भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 398

४० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् स्वेदाध्यायः २३]

सन्ति चाप्यपरे बालाः सुकुमाराः सदासुखाः । घृतक्षीराशिनः कल्या ईश्वराणां महात्मनाम् ।।२९।।

कुछ बालक ऐश्वर्यशाली महापुरुषों के पुत्र होते हैं। वे सुकुमार तथा सदा सुखी होते हैं, उन्हें खाने पीने को पर्याप्त घृत तथा दूध मिलता है तथा वे स्वस्थ होते हैं।

मध्यमा मध्यमानां च दरिद्राणां च दुःखिनाम् । निषेकदेशसात्म्ये च तान् विद्यात् पण्डितो भिषक् ।।३०।।

दूसरे बालक मध्यम कहलाते हैं जो मध्यम श्रेणी वालों के तथा दरिद्र एवं दुखी व्यक्तियों के पुत्र होते हैं। इसलिये बुद्धिमान चिकित्सक को चाहिये कि इनके निषेक (उत्पत्ति) तथा देश (स्थान) के सात्म्य को जाने। अर्थात् चिकित्सक बालक के घराने (कुल) का ज्ञान प्राप्त करे तथा यह भी जाने की उसका पालन-पोषण किस प्रकार की स्थिति (धनी अथवा निर्धन) में हुआ है। जिससे वह प्रत्येक बालक की पृथक् २ परिस्थिति के अनुसार चिकित्सा का विधान कर सके।

अविशेषेण बाधन्ते सर्वे सर्वान्ररान् गदाः । विशेषस्तु महान् दृष्टो दक्षिणाहारभेषजे ।।३१।।

सब प्रकार के रोग सब प्रकार के मनुष्यों को बिना भेद भाव के कष्ट पहुंचाते हैं। अर्थात् रोग धनी एवं निर्धन के भेद के बिना ही सब लोगों को समान रूप से आक्रान्त करते हैं। अन्तर (भेद) केवल दक्षिणा (धन) आहार तथा ओषधि में होता है। धनी एवं निर्धन व्यक्ति में अन्तर केवल आर्थिक परिस्थिति का ही होता है। रोग की दृष्टि से कोई अन्तर नहीं है अर्थात् रोगों से धनी व्यक्ति भी नहीं बच पाते हैं। केवल धन होने के कारण वे अच्छी से अच्छी ओषधि एवं पथ्य का सेवन कर सकते हैं जबकि निर्धन व्यक्ति को धन के अभाव में अधिक कष्टों को झेलना पड़ता है।

देशकालवयोमात्रासर्व्रगुरुलार्घवैः । स्वेदोऽतिरिक्तो हीनो वा हन्याद्बालं यथा विषम् ।।३२।।

देश, काल, अवस्था, मात्रा तथा सब प्रकार के रोगों की गुरुता अथवा लघुता की दृष्टि से अतिस्वेद तथा हीनस्वेद विष के समान बालक को मार देते हैं। अर्थात् बालक को स्वेद देते समय यह ध्यान रखना चाहिये कि किसी भी दृष्टि से स्वेद का अतियोग तथा अयोग न हो।

तस्मादवेक्ष्य देशादीन् काठिन्यं सुकुमारताम् । शिशोः स्वेदं प्रयुञ्जीत यशोधन्या (र्मा) र्थसिद्धये ।।३३।।

इस लिये यश, धन्यवाद (अथवा धर्म) तथा धन की प्राप्ति के लिये चिकित्सक को चाहिये कि वह देश, काल, अवस्था आदि तथा कठोरता एवं सुकुमारता को दृष्टि में रखते हुए बालक को स्वेदन का प्रयोग करावे।

गलकर्णशिरोमन्याकर्णाक्षिचिबुकोरसि । अभिष्यन्दात् समुच्छूने प्रदेहस्वेद इष्यते ।।३४।।

प्रदेहस्वेद कहां देना चाहिये—गलकर्ण, शिर, मन्या, कर्ण, आँखों, चिबुक (ठोडी-Chin) तथा छाती में और अभिष्यन्द रोग के कारण शरीर में शोथ होने पर प्रदेह स्वेद करना चाहिये।

वक्तव्य—प्रदेह स्वेद से अभिप्राय प्रलेप (लेप करने) से है।

एरण्डवृषशिग्रूणां त्वक्पत्रैः कल्कसाधितैः । समूत्रबुक्क(किण्व)लवणैः प्रदेहः स्यात् सुखोष्मभिः ।।३५।।

शीतीभूतं तु निर्मृज्य लेपयेदपरापरम् । अनेकशस्तु विज्ञाय स्विन्नं स्वेदं निवर्तयेत् ।।३६।। द्रव्यैर्वातकफघ्नैश्च प्रदेहः शिग्रुवद्धितः । अन्यैरपि करीषैश्च गोखराश्वाविबस्तजैः ।।३७।।