काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंस्वेदाध्यायः २३] सूत्रस्थानम् ४१
प्रदेहस्वेद की विधि—एरण्ड, बांसा तथा सुहांजने की त्वचा (छाल) तथा पत्तों का कल्क (लुगदी) बनाकर उसमें गोमूत्र बुक्क—(अग्रमांस-हृदय का मांस) अथवा किण्व (सुराबीज-yeast) तथा सैन्धव डालकर उस कल्क की हल्की गर्मी के द्वारा प्रदेहस्वेद किया जाता है। ठण्डा हो जाने पर पूर्व लेप को उतार कर दूसरा लेप कर देना चाहिये। इस प्रकार अनेक तरह से (पर्याप्त) स्विन्न (पसीना आया हुआ) जानकर उस स्वेद (प्रदेह) को हटा दे। इसी प्रकार अन्य वात एवं कफनाशक द्रव्यों-तथा गौ, गदहे, घोड़े भेड़ तथा बकरी के पुरीष (गोबर-उपलों) के द्वारा किया गया प्रदेह (प्रलेप) भी सुहांजने की तरह ही हितकारी होता है।
वक्तव्य—पहले लेप के ठण्डा हो जाने पर दूसरा लेप कर दे तथा उसके भी ठण्डा हो जाने पर तीसरा नया लेप कर देना चाहिये इस प्रकार लेपों के द्वारा जब पसीना आजाय तब लेपों के द्वारा स्वेदन बन्द कर देना चाहिये।
वंशमुञ्जनलाद्यैश्च यथायोगं यथासुखम् । नाडीस्वेदं प्रयुञ्जीत निवाते वस्त्रसंवृतम् ।।३८।।
नाडी स्वेद की विधि—बांस, मूंज तथा नल आदि के द्वारा आवश्यकता के अनुसार वस्त्रों से ढककर निवातस्थान में बैठकर सुखपूर्वक नाडीस्वेद का प्रयोग करे। चरक सू. अ. १४ में नाडीस्वेद की विधि निम्न प्रकार से दी है—
स्वेदनद्रव्याणां पुनर्मूलफलपत्रशुङ्गादीनां मृगशकुनिपिशितशिरः-पदादीनामुष्णस्वभावानां वा यथार्हमम्ललवणस्नेहोपसंहितानां मूत्रक्षीरादीनां वा कुम्भ्यां वाष्पमनुद्गमन्त्यामुत्क्वथितानां नाड्याशरेषीकावंशदलकरञ्जार्कपत्रान्यतमकृतया गजाग्रहस्तसंस्थानया व्यामदीर्घया व्यामार्धदीर्घया वा व्यामचतुर्भागाष्टभागमूलाग्रपरिणाहस्रोतसा सर्वतो वातहरपत्रसंवृतच्छिद्रया द्वित्रिर्वा विनामितया वातहरसिद्धस्नेहाभ्यक्तगात्रो वाष्पमुपहरेत्, वाष्पो ह्यनूर्ध्वगामी विहतचण्डवेगस्त्वचमविदहन् सुखं स्वेदयतीति नाडीस्वेदः ।। सुश्रुत चि. अ. ३२ में कहा है—
पार्श्वच्छिद्रेण वा कुम्भेनाधोमुखेन तस्य मुखमभिसन्धाय तस्मिंश्छिद्रे हस्तिशुण्डाकारां नाडीं प्रणिधाय तं स्वेदयेत् । सुखोपविष्टं स्वभ्यक्तं गुरुप्रावरणावृतम् । हस्तिशुण्डिकया नाड्या स्वेदयेद्वातरोगिणम् ।। सुखा सर्वाङ्गगा ह्येषा न च क्लिश्नाति मानवम् । व्यामार्थमात्रा त्रिवक्रा हस्तिहस्तसमाकृतिः ।। स्वेदनार्थे हिता नाडी कलिङ्गी हस्तिशुण्डिका ।। इसी प्रकार अष्टाङ्ग हृदय में भी नाडी स्वेद का विधान दिया गया है।
उष्णान् पुलाकानास्तीर्य पायसं कृसरादि वा ।
वाससान्तरिते(तं) बालमभ्यक्तं शाययेत् सुखम् ।।३९।।
पद्माङ्गुलोरुबूकार्कपत्रैर्वा स्नेहितोष्णितैः । प्रस्तरस्वेदमित्याहुरभीक्ष्णपरिवर्तिनः ।।४०।।
प्रस्तरस्वेद की विधि—गरम किये हुए पुलाक (क्षुद्रधान्य) अथवा तुष, पायस (खीर) अथवा कृशरा (खिचड़ी) को बिछाकर (फैलाकर) उस पर श्वेत एरण्ड, लाल एरण्ड तथा आक के पत्तों पर स्नेह लगाकर उन्हें गरम करके बिछा दें उन पर अच्छी प्रकार अभ्यक्त किए हुए (स्नेह की मालिश किये हुए) बालक को वस्त्रों से ढककर सूखपूर्वक लिटा दें। इसे प्रस्तरस्वेद कहते हैं। इसे निरन्तर बदलते रहना चाहिये। चरक सू. अ. १४ में कहा है—
शूकशमीधान्यपुलाकानां वेशवारायसकृशरोत्कारिकादीनां वा प्रस्तरे कौशेयाविकोत्तरप्रच्छदे पद्माङ्गुलोरुबूकार्कपत्रप्रच्छदे वा स्वभ्यक्तसर्वाङ्गस्य शयानस्योपरि स्वेदनं प्रस्तरस्वेद इति विद्यात्। सुश्रुत चि. अ. ३२ में कहा है—कोशधान्यानि वा सम्यगुपस्वेद्यास्तीर्य कलिञ्जेऽन्यस्मिन् वा तत्प्रतिरूपके शयानं प्रावृत्य स्वेदयेत् । एवं पांशुगोशकृत्तुषबुसपलालोष्मभिः स्वेदयेत् । इसीलिए अष्टाङ्गसंग्रह में भी कहा है—यथार्हस्वेदद्रव्याणि पिहितमुखायामुखायां सम्यगुपस्वेद्य निवातशरणशयनस्थे कलिञ्जे प्रस्तीर्याविककौशेयवातहरपत्रान्यतमोत्तरप्रच्छदे रौरवाजिनप्रावारादिभिः स्ववच्छन्नं स्वेदयेदिति संस्तरस्वेदः ।।