काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् स्नेहाध्यायः २२]
मृदु कोष्ठ वाले व्यक्ति को द्राक्षा (अंगूर या मुनक्के का रस) पीलुरस, त्रिफला, गोमूत्र, उष्णजल, नवीन तैयार की हुई मद्य, तथा दूध के सेवन करने से ही विरेचन हो जाता है। परन्तु इनसे क्रूर कोष्ठ व्यक्ति को विरेचन नहीं होता है। चरक सू. अ. १३ में कहा है—गुडमिक्षुरसं यस्तु क्षीरमृल्लोडितं दधि। पायसं कृसरं सर्पिः काश्मर्यत्रिफलारसम्।। द्राक्षारसं पीलुरसं जलमुष्णमथापि वा। मद्यं वा तरुणं पीत्वा मृदुकोष्ठो विरिच्यते। विरेचयन्ति नैतानि क्रूरकोष्ठं कदाचन। भवति क्रूरकोष्ठस्य ग्रहबृत्यल्बणानिला।। सुश्रुत में तीन प्रकार के कोष्ठों का वर्णन किया गया है—तत्र मृदुः क्रूरो मध्य इति त्रिविधः कोष्ठो भवति। तत्र बहुपित्तो मृदु। स दुग्धेनापि विरिच्यते। बहुवातश्लेष्मा क्रूरः स दुर्विरेच्यः। समदोषो मध्यमः, स साधारणः।।
पित्तबहुलेतराल्पा ग्रहणी भवति मृदुकोष्ठानां तस्मात्।
सुविरेच्या मृदुकोष्ठाः प्रायः पित्तं ह्यधोभागि ।।४०।।
मृदु कोष्ठ वाले व्यक्तियों की ग्रहणी में पित्त का आधिक्य होता है तथा इतर दोष (वात और कफ) अल्प मात्रा में होते हैं इसलिये इन्हें विरेचन सुगमता से हो जाता है। क्योंकि पित्त इनके अधोभाग में स्थित होता है। चरक सू. अ. १३ में कहा है—उदीर्णपित्ताऽल्पकफा ग्रहणी मन्दमारुता। मृदुकोष्ठस्य तस्मात् स सुविरेच्यो नरः स्मृतः।।
वक्तव्य—ग्रहणी से अभिप्राय क्षुद्रान्त्र का प्रारम्भिक भाग है। इसका परिमाण १२ अंगुल होता है। इसमें अर्धपक्व अन्न को पकाने के लिये पित्ताशय (Gall Bladder) से पाचक पित्त (Bile) तथा अग्न्याशय (Pancreas) से उसका रस पृथक् २ स्रोतों द्वारा आकर एक सम्मिलित मुख (Ampulla of Water) के द्वारा ग्रहणी में पहुँचता है। उनके द्वारा अपक्व अन्न का पाक होकर आगे जाता है इसे पित्तधरा कला भी कहा गया है। सुश्रुत में कहा है—षष्ठी पित्तधरा नाम या कला परिकीर्तिता। पक्वामाशयमध्यस्था ग्रहणी परिकीर्तिता।। इसी प्रकार चरक में भी इसे अग्नि का अधिष्ठान माना गया है। कहा है—अग्न्यधिष्ठानमन्नस्य ग्रहणात् ग्रहणी मता। नाभेरुपरि सा ह्यग्नि बलोपस्तम्भबृंहिता।। अपक्वं धारयत्यन्नं पक्वंत्यजति चाप्यधः।।
तृण्मूर्छामुखशोषैः शब्दद्वेषाङ्गमर्दजृम्भाभिः। तन्द्रीवाग्देहसादैः स्नेहज्ञा(ज्ञोऽ)जीर्यतीत्याह ।।४१।।
स्नेह के जीर्ण न होने के लक्षण—स्नेह के गुणों को जाननेवाला व्यक्ति प्यास, मूर्छा, मुखशोष, शब्दद्वेष, (किसी प्रकार का शब्द अच्छा न लगना), अङ्गमर्द, जँभाई, तन्द्रा तथा वाणी और देह का अवसाद (खिन्न होना) इन लक्षणों से स्नेह के अजीर्ण को जानता है। अर्थात् उपर्युक्त लक्षणों को देखकर यह जाना जा सकता है कि सेवन किया हुआ स्नेह जीर्ण नहीं हुआ है।
जीर्णाजीर्णविशङ्की केवलमुष्णोदकं पिबेत् तद्धि।
उद्गारस्य विशुद्धिं जनयति भक्ताभिलाषं च।।४२।।
स्नेहाजीर्ण की चिकित्सा—जिस व्यक्ति को सेवन किये हुए स्नेह के जीर्ण होने या न होने की शंका हो वह केवल उष्ण जल पीये। इससे उद्गार (डकार) ठीक हो जाती है तथा भोजन में भी रुचि उत्पन्न होती है।
तैलेऽधिको(के)विदाहः, सर्पिषि मूर्च्छा, वसासु हल्लासः।
मज्जनि गौरवमेषां दोषैरल्पा प्रवृत्तिस्तु ।।४३।।
यदि स्नेहाजीर्ण तैल के आधिक्य से हो तो विदाह (कोष्ठ में जलन), घृत के आधिक्य से हो तो मूर्छा, वसा से हल्लास (जी मचलाना) तथा मज्जा से शरीर का भारीपन होगा। इन व्यक्तियों की (प्रवृद्ध) दोषों के कारण प्रवृत्ति (कार्य में रुचि) भी अल्प होती है।