काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् स्नेहाध्यायः २२]
न स्नेहयेद्गर्भिणीं न प्रसूतां न क्षीरपं नैव दग्धातिवृद्धौ । न श्लेष्मपित्तोपहतान्तराग्निं मूर्च्छारुचिग्लानिभृशामतृट्सु ॥ ३० ॥ बस्तौ न नस्तश्च विधिक्रियायां छर्द्यां ज्वरे विट्प्रकोपे कफे च । बृहत्त्वजाड्येषु गलामयेषु नस्नेहयेत् स्नेहमदात्ययेषु ॥ ३१ ॥ तेषां स्नेहाच्छपानान्ते (त्ते) वर्धन्ते व्याधयो भृशम् । असाध्यतां वा गच्छन्ति स्नेहपानाभिवर्धिताः ॥ ३२ ॥
किनका स्नेहन नहीं करना चाहिये—गर्भिणी, प्रसूता, दूध पीनेवाले बालक, दग्ध (जले हुए), जिनकी अतिवृद्धि हो (जिनके शरीर की आवश्यकता से अधिक वृद्धि हुई है), श्लेष्म एवं पित्त से जिनकी आन्तराग्नि क्षीण हुई है, मूर्च्छा, अरुचि, ग्लानि, अत्यन्त आमदोष तथा प्यास में, बस्ति एवं नस्यकर्म जिस समय किये जा रहे हों, छर्दि (वमन), ज्वर, मलरोग (अतिसार) तथा कफ के प्रकोप में, शरीर की अत्यन्त जड़ता में गले के रोगों में तथा स्नेह के अधिक सेवन से जिन्हें मदात्यय रोग हो जाता हो—उनका स्नेहन न करे इनको केवल स्वच्छ स्नेह का पान कराने से वे व्याधियाँ बढ़ जाती हैं तथा स्नेहपान से बढ़ी हुई व्याधियाँ असाध्य हो जाती हैं।
वक्तव्य—जो नित्य मद्य पीते हैं उनको स्नेहन करना चाहिये परन्तु जिन्हें अधिक मद्य के सेवन से मदात्यय रोग हो गया हो उनका स्नेहन नहीं करना चाहिये। चरक में निम्न पुरुष स्नेहन के अयोग्य गिनाये हैं—अभिष्यण्णाननगुदा नित्यं मन्दाग्नयश्च ये । तृष्णामूर्च्छापरीताश्च गर्भिण्यस्तालुशोषिणः ॥ अन्नद्विषश्छर्दयन्तो जठरामरगार्दिताः । दुर्बलाश्च प्रतान्ताश्च स्नेहम्लाना मदातुराः ॥ न स्नेह्या वर्तमानेषु न नस्तोबस्तिकर्मसु । स्नेहपानात्प्रजायन्ते तेषां रोगाः सुदारुणाः ॥ सुश्रुत चि. ३१ अ. में भी कहा है—विवर्जयेत् स्नेहपानमजीर्णी चोदरी ज्वरी । दुर्बलोऽरोचकी स्थूलो मूर्च्छार्तो मदपीडितः । छर्दार्दितः पिपासार्तः श्रान्तः पानक्लमान्वितः ॥ दत्तबस्तिर्विरिक्तश्च वान्तो यश्चापि मानवः । अकाले दुर्दिने चैव न च स्नेहं पिबेन्नरः ॥ अकाले च प्रसूता स्त्री स्नेहपानं विवर्जयेत् । स्नेहपानाद्भवन्त्येषां नृणां नानाविधा गदाः ॥ गदा वा कृच्छ्रतां यान्ति न सिध्यन्त्यथवा पुनः ॥ गर्भाशये सशेषा स्यू रक्तक्लेदमलास्ततः । स्नेहं जह्यान्त्रिषेवेत पाचनं रूक्षमेव च ॥
वायोरप्रगुणत्वं रौक्ष्यं खरताऽधृतिर्ज्वलनहानिः । शुष्कग्रथितपुरीषं लक्षणमस्निग्धगात्रस्य ॥ ३३ ॥
अस्निग्ध व्यक्ति के लक्षण—वायु का अपने गुणों से युक्त न होना अर्थात् अनुलोम न होना, रूक्षता, कर्कशता, अधैर्य (बेचैनी—uneasiness), जाठराग्नि की दुर्बलता, तथा पुरीष (मल) का सूखा और गाँठोंवाला होना—ये अस्निग्ध व्यक्ति के लक्षण हैं। चरक सू. अ. १३ में अस्निग्ध के निम्न लक्षण बताये हैं—पुरीषं ग्रथितं रूक्षं, वायुरप्रगुणो, मृदुः । पक्ता, खरत्वं रौक्ष्यं च गात्रस्यास्निग्धलक्षणम् ॥ इसी प्रकार सुश्रुत में भी ये ही लक्षण दिये हैं—पुरीषं ग्रथितं रूक्षं कृच्छ्रादन्नं विपच्यते । उरो विदहते वायुः कोष्ठादुपरि धावति ॥ दुर्वर्णो दुर्बलश्चैव रूक्षो भवति मानवः ॥
धृतिर्मृदुपुरीषत्वं मेधापुष्ट्यग्नितेजसां वृद्धिः । काले शरीरवृत्तिः स्निग्धस्य वदन्ति लिङ्गानि ॥ ३४ ॥
सम्यक् स्निग्ध के लक्षण—रोगी धैर्य (easiness) अनुभव करता है, मल मृदु (नरम) हो जाता है, मेधा, पोषण, जाठराग्नि तथा तेज की वृद्धि होती है और शरीर की सब वृत्तियाँ (कार्य) ठीक समय पर होती रहती हैं—ये सम्यक् स्निग्ध के लक्षण हैं। चरक सू. अ. १३ में सम्यक् स्निग्ध के निम्न लक्षण दिये हैं—वातानुलोम्य दीप्तोऽग्निर्वर्चः स्निग्धमसंहतम् । मार्दव स्निग्धता चाङ्गे स्निग्धानामुपजायते ॥
गौरवजाड्योत्क्लेशाध्मानानि पुरीषमविपक्वम् । अरुचिरपि पाण्डुतन्द्रे वदन्त्यतिस्निग्धलिङ्गानि ॥ ३५ ॥