भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 387

स्नेहाध्यायः १२] सूत्रस्थानम् २९

तैल का किन्हें सेवन करना चाहिये—जिनमें मेद, कफ, मांस तथा वात बढ़े हुए हों, जो नाडीव्रण, उदरकृमि तथा वातरोग से पीडित हों, जिनके कोष्ठ क्रूर हों, जो तनुता (कृशता-पतलापन) तथा वीर्य को चाहनेवाले हैं—उन व्यक्तियों को तैल का पान करना चाहिये। परन्तु तीव्र कुष्ठ में तैल का पान न करें। चरक सू. अ. १३ में कहा है—प्रवृद्धश्लेष्ममेदस्काश्चलस्थूलगलोदराः । वातव्याधिभिराविष्टा वातप्रकृतयश्च ये ।। बलं तनुत्वं लघुतां दृढतां स्थिरगात्रताम् । स्निग्धश्लक्ष्णतनुत्वक्तां ये च काङ्क्षन्ति देहिनः ।। कृमिकोष्ठाः क्रूरकोष्ठास्तथा नाडिभिर्दिताः । पिबेयुः शीतले काले तैलं तैलोचिताश्च ये ।। यद्यपि तैलपान का काल पहले प्रावृट् ऋतु बतलाया है परन्तु आत्ययिक विकारों में शीतकाल में भी तैल (स्नेह) पान कराया जा सकता है। इसीलिये अष्टाङ्गसंग्रह सू. अ. २५ में कहा है—निश्यनिले पित्ते संसर्गे पित्तवत्यपि । त्वरमाणे तु शीतेऽपि दिवा तैलं च योजयेत् ।।

(इति ताडपत्र पुस्तके ३७ तमं पत्रम्)

संशुष्कमेदःकफरक्तशुक्रा वातातपाध्वश्रमरौक्ष्यनित्याः ।
भृशाग्नयो वातनिपीडिताङ्गा वसां पिबेयुर्धृतिधातुकामाः ।।२७।।

वसा का किन्हें सेवन करना चाहिये—जिनके मेद, कफ, रक्त तथा शुक्र (वीर्य) सूख गये हों (क्षीण हो गये हों), जो नित्य वात, आतप (धूप) तथा मार्ग चलने के श्रम एवं रूक्षता को सहते हैं, जिनकी अग्नि तीव्र हो, वायु से जिनके अङ्ग पीडित हों, तथा जो धृति (धारण शक्ति) और धातुओं की वृद्धि चाहते हों उन्हें वसा का पान करना चाहिये। चरक सू. अ. १३ में कहा है—वातातपसहा ये च रूक्षा भाराध्वकर्शिताः । संशुष्करेतोरुधिरा निष्पीतकफमेदसः ।। अस्थिसन्धिशिरास्नायुमर्मकोष्ठमहारुजः । बलवामारुतो येषां खानि चावृत्य तिष्ठति ।। महच्चाग्निबलं येषां वसासात्म्याश्च ये नराः । तेषां स्नेहयितव्यानां वसापानं विधीयते ।। इसी प्रकार सुश्रुत चि. अ. ३१ में भी कहा है—व्यायामकशिताः शुष्करेतोरक्ता सहारुजः । महाग्निमारुतप्राणा वसायोग्या नराः स्मृताः ।।

दीप्ताग्नयो घस्मराः स्नेहनित्याः क्लेशक्षमाः क्रूरकोष्ठानिलार्ताः ।
मज्जानमेतेषु भिषग्विद्ध्यात् स्नेहो भवेत्सात्म्यतो यस्य यो वा ।।२८।।

मज्जा का किन्हें सेवन करना चाहिये—जिनकी अग्नि दीप्त हो, बहुत खानेवाले हों, जो नित्य स्नेह का सेवन करते हों, क्लेशों को सहनेवाले हों, जिनके कोष्ठ क्रूर हों तथा जो वातरोगी हों—उन्हें चिकित्सक को मज्जा का सेवन कराना चाहिये। अथवा जिनको जो भी स्नेह सात्म्य हों उसका सेवन करना चाहिये। चरक सू. अ. १३ में भी कहा है—दीप्ताग्नयः क्लेशसहा घस्मराः स्नेहसेविनः । वातार्ताः क्रूरकोष्ठाश्च स्नेह्मा मज्जानमाप्नुयुः ।। इसी प्रकार सुश्रुत चि.अ. ३१ में भी कहा हैं—क्रूराशयाः क्लेशसहा वातार्ता दीप्तवह्नयः । मज्जानमाप्नुयुः सर्वे ......... ।।

व्यायाममद्यचिन्तामैथुननित्याः श्रमाध्वकृशदेहाः ।
स्नेह्यास्तथाविधाः स्युर्बलकालवयोग्निसात्म्यज्ञैः ।।२९।।

किनका स्नेहन करना चाहिये—बल, काल, अवस्था, जाठराग्नि तथा सात्म्य को जाननेवालों को चाहिये कि नित्य व्यायाम करनेवाले, नित्य मद्य पीनेवाले, नित्य चिन्ता में लगे रहनेवाले अथवा मस्तिष्क संबन्धी कार्य अधिक करनेवाले, नित्य मैथुन (भोगविलास) में लगे रहने वाले, श्रम तथा मार्ग चलने से कृश देहवाले तथा अन्य भी इसी प्रकार के पुरुषों को स्नेहन करायें। चरक में स्नेहन के योग्य निम्न व्यक्ति दिये हैं—स्वेद्याः शोधयितव्याश्च रूक्षा वातविकारिणः । व्यायाममद्यस्त्रीनित्याः स्नेह्माः स्युर्ये च चिन्तकाः ।। अर्थात् यहाँ स्वेदन एवं संशोधन (वमन-विरेचन) के योग्य पुरुषों को विशेषरूप से गिनाया है। स्वेदन एवं संशोधन से पूर्व स्नेहन का करना अत्यन्त आवश्यक है। कहा भी है—स्नेहमग्रे प्रयुञ्जीत ततः स्वेदमन्तरम् । स्नेहस्वेदोपपन्नस्य संशोधनमनन्तरम् ।।