य आहार विहार का सेवन न करने से क्या उपद्रव हो जाते हैं—
ज्वर, आमदोष, कामला, पाण्डु, कर्णरोग, कुष्ठ, गलरोग, हिक्का, अतिसार, शोथ तथा कास आदि रोग संसर्जन क्रम के उल्लंघन से हो जाते हैं। शुद्ध व्यक्ति के शीतल जल एवं अन्न के सेवन से शूल तथा अतिसार हो जाते हैं। खट्टे द्रव्य, अधिक स्नेह, तथा दिवाशयन (दिन में सोने) से शोथ, उदररोग तथा ज्वर हो जाते हैं। सुश्रुत चि. अ. ३९ में इन उपद्रवों का विस्तार से वर्णन किया गया है—क्रुध्यतः कुपितं पित्तं कुर्यात्तांस्तानुपद्रवान्। आयास्यतः शोचतो वा चित्तं विभ्रममृच्छति ।। मैथुनोपगमाद्धोरान् व्याधीनाप्नोति दुर्मतिः। आक्षेपकं पक्षघातमङ्गप्रग्रहमेव च ।। गुह्यप्रदेशे श्वयथुं कासश्वासौ च दारुणौ। रुधिरं शुक्रवच्चापि सरजस्कं प्रवर्तते ।। लभते च दिवास्वप्नात्तांस्तान् व्याधीन् कफात्मकान्। प्लीहोदरं प्रतिश्यायं पाण्डुतां श्वयथु ज्वरम् ।। मोहं सदनमङ्गानामविपाकं तथाऽरुचिम्। तमसा चाभिभूतस्तु स्वप्नमेवाभिनन्दति ।। उच्चैः संभाषणाद्वायुः शिरस्यापाद्येद्रुजम्। आन्ध्यं जाड्यमजिव्रत्वं बाधिर्यं मूकता तथा ।। हनुमोक्षमधीमन्थमर्दितं च सुदारुणम्। नेत्रस्तम्भं निमेषं वा तृष्णां कासं प्रजागरम् ।। लभते दन्तचालं च तांस्तांश्चान्यानुपद्रवान्। यानयानेन लभते छर्दिमूर्छाभ्रमक्लमान् ।। तथैवाङ्गग्रहं घोरमिन्द्रियाणां च विभ्रमम्। चिरासनातथा स्थानाच्छ्रोण्यां भवति वेदना ।। अतिचङ्क्रमणान्द्वायुर्जङ्घयोः कुरुते रुजः। सक्थिप्रशोषं शोफं वा पादहर्षमथापि वा ।। शीतसंभोगतोयानां सेवा मारुतवृद्धये। ततोऽङ्गमर्दविष्टम्भशूलाध्मानप्रवेपकाः ।। वातातपाभ्यां वैवर्ण्यं ज्वरं चापि समाप्नुयात्। विरुद्धाध्यशनान्मृत्यु व्याधिं वा घोरमृच्छति ।। असात्म्यभोजनं हन्याद्बलवर्णमसंशयम्। अनात्मवन्तः पशुवद्भुञ्जते येऽप्रमाणतः ।। रोगानीकस्य ते मूलमजीर्णं प्राप्नुवन्ति हि ।।
कांक्षा बुभुक्षा वैशद्यं लघुता स्थिरता सुखम्। स्वस्थवृत्तानुवृत्तिश्च सम्यग्जीर्णान्नलक्षणम् ।।
अन्न के सम्यक् जीर्ण होने के लक्षण—भोजन की इच्छा होना, भूख लगना, शरीर का विशद (प्रसन्न), हलका, स्थिर तथा स्वस्थ होना और स्वस्थ व्यक्ति के समान शरीर की क्रियाओं का होना—ये खाये हुए अन्न के सम्यक् जीर्ण होने के लक्षण हैं।
विषादो गौरवं तन्द्री श्लेष्मसेकारतिभ्रमाः । स्वस्थवृत्तोपरोधश्च तदजीर्णस्य लक्षणम् ।।
अन्न के जीर्ण न होने के लक्षण—विषाद, भारीपन, तन्द्रा, कफ की वृद्धि, अरति (ग्लानि), भ्रम, तथा स्वस्थवृत्त का पालन न कर सकना—ये खाये हुए अन्न के अजीर्ण के लक्षण हैं।
उपकल्पनीयाध्यायः २४] सूत्रस्थानम् ४७
आमं विदग्धं सश्लेष्म रसशेषं तथैव च। चतुर्विधमजीर्णं तु तस्य वक्ष्यामि लक्षणम्।।
उपर्युक्त अजीर्ण के ४ भेद—१. आमाजीर्ण २. विदग्धाजीर्ण ३. श्लेष्माजीर्ण तथा ४ रसशेषाजीर्ण। यह चार प्रकार का अजीर्ण होता है। उनके लक्षण मैं कहूंगा। सुश्रुत सू. अ. ४६ में भी अजीर्ण के इन्हीं भेदों का उल्लेख किया है—आमं विदग्धं विष्टब्धं कफपित्तानलैस्त्रिभिः। अजीर्णे केचिदिच्छन्ति चतुर्थं रसशेषतः॥ श्लेष्माजीर्ण को ही यहां विष्टब्धाजीर्ण कहा गया है।
यथाभुक्तं भवेद्दामे, धूमोद्गारौ विदाहिनि। सश्लेष्मणि गुरुत्वं तु, रसशेषे तु हृद्द्रवः ।।
इनके सामान्य लक्षण—आमाजीर्ण में रोगी को ऐसा प्रतीत होता है मानों अभी २ भोजन किया गया है। विदग्धाजीर्ण में मुंह से धुंआ निकलता है तथा डकार आती है। श्लेष्माजीर्ण में शरीर में भारीपन होता है तथा रसशेषाजीर्ण में हृदय में भारीपन (Palpitation of Heart) प्रतीत होता है, सुश्रुत सू. अ. ४६ में इनके निम्न लक्षण दिये हैं—माधुर्यमन्नं गतमामसंज्ञं विदग्धसंज्ञं गतमम्लभावम्। किंचिद्विपक्वं भृशतोदशूलं विष्टब्धमाब(न)द्धविरुद्धवातम्॥ उद्गार शुद्धावपि भक्तकांक्षा न जायते हृद्गुरुता च यस्य। रसावशेषेण तु सप्रसेक चतुर्थमेतत् प्रवदन्त्यजीर्णम्॥ अर्थात् आमाजीर्ण में सेवन किया हुआ भोजन (आम रस के कारण) मधुरता को प्राप्त होता है। विदग्धाजीर्ण में अम्लता को प्राप्त होता है। विष्टब्धाजीर्ण में भोजन का आधा परिपाक होकर पेट में पीड़ा तथा शूल होती है तथा नीचे का मार्ग बन्द हो जाने से वायु ऊपर की ओर चढ़ती है। तथा रसशेषाजीर्ण में शुद्ध डकार आने पर भी भोजन की इच्छा नहीं होती, हृदय प्रदेश पर भारीपन रहता है तथा मुंह से लालास्राव होता रहता है। इसी प्रकार अष्टाङ्गसंग्रह सू. अ. ११ में भी कहा है—तत्रा मे गुरुतोत्क्लेशः शोथो गण्डाक्षिकूटयोः। उद्गारश्च यथाभुक्तमविदग्धः प्रवर्त्तते॥ विष्टब्धे शूलमाध्मानं विविधा वातवेदनाः। मलवाताप्रवृत्तिश्च स्तम्भो मोहोऽङ्गपीडनम्॥ विदग्धे भ्रमतृण्मूर्छाः पित्ताच्च विविधाः रुजाः। उद्गारश्च सधूमाम्लःस्वेदो दाहश्च जायते॥ रसशेषेऽन्नविद्वेषो हृदयाशुद्धिगौरवे॥
तन्द्रीशूलारतिग्लानितृड्विदाहारुचिभ्रमाः । अङ्गमर्दज्वरानाहाः सर्वेष्वप्यल्पशो गदाः ।।
सर्वैरसध्यतोत्कृष्टैः क्रमशो याप्यसाध्यते । साध्यानां साधनं यत्तु तन्मे प्रवदतः शृणु ।।
आमस्योद्धरणं पथ्यं, विदग्धे प्रावृतः स्वपेत् ।
सश्लेष्मणि भवेत् स्वेदः, परिशोष्यो रसाधिके ।।
सब अजीर्णों के सामान्य लक्षण—सब प्रकार के अजीर्णों में थोड़ी मात्रा में तन्द्रा, शूल, अरति, ग्लानि, प्यास, विदाह, अरुचि, भ्रम, अङ्गमर्द, ज्वर तथा आनाह आदि लक्षण होते हैं। जब ये सब उपर्युक्त लक्षण प्रबल रूप में उपस्थित हों तो रोग असाध्य हो जाता है। इसके विपरीत अल्प लक्षण होने पर रोग क्रमशः याप्य अथवा साध्य होते हैं। इनमें से जो साध्य रोग हैं उनकी तूं मेरे से चिकित्सा सुन।
यदुक्तं पथ्यमशनं तदेवैतेषु शस्यते । दीर्घकालोषधानां तु मुद्गमण्डः सदाडिमः ।।
इनकी सामान्य चिकित्सा—आमाजीर्ण में आम का उद्धरण करना चाहिये अर्थात् लङ्घन के द्वारा आम का पाचन कर देना चाहिये। विदग्धाजीर्ण में कपड़ा ओढ़कर सो जाये (अष्टाङ्गसंग्रह में कहा है—तत्राभुक्तवा दिवा स्वप्यात्-अर्थात् बिना कुछ खाये दिन में सो जाये)। श्लेष्माजीर्ण में स्वेदन देना चाहिये (कफ के विलय के लिये) तथा रस की अधिकता (अर्थात् रसशेषाजीर्ण) में शोषण करना चाहिये (लङ्घन इत्यादि के द्वारा)। सुश्रुत सू. अ. ४६ में इनका निम्न चिकित्सा सूत्र दिया है—तत्रामे लंघनं कार्यं विदग्धे वमनं हितम्। विष्टब्धे स्वेदनं पथ्यं रसशेषे शयीत च॥ यहां चिकित्सा में थोड़ा अन्तर है। सुश्रुत में विदग्धाजीर्ण में वमन तथा रसशेषाजीर्ण में सोने का विधान है जब कि यहां पर विदग्धाजीर्ण में सोने
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