भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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३८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् स्वेदाध्यायः २३]

स्वेदाभिनन्दिता सौख्यं मृदुता रोगदेहयोः । काले विसृष्टिः क्षुत्तृष्णा सम्यक्स्विन्नस्य लक्षणम् ।। १८ ।।

सम्यक् स्विन्न के लक्षण—स्वेद से प्रसन्नता एवं सुख की प्राप्ति हो, रोग मृदु (कम बलवाला) हो जाय, देह भी मृदु हो जाय, मल, मूत्र आदि का वेग यथासमय हो तथा भूख और प्यास लगे—ये सम्यक् स्विन्न के लक्षण हैं। अर्थात् इन लक्षणों को देखकर जाना जा सकता है कि स्वेदन ठीक हो गया है तथा अब स्वेदन बन्द कर देना चाहिये। सुश्रुत चि. अ. ३२ में कहा है—स्वेदास्त्रावो व्याधिहानिर्लघुत्वं शीतार्थित्वं मार्दवं चातुरस्य। सम्यक्स्विन्ने लक्षणं प्राहुरेतन्मिथ्यास्विन्ने व्यत्यये नैतदेव।। अर्थात् सम्यक् स्विन्न में स्वेदास्त्राव, व्याधि का शमन, शरीर की लघुता, शीतपदार्थों की इच्छा तथा शरीर की मृदुता आदि लक्षण होते हैं। तथा असम्यक् स्विन्न में इससे विपरीत लक्षण होते हैं अर्थात् स्वेद नहीं आता, तथा व्याधि की वृद्धि, शरीर का भारीपन, उष्ण पदार्थों की इच्छा तथा शरीर की कठोरता आदि लक्षण होते हैं। इसी प्रकार अष्टाङ्गसंग्रह में कहा है—शीतशूलक्षये स्विन्नो जातोऽङ्गानां च मार्दवे।

पित्तात्मा पित्तरोगी च गर्भिणी मधुमेहिनः । क्षुत्तृष्णाशोषरोषार्ताः कामल्युदरविक्षताः ।। १९ ।। कार्श्यमद्यविषातार्ताश्च भृशाग्नितिमिरस्रुताः । भ्रष्टभग्नविदग्धाङ्गा न स्वेद्यास्ते कथंचन ।। २० ।।

किन्हें स्वेदन नहीं कराना चाहिये—पित्तप्रकृति अथवा पित्त के रोगी, गर्भिणी, मधुमेही, भूख, प्यास, शोष तथा रोष से पीडित, कामला तथा उदररोग के रोगी, विक्षत (जिन्हें घाव लगा हो) कृश, मद्य एवं विष के विकारों से पीड़ित, जिनकी जठराग्नि अत्यन्त तीव्र हो, तिमिर रोग से पीड़ित तथा अतिसार रोगी भ्रष्ट (जिनकी आंत अथवा गुदा-कांच निकली हुई हो, जिनकी अस्थि भग्न हो तथा जिनके अंग जले हुए हों—उन्हें कभी स्वेदन न करावें। चरक में कहा है—कषायमद्यनित्यानां गर्भिण्या रक्तपित्तिनाम्। पित्तिनां सातिसाराणां रूक्षाणां मधुमेहिनाम् ।। विदग्धभ्रष्टवध्नानां विषमद्यविकारिणाम् । श्रान्तानां नष्टसंज्ञानां स्थूलानां पित्तमेहिनाम् ।। तृष्यतां क्षुधितानां च क्रुद्धानां शोचतामपि। कामल्युदरिणां चैव क्षतानामाढ्यरोगिणाम् ।। दुर्बलातिविशुष्काणामुपक्षीणौजसां तथा । भिषक् तैमिरिकाणां च न स्वेदमवतारयेत् ।। इसी प्रकार सुश्रुत में भी कहा है—पाण्डुर्मेही रक्तपित्ती क्षयार्तः क्षामोऽजीर्णी चोदरार्तो गरार्तः । तृट्छद्यर्त्तो गर्भिणी पीतमद्यो नैते स्वेद्या यश्च मर्त्योऽतिसारी ।।

स्वरभेदप्रतिश्यायगलग्रहशिरोरुजि । मन्याकर्णशिरःशूले गौरवे श्वासकासयोः ।। २१ ।। कुक्षिपाश्र्वेकटीपृष्ठविङ्ग्रहे मूत्रयक्ष्मणि । शुक्राघाते पक्षवधे कोष्ठानाहविबन्धयोः ।। २२ ।। विनामार्दितजृम्भासु हनुमन्याशिरोग्रहे । अङ्गमर्दे महत्त्वे च वेपथौ वातकण्टके ।। २३ ।। शीतशोथामखल्वी(ल्ली)षु पाणिपादाङ्गमारुते । आयामाक्षेपशूलादौ स्वेदः पथ्यतमो नृणाम् ।। २४ ।।

स्वेदन कहां २ करना चाहिये—स्वरभेद, प्रतिश्याय, गलग्रह (गले का पकड़ा जाना) शिररोग, मन्या (ग्रीवा शिरा) शूल, कर्णशूल तथा शिरःशूल, गौरव (अङ्गों का भारीपन) श्वास एवं कासरोग, कुक्षिग्रह, पाश्र्वग्रह, कटिग्रह, पृष्ठग्रह, तथा विङ्ग्रह (मलबन्ध), मूत्ररोग, यक्ष्मारोग, शुक्राघात (शुक्ररोध अथवा वीर्य का बाहर क्षरण न होना), पक्षाघात, कोष्ठ का आनाह (आध्मान), विबन्ध (मल तथा मूत्र के रुक जाने पर), विनाम (वातप्रकोप से शरीर के नमन होने वाले लक्षणों से युक्त अपतानक, धनुस्तम्भ, बाह्यायाम तथा आभ्यन्तरायाम आदि रोग) अर्दित (Facial Paralysis), जृम्भारोग (जंभाई) हनुग्रह, मन्याग्रह, शिरोग्रह, अङ्गमर्द, महत्त्व (अण्डवृद्धि-Hydrocele आदि), वेपथु (कम्पन), वातकण्टक (पैरों में वातिक वेदना), शीत (सर्दी लगना), शोथ, आमदोष (विसूचिका-अलसक आदि), खल्ली (खल्ली तु पादजंघोरुकरमूलावमोटनी-हाथ पैर आदि में खिंचावट के साथ दर्द होना), हाथ, पैर तथा अन्य अङ्गों में वायु का प्रकोप, आयाम (अङ्गों का फैलना), आक्षेप तथा (Convulsions) तथा शूल में मनुष्यों को स्वेद करना अत्यन्त हितकर माना गया है। चरक सू. अ. १४ में स्वेदन के लिये निम्न रोगों का परिगणन किया गया है—प्रतिश्याये च कासे च