काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंस्नेहाध्यायः २२] सूत्रस्थानम् ३१
अतिस्निग्ध के लक्षण—शरीर का भारीपन, जड़ता, शरीर या इन्द्रियों का अच्छी प्रकार कार्य न करना, उत्क्लेश (जी मचलाना—Nausca), आध्मान (पेट का वायु के कारण फूलना), कच्चा मल आना (Undigested foeces), अरुचि, पाण्डुता तथा तन्द्रा—ये अतिस्निग्ध के लक्षण हैं। चरक सू. अ. १३ में इसके निम्न लक्षण दिये हैं—पाण्डुता गौरवं जाड्यं पुरीषस्याविपक्वता। तन्द्रीरुचिरुत्क्लेशः स्यादतिस्निग्धलक्षणम् ।। इसी प्रकार सुश्रुत चि. अ. ३१ में भी कहा है—भक्तद्वेषो मुखस्रावो गुददाहः प्रवाहिका। पुरीषातिप्रवृत्तिश्च भृशं स्निग्धस्य लक्षणम् ।।
द्रवमितलघूष्णमन्नं काले सात्म्यं बलाग्निरुग्युक्तम्। स्वः स्नेहपानमिच्छन् भुञ्जीत शयीत गुप्तश्च ।।३६।।
स्नेहपान से पूर्व क्या हितकर है—अपने लिये स्नेहपान की इच्छावाले व्यक्ति को चाहिये कि वह द्रव (liquid), मित (मपा हुआ-मात्रा में), लघु, उष्ण, सात्म्य, बल एवं अग्नि से युक्त अन्न को उपयुक्त काल में (जो समय उपयुक्त समझा जाये) खाये तथा एकान्त में शयन करे।
वक्तव्य—यहाँ 'स्वः' के स्थान पर 'श्वः' पाठ होता तो अधिक उपयुक्त था अर्थात् अगले दिन जिसने स्नेहपान करना है उसे पहले दिन उपर्युक्त विधि का पालन करना चाहिये। चरक में कहा है—द्रवोष्णमनभिष्यन्दि भोज्यमन्नं प्रमाणतः। नातिस्निग्धमसंकीर्णं श्वः स्नेहं पातुमिच्छता ।।
उष्णोदकोपचारी जितेन्द्रियः स्यान्निवातशयनस्थः। व्यायामवेगरोधत्यागी स्नेहाच्छपोऽस्वप्नः ।।३७।।
स्नेहपान के पश्चात् क्या हितकर तथा क्या अहितकर है—स्नेह को पीकर (जीर्ण हो जाने पर) तथा पान करते हुए भी दोनों अवस्थाओं में पुरुष को उष्ण जल का सेवन (प्रयोग) करना चाहिये। जितेन्द्रिय होकर (ब्रह्मचर्यपूर्वक) रहना चाहिये। सोने तथा बैठने की जगह ऐसी होनी चाहिये जहाँ सीधी हवा न आती हो। तथा व्यायाम (परिश्रम के कार्य) वेग (मल मूत्र अपानवायु आदि के वेग) क्रोध तथा दिवास्वप्न का त्याग कर देना चाहिये। चरक सू. अ. १३ में कहा है—स्नेहं पीत्वा नरः स्नेहं प्रतिभुञ्जान एव च। उष्णोदकोपचारी स्यात् ब्रह्मचारी क्षपाशयः ।। शकृन्मूत्रानिलोद्गारानुदीर्णींश्च न धारयेत्। व्यायाममुच्चैर्वचनं क्रोधशोकौ हिमातपौ ।। वर्जयेत्प्रवातं च सेवेत शयनासनम्। स्नेहमथ्योपचाराद्धि जायन्ते दारुणाः गदाः ।। इस विधि का पालन स्नेहपान के दिनों में तथा उसके बाद उतने ही दिन और करना चाहिये। इस विषय में चरक सिद्धिस्यान अध्याय १ में कहा है—कालस्तु बस्त्यादिषु याति यावांस्तावन् भवेद्विद्विःपरिहारकालः। अत्यासनस्थानवचांसि पानं स्वप्नं दिवा मैथुनवेगरोधान् ।। शीतोपचारात्तपशोकरोषांस्त्यजेदकालाहितभोजनं च ।। इसी प्रकार अष्टाङ्गसंग्रह में भी कहा है—भोज्योन्नं मात्रया पास्यन् श्वः पिबन् पीतवानपि। द्रवोष्णमनभिष्यन्दि नातिस्निग्धमसङ्करम् ।। उष्णोदकोपचारी स्यात् ब्रह्मचारी क्षपाशयः। व्यायामवेगसंरोधशोकहर्षहिमातपान् ।। प्रवातयानापानाध्वभाष्यात्याशनसंस्थितीः। नीचात्युच्चोपधानाहः स्वप्नधूमरजांसि च ।। यान्यहानि पिबेत्तानि तावन्त्यन्यान्यपि त्यजेत् ।।
संस्निह्यति मृदुकोष्ठो नरस्त्रिरात्रेण, सप्तरात्रेण। स्नेहाच्छपानयोगाज्जीवक ! यः क्रूरकोष्ठस्तु ।।३८।।
हे जीवक ! अच्छ स्नेह के पान से मृदु कोष्ठ वाला व्यक्ति तीन दिन में स्निग्ध हो जाता है तथा कठोर कोष्ठ वाला व्यक्ति सात दिन में स्निग्ध होता है। चरक में कहा है—मृदुकोष्ठस्त्रिरात्रेण स्निह्यत्यच्छोपसेवया। स्निह्यति क्रूरकोष्ठस्तु सप्तरात्रेण मानवः ।।
द्राक्षापीलुत्रिफलागोरसतप्ताम्बुतरुणमद्यानि । भुक्त्वाऽथ पायसं यो मृदुकोष्ठःस्रंस्य(स)ते नान्यः ।।३९।।
२५ का.सं.