काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 397, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्वेदाध्यायः २३] सूत्रस्थानम् ३९
हिक्काश्वासेष्वलाघवे । कर्णमन्याशिरःशूले स्वरभेदे गलग्रहे ॥ अर्दितैकाङ्गसर्वाङ्ग पक्षावाते विनामके । कोष्ठानाहविबन्धेषु शुक्राघाते विजृम्भिके ॥ पार्श्वपृष्ठकटीकुक्षिसंग्रहे गृध्रसीषु च । मूत्रकृच्छ्रे महत्त्वे च मुष्कयोरङ्गमर्दने ॥ पादोरुजानुजङ्घार्तिसंग्रहेश्चयथावपि । खल्लीष्वामेषु शीते च वेपथौ वातकण्टके ।। सङ्कोचायामशूलेषु स्तम्भगौरवसुप्तिषु । सर्वेष्वेव विकारेषु स्वेदनं हितमुच्यते ॥
जन्मप्रभृति बालानां स्वेदमष्टविधं भिषक् । प्रयुञ्जीत यथाकालं रोगदेहव्यपेक्षया ।।२५।।
जन्म से लेकर चिकित्सक बालकों में यथाकाल रोग तथा शरीर (शारीरिक बल) के अनुसार आठ प्रकार का स्वेदन प्रयुक्त करें।
हस्तस्वेदः प्रदेहश्च नाडीप्रस्तरसंकराः । उपनाहोऽवगाहश्च परिषेकस्तथाऽष्टमः ।।२६।।
आठ प्रकार के स्वेद—(१) हस्तस्वेद (२) प्रदेह (३) नाडी-स्वेद (४) प्रस्तरस्वेद (५) सङ्करस्वेद (६) उपनाह (७) अवगाह तथा (८) परिषेक।
वक्तव्य--चरक में स्वेदों की संख्या इससे अधिक दी है। वहां मुख्य रूप से अग्निस्वेद एवं अनग्निस्वेद (जिनमें अग्नि का सम्पर्क न हो) दो भेद देकर अग्निस्वेदों के पुनः १३ भेद दिये गये हैं—सङ्करः प्रस्तरो नाडी परिषेकोऽवगाहनम् । जेन्ताकोऽश्मघनः कर्षुः कुटीभूकुष्मिकैव च ।। कूपो होलाक इत्येते स्वेदयन्ति त्रयोदश ।। सुश्रुत में केवल चार प्रकार का स्वेद गिनाया है—१. तापस्वेद २. ऊष्मस्वेद ३. उपनाहस्वेद ४. द्रवस्वेद । चरक में इनके अतिरिक्त दूसरे प्रकार के स्वेदन वे दिये हैं जो अग्नि के गुण के बिना ही स्वेदन करते हैं अर्थात् इनमें अग्नि का सम्पर्क नहीं होता है। ये १० गिनाये गये हैं—व्यायाम उष्णसदनं गुरुप्रावरणं क्षुधा। बहुपानं भयक्रोधावाहवातातपवातपाः ॥ स्वेदयन्ति दशैतानि नरमग्निगुणादृते ।। इनमें साक्षात् बाह्य अग्नि का सम्पर्क नहीं होता है। ये अपने उष्ण स्वभाव के कारण ही स्वेदन करते हैं। इसी प्रकार अनग्निस्वेदों के विषय में सुश्रुत में कहा है—कफ मेदोऽन्विते वायौ निवातातपगुरुप्रावरणनियुद्धाध्वव्यायामभारहरणामर्षैः स्वेदमुत्पादयेत् ।। परन्तु यहां केवल आठ स्वेदों का वर्णन किया है। यहां वे ही स्वेद दिये गये हैं जो बालकों को सुविधा पूर्वक दिये जा सकते हैं। क्योंकि इस संहिता में विशेष रूप से बालकों का ही विषय दिया गया है।
जातस्य चतुरो मासान् हस्तस्वेदं प्रयोजयेत् । अप्रमादी निवातस्थो विधूमाग्न्यूष्मणा शनैः ।।२७।।
हस्तस्वेद का विधान—उत्पन्न हुए बालक को चार मास तक प्रमादरहित होकर निवातस्थान (जहां सीधी एवं तेज हवा न आती हो) में बैठकर धुएं से रहित अग्नि की ऊष्मा के द्वारा धीरे २ हस्तस्वेद का प्रयोग करे।
वक्तव्य—हस्तस्वेद का तात्पर्य अग्नि के द्वारा अपने हाथों को गरम करके उससे बालक के शरीर को स्पर्श करना है। छोटे बालक को विशेषकर शीतऋतु में गरम रखने की आवश्यकता होती है परन्तु उस अवस्था में बालक बहुत अधिक नाजुक (Sensitive) होते हैं। वे जरा भी अधिक उष्णता को सहने में असमर्थ होते हैं। हाथों के द्वारा स्वेदन करने का उद्देश्य यह है कि बालक को कहीं अधिक स्वेदन न दे दिया जाय। अपने हाथों को गरम करने से व्यक्ति को पहले अग्नि का अपने शरीर पर अनुभव हो जाता है इससे बालक को अधिक उष्णता लगने की सम्भावना बिलकुल कम रहती है। इस प्रकार बालक को निर्भयतापूर्वक स्वेदन दिया जा सकता है। परन्तु स्वेदन करते हुए यह ध्यान रखना चाहिये कि ऐसे स्थान पर न बैठा जाय जहां सीधी एवं तेज हवा आती हो। तथा अग्नि भी धूम्र रहित होनी चाहिये अन्यथा बालक के नेत्रों तथा श्वासमार्ग में कष्ट होगा।
निवर्तमाने बालस्य सौकुमार्ये यथाक्रमम् । प्रवर्त्तमाने काठिन्ये तेषां स्वेदं प्रवर्धयेत् ।।२८।।
धीरे २ बालक की सुकुमारता (Delicacy) हटकर शरीर में कठिनता (कठोरता) आने पर उनका स्वेदन बढ़ाना चाहिये।